यदि आप नहीं बदलते हैं तो कुछ नहीं बदलेगा

हम अपनी आदतों व धारणाओं में जीते हैं । उन्हीं मे अपने को सुरक्षित समझते हैं । फलस्वरूप हम नई धारणा ग्रहण कम करते है । अर्थात अपने को बदलते नही है । जबकि समय के साथ परिवर्तन जरूरी है । जो लोग नहीं बदलते है वह रूक जाते है । उनकी सोच व धारणाओं के बन्दी होकर रह जाते हैं । अन्धी धारणाओं के शिकार श्रीमाधोपुर में शिवजी से मिलने के क्रम में पूरे परिवार ने जहर खा लिया। यह नहीं बदलने व अपनी धारणाओं को सच मानने का ज्वलंत उदाहरण है । Change for Success
जो लोग धारणाओं को तोल नहीं पाते है, वे उसे सच मानकर सोच बन्द कर देते हैं । एक तरह से कहे कि उन्हे सोचना नहीं आता है । उनकी उन्नति रूक जाती है । मेरी एक घनिष्ठ साथी जिनका वजन बढ़ता जा रहा था । वे वजन घटाने की बात सुनती नहीं थी । उन्होने अपनी धारणाओं के विरूद्ध बदलना स्वीकार नहीं कर आत्महत्या कर ली ।
हमारे नहीं बदलने के कई कारण है । पहला कारण ‘‘मै भी समझता हूं’’ की धारणा व्यक्ति को सच महसूस कराती है । दूसरा कारण बदलने के खतरे से भी व्यक्ति बच जाता है । धारणा बदलने पर नए कर्म करने पड़ते है, जिससे व्यक्ति बचना चाहता है । अतः व्यक्ति बदलता नहीं है ।
जो समय के साथ नहीं बदलते हैं वे टुट जाते है । अतः समय के साथ बदलने वाले जीतते है ।

 

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व्यक्ति को बदलने में अनुभव की भूमिका

अनुभव कोष की बढ़त ही आपकी बढ़त

अनुभव कोष सबसे बडी पँूजी हैं। अनुभव द्वारा ही हम बदलते हैं। हम अपनी पुरानी आदतों तक को नए अनुभव कर उन्हे बदल सकते हैं। हम अपनी धारणाओं,विचारंो व जीवन को अनुभव द्वारा बदल सकते हैं।

एक मां का बेटा उसको छोड़ किसी और की कोख से जन्म नहीं ले सकता हैं । ऐसे ही अनुभव आपके लिए कोई दूसरा प्राप्त नहीं कर सकता हैं एवं दूसरों के अनुभव से आप लाभान्वित नहीं हो सकते हैं । दूसरों के बहकावे में मत आओं । स्वयं सत्य को परखो । अर्थात् अपने अनुभवों की कसौटी पर जांचों । स्वयं के मार्ग खोजों और उसी अनुसार चलो । अपने अनुभवों को महत्व दो, उन्हैं सत्य मानो । अन्यत्र कहीं पढ़ा सुना संकेत हो सकता है, सत्य नहीं । न शास्त्र, न शब्द, न कहानी, न वचन सत्य हैं आपके अनुभव ही प्रमाण हैं । शास्त्र एवं स्मृति मृत होते है, अनुभव प्रमुख हैं ।

फीलिंग को महत्व दो । उसके प्रति सचेत हो व होशपूर्ण रहेा । अनुभव से ही रूपान्तरण सम्भव हैं । परिवर्तन मानसिक क्रिया नहीं हैं । अनुभवों के प्रति साक्षी ही सच में बुद्धिमान अर्थात् प्रज्ञावान बनाता हैं । जब आप अनुभव करते हैं तब स्व में होता। जब चर्चा कर रहे होते है तो स्व से दूर होते हैं । प्रतिक्रिया करना स्व को खोना हैं ।

जैसा कि भगवान बुद्ध ने लिखा है कि अप्प दीपो भव अर्थात अनुभवों के सहारे चलो, गांठ की अक्ल से कार्य करो, खुद अपनी रोशनी को प्रमाण मानो । अपने मार्गदर्शक स्वयं बनो । अनुभवों की पूंजी सबसे बड़ी होती है । यह सदैव आपके साथ रहती हैं । अनुभवों से आपकी क्षमता बढ़ती हैं । इस पर सरकार कर नहीं लगा सकती हैं । इसे चोर उच्चके छीन नहीं सकते हैं। परिजन इसको हथिया नहीं सकते । कोई व्यक्ति इसमें से हिस्सा नहीं छीन सकता हैं । दर्शन शास्त्र के जाने माने प्रोफेसर व्यास तो बार बार अपने अनुभवों को बढ़ाने की बात करते हैं । उनके अनुसार अपने अनुभव कोष की बढ़त ही आपकी बढ़त हैं । अनुभव के उपरान्त भी आपकी शंका बनी रहती है यह सबसे बड़ी बीमारी हैं । जब आप एक बार फाइनल समझ लो तो उसी पर डटे रहना । विचार दुबारा कर द्वन्द्ध के जाल में न फंसना । समझ के तल पर स्पष्टतः समझ कर न स्वीकारना हमारा रोग हैं ।

आपका अनुभव दूसरे किसी भी दुनिया के व्यक्ति से अधिक महत्व रखता हैं । अपने अनुभव को सर्वोच्च प्राथमिकता देवें । दूसरे किसी महान व्यक्ति के कथन से अपने अनुभव की मत अनदेखी करो ।


अपने आप को कैसे बदले ?

हम ज्ञान एवं विचार द्वारा  बिलकुल ही नही बदलते है। अनुभव द्वारा ही हम बदलते हैं। विचारों में जीना छोड़ों । विचार आपको उधार जीना सीखाते हैं । विचार दूसरांे से ग्रहण किये होते हैं जो प्राप्त होते हैं । अतः विचारों में जीना छोड़ों । अनुभव को प्रधानता दों । अनुभव का एक कण ज्ञान के टन से बहुत भारी होता हैं ।

मन आधारित जीवन न जीकर अनुभव आधारित जीवन जीए । मन का प्रमुख कार्य सोचना, निर्णय करना, तुलना करना, न्यायोचित ठहराना एवं तादत्म्य बिठाना हैं । अतः इन पांचों कार्यो की तुलना में अपने अनुभव को प्राथमिकता दो । कई बार अनुभव के उपरान्त भी आपकी शंका बनी रहती हैं तो उसे छोड़ों । बुद्धि के आधार पर अनुभव को उपेक्षित मत करों । अनुभव से ही जीवन में रूपान्तरण सम्भव हैं ।

परिवर्तन एक मानसिक क्रिया नहीं हैं । अनुभवों के प्रति साक्षी होना ही सच में बुद्धिमान अर्थात् प्रज्ञावान होना हैं । जब हम अनुभव करते है तब स्व में होते हैं जब चर्चा करते हैं तब स्व से दूर होते हैं । प्रतिक्रिया करना स्व को खोना हैं ।

मस्तिष्क की संरचना कुछ इस प्रकार की है कि हम अनुभव से ही बदल पाते हैं । सूचनात्मक ज्ञान एवं स्मृति हमें रूपान्तरित करने में असमर्थ हैं। वर्तमान की सारी शिक्षा सूचनात्मक ज्ञान बढ़ाती हैं । तभी तो राजस्थानी में कहा गया है कि ’’भण्या घणा पण गण्या नहीं ’’ इसका अर्थ है कि शिक्षा तो बहुत प्राप्त की लेकिन अनुभव शून्य हैं ।

(To be Continued)

सफलता प्राप्ति में एकाग्रता की भूमिका:द्रोणाचार्य की परीक्षा में केवल अर्जुन ही क्यों उत्तीर्ण हुआ?

महाभारत में यह कथा है कि द्रोणाचार्य ने अपने शिष्यों के लिए एक परीक्षा का आयोजन किया। उन्होंने अपने सभी शिष्यों को चिड़िया की आँख पर निशाना लगाने के लिये कहा। प्रत्येक धनुर्धारी के आने पर उन्होंने पूछा, “तुम क्या देख रहे हो ?” एक शिष्य को पेड़ दिखाई दिया, दूसरे ने शाखाएं देखीं, कुछ ने केवल चिड़िया को देखा। इस प्रकार भिन्न उत्तर प्राप्त हुए । उन्होंने किसी को भी बाण छोड़ने की अनुमति नहीं दी। अर्जुन ने कहा, “उसे सिर्फ चिड़िया की आँख दिखाई दे रही है।” और इस प्रकार केवल अर्जुन ही परीक्षा में उत्तीर्ण रहा।

किसी लक्ष्य के प्रति पूर्णरूपेण ध्यान देना ही एकाग्रता है। एकाग्र मन किसी अन्य मानसिक गतिविधि में व्यस्त नहीं हो सकता। एकाग्रता का अर्थ है अपनी संपूर्ण ऊर्जा और मन को इच्छित दिशा में केन्द्रित करना। मनोयोग, एकाग्रता की कुंजी हैं। मन को एक दिशा में, एक ही कार्य में व्यस्त करना एकाग्रता है। ध्यान व एकाग्रता से मानसिक शक्ति को बढ़ाया जा सकता है ओर उसका उपयोग किया जा सकता है ।

एकाग्रता के बिना मन को केन्द्रित नहीं किया जा सकता । जब मन की शक्ति बिखरी हुई होती है तो आप इसे सफलता की दिशा में प्रयुक्त नहीं कर सकते। अर्थात् मन की शक्ति, ध्यान की शक्ति में निहित है। बुद्धि, विश्लेषण, चिन्तन, कल्पना, अभिव्यक्ति, लेखन एवं भाषण आदि की शक्ति को एकाग्रता द्वारा ही विकसित किया जा सकता है । एकाग्रता की शक्ति आपकी योग्यता एवं कुशलता को बढ़ाती है । एकाग्रता से द्वन्द्व, उलझनंे, घबराहट एवं तनाव कम होते हैं।

वह व्यक्ति, जो समस्या के साथ खाता है, समस्या के साथ चलता है, समस्या के साथ सोता है, वह समस्या का समाधान ढूँढ लेता है।

-राधाकृष्णन (भारत के दिवगंत राष्ट्रपति)

( एकाग्रता की विधि अगली पोस्ट में)

वेब दुनिया में इस ब्लाग की चर्चाःरूको मत ,जब तक लक्ष्य हासिल न कर सको

यह पँचासवी पोस्ट हैं। इस अवसर पर हिन्दी के नामी पोर्टल वेब दुनिया में प्रकाशित ब्लोग की खबर को ही पुनः पहुँचाना चाहता हूँ। रविन्द्र व्यास ने रूको मत ,जब तक लक्ष्य हासिल न कर सको के नाम लिखा हैं।