स्वस्थ रहने करे सोलह आसन

शरीर के  सभी  जोड़ो  को नम्य व  स्वस्थ रखने  प्रतिदिन निम्न सोलह आसन काफी हैl इन आसनों को क्रमशः व धीरे धीरे करे l करते वक्त शरीर को झटका न दे  न ही मन को भटकने दे l

1सचल गति चक्रासन: इसमें पद्मासन में बैठ कर कमर को तिन बार -तिन बार दोनो दिशाओ में घुमाना है l

२ अर्ध शलभासन : इसमें पीठ के बल लेटकर एक पाव ऊँचा करना है l

३ शलभासनShalabhasana-Locust-pose

४ भुजंगासन

bhujngasn

५ धुनुरासन

dhnurasn

6 मार्जरी आसन

marjri aasn

७ नौकासन

naukasn

८ अर्ध पवन मुक्तासन

pvn muktasn

९ पवन मुक्तासन: यह दोनों पावो के साथ करना हैl

१० सर्वांगासन

sarvangasana-

११सेतु बन्ध आसन

setubandhasn

१२ नटराज आसन : इसमें पीठ के बल लेटकर  करना है ताकि रीढ़ की नम्यता बनी रहे l

१३ पश्चिमोत्तासन

pschimottasn

14 अर्ध मत्सेयान्द्र आसन

ardh maseyndrasn

15 पर्वतासन

Parvatasana.

१६ योग मुद्रा: पद्मासन में बैठ कर दोनों हाथ सिर के उपर कर धीरे धीरे निचे लेन है l

परवरिश सिखाने वाली अनूठी एवं प्रेक्टिकल किताब : संतान-निर्माण

 संतान-निर्माण के लिए बाल-मनोविज्ञान और प्रत्येक बच्चे के अनूठेपन को ध्यान रखकर बच्चे को पालना होगा।लेखक ने  नये इंसान को निर्मित करने के लिए कुछ चीजें बुनियादी रूप से बदलने की आवश्यकता बताई है l  बच्चे परिवार से आचरण सीखते हैं, वे कहने से अधिक हमारे व्यवहार से सीखते हैंl वे हमारी वृत्तियां, काम करने के तरीके, सोचने के ढंग अनुभव आदि से सीखते है l वे हमसे सफलता और आनंद के उच्च शिखर पर पहुँचने या नाकामयाबी का नज़रिया भी ले सकते हैं। भविष्य की चुनौतियाँ हमसे अलग तरह की होंगी, हमें उनकी परवरिश करने की कला सीखनी होगी।लेखक एक बच्चे का पिता है  एवं गर्भाधान आदि संस्कारो का स्वयं अनुभवी है l
यह पुस्तक परवरिश के साथ ही स्व-प्रबंधन के सूत्र समेटे है, यह बच्चे को समझने उसकी प्रतिभा को पहचानने, जड़ों से जोड़ने तथा उसकी असीम संभावनाओं को पंख देने में मदद करेगी, विषय क्रम में संतान-जन्म, स्वास्थ्य, मन, अन्तर्सम्बन्ध, शिक्षा, संवाद, आचरण, प्रतिभा-पहचान, नवाचार, कॅरियर-चयन आदि बहुत कुछ है। पुस्तक में अभिभावकों के सामने आने वाली कठिनाइयों के समाधान हैं, यह परवरिश पर अनूठी पुस्तक है।

संतान-निर्माण   (परवरिश के प्रभावी सूत्र) 

लेखक – धीरज कुमार अरोड़ा

पृष्ठ -135,                         कीमत – 80/- मात्र

प्रकाशक – रिद्धी पब्लिकेशन,जयपुर, उदयपुर

अंत्येष्टि में अस्सी प्रतिशत लकड़ी कैसे बचाए ?

एक शव को जलाने में सामान्यतः तीन सौ से पाँच सौ किलो लकड़ी प्रयोग में आती हैं।जबकि पाण्डिचेरी में एक शव को जलाने में मात्र तीस से पचास किलो जलाऊ लकड़ी चाहिए।इसमें एक इंच से मोटी लकड़ी नहीं चाहिए।इस तरह दसवें भाग की लकड़ी से ही दाह सँस्कार हो जाता है अर्थात दो सौ सत्तर से चार सौ पचास किलो प्रति दाह संस्कार से लकड़ी बचेगी। एक गणना के अनुसार हमारे देश में प्रति वर्ष सत्तर लाख शव जलाए जाते है जिसमें पांच से छ : करोड़ पेड़ काटे जाते हैं। नई विधि अपनाने से सिर्फ़ पचास से साठ लाख पेड़ कटेंगे।

कम लकड़ी से दाह संस्कार करने की विधि :-

सबसे पहले छ फ़ीट लम्बे व दो फीट चौडॉ व दो- तीन इंच गहरा खड्डा कर उसके चोरों ओर ईंट के टुकड़ों की बाउंड्री बनाई जाती है,जिसमें बीच बीच मे खाली स्थान हवा पास करने हेतु रखे जाते हैं। इस खड्डे को पतली पतली लकड़ी से भर दी जाती हैं।

 

पांडिचेरी में केजुरिना की पतली लकड़ी रख देते हैंlउसके ऊपर शव को रखते हैं।फिर दो ईंटो की बाउंड्री बनाई जाती हैं। इसमे भी हवा के पास होने के लिये खाली जगह रखते हैं। कुछ पतली लकड़िया खाली किनारों में भरी जाती हैं। इसके बाद पतले उपलों की दो परते बिछाई जाती हैं। उसके ऊपर घास या पुआल बिछाई जाती है फिर लाल मिट्टी से ऊपर ऊपर लिपाई कर देते हैं।इस तरह वह भट्टी बन जाती है।
इसके बाद धार्मिक संस्कार कर ईंटो के बीच घी, या ज्वलन शील पदार्थ से आग लगाई जाती हैं।
तीन से चार घंटे में शव पूरा जल जाता हैं। मात्र तीन व चार किलो राख व हड्डियां बचती हैं।

इस तरह शव को जलाने में अस्सी प्रतिशत लकड़ी बच जाती हैंl धन भी कम लगने से आर्थिक रूप से लाभदेय हैंlहवा में धुआं कम पहुचेगा इससे प्रदुषण भी कम होगाl सभी तरह से हितकर हैl यह विधि पॉन्डिचेरी में प्रयुक्त होती हैl लेखक  से विस्तृत जानकारी हेतु ९४१४२८९४३७ पर सम्पर्क करें l

( श्याम कुमारी,  सौम्य बब्लेस्वर व दिलीप , श्री अरविन्द आश्रमवासियों का आभार)

 

शौच करने की सही विधि ताकि बवासीर आदि रोग न हो

विधिपूर्वक शौच करने से दातों के रोग, लकवा ,बवासीर व् कई अन्य रोग नहीं होते हैl  उषःपान(प्रातः जल सेवन) के बाद कुछ देर घुमने से मलत्याग सरलता से होता हैl न हो तो पवन मुक्तासन,ताड़ासन व कटी  चक्रासन करें l

विधि:

भारतीयशैली के टॉयलेट का उपयोग करें l  शौच  हेतु  उकड़ू आसन में बैठेl  पश्चिमी शैली की टॉयलेट के प्रयोग में मलद्वार पूरा नहीं खुलता है, न हीं पेट पर दबाव पड़ता हैl

दोनों हाथ ठुड्डी को पकडे रहे व दांत भींच कर रखे l  शौच या पेशाब के समय दांतों के जबड़ों को आपस में दबाकर रखने से दांत मजबूत रहते हैं।

मल छोड़ते वक्त दांतों को और भींचे और श्वास फेकेंl

शौच करते वक्त मुहं बंद रखे l  तत्समय पढ़ना – बोलना उचित नहीं हैl

सहजता से मलत्याग न होने पर कुछ लोग जोर लगाकर शौच करते हैं किंतु ऐसा करना ठीक नहीं हैl

मल आपके स्वास्थ्य को दर्शाता है, बहुत सूखा या पतला, दुर्गन्धयुक्त, चिपचिपा, रक्त या  सफ़ेद झाग युक्त मल रोग को दर्शाता हैl

 

इजरायली शोधकर्ता डॉ. बेरको सिकिरोव ने अपने शोध के निष्कर्ष में पाया कि सिटिंग मेथड कब्जियत का करण बनती है, जिसके कारण व्यक्ति को मल त्यागने के लिए लगभग तीन गुना अधिक जोर लगाना पड़ता है, जिसके कारण चक्कर और हृदयतंत्र की गड़बड़ियों के कारण लोग मर जाते हैं।

२४ घंटे ॐ साधना :अंतर्यात्रा की दिशा में एक कदम

गृहप्रवेश के पूर्व बेंगलोर में २४ घंटे अखंड जप अक्षय तृतीया पर करने का अवसर मिलाl पहली बार इस तरह की साधना की l एक मित्र ने वहाँ पर नकारात्मकता शक्ति  होने की बात बताई थी lप्रारम्भ में बहुत उत्साह था लेकिन भीतर डर भी था की पूरी कैसे करेंगे l घी का दीपक कर मीना और मैंने निरन्तर २४ घंटा तक ॐ का जप किया l

चारो तरफ सकारात्मक बढ़ी l घर में डर समाप्त हुआ l रात्रि में सघन नीद आने लगी l इसके जप  से शारीरिक ,मानसिक व आध्यात्मिक शांति महसूस हुई lइससे चेतना में नई ऊर्जा  व सक्रियता का बोध  हुआ l  एकाग्रता बढ़ी l थकान,बैचेनी ,निराशा  एवं आलस्य घटा lबहुत सुखद परिणाम आये