मेरी पुस्तक ‘तनाव छोड़ो ,सफलता पाओ’ से तनावरोधी कैप्सूल

हम समस्याओं के कारण तनावग्रस्त नहीं हैं, बल्कि हमारे तनावग्रस्त होने से समस्याएँ हंै।

तनाव छोड़ो ,सफलता पाओ
तनाव छोड़ो ,सफलता पाओ

 हम समस्याओं के कारण तनावग्रस्त नहीं है बल्कि हमारे तनावग्रस्त होने से समस्याएँ है।

 हमारा मस्तिष्क बहुत बड़ी कृशि भूमि के समान है। यहाॅ हम खुशी या तनाव उगा सकते है। अगर खुशी के बीज नहीं बोएंगें तो तनाव स्वतः ही खरपतवार की तरह उग आयेगा।

 तनाव मुक्त होकर नाभि पर समश्वास के साथ जीना यानि विश्राम के साथ जीना बील गेट्स, विश्व के सबसे धनाढ्य व्यक्ति होने से बड़ी उपलब्धि है। चन्द्रमा पर जाने से भी बड़ी उपलब्धि तनाव मुक्त होना है।

 यह सच है कि स्वयं आपके सिवा और कोई भी आपको तनाव नहीं दे सकता।

 मानव के सोचने की योग्यता ही जानवर और मानव के बीच का अन्तर है। इसलिए जीवन की साधारण खुशियों का आनन्द लेने के लिए ’’सोचिए’’।

 तनाव और चिंताये ऐसे तथ्य हैं जिनका जोड़ आपको ’हार्ट अटैक’ कर सकता है।

 विश्व में कोई भी शक्ति हमें नुकसान नहीं पहॅुचा सकती,जब तक कि हम पहले,अपने आप को नुकसान,नहीं पहॅुचाते।

 आपको हरएक के साथ अच्छा बनने की जरूरत नहीं है। मिलकर कार्य करना सीखिए और यह सिद्ध मत कीजिए कि आप ज्यादा समझदार है।तनावपूर्ण रहने से बेवकूफ बनना अधिक अच्छा है।

 कई बार, एक स्पष्ट और निर्भीक ’’नहीं ’’कहने से 100 सिरदर्दियों से बचा जा सकता है।

 तीर्थंकर महावीर के साधनाकाल में एक ग्वाले ने उनके कानों में कीले ठोकी तो भी वे विचलित न हुये। दूसरी तरफ हम स्वयं के माता पिता की डॅाट फटकार तक से घायल हो जाते है। महावीर के पैरो में सांप ने काटा तो भी वे तनावग्रस्त नहीं हुये और हम उसे देख कर ही डर जाते है। क्या कारण है?
 हम अपने सिवाय दूसरा कुछ नहीं बन सकते है। इसलिए कुछ बनने का प्रयास नहीं करना चाहिये। क्या गुलाब कभी चमेली बनने का प्रयास करता है ?

 दृश्य को अदृश्य धारण किए हुए है। साकार, निराकार के अधीन है। जो भी साकार एवं स्थूल है उसके लिए कहीं न कहीं निराकार एवं सूक्ष्म सहयोगी है। जब तक यह अनुभव न हो तब तक जीवित होते हुये भी हमारा जीवन से संबंध नहीं होता है। पदार्थ की सत्ता से ही हम अवगत है, चेतना की सत्ता को नहीं जानने हम उसे नकारते है। यही हमारी सबसे बड़ी भूल है।

 साक्षी रहो व स्वयं को ’फील’ करो।

 हम चेतना के जिस तल पर खड़े है,वहाँ संकट,विपरीत स्थितियां एवं कठिनाईयाॅ उसे बढ़ाने आती है।

 

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अपने भीतर देखो, उसे संभालों सफलता निश्चित है

हमारे जीवन में अंतर्यात्रा बहुत महत्वपूर्ण है। हमारे सारे कार्यो के लिए अंदर की सोच व भाव ही जिम्मेदारहै। अण्डा अगर बाहर से फूटे तो जीवन समाप्त होता है। यदि अण्डा भीतर से फूटे जो जीवन प्रारम्भ होता है।अर्थात् जीवन में अन्तर्यात्रा जरूरी है। हमारे जीवन का सारा व्यवहार भीतर से तय होता है। हम अन्दर जो है वही बाहर प्रकट करते है। बाहर की सारी क्रान्ति भीतर के परिवर्तन के अभाव में व्यर्थ है। हमारा अन्तर्मन बहुत महत्वपूर्ण है। तभी तो बाहर के सारे परिवर्तन थोड़े समय बाद बेकार हो जाते है। तभी तो बदलने हेतु अन्दर से बदलना जरूरी है।
शान्त मन आपके बाहय जीवन के उपद्रवों को भी मिटा देता है। अन्तर्यात्रा द्वारा ही स्वयं को जानना होता है। दूसरों को भूलने के लिए अन्दर से अकेले होना पड़ता है। स्वयं का ऐकान्त मिल जाने पर किसी और की जरूरत नहीं पड़ती। हमारे सारे जीवन की अव्यवस्था के अन्तर्मन की अराजकता जिम्मेदार है। जब हम अन्दर से टूटे हुए होते है तो बाहर कुछ भी अच्छा नहीं लगता। जब हमें अपने पर भरोसा नहीं होता तो हम किसी ओर पर भरोसा नहीं कर सकते। इसीलिए किसी ने कहा  है कि अपने भीतर देखो, उसे संभालों सब कुछ ठीक हो जाएगा ।

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सफल होने/प्रश्नकर्ता का समाधान करने प्रश्नों का उत्तर कैसे देना ?

प्रश्नों का जीवन में बहुत महत्व है।ये हमारी समझ को पक्की करते है। हमसे अनेक लोग प्रश्न पूछते हैं। प्रश्न कई तरह के होते है। प्रश्न कई कारणों से पूछे जाते है। निष्ठा पूर्वक पूछे गए प्रश्नों के उत्तर निष्ठा से दिए जाने चाहिए। अन्यथा पूछे गए प्रश्नो ंके जवाब नहीं देने चाहिए। इसलिए प्रश्नकर्ता की मंशा को समझना जरुरी है।

प्रश्न का नहीं प्रश्नकर्ता को जवाब देना चाहिए। प्रश्नकर्ता की मनोवृति प्रश्न मंे छिपी होती है। लेकिन प्रश्नकर्ता को सही एवं सटिक जवाब दिया जा सकता है। प्रश्नकर्ता की मंशा समझे व उस अनुरुप जवाब देना चाहिए। प्रश्न का सटिक व संक्षिप्त जवाब दें। उदाहरण से प्रश्नकर्ता को समझ मंे आसानी होती है। इसलिए उदाहरण सहित उत्तर दें। तथ्यात्मक व सार्थक जवाब दें जो प्रश्नकर्ता को उसकी समस्या का समाधान देता हो। वैसे प्रश्न के कई सही जवाब होते है इसलिए किसी एक जवाब को गलत या सही कहना कठिन है। क्योंकि उत्तर कई दृष्टियों से दिया जा सकता है।

प्रश्न का दार्शनिक जवाब देना ठीक नहीं हेै। इससे प्रश्न घूम जाता है। शायद श्रोता का उददे्श्य भी पूरा नहीं होता है। प्रश्न को उड़ा देना उचित नहीं है जब तक कि प्रश्न आपकी परीक्षा लेने न पूछा गया हो।

 

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अपने आप को कैसे बदले ?

हम ज्ञान एवं विचार द्वारा  बिलकुल ही नही बदलते है। अनुभव द्वारा ही हम बदलते हैं। विचारों में जीना छोड़ों । विचार आपको उधार जीना सीखाते हैं । विचार दूसरांे से ग्रहण किये होते हैं जो प्राप्त होते हैं । अतः विचारों में जीना छोड़ों । अनुभव को प्रधानता दों । अनुभव का एक कण ज्ञान के टन से बहुत भारी होता हैं ।

मन आधारित जीवन न जीकर अनुभव आधारित जीवन जीए । मन का प्रमुख कार्य सोचना, निर्णय करना, तुलना करना, न्यायोचित ठहराना एवं तादत्म्य बिठाना हैं । अतः इन पांचों कार्यो की तुलना में अपने अनुभव को प्राथमिकता दो । कई बार अनुभव के उपरान्त भी आपकी शंका बनी रहती हैं तो उसे छोड़ों । बुद्धि के आधार पर अनुभव को उपेक्षित मत करों । अनुभव से ही जीवन में रूपान्तरण सम्भव हैं ।

परिवर्तन एक मानसिक क्रिया नहीं हैं । अनुभवों के प्रति साक्षी होना ही सच में बुद्धिमान अर्थात् प्रज्ञावान होना हैं । जब हम अनुभव करते है तब स्व में होते हैं जब चर्चा करते हैं तब स्व से दूर होते हैं । प्रतिक्रिया करना स्व को खोना हैं ।

मस्तिष्क की संरचना कुछ इस प्रकार की है कि हम अनुभव से ही बदल पाते हैं । सूचनात्मक ज्ञान एवं स्मृति हमें रूपान्तरित करने में असमर्थ हैं। वर्तमान की सारी शिक्षा सूचनात्मक ज्ञान बढ़ाती हैं । तभी तो राजस्थानी में कहा गया है कि ’’भण्या घणा पण गण्या नहीं ’’ इसका अर्थ है कि शिक्षा तो बहुत प्राप्त की लेकिन अनुभव शून्य हैं ।

(To be Continued)

कैसे पाए अपनी प्रार्थना का प्रतिउत्तर ?

मैने शक्ति मांगी और प्रभु ने कठिनाईयाॅ दी
ताकि मैं मजबुत बनूॅ।

मैने बुद्धि माॅंगी और प्रभु ने मुझे समस्याएॅ दी
ताकि मैं उपाय खोजूॅ।
मैने समृद्धि माॅंगी और प्रभु ने मुझे ताकत व मस्तिष्क दिये
ताकि मैं प्राप्त कर सकूॅ।
मैने साहस माॅगा और प्रभु ने मुझे खतरे दिये
ताकि मैं जीत सकूॅ।
मैने धैर्य माॅंगा और प्रभु ने मुझे ऐसी स्थिति दी
कि मुझे मजबूरन इन्तजारी करनी पडे।
मैने प्रेम माॅगा और प्रभु ने मुझे दुखी साथी दिये
ताकि मैं सेवा कर सकूॅ।
मैने तेरी कृपा चाहीं और प्रभु ने मुझे अवसर दिये।
जो मैने चाहा वह मुझे कभी न मिला
लेकिन जिसकी आवश्यकता थी वह सदा मिला।

इस तरह मेरी प्रार्थना सुनी गई।

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