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जीवन ऊर्जा बढ़ाने प्राण मुद्रा लगाएँ

प्राण मुद्रा को प्राणशक्ति का केंद्र माना जाता है और इसको करने से प्राणशक्ति बढ़ती है । इस मुद्रा में छोटी अँगुली (कनिष्ठा) और अनामिका (सूर्य अँगुली) दोनों को अँगूठे से स्पर्श कराना होता है । और बाकी छूट गई अँगुलियों को सीधा रखने से अंग्रेजी का ‘वी’बन जाता हैl

प्राण मुद्रा के लाभ

  • प्राण मुद्रा से आँखों की रौशनी बढती है साथ ही साथआँखों से जुड़ी कई परेशानियां भी दूर होती है।
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने से कई परेशानिया जैसे की बार बार -बार सर्दी-जुकाम होना, बुखार आना होती है| इसके अभ्यास से आपका प्रतिरोधक तंत्र मजबूत बनता है|
  • जिन महिलाओ को मासिक धर्म के दौरान बहुत दर्द होता है उन्हें इसे करने से फायदा मिलता है|
  • जिन लोगो की सहनशीलता कम होती है और लगातार थकान बनी रहती है, उन्हें इस मुद्रा को करने से ताकत मिलती है|
  • यह त्वचा के रोगों को भी ठीक करता है| इससे लाल त्वचा, त्वचा पर चकत्ते, पित्ती आदि रोग ठीक होते है|
  • उच्च रक्तचाप के मरीजो के लिए भी यह आसन लाभदायक है|
  • यदि आपको छोटी छोटी बात पर क्रोध आता है और चिड़चिड़ापन महसूस होता है तो इसे करने से इन सभी चीजों में कमी आती है|
  • अन्य समस्याए जिसमे प्राण मुद्रा को करने से फायदा मिलता है:-

थॉयरायड का बढ़ना

जोड़ों में अस्थिरता

भूलने की आदत

नींद न आना (अनिद्रा)

पेट में जलन

कब्ज और एसिडिटी

मूत्र मार्ग में जलन होना

दुर्गंधयुक्त पसीना

पीलिया

समय से पहले बुढ़ापा आना

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हार्ट अटैक आने पर उससे बचने अपान वायु मुद्रा लगाएँ

हार्ट अटैक आ जाने पर डॉक्टर की मदद मिलने तक अपान वायु मुद्रा लगा कर रखेंl यह ह्रदय को स्वस्थ रखता हैl

appan vayu mudra

विधि:

अंगूठे के पास वाली पहली उंगली अर्थात तर्जनी को अंगूठे के मूल में लगाकर मध्यमा और अनामिका को मिलाकर उनके शीर्ष भाग को अंगूठे के शीर्ष भाग से स्पर्श कराएं। सबसे छोटी उंगली (कनिष्ठिका) को अलग से सीधी रखें। इस स्थिति को अपान वायु मुद्रा कहते हैं।इसको मृत संजीवनी मुद्रा भी कहते है

आवश्यकतानुसार हर रोज 20 से 30 मिनट तक इस मुद्रा का अभ्यास किया जा सकता है।

लाभ :

हृदय रोगियों के लिए यह मुद्रा बहुत ही लाभदायक बताई गई है।

इससे रक्तचाप को ठीक रखने में सहायता मिलती है।

पेट की गैस एवं शरीर की बेचैनी इस मुद्रा के अभ्यास से दूर होती है।

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वजन घटाने हेतु सूर्य मुद्रा लगाएँ

जो लोग मोटापा और मधुमेह जैसी समस्याओ से ग्रसित है उनके लिए यह योग मुद्रा बेहद ही फायदेमंद है|

विधि:-

  • सूर्य मुद्रा करने के लिए सबसे पहले तो सिद्धासन,पदमासन या सुखासन में बैठ जाएँ ।
  • अब दोनों हाँथ घुटनों पर रख लें और हथेलियाँ उपर की तरफ रहें|
  • अब सबसे पहले अनामिका उंगली को मोड़कर अंगूठे की जड़ में लगा लें एवं उपर से अंगूठे से दबा लें|
  • इस वक्त आपकी बाकी बची हुई तीनों उंगलियों को बिल्कुल सीधी रहने दे|

 

 

लाभ:-

  1. सूर्य मुद्रा को दिन में दो बार 15 मिनट करने से कोलेस्ट्राल घटता है|
  2. शरीर की सूजन दूर करने में भी यह मुद्रा लाभप्रद है|
  3. इसे करने से बलगम, खांसी, पुराना जुकाम, नजला, सांस का रोग, ज्यादा ठंड लगना तथा निमोनिया आदि रोग दूर हो जाते हैंl
  4. इसके नियमित अभ्यास से मानसिक तनाव दूर होता है और भय, शोक खत्म हो जाते है|

5. इसे  नियमित करने से व्यक्ति में अंतर्ज्ञान जाग्रत होता है|

6 .इस मुद्रा के अभ्यास से पाचन प्रणाली ठीक होती है किन्तु यदि आपको एसिडिटी और अम्लपित्त की तकलीफ है तो यह मुद्रा ना करे|

 

सावधानियां:-

  • यदि आपका शरीर बहुत अधिक कमजोर है तो आपकोसूर्य मुद्रा नही करनी चाहिए|
  • सूर्य मुद्रा करने से शरीर में गर्मी बढ़ती है इसलिए गर्मियों में इस मुद्रा करने से पहले एक गिलास पानी पी लेना चाहिए।

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थायराइड एवं गले का संक्रमण भगाने उज्जायी प्राणायाम करें

संस्कृत में उज्जायी का अर्थ है विजयी-‘उज्जी’ अर्थात जीतना। उज्जायी प्राणायाम
विधि:
इसके लिए कमर को सीधा रखते हुए आराम से बैठ जाएंए अब अपने ध्यान को सांसों पर ले आएं और सांस की गति पर ध्यान लाते हुएए अधिक से अधिक सांस बाहर निकाल दें। अब गले की मांशपेशियों को टाइट कर लें और धीरे.धीरे नाक से सांस भरना शुरू करेंए सांस भरते समय गले से सांस के घर्षण की आवाज़ करें।
सांस भरते जाएंए आवाज़ होती जाए। इस प्रकार आवाज़ के साथ पूरा सांस भर लें। अब सांस भरने के बाद कुछ सेकेण्ड सांस अंदर रोकें।इस समय जालंधर बंध लगाएस इसके बाद सीधे हाथ की प्राणायाम मुद्रा बनाकर नासिका पर ले जाएं और दाईं नासारंध्र को बंद कर बाईं नासारंध्र से धीरे.धीरे सांस बाहर निकाल दें। इस प्रकार 12.15 बार इसका अभ्यास कर लें।
लाभ:
शारीरिकः प्राणायाम के सभी सामान्य लाभों के अतिरिक्त यह कंठ से कफ दोष को मिटाता है और जठरा ग्नि को उद्यीप्त करता है। इससे नाड़ी और धातुदोष भी दूर होते है। यह कंठच्छद की मांसपेशियों को मजबूत करता है, जिससे खर्राटों की समस्या दूर हो जाती है। आवाज भी साफ और शुद्ध हो जाती है।
चिकित्सीयः उज्जायी प्राणायाम से गलतुण्डिका, गला खराब, पुरानी सर्दी और श्वसनी दमा को बहुत आराम मिलता है। इससे अतिसंवेदनशील गला, खांसी एवं हिचकी आदि में भी मदद मिलती है। चिन्तित रहने वाले रोगी यदि इस प्राणायाम को करें तो उनका चिंता-स्तर कम होता चला जायेगा।
आध्यात्मिकः कंठ विशुद्धि चक्र का स्थान है। इस जगह ध्यान का केन्द्रीकरण और जागरूकता आध्यात्मिक विकास का आरम्भ है।
उज्जायी एक आधारभूत प्राणायाम है और अन्य अनेक प्राणायामों के साथ इसका उपयोग किया जा सकता है।

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गड्डा खोदे दूसरे के लिए लेकिन गिरते हम क्यों है?

हमारे  लिए यह जानना बेहद महत्वपूर्ण है कि बुरा महसूस करते समय दिमाग में अच्छे विचार रखना असंभव होता है।तब स्वत: ही हम तनाव ग्रस्त हो जाते है  क्योंकि आपके विचार ही आपकी भावनाओं को उत्पन्न करते हैं। अगर आप बुरा महसूस कर रहे हैं, तो ऐसा इसलिए है, क्योंकि आप ऐसे विचार सोच रहे हंै, जो आपको बुरा महसूस करा रहे हैं।  यह एक विचित्र सत्य है की   हम बुरा सोचे दूसरे का एव बुरा होता हमारा हैlquote-neither-in-the-sky-nor-in-mid-ocean-nor-by-entering-into-mountain-clefts-nowhere-in-gautama-buddha-66-76-47

कारण:

आपके विचार आपकी फ्राक्वेन्सी तय करते हैं और आपकी भावनाएँ आपको तत्काल बता देती हैं कि आप किस फ्रीक्वेन्सी पर हैं। जब आप बुरा महसूस करते हैं, तो इसका मतलब यह है कि आप बुरी चीजों का आकर्षित करने की फ्रीक्वेन्सी पर हैं। आकर्षण का नियम हमेशा प्रतिक्रिया करेगा और बुरी चीजों की ज्यादा तस्वीरें आपके जीवन में लाएगा, जिससे आप बुरा महसूस करेंगे। अथार्त बुरा सोचने पर बुरा हमारा होता हैlयही कर्म सिधांत हैl

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यदि द्रोण जैसा गुरु उपलब्ध हो तो हम अर्जुन बनना चाहेंगे या एकलव्य?

यदि जीवन में हमें द्रोणाचार्य जैसा गुरु मिले तो हम अर्जुन बनना चाहंेगे या एकलव्य। निश्चित रूप से अधिकांश लोग अर्जुन होना चाहेंगे। वैसे यह निर्णय उचित भी प्रतीत होता है। अतः इस पक्ष का विश्लेषण कर लें।

माना कि अर्जुन धनुर्विद्या सीख रहा है और उसका तीर निशाने से करीब दो इंच चूक जाता है। वह द्रोण के पास जाकर उपाय पूछेगा। गुरु स्थिति देख कर बता देगें कि उसका बाएं पांव पर वजन ज्यादा है, थोड़ा कम कर तीर छोड़ों। वह एक-दो बार में निशाने पर तीर लगा देगा।Eklavya-1

दूसरी तरफ एकलव्य का तीर भी निशाने से दो इंच दूर लगता है। तत्क्षण सहायता के लिए उसके पास गुरु उपलब्ध नहीं है। अर्थात् उसे ‘‘तैयार उत्तर’’नहीं मिलेगा। उसे अपना उत्तर स्वयं खोजना पड़ेगा। इस हेतु वह स्वयं सोचेगा, देखेगा, व चिन्ता में करेगा। बार-बार नए तरीके से तीर चला कर प्रयोग करेगा। उत्तर खोजने के क्रम में हो सकता है उसे रात को नींद न आए व उपाय खोजता रहे। वैसे है दो-तीन दिन में उसे पता लग जाएगा कि उसे बाएं पांव पर जोर अधिक देना है तब वह सफल हो जाए। इस प्रकार वह अपना मार्ग स्वयं खोज लेता है। अर्थात् उसकी निर्भरता दूसरो पर न रहेगी।

अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि विपरीत स्थिति में अपना उत्तर दूसरों की सहायता से खोजने में बुद्धिमत्ता है कि उसे स्वयं खोजना चाहिए। अर्जुन की सहायता प्राप्ति की आदत ने ही कुरुक्षेत्र के मैदान में भी सहायता चाही। वह परिजनों को सामने देख कर युद्धभूमि में घबरा गया। तभी तो कृष्ण ने वहां पर गीता का उपदेश दिया। अर्थात् अर्जुन सदैव मुसीबत में दूसरों की तरफ देखता है जबकि एकलव्य अपना समाधान खुद खोजता है। इससे वह तृप्त व आत्मविश्वास से युक्त रहता है। एकलव्य कोे अपने पर भरोसा अधिक है, वह स्वयं से सन्तुष्ट है क्योंकि दूसरों की तरफ देखने की आदत नहीं है। चुनौतियों का मुकाबला वह अपने तरीके से करता है। जबकि अर्जुन सदैव दूसरों की तरफ ताकता है।

अब मित्रों, पुनः विचार करें कि क्या हमंे मार्गदर्शन चाहने वाला अर्जुन बनना चाहिए या अपनी सहायता आप करने वाला एकलव्य? अब यह तय आपको करना है? द्रोण जैसा कोई गुरु साक्षात् चाहिए या साक्षात् गुरु के बिना भी जीवन को आगे बढ़ाया जा सकता है।

(आभार-एकलव्य एजुकेशन फाउन्डेशन)

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जीवन शक्ति बढ़ाने में चमत्कारिक है भस्त्रिका प्राणायाम (अंतिम भाग )

भस्त्रिका प्राणायाम के फायदे

  • यह प्राणायाम  दमा, टीबी और कैंसर  जैसे जटिल रोगों में भी लाभदायक हैं।
  • शरीर की चर्बी कम होती है। और मोटापा तेजी से कम होता है।
  • यह आसन शरीर में खून साफ करता है।
  • शरीर में प्राणवायु की मात्रा को बढ़ाता है।
  • किडनी, लीवर और पाचनतंत्र मजबूत बनता है।
  • कफ, पित्त और वात दोषों को दूर करना।
  • इस योगासन को करने से शरीर के हर अंग तक खून का संचार ठीक तरह से हो पाता है।
  • सांसों के रोग, दमा और टीवी की बीमारी ठीक होती है। bhastrika

सावधानियाँ-

 उच्च रक्तचाप, ह्रदय रोग, हार्निया, दमा, टीबी, अल्सर, पथरी, मिर्गी, स्ट्रोक से ग्रस्त व्यक्ति तथा गर्भवती महिलाएँ इसका अभ्यास न करें। फेफड़ें, गला, हृदय या पेट में किसी भी प्रकार की समस्या हो, नाक बंद हो या साइनस की समस्या हो या फिर नाक की हड्डी बढ़ी हो तो चिकित्सक से सलाह लेकर ही यह प्रणायाम करना या नहीं करना चाहिए। अभ्यास करते समय अगर चक्कर आने लगें, घबराहट हो, ज्यादा पसीना आए या उल्टी जैसा मन करे तो प्राणायाम करना रोककर आराम पूर्ण स्थिति में लेट जाएँ।