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यदि आप नहीं बदलते हैं तो कुछ नहीं बदलेगा

हम अपनी आदतों व धारणाओं में जीते हैं । उन्हीं मे अपने को सुरक्षित समझते हैं । फलस्वरूप हम नई धारणा ग्रहण कम करते है । अर्थात अपने को बदलते नही है । जबकि समय के साथ परिवर्तन जरूरी है । जो लोग नहीं बदलते है वह रूक जाते है । उनकी सोच व धारणाओं के बन्दी होकर रह जाते हैं । अन्धी धारणाओं के शिकार श्रीमाधोपुर में शिवजी से मिलने के क्रम में पूरे परिवार ने जहर खा लिया। यह नहीं बदलने व अपनी धारणाओं को सच मानने का ज्वलंत उदाहरण है । Change for Success
जो लोग धारणाओं को तोल नहीं पाते है, वे उसे सच मानकर सोच बन्द कर देते हैं । एक तरह से कहे कि उन्हे सोचना नहीं आता है । उनकी उन्नति रूक जाती है । मेरी एक घनिष्ठ साथी जिनका वजन बढ़ता जा रहा था । वे वजन घटाने की बात सुनती नहीं थी । उन्होने अपनी धारणाओं के विरूद्ध बदलना स्वीकार नहीं कर आत्महत्या कर ली ।
हमारे नहीं बदलने के कई कारण है । पहला कारण ‘‘मै भी समझता हूं’’ की धारणा व्यक्ति को सच महसूस कराती है । दूसरा कारण बदलने के खतरे से भी व्यक्ति बच जाता है । धारणा बदलने पर नए कर्म करने पड़ते है, जिससे व्यक्ति बचना चाहता है । अतः व्यक्ति बदलता नहीं है ।
जो समय के साथ नहीं बदलते हैं वे टुट जाते है । अतः समय के साथ बदलने वाले जीतते है ।

 

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इच्छा शक्ति से सफलता कैसे पाए ?

सफलता का मंत्रः रतन टाटा के अनुसार

 “भूख रखिए, नासमझ बने रहिए”स्टीव जाॅब्स

सफल होने ए. पी. जे. अब्दुल कलाम की प्रार्थना “अदम्य साहस जगाइए!”रोज करें

 

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दुनिया में सबसे दुःखी कौन है?

एक बार  दरबार में चर्चा हो रही थी कि सबसे दुःखी व्यक्ति कौन है। अलग-अलग लोग अलग-अलग राय रख रहे थे। अन्त में दरबारी इस बात पर सहमत हुए कि गरीब व बीमार व्यक्ति सबसे अधिक दुःखी होता है।

लेकिन राजा इससे संतुष्ट नहीं हुआ। उसने अपने बुद्धिमान मंत्री चतुरनाथ की तरफ देखा जो कि चुपचान सुन रहे थे। चतुरनाथ ने कहा कि सबसे ईष्र्या एवं द्वेष (मत्सर, डाह) रखने वाला व्यक्ति सबसे ज्यादा दुःखी होता है। वह दूसरे का सुख देखकर दुःखी होता है। उसका मस्तिष्क शांत नहीं रहता है। वह सदैव शंका करता है, आशंकित रहता है एवं दूसरों की अच्छाई एवं उन्नति देखकर घृणा करता है। ऐसा व्यक्ति सबसे ज्यादा दुःखी रहता है।

वैसे एक पते की बात कि   मुझसे ज्यादा  दुखी कोई नहीं है!

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जीवन में मनोदशा का महत्व

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अन्तर्मन में चलते द्वन्दों का सामना कैसे करें ?

वास्तव में हम मन में चलते व्यर्थ के विचारों से परेशान है । प्रेम, शान्ति, माधुर्य और आनन्द को विचारों ने घायल कर रखा है । अन्यथा जीवन में कोई परेशानी नहीं है ।
हमारे मन के भीतर अंहकारी दुर्योधन बैठा है, जो सदैव दुश्चक्र रचता रहता है। भीतर बैठा स्वार्थ का शकुनि हमें नचाता हैे। हमारे मन के भीतर एक दुःशासन भी बैठा हुआ है जो अवसर मिलने पर द्रोपदी को नंगा करता रहता हैं। हमारे मन का रावण कई बार सीता का अपहरण करता है। हमारे भीतर बैठा कंस अपनी रक्षा के लिए दूसरों के साथ अत्याचार करता रहता हैं। कंस अपने भांजे कृष्ण को जन्मते ही मारना चाहता है , उसी तरह हम अपने स्वार्थ के लिए अपनो को मारने के लिए तत्पर है। भीतर बैठा शिशुपाल अपने घमंड को स्थापित करने दूसरों को अनवरत सताता हैं।

जीवन के बाहययु़द्ध में तो अन्ततः हार ही होती हैं। विश्वविजेता सिकन्दर तक बाहययुद्ध में हारा- हम क्या चीज हैं? पौराणिक कथा के अनुसार ययाति एक हजार वर्ष जीकर भी तृृृप्त न हुआ। उसकी इच्छाऐं पूरी न हुई । कुरुक्षेत्र भूलोक में कहीं बाहर हैं या नहीं, मैं नहीं जानता लेकिन हमारे मन में निश्चित हैं। इसे देख सकता हूं। महाभारत का युद्ध ऐतिहासिक हैं या नहीं, मैं नहीं जानता, लेकिन मन में चलने वाली महाभारत को मैं रोज देखता हूं। यहां कौरव-पाण्डवों का युद्ध हुआ की नहीं, यह घटना ऐतिहासिक हैं या नहीं, मैं नहीं जानता। परन्तु हमारे मन में रोज महाभारत लड़ी जाती हैं। विषय वासना व सत्य के बीच, भलों व बुरे के बीच, सत्य -झूठ के बीच, काम व अकाम के बीच, धर्म व अधर्म के बीच युद्ध जारी हैं। अन्यायी दुर्योधन व धर्मात्मा युधिष्ठिर मन में रोज लड़ते रहते हैं। यह करुं या नहीं, इधर जाए या नहीं, इस तरह जीउं या नहीं, यह उचित हैं या अनुचित का विश्लेषण मन में चलता रहता हैं।
कृष्ण द्वारा अर्जुन का बताया मार्ग गीता में है । जीवन में ’’जो है’’ उसको स्वीकारते हुए उसका पूर्ण होश से सामना करो । निर्लिप्त भाव से ’’जो है’’ उसका सामना करोें । गीता कहती है अपने अधिकारों के लिए लडाई भी जायज है ।

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आप अद्वितीय एवं अनुपम:आपका मस्तिष्क दुनिया का सबसे बड़ा सुपर कम्प्यूटर

विश्व के सबसे बड़े सुपर कम्प्यूटर का मालिक अमेरिका नहीं है। विश्व के सबसे बड़े सुपर कम्प्यूटर के मालिक आप हैं। यह आपके बालों के ठीक नीचे है। फिर भी हमारी हालत दयनीय क्यों है ? क्योंकि इस सुपर कम्प्यूटर को आॅपरेट करना हमको नहीं आता है, और यह यंत्र हमें चलाने वाला बन गया है। जिसे मनुष्य को चलाना चाहिये वह मनुष्य को चला रहा है। यंत्र बेचारा क्या करे, आॅपरेटर के अभाव में स्वयं चल पड़ा है। यह व्यक्तिगत कम्प्यूटर सार्वजनिक हो गया है। यह चेतन कम्प्यूटर यांत्रिक रूप से चल रहा है, क्योंकि इसे समाज, विचारधारा, पड़ौसी, अतीत, इज्जत, महत्त्वाकांक्षा, भय आदि शक्तियां चला रहीं हैं। जब जिसका कोई मालिक नहीं होता तो सारी दुनिया उसकी मालिक हो जाती है। आप सोये हुए हैं और अन्य शक्तियां आपके कम्प्यूटर को चला रही हैं जिसका नतीजा सामने है। हमारा समस्त जीवन नकारात्मक हो गया है। हम स्वतः ही अपने को नहीं पर को देखते हैं। जगत की या स्वयं की हर कमी, हर चीज के लिये दूसरों को जिम्मेदार ठहराते हैं। सदैव खामियों, कमजोरियों को ही देखते हैं। हम इच्छापूर्वक विचार करते नहीं है। विचार हमको जहां-तहां ले जाते हैं। हम कईं बार नकारात्मक आवेग में फंस जाते हैं।
आज का विकसित विज्ञान भी मस्तिष्क के बराबर की क्षमता का कम्प्यूटर बनाये तो उसे 10 घन किलोमीटर जगह चाहिये। 10 किलोमीटर लम्बी, 10 किलोमीटर चैड़ी एवं 10 किलोमीटर ऊंची जगह की जरुरत पड़ती है।
आपके मस्तिष्क की प्रत्येक कोशिका एक समय में 3 करोड़ घटनाएं प्रोसेस कर सकती हैं जो कि दनिया के सबसे बड़े सुपर कमप्यूटर की गति से बहुत अधिक है। एक मानव मस्तिष्क में 28 अरब कोशिकाएं होती हैं।

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उत्तरी भारत में होली पर बच्चे की ढून्ढ क्यों करतेहै?

प्राचीन कथानुसार राजा पृथु के समय कुटिल ढुन्ढा नाम की एक राक्षसी थी जो बच्चों को परेशान करती थी,चुराया करती थी,उसके भय से बच्चे बीमार हो जाते थे एवं वह उन्हे खा जाती थी । इस कारण बच्चे उससे बहुत डरते थे।उसे वरदान प्राप्त था लेकिन शिव के शाप के कारण बच्चो की शरारत से मुक्त नही ंथी।वह नकारात्मकता का प्रतीक थी ।उससे सुरक्षा हेतु तत्समय के राजपुरोहित ने एक उपाय सुझाया था ताकि बच्चे उसके झांसेमें न आए । फाल्गुन मास की पूर्णिमा को समूह में बच्चे जब किलकारियां करते हुए उसके पास जाते है तो वह अप्रभावी हो जाती है ऐसे में  बच्चे उसे चिल्लाते हुवे जला देते है।इस तरह बच्चे भय से मुक्त हो जातेहै।इसलिए होली के दिन बच्चों को अग्नि के चारों ओर समूह में शोर करते हुवे घुमाया जाता है । इसी प्रक्रिया को ढून्ढ कहा जाता है अर्थात् राक्षसी ढुन्ढा के डर को बच्चों के मन से निकालने हेतु ढून्ढ की जाती है ।वैसे ही नकारात्मकता अर्थात् राक्षसवृति से बच्चों को मुक्त रखने के लिए ढून्ढ की जाती है ।असद को पराजित कर सदवृति को स्ािापित करने हेतु होली मनाते है ।प्रहलाद अर्थात् सत्य की जय होती है । इसीलिए ढंूढ होली के दिन मनाई जाती है ।
यह बच्चो ंको निर्भय बनाने का त्यौहार है । बच्चों के मन में बैठे डर को भगाने हेतु मनाया जाता है ।इस तरह  यह अभय को सिखाने का त्यौहार है । नवजात को जीवन से परिचय कराने काअवसरहै । पुराने समय मेंबच्चे के जन्म की खुशी भी ढून्ढ पर ही मनाई जाती है । तब   जन्मदिन नही ंमनाते थे।

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अपने भीतर देखो, उसे संभालों सफलता निश्चित है

हमारे जीवन में अंतर्यात्रा बहुत महत्वपूर्ण है। हमारे सारे कार्यो के लिए अंदर की सोच व भाव ही जिम्मेदारहै। अण्डा अगर बाहर से फूटे तो जीवन समाप्त होता है। यदि अण्डा भीतर से फूटे जो जीवन प्रारम्भ होता है।अर्थात् जीवन में अन्तर्यात्रा जरूरी है। हमारे जीवन का सारा व्यवहार भीतर से तय होता है। हम अन्दर जो है वही बाहर प्रकट करते है। बाहर की सारी क्रान्ति भीतर के परिवर्तन के अभाव में व्यर्थ है। हमारा अन्तर्मन बहुत महत्वपूर्ण है। तभी तो बाहर के सारे परिवर्तन थोड़े समय बाद बेकार हो जाते है। तभी तो बदलने हेतु अन्दर से बदलना जरूरी है।
शान्त मन आपके बाहय जीवन के उपद्रवों को भी मिटा देता है। अन्तर्यात्रा द्वारा ही स्वयं को जानना होता है। दूसरों को भूलने के लिए अन्दर से अकेले होना पड़ता है। स्वयं का ऐकान्त मिल जाने पर किसी और की जरूरत नहीं पड़ती। हमारे सारे जीवन की अव्यवस्था के अन्तर्मन की अराजकता जिम्मेदार है। जब हम अन्दर से टूटे हुए होते है तो बाहर कुछ भी अच्छा नहीं लगता। जब हमें अपने पर भरोसा नहीं होता तो हम किसी ओर पर भरोसा नहीं कर सकते। इसीलिए किसी ने कहा  है कि अपने भीतर देखो, उसे संभालों सब कुछ ठीक हो जाएगा ।

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सफलता पाने हेतु भोजन से प्राणऊर्जा कैसे प्राप्त करें?

यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि हम जन्म से भोजन करते है लेकिन यह नहीं जानते है कि कब खाना, कितना खाना और क्या खाना है।

एक बार अरस्तु से उसके शिष्य ने पूछा, ‘‘सफलता का रहस्य क्या है ?’’ अरस्तु ने जवाब दिया, ‘‘सफलता का रहस्य मुँह में है।’’ शिष्य ने फिर पूछा, ‘‘कैसे?’’ तब गुरु ने बताया, ‘‘अपने आहार पर ध्यान दो और सफल होओ।’’जब आपका आहार संतुलित, पोैष्टिक व हल्का होगा तो आपकी कार्य क्षमता स्वतः ही बढ़ जाएगी। एवं जब आप गरिष्ठ व अधिक भोजन करते है तो आलस्य आपको घेर लेता है, तब आपकी कार्य क्षमता घट जाती है। इसलिए सफल होने में आहार की बड़ी भूमिका है। अच्छा आहार हमें प्राणवान बनाता है। तामसिक व अत्यधिक भोजन से व्यक्ति प्रमादी हो जाता है।

अर्थात् प्राणऊर्जा प्राप्त करने का दूसरा स्रोत है भोजन। जब हम बहुत ज्यादा खा लेते हैं या बहुत गरिष्ठ भोजन कर लेते हैं तो थक जाते है। और जिस दिन बहुत हल्का फुल्का खाना खाते हैं जैसे फल-सलाद वगैरह, उस दिन हल्का लगता है? पहली स्थिति में भारीपन और आलस्य महसूस होता है और दूसरी अवस्था में शरीर हल्का व ऊर्जायुक्त रहता है। तभी तो कहां जाता है कि जैसा खावे अन्न वैसा होवे मन। सात्विक आहार हमारी क्रियाशीलता को बढ़ाते है। मांसाहारी खाने की तुलना में शाकाहारी भोजन हमारे शरीर के लिए ज्यादा उपयुक्त है, और जल्दी पच भी जाता है। मनुष्य की पाचन प्रणाली शाकाहारी भोजन पचाने में अधिक उपयुक्त है। उदाहरण के लिए हमारे दाँत और हमारी लंबी अंतडि़यां शाकाहारी भोजन खाने और पचाने के लिए बनाई गयी हैं। बहुत ज्यादा पका हुआ या बासी खाने की तुलना में ताजा कच्चा भोजन ज्यादा प्राणयुक्त है।

प्रातः ऊर्जा युक्त नाश्ता लेना दिन भर क्रियाशील रहने के जिए जरुरी है। जैविक नाश्ता सर्वोंत्तम है। नाश्ते में अंकुरित अनाज व फल लें। तली-गली चीजें न लें। शाम का भोजन हल्का होना चाहिए। तभी तो कहावत है कि सम्राट की तरह नाश्ता करो, राजकुमार की तरह दोपहर का भोजन करो एवं भिखारी की तरह शाम का भोजन करो।

अमरीकी स्वास्थ्य संगठन के अनुसार स्वस्थ रहने के लिए हमें ताजा फल और सब्जियां हर रोज खानी चाहिए और तला हुआ भोजन कम से कम और रेशायुक्त भोजन ज्यादा से ज्यादा करना चाहिए। भोजन पर यदि हम थोड़ा सा ध्यान दें तो हम अपनी प्राणशक्ति उच्च स्तर पर बनाए रख सकते हैं।