अंत्येष्टि में अस्सी प्रतिशत लकड़ी कैसे बचाए ?

एक शव को जलाने में सामान्यतः तीन सौ से पाँच सौ किलो लकड़ी प्रयोग में आती हैं।जबकि पाण्डिचेरी में एक शव को जलाने में मात्र तीस से पचास किलो जलाऊ लकड़ी चाहिए।इसमें एक इंच से मोटी लकड़ी नहीं चाहिए।इस तरह दसवें भाग की लकड़ी से ही दाह सँस्कार हो जाता है अर्थात दो सौ सत्तर से चार सौ पचास किलो प्रति दाह संस्कार से लकड़ी बचेगी। एक गणना के अनुसार हमारे देश में प्रति वर्ष सत्तर लाख शव जलाए जाते है जिसमें पांच से छ : करोड़ पेड़ काटे जाते हैं। नई विधि अपनाने से सिर्फ़ पचास से साठ लाख पेड़ कटेंगे।

कम लकड़ी से दाह संस्कार करने की विधि :-

सबसे पहले छ फ़ीट लम्बे व दो फीट चौडॉ व दो- तीन इंच गहरा खड्डा कर उसके चोरों ओर ईंट के टुकड़ों की बाउंड्री बनाई जाती है,जिसमें बीच बीच मे खाली स्थान हवा पास करने हेतु रखे जाते हैं। इस खड्डे को पतली पतली लकड़ी से भर दी जाती हैं।

 

पांडिचेरी में केजुरिना की पतली लकड़ी रख देते हैंlउसके ऊपर शव को रखते हैं।फिर दो ईंटो की बाउंड्री बनाई जाती हैं। इसमे भी हवा के पास होने के लिये खाली जगह रखते हैं। कुछ पतली लकड़िया खाली किनारों में भरी जाती हैं। इसके बाद पतले उपलों की दो परते बिछाई जाती हैं। उसके ऊपर घास या पुआल बिछाई जाती है फिर लाल मिट्टी से ऊपर ऊपर लिपाई कर देते हैं।इस तरह वह भट्टी बन जाती है।
इसके बाद धार्मिक संस्कार कर ईंटो के बीच घी, या ज्वलन शील पदार्थ से आग लगाई जाती हैं।
तीन से चार घंटे में शव पूरा जल जाता हैं। मात्र तीन व चार किलो राख व हड्डियां बचती हैं।

इस तरह शव को जलाने में अस्सी प्रतिशत लकड़ी बच जाती हैंl धन भी कम लगने से आर्थिक रूप से लाभदेय हैंlहवा में धुआं कम पहुचेगा इससे प्रदुषण भी कम होगाl सभी तरह से हितकर हैl यह विधि पॉन्डिचेरी में प्रयुक्त होती हैl लेखक  से विस्तृत जानकारी हेतु ९४१४२८९४३७ पर सम्पर्क करें l

( श्याम कुमारी,  सौम्य बब्लेस्वर व दिलीप , श्री अरविन्द आश्रमवासियों का आभार)

 

शौच करने की सही विधि ताकि बवासीर आदि रोग न हो

विधिपूर्वक शौच करने से दातों के रोग, लकवा ,बवासीर व् कई अन्य रोग नहीं होते हैl  उषःपान(प्रातः जल सेवन) के बाद कुछ देर घुमने से मलत्याग सरलता से होता हैl न हो तो पवन मुक्तासन,ताड़ासन व कटी  चक्रासन करें l

विधि:

भारतीयशैली के टॉयलेट का उपयोग करें l  शौच  हेतु  उकड़ू आसन में बैठेl  पश्चिमी शैली की टॉयलेट के प्रयोग में मलद्वार पूरा नहीं खुलता है, न हीं पेट पर दबाव पड़ता हैl

दोनों हाथ ठुड्डी को पकडे रहे व दांत भींच कर रखे l  शौच या पेशाब के समय दांतों के जबड़ों को आपस में दबाकर रखने से दांत मजबूत रहते हैं।

मल छोड़ते वक्त दांतों को और भींचे और श्वास फेकेंl

शौच करते वक्त मुहं बंद रखे l  तत्समय पढ़ना – बोलना उचित नहीं हैl

सहजता से मलत्याग न होने पर कुछ लोग जोर लगाकर शौच करते हैं किंतु ऐसा करना ठीक नहीं हैl

मल आपके स्वास्थ्य को दर्शाता है, बहुत सूखा या पतला, दुर्गन्धयुक्त, चिपचिपा, रक्त या  सफ़ेद झाग युक्त मल रोग को दर्शाता हैl

 

इजरायली शोधकर्ता डॉ. बेरको सिकिरोव ने अपने शोध के निष्कर्ष में पाया कि सिटिंग मेथड कब्जियत का करण बनती है, जिसके कारण व्यक्ति को मल त्यागने के लिए लगभग तीन गुना अधिक जोर लगाना पड़ता है, जिसके कारण चक्कर और हृदयतंत्र की गड़बड़ियों के कारण लोग मर जाते हैं।

२४ घंटे ॐ साधना :अंतर्यात्रा की दिशा में एक कदम

गृहप्रवेश के पूर्व बेंगलोर में २४ घंटे अखंड जप अक्षय तृतीया पर करने का अवसर मिलाl पहली बार इस तरह की साधना की l एक मित्र ने वहाँ पर नकारात्मकता शक्ति  होने की बात बताई थी lप्रारम्भ में बहुत उत्साह था लेकिन भीतर डर भी था की पूरी कैसे करेंगे l घी का दीपक कर मीना और मैंने निरन्तर २४ घंटा तक ॐ का जप किया l

चारो तरफ सकारात्मक बढ़ी l घर में डर समाप्त हुआ l रात्रि में सघन नीद आने लगी l इसके जप  से शारीरिक ,मानसिक व आध्यात्मिक शांति महसूस हुई lइससे चेतना में नई ऊर्जा  व सक्रियता का बोध  हुआ l  एकाग्रता बढ़ी l थकान,बैचेनी ,निराशा  एवं आलस्य घटा lबहुत सुखद परिणाम आये

 

गुरु की प्राप्ति कैसे हो ?

एक गुरु बहती हुई सूक्ष्म शक्तियों का केंद्र होता हैं l किसी सत्संग में जाए ,जहा पर आपको शांति मिले व अच्छा लगेl किसी आध्यात्मिक मिलन या योग केंद्र में जाएं l धैर्य पूर्वक खोजते रहे l गुरु की खोज एक प्रतीक्षा है।
कभी भी गुरु के प्रति बहुत तार्किक न हों क्योकि बहुतसी ऐसी चीजें है जो आप समझ नहीं सकते और गुरु आपको समय से पहले समझा नहीं सकता ,अतः केवल विश्वास पर रहें ,अति तर्क आपमें अश्रद्धा उत्पन्न कर सकता है ,जबकि आप गलत भी हो सकते हैं ,क्योकि ऊर्जा संरचना और प्रकृति का विज्ञान गुरु ही समझ
सकता हैl
ओशो ने तो बताया है कि गुरु को शिष्यक नहीं खोज सकता। यह असंभव है । इसका कोई उपाय नहीं है। यह तो बात ही व्यबर्थ है। हमेशा गुरु शिष्यत को खोजता हे। तो जब भी आप शिष्यक होने के लिए तैयार हो जाते है गुरू प्रकट हो जाता है। आप प्यास व पात्रता पैदा करे वह आपको खोज लेगा। फिर आप बच नहीं सकते। वह आपको खोज लेगा। फिर आपके बचने का कोई उपाय नहीं है। इसलिए बड़ी चीज गुरु को खोजना नहीं है, बड़ी चीज शिष्ये बनने की तैयारी है। आप गड्ढे बन जाएं; पानी बरसेगा और झील भर जायेगी।

गुरु एक मार्गदर्शक ज्योति होता है lयह एक तत्व के रूप में भी है एवं यह एक व्यक्ति के रूप में भी हो सकता है l इसको खोजना कठिन है चुकि कोई हमारा शोषण भी कर सकता हैं l

योग मुद्रा द्वारा शरीर ,मन ,एवं प्राण ऊर्जा में संतुलन होने से रोग ठीक होते हैं

सहज व्रतिजन्य आदतो   एवं अचेतन प्रतिक्रियाओ  के फलस्वरूप हम एक तरह की मुद्राए बनाएं रहते है जिसके कारण प्राण  अवरुद्ध रहते है l इस चक्र को तोड़ने हम  तरह तरह की मुद्राओ  का अभ्यास करते हैंl

मुद्रा एक विशिष्ट साधना-पद्धति होती है जो तुरन्त फलदायी होती है । अर्थात् जिस लक्ष्य को धारण करके मुद्रा की जाती है  वह मुद्राओं से तुरन्त प्राप्त हो जाता है । भिन्न-भिन्न उद्देश्यों की पूर्ति हेतु भिन्न-भिन्न मुद्रायें करनी पड़ती है ।

अंगुलियों के पांचों वर्ग से अलग-अलग विद्युत धारा बहती है। इसलिए मुद्रा विज्ञान में जब अंगुलियों का योगानुसार आपसी स्पर्श करते हैं, तब रुकी हुई या असंतुलित विद्युत बहकर शरीर की शक्ति को पुन: जाग देती है और हमारा शरीर निरोग होने लगता है। ये अद्भुत मुद्राएं करते ही यह अपना असर दिखाना शुरू कर देती हैं।

प्राण के बिखराव को रोकने मुद्रा का अभ्यास किया जाता हैl इससे मन अन्तर्मुखी हो जाता हैंl  मुद्राओ के करने से  कोशों में प्राणिक संतुलन होता है अथार्त अन्नमयकोश,मनोमय कोश व प्राणमय कोश के बीच सीधा  सम्बन्ध स्थापित होता हैं- जिससे सूक्ष्म ऊर्जा उपर के चक्रों में जाती है l इससे चेतना विकसित होती है lशरीर,मन ,एवं प्राण  मुद्रा द्वारा जुड़ते है l

 

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