शौच करने की सही विधि ताकि बवासीर आदि रोग न हो

विधिपूर्वक शौच करने से दातों के रोग, लकवा ,बवासीर व् कई अन्य रोग नहीं होते हैl  उषःपान(प्रातः जल सेवन) के बाद कुछ देर घुमने से मलत्याग सरलता से होता हैl न हो तो पवन मुक्तासन,ताड़ासन व कटी  चक्रासन करें l

विधि:

भारतीयशैली के टॉयलेट का उपयोग करें l  शौच  हेतु  उकड़ू आसन में बैठेl  पश्चिमी शैली की टॉयलेट के प्रयोग में मलद्वार पूरा नहीं खुलता है, न हीं पेट पर दबाव पड़ता हैl

दोनों हाथ ठुड्डी को पकडे रहे व दांत भींच कर रखे l  शौच या पेशाब के समय दांतों के जबड़ों को आपस में दबाकर रखने से दांत मजबूत रहते हैं।

मल छोड़ते वक्त दांतों को और भींचे और श्वास फेकेंl

शौच करते वक्त मुहं बंद रखे l  तत्समय पढ़ना – बोलना उचित नहीं हैl

सहजता से मलत्याग न होने पर कुछ लोग जोर लगाकर शौच करते हैं किंतु ऐसा करना ठीक नहीं हैl

मल आपके स्वास्थ्य को दर्शाता है, बहुत सूखा या पतला, दुर्गन्धयुक्त, चिपचिपा, रक्त या  सफ़ेद झाग युक्त मल रोग को दर्शाता हैl

 

इजरायली शोधकर्ता डॉ. बेरको सिकिरोव ने अपने शोध के निष्कर्ष में पाया कि सिटिंग मेथड कब्जियत का करण बनती है, जिसके कारण व्यक्ति को मल त्यागने के लिए लगभग तीन गुना अधिक जोर लगाना पड़ता है, जिसके कारण चक्कर और हृदयतंत्र की गड़बड़ियों के कारण लोग मर जाते हैं।

२४ घंटे ॐ साधना :अंतर्यात्रा की दिशा में एक कदम

गृहप्रवेश के पूर्व बेंगलोर में २४ घंटे अखंड जप अक्षय तृतीया पर करने का अवसर मिलाl पहली बार इस तरह की साधना की l एक मित्र ने वहाँ पर नकारात्मकता शक्ति  होने की बात बताई थी lप्रारम्भ में बहुत उत्साह था लेकिन भीतर डर भी था की पूरी कैसे करेंगे l घी का दीपक कर मीना और मैंने निरन्तर २४ घंटा तक ॐ का जप किया l

चारो तरफ सकारात्मक बढ़ी l घर में डर समाप्त हुआ l रात्रि में सघन नीद आने लगी l इसके जप  से शारीरिक ,मानसिक व आध्यात्मिक शांति महसूस हुई lइससे चेतना में नई ऊर्जा  व सक्रियता का बोध  हुआ l  एकाग्रता बढ़ी l थकान,बैचेनी ,निराशा  एवं आलस्य घटा lबहुत सुखद परिणाम आये

 

कैंसर का उपचार नहीं है लेकिन इसे होने से निश्चित रोक सकते है

तम्बाकू,रिफाइंड तेल व गहन अवसाद न हो तो भी कैंसर न हो इस हेतु निम्न कार्य करें :-

1 नियमित विटामिन डी ५००० IU विटामिन K2 के साथ ले– यह आपकी प्रतिरोध क्षमता बढ़ाएगाl

विटामिन डी  की कमी होने पर शरीर में निम्न रोग हो सकते है-उच्च रक्तचाप एवं ह्रदय सम्बन्धित सभी रोग ,अवसाद ,हड्डियों का निर्माण  सही तरीके से नहीं होना ,प्रतिरोध क्षमता का घटना  आदि.

गोली न लेना चाहे तो प्रतिदिन आधा घंटा धुप में बैठेl

2 मेग्निसियम ४०० mg प्रतिदिन ले-एक शोध में जिन चूहों में मैग्नीशियम की कमी थी उन्हें कैन्सर अधिक हुआ l इससे स्पस्ट होता है की मेग्नीसियम कैंसर रोधी तत्व है l घुटनों में दर्द,   उच्च रक्तचाप , मधुमेह ,शरीर में दर्द ,  मांसपेशियों में खिचाव,ऐठन,शुन्यता, झनझनाहट का कारण मैग्नीशियम की कमी हैl रक्त नलिकाओं एवं स्न्नायुओं में दर्द  एवं असुविधा का कारण भी इसकी कमी हैl

ज्यादातर सभी खाद्य पदार्थों में मैग्नीशियम आसानी से उपलब्ध  होता हैl  साबुत अनाज, फल,गहन हरी पत्तेदार सब्जियां,नट्स,फलियां सेम जैसे शाकाहारी स्रोतों में  खूब होता  हैं l मटर,  टोफू, सोयाबीन का आटा, बादाम, काजू, केला ,कद्दू, अखरोट और पूरे अपरिष्कृत अनाज भी मैग्नीशियम के अच्छे स्रोत हैं।लेकिन यह बहुत कम मात्रा में मिलता हैl इसलिए इसे अलग से लेने की जरूरत हैl

 

3 ओमेगा 3 प्रतिदिन ५०० mg ले या ३० -५० ग्राम अलसी खाएंl या कोल्ड प्रेस्सेड अलसी का आयल 2 चम्मच रोज ले  तो कैंसर  होने की सम्भावना कम है l

साथ ही नाडी शोधन प्राणायाम करने से कैंसर होने की सम्भावना नहीं के बराबर हैl

 

एसिडिटी और श्वशन रोगों से बचने कुंजल करें

हठयोग के षट्कर्म में से एक कुंजल क्रिया है जिसमे कुनकुना पानी पीकर उसे मुहं के द्वारा पुनः निकालना होता हैl 4 से 6 गिलास पानी बिना रुके पी कर उसे निकालते है l  एक लीटर पानी में एक चम्मच सेंधा नमक  मिलाते  है lमुहं में अनामिका व मध्यमा अंगूली डालकर  जीभ के निचे रगड़ते है इससे पानी बाहर आ जाता है , न आये तो 60 डिग्री पर धड को झुकाए व दूसरे हाथ से पेट को दबाने से पानी बाहर आ जाता है l  इससे आमाशय ,गला व श्वशन तंत्र में चिपका श्लेष्मा,कफ व बलगम साफ हो जाता है l आमाशय में जमा पित्त बाहर आ जाता हैl

योग का पूरा लाभ उठाने षट्कर्म अति आवश्यक

हठयोग के अनुसार योग का प्रथम चरण षट्कर्म – नेति ,धौति,बस्ति,नौली,कपाल भाति एवं त्राटक हैlआसन प्राणायाम करने का पूरा लाभ शारीरिक व मानसिक शुद्धी पर ही मिलता हैl
नेति द्वारा नासिका को,धौति द्वारा पाचन तंत्र को ,बस्ति द्वारा उत्सर्जन तंत्र को ,कपाल भाति द्वारा मस्तिष्क को शुद्ध एवं त्राटक द्वारा मन की चंचलता को कम किया जाता हैl

काम, क्रोध, लोभ, द्वेष इत्यादि मानसिक मलिनताएँ शरीर के अंदर विषैले पदार्थ उत्पन्न करते हैं। अशुद्ध भावनाओं के कारण प्राणों में असंतुलन हो जाता है। शरीर के विभिन्न अवयव इससे प्रभावित हो जाते हैं। तंत्रिकातंत्र दुर्बल हो जाता है। इसलिए शरीर को स्वस्थर और शक्तिशाली बनाने के लिए मानसिक मलिनताओं को दूर करना आवश्यक है।

भय से हृदय रोग होता है। दु:ख से तंत्रिकातंत्र असंतुलित हो जाता है। निराशा से दुर्बलता होती है। लोभ प्राणों को असंतुलित करता है जिससे अनेक प्रकार के शारीरिक रोग उत्पन्न होते हैं। अहंकार जीवन की पूर्णता का आनंद नहीं लेने देता। इससे पाचनतंत्र तथा किडनी संबंधी रोग होते हैं। अधिकांश बीमारियाँ रोगी की मानसिक विकृतियों के ही कारण हुआ करती हैं।

इसी प्रकार ध्यान से संपूर्ण शरीर में प्राणों का प्रवाह निर्बाध गति से संचारित होता है।
शारीरिक ,मानसिक व भावनात्मक शुद्धी षट्कर्म से होती है जो की आसन प्राणायाम का पूरा लाभ लेने के लिए जरूरी हैl तभी कहा जाता है की हठयोग के बिना राजयोग को प्राप्त नहीं किया जा सकता हैl