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हँस कर रोगों को भगाए

दुनिया में प्रसन्नता नामक औषधि का कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि इसके अनुपात मंे ही शेष दवाइयां काम करती है। हँसी मन की गाँठे खोलती है। प्रसन्नता से मतलब केवल शारीरिक हास्य से नहीं है। भीतरी पवित्रता से उबरने वाला प्रसन्न भाव चाहिए। ऐसे मन की अवस्था मंे न भय होता है न शिकायत और न विरोध।
रोगी को हास्यरस प्रधान कविताएं सुनाकर जो चिकित्सा करने की विधि चली, उसका उद्देश्य भी यही सकारात्मक विचारों के लायक विद्युत् प्रवाह को पैदा करना था।
थकान शरीर में अपच, कब्ज जैसी कुछ बीमारियों को उत्पन्न करके मन के जगत् को घबराहट से भर देती है।। अतः इस बात पर विश्वास पैदा करें कि प्रसन्नता एक देवता है, कल्पवृक्ष है, जो मनोवांछित फल प्रदान करती है। तभी तो जोश बिलिंग्स ने लिखा है कि औषधि मंे कोई आमोद-प्रमोद नहीं है, लेकिन आमोद-प्रमोद में औषधि खूब भरी हुई है।
अब तो वैज्ञानिक ढंग से यह प्रमाणित हो गया है कि मानव शरीर स्वयं ही दर्द निवारक एवं तनाव को कम करने वाले हारमोन्स पैदा करता है। हंसने से इण्डोरफिन नामक हारमोन सक्रिय होता है जो एक प्रभावशाली पेन किलर है।

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कैंसर को फेलने से रोकने हेतु कारगर आहार

cancer prevention

कैंसरग्रस्त रोगी के लिए निम्न प्राकृतिक आहार की सिफारिश की जाती हैंः-
1.उगाई गई ताजा गेहूँ की बालियों का रस निकालकर पीना।
2.अंगूर का रस लेना।
3.प्रतिदिन दो या तीन बादाम गिरी खाने का मतलब है, कैंसर का डर नहीं।
4.ताजा खुरबानी खाना क्योंकि इसमें कैरोटिन की हाईबेटा है, जो कैंसर रोधी है।
5.विटामिन ‘‘सी’’, कैरोटिन व सेलेनियम लेना।
6.गोभी, अंजीर, दूध, हरी और पीली सब्जियाँ-विशेषकर परवल व विटामिन ‘‘सी’’ वाली चीजें, गुड़, टमाटर आदि का प्रयोग।
7.शीत मशरूम का प्रयोग।

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कैंसर से बचाव की सम्पूर्ण योजना

 

  • क्या करें कि कैंसर न होःcancer

ताजी और हरी सब्जी खाएं।
रेशेदार भोजन करें।
विटामिन ‘ए’ युक्त भोजन करें।
विटामिन ‘सी’ लेते रहें।
वजन न बढ़ने दें।
खतरे का प्रथम लक्षण दिखने पर कैंसर विशेषज्ञ से परामर्श करें।

  •         क्या न करें कि कैंसर से बचेंः
    पान, सुपारी, पान मसाला, गुटका, तंबाकू किसी रूप मंे न लें।
    शराब का सेवन न करें।
    मोटापा न बढ़ाएँ
    बहुत अधिक अचार, नमक व मसालेदार भोजन न लें।
    डिब्बाबंद या पेक्ड फूड का सेवन न करें।      अधिक तेल व वसा युक्त भोजन न लें।

 

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अलसी में विधमान पोषक तत्व जो भगाए रोग

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लिखने में बाँधाए दूर कर सफल लेखक बने

राईटर्स ब्लाक
एक औसत व्यक्ति अभ्यास के अभाव में सोचता है कि वह लिख नहीं सकता। लिखने के लिए किसी खास कौशल की जरूरत नहीं है। मात्र अभ्यास एवं स्वयं पर विश्वास की जरूरत है। निम्न कारणों से व्यक्ति लेखक नहीं बन पाता है। उन कारणों को राईटर्स ब्लाक कहते है। जिनका विश्लेषण निम्न प्रकार है।ेेेेे
1. टेलेन्ट/प्रतिभा नहीं
कई बार बचपन मंे ठोकरें खाने के कारण या टोका-टोकी के कारण स्वयं को प्रतिभाहीन मान लेते है। ऐसे में हम स्वयं पर भरोसा नहीं करते है। व्यक्तिगत प्रतिभा दब जाती है लेकिन टैलेंट हम में हे ही।
2. रचनात्मकता
मनुष्य मात्र में नया कुछ करने की सहज प्रवृति होती है। लेकिन बचपन के दबाव के कारण व्यक्तित्व कुन्ठित हो जाता है। तब वह नई चीज करने में स्वयं को अक्षम पाता है।writer
3. समय
हम कई बार अपनी प्राथमिकताएँ सही तरह से तय नहीं कर पाते है। ऐसे में हमेशा व्यस्त रहते है। शीथल अवस्था में ही सृजन सम्भव है।
4. भाग्य
कई बार हम अपनी अक्षमताओं को भाग्य का नाम दे देते है। जबकि हम प्रयत्न ही नहीं करते है।
5. लिखने की कला
लिखने के अभ्यास एव थोड़े से प्रयत्न से मार्ग  मिल जाता है l

6.छपेगी नहीं

प्रारम्भ में हमें अपने लेखन पर भरोसा नहीं होता है। वह छपेगा या नहीं, वह छपने योग्य है या नहीं , वह पाठकों को पसन्द आयेगा या नह एवंीं सोचते रहते है इस से मार्ग मिल जाता हैतरह के भय के होने पर लिखना कठिन हो जाता है।

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आरोग्य वर्धकअलसी का सेवन किस रोग में व कैसे करें?

अलसी में ओमेगा थ्री व सबसे अधिक फाइबर होता है। यह डब्लयू एच ओ ने इसे सुपर फुड माना है। यह रोगों के उपचार में लाभप्रद है। लेकिन इसका सेवन अलग-अलग बीमारी में अलग-अलग तरह से किया जाता हैlFlax_Seeds-7971

स्वस्थ व्यक्ति को रोज सुबह-शाम एक-एक चम्मच अलसी का पाउडर पानी के साथ ,सब्जी, दाल या सलाद मंे मिलाकर लेना चाहिए । अलसी के पाउडर को ज्यूस, दूध या दही में मिलाकर भी लिया जा सकता है। इसकी मात्रा 30 से 60 ग्राम प्रतिदिन तक ली जा सकती है। 100-500 ग्राम अलसी को मिक्सर में दरदरा पीस कर किसी एयर टाइट डिब्बे में भर कर रख लें। अलसी को अधिक मात्रा में पीस कर न रखें, यह पाउडर के रूप में खराब होने लगती है। सात दिन से ज्यादा पुराना पीसा हुआ पाउडर प्रयोग न करें। इसको एक साथ पीसने से  ओक्सीडाइज होने के कारण खराब हो जाता है। पढ़ना जारी रखें “आरोग्य वर्धकअलसी का सेवन किस रोग में व कैसे करें?”

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हंसते-हंसते पत्नी के ब्रेन-ट्यूमर का सामना किया

मेरा दुःख और कष्ट मेरी धर्मपत्नी की असाध्य बीमारी ब्रेन-ट्यूमर था; अन्यथा मैंने अपनी जानकारी मंे कभी भी दुःख और कष्ट महसूस नहीं किया।
मेरे इस दुःख और कष्ट का निराकरण सिर्फ प्रेम का ही सहारा था जो मैंने जीवन में शुरु से ही अपनाया है। महान् लेखक स्वेट मार्डेंन ने कहा है कि जीना ही है तो हंसते-हंसते जिओं।मैंने अक्षरसः इसका पालन करते हुए अपनी पत्नी का इलाज कराया। मैंे हमेशा जागरुक रहा कि मुझे-
1. चिन्ता नहीं करनी है, क्योंकि यह मन की सबसे हानिकारक अवस्था होती है।
2. हमेशा नोर्मल रहना है, क्योंकि यदि मानसिक शांति नहीं है तो मेरी कार्य क्षमता पर उसका बुरा असर पड़ेगा।
3. असाध्य बीमारी होने से पता था कि निकट भविष्य मंे क्या होना है इसलिये मैं हमेशा अपने परिवार के सदस्यों के साथ, रिश्तेदारों के साथ दिखावटी हंसी नहीं बल्कि दिल से हंसता रहा हंसाता रहा और हमेशा यहीं कहता रहा कि विपत्तियां तो आती रहती है। सुख-दुःख का तो जोड़ा है। इसलिये यह दुःख की रात भी बीत जाएगी। मेरे इस हौसले से मेरे परिवार के सदस्य भी चिंता रहित रहे और हर तरह से मेरा साथ देते रहे।
मेरी पत्नी कांता सितम्बर 1996 से जून 2005 तक इस असाध्य बीमारी से ग्रसित रही। 1996, 2000,2002,2004 मंे क्रमशः 4 सर्जरी हुई। कल्पना कीजिये मैं किन हालतों से गुजरा होऊँगा। आर्थिंक भार के अलावा मानसिक ओैर सरकारी नौकरी में एक महत्वपूर्ण पद पर रहते हुए समय निकालना बहुत कठिन था।
मेरी धर्म पत्नी की बीमारी के दौरान् 9वर्ष तक उसकी सेवा शुश्रूषा मंे कहीं कोई कमी नहीं आवें यह मेरा अथक प्रयास रहा। आखिर के चार महिने मार्च 2005 से जून 2005 मंे तो मैं पूरी तरह सेवा सुश्रूषा मंे जुटा रहा और मैंने मन को हमेशा दृढ़ रखा। मन की दृढ़ता पर ही बहुत कुछ निर्भर रहता है। मैंने कभी चिड़़िचड़ा पन और अप्रसन्नता नहीं दिखायी। मेरा एक ही आदर्श था-कांता की सेवा सुश्रूषा में कोई कमी न रहें। मैंने इस आदर्श को कभी एक पल के लिये भी नहीं खोया।
मैंने युवाकाल से हंसते-मुस्कराते हुये सर्वोंत्तम जीवन जीने का संकल्प पाल रखा है। मुझे किसी चमत्कार और जादू पर विश्वास नहीं है। सिर्फ दृढ़ इच्छाशक्ति, संकल्प, धेैर्य, आशा और ईश्वर तथा स्वयं पर विश्वास है और मैंने यह अपनी आदत बना ली है कि प्रत्येक दशा में प्रसन्नता नहीं खोनी है। कभी भी घटियापन पर नहीं उतरना है। कभी कूढ़ो मत, कभी रोओ मत। मैंने अपनी रुचियां हमेशा ऊँची रखी है। हमेशा उत्तम वस्तु ही पाना चाहता हूँ और पायी है।
मैंने कभी संकीर्ण मनोवृति नहीं पाली। संकीर्ण मनोवृति वातावरण को मनहूस और दमघोंटू बनाती है और खुशियों को छीनती है। इस दुःख के दौरान् भी मैंने पूरी सावधानी बरती।
मैंने बहुत ही पहले अपने अंदर से आन्नद प्राप्त करना सीखा है। इस संकट और दुःख की घड़ी के समय मैंने और परिवार के सदस्यों ने मनोरंजन से मुँह नहीं मोड़ा। मनोरंजन से शरीर और मस्तिष्क हल्का-फुल्का हो जाता है। सत्य ही कहाँ है जिन्दगी जिन्दा दिली का नाम है। विकट परिस्थितियों के बावजूद सबके साथ हंसता-मुस्कराता रहा। हमेशा उजले पक्ष को देखने की ही आदत है। अँधरे पक्ष को देखने की बुरी आदत पड़ी ही नहीं।
कांता लक्ष्मी थी उसमें असीम प्रेम और प्रतिभा थी। औपचारिक शिक्षा न होने के बावजूद वह अपनी चतुराई से दुर्भाग्य पूर्ण परिस्थितियों को भी आन्नद में बदल देती थी और इसलिये यह स्वभाविक था कि उसके प्रति हम सभी का समपर्ण रहा।
मैंने उसकी सेवा करते कभी अपने आपको अशक्त और वृद्ध नहीं माना। मुझे बुढ़ापे का एहसास ही नहीं होता। मैं क्या हूँ, अपने विचारों का ही तो परिणाम। मुझे अपने जीवन से प्यार है इसलिये मैं उसे दूषित विचारों से भ्रष्ट नहीं होने देता। संघर्ष ही तो जीवन है। मैंने तनावों पर नियन्त्रण रखा।
यही आमोद-प्रमोद से भरी बातें और यादें मुझे आनंद देती हैं और मैं ह्नदय से अपनी पत्नी का कृतज्ञ हूँ। उसके साथ मेरी जवानी में शादी एक ऐसी बात है जो हमेशा सुखदायी रही। तो क्या मैं उसकी बीमारी से दूर भागता? नहीं कभी नहीं।
मैंने सीखा है और मैं अपने बच्चों से भी कहता हूँ कि-
1.बुरे समय मंे हिम्मत न हारें व्यवहार मंे सहज रहें।
2.कृपया बहानों की शरण न लें।
3.अपने को प्रेम करो ताकि दूसरों से घृणा न कर सको।
4.उदार और सहयोग करने से परिवार मंे महत्व मिलता है।
5.अपने वायदों को पूरा करो।

हंसते-हंसते उन्हें अन्तिम विदाई दी एवं स्वीकारा यही सच है।
-छगनलाल जैन सेवानिवृत इन्जिनियर

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