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गुंजन भ्रामरी , ॐजप व ध्यान सम लाभदायक

अपने दबाव व तनाव का सामना गुंजन करके करें।  भीतरी दबावों से मुक्त होने में सहायक हैlभौरों की तरह गंुजन करो। बस गुनगुनाओं। इस प्रकार गुंजन करने से हमारे सारे दबाव समाप्त हो जाते है। दबी हुई इच्छाएँ व वासनाएँ गंुजन करने से निकल जाती है। वैसे आधा घंटे प्रातः काल सीधे बैठ कर गंुजन करो व दिन में जब भी मौका, मिले गंुजन करें। गुंजन के बाद  आभामंडल की सफाई करेl  इसके बाद विश्राम करे वह ध्यान बन जाता हैl

गुजन

गंुजन एक तरह का प्राणायाम है। भ्रामरी प्राणायाम का यह सरल रूप है। गुुंजन करने से हमारा ध्यान गहराता  है। गुंजन करने से व्यक्ति स्वयं के पास आता है। इससे स्वयं को जानने में सहायता मिलती है। यह स्वयं पास जाने की मार्ग है, स्वयं से जुड़ने में सहायक है। अपने भटकते मन को नियन्त्रित करने का यह सरल मार्ग है। तभी तो कहते है कि जब गुनगुनाती हुई स्त्री खाना बनाती है तो उसका स्वाद बढ़ जाता है। गंुजन करना मन्त्रों का उच्चारण करने के समान है। गुंजन करने से मन्त्र शक्ति जाग्रत होती है। यह मन्त्र के गुनगुनाने की समान है।

इससे हमारी अवांछित जल्दबाजी पर नियन्त्रण होता है। मन में उठते विचारों पर लगाम लगती है। भागम-भाग पर ब्रेक लगता है। व्यक्ति भटकने से बच जाता है। इससे गुस्सा कम होता है, इससे जीवन मंे संतुलन बढ़ता है। इस तरह भावनात्मक संतुलन स्थापित होता है।

गुंजन करो और  तनाव भगाए।

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चाय को आप पीते है या चाय आपको पीती है,क्या चाय का कोई विकल्प है

चाय   नशा न  बने चाय  

श्री मोरारजी देसाई ने कहा था कि यदि मुझे संसार की विषैली वस्तुओं की सूची बनाने को कहा जाए तो मैं चाय को प्रथम स्थान पर रखूंगा। श्री देसाई ने प्राकृतिक जीवन शैली का अनुसरण किया तथा वे शतायु को प्राप्त हुए। “स्वास्थ्य और जीवन” नामक स्वास्थ्य पत्रिका के अनुसार चाय में निम्न दस प्रकार के ऐसे तत्व पाए जातें हैं जो मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त हानिकारक हैं। रिसर्च के अनुसार सुबह खाली पेट चाय पीना काफी नुकसानदायक हो सकता हैए खासतौर पर गर्मियों में।harms of tea

चाय में निम्न रसायन होते है

  •  टेनीनः जो  पेट में गैस बनाता हैं, घाव करता है तथा मन्दाग्नि करता है।
  •  थीनः  यह शरीर में खुश्की पैदा करता है तथा फेफड़ों व दिमाग में भारीपन लाता है।
  •  कैफीनः यह गठिया, अनिद्रा, गुर्दे की कमजोरी, सिरदर्द व जल्दी बाल सफेद करता है।
  •  वाॅलेटायल आयलः यह आंखो के लिए अहितकर है तथा अनिद्राकारक है।
  •  कारवोलिक ऐसिडः यह  ऐसिडिटी बढ़ाता है और बुढ़ापा भी जल्दी लाता है।
  •  पमिनः यह पाचन क्रिया को बिगाड़ता है।
  • एण्टोमिलिकः यह आंतों में खुश्की पैदा करता है।
  •  साइनोजनः यह चक्कर लाता है, अनिद्रा बढ़ाता है और लकवे की संभावना बढ़ाता है।
  •  स्ट्रीक्नायलःयह  रक्त विकार, वीर्य दोष एवं नपुसंकता बढ़ाता है।

चाय की बजाय ये पिए 

चाय के  एवज में प्रकृतिदत कुछ बेहतरीन विकल्पों का सेवन कर धन तथा स्वास्थ्य की रक्षा करें, यथा इलायची, सौफ, नींबू पानी, छाछ, विभिन्न प्रकार के शर्बत, दूध, नारियल पानी, फलों के रस तथा सूखे मेवे, विविध प्रकार के आयुर्वेदिक पेय  लेस l

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मेरा स्वास्थ्य मेरी जीवन शैली का परिणाम है.

 

शरीर ने जैसे ही चालीस पार किए बीमार होना शुरू किया तो समझ में आया की जीवन शैली ठीक नहीं चल रही है.इलाज हेतु दवाई लेनी शुरू की तो पार्श्व प्रभाव नजर आने लगे. एलोपैथि के अलावा  कभी आयुर्वेद,योग,एक्यूप्रेशर,होमियोपैथी अपनाई तो  कुछ  क्षेत्र में अधिक सार्थक लगी.इस हेतु योग करते करते कराने लगे .अनुभव में आया की हम  मात्र दिखाई देने वाला शरीर ही नहीं है हमारी अन्य सुक्ष्म परते भी है.इन को ध्यान में रखने पर योग की गहराईया स्पष्ट हुई .इस तरह परम्परागत चिकित्सा पद्धतियों में रूचि हुई .इस तरह स्वास्थ्य-सेतु का जन्म हुआ sw se है?

कई देसी पद्धतियां परस्पर   सहायक भी है.कई बार एक पद्धति की कमी दूसरी पद्धति से पूरी भी होती है. गावं का हड्डी जोड़ने वाला  जडीबुटी भी साथ में देता है.इस हेतु विमर्श करने की जगह है बस स्वास्थ्य सेतु . एक पद्धति के पास एक रोग का  इलाज  नहीं है इसका अर्थ यह नहीं  है की अन्य पद्धति के पास भी  उसका इलाज नहीं है.

यहाँ प्रतिदिन सुबह ६ बजे योग होता है.साथ ही प्रति  शुक्रवार को सायं ५.३० बजे स्वास्थ्य वार्ता होती है या फिर स्वास्थ्य सम्बन्धि डॉक्यूमेंट्री दिखाई जाती है.

आप भी जुड़िये

प्रात: योग कक्षा में  पधार कर पंचकोष आधारितयोग थेरपी का लाभ ले सकते है.स्वास्थ्य वार्ता में पधार कर वार्ता दे भी सकते है अन्यथा सुनने का लाभ ले .

स्वास्थ्यसेतु एक  आन्दोलन  है.प्रात: योग कक्षा में  पधार कर पंचकोष आधारितयोग थेरपी का लाभ ले सकते है.स्वास्थ्य वार्ता में पधार कर वार्ता दे भी सकते है अन्यथा सुनने का लाभ ले .इसका एक केन्द्र ऍफ़ -40,सेक्टर 14 ,उदयपुर में चल रहा है.

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क्या पुनर्जन्म होता है?

पुनर्जन्म आज एक धार्मिक सिद्धान्त मात्र नहीं है। इस पर विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों एवं परामनोवैज्ञानिक शोध संस्थानों में ठोस कार्य हुआ है। वर्तमान में यह अंधविश्वास नहीं बल्कि वैज्ञानिक तथ्य के रुप में स्वीकारा जा चुका है।
पुनरागमन को प्रमाणित करने वाले अनेक प्रमाण आज विद्यमान हैं। इनमें से सबसे बड़ा प्रमाण ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत है। विज्ञान के सर्वमान्य संरक्षण सिद्धांत के अनुसार ऊर्जा का किसी भी अवस्था में विनाश नहीं होता है, मात्र ऊर्जा का रुप परिवर्तन हो सकता है। अर्थात जिस प्रकार ऊर्जा नष्ट नहीं होती, वैसे ही चेतना का नाश नहीं हो सकता।चेतना को वैज्ञानिक शब्दावली में ऊर्जा की शुद्धतम अवस्था कह सकते हैं। चेतना सत्ता का मात्र एक शरीर से निकल कर नए शरीर में प्रवेश संभव है। पुनर्जन्म का भी यही सिद्धांत है।
past-livesपुनर्जन्म का दूसरा प्रत्यक्ष प्रमाण पूर्वजन्म की स्मुति युक्त बालकों का जन्म लेना है। बालकों के पूर्वजन्म की स्मृति की परीक्षा आजकल दार्शनिक और परामनोवैज्ञानिक करते हैं। पूर्वभव के संस्कारों के बिना मोर्जाट चार वर्ष की अवस्थ्सा में संगीत नहीं कम्पोज कर सकता था। लार्ड मेकाले और विचारक मील चलना सीखने से पूर्व लिखना सीख गए थे। वैज्ञानिक जान गाॅस तब तीन वर्ष का था तभी अपने पिताजी की गणितीय त्रुटियों को ठीक करता था। इससे प्रकट है कि पूर्वभव में ऐसे बालकों को अपने क्षेत्र में विशेष महारत हासिल थी। तभी वर्तमान जीवन में संस्कार मौजूद रहे।
प्रथमतः शिशु जन्म लेते ही रोता है। स्तनपान करने पर चुप हो जाता है। कष्ट में रोना ओर अनुकूल स्थिति में प्रसन्नता प्रकट करता है। शिशु बतख स्वतः तैरना सीख जाती है। इस तरह की घटनाएं हमें विवश करती हैं यह सोचने के लिए कि जीव पूर्वजन्म के संस्कार लेकर आता है। वरन नन्हें शिशुओं को कौन सिखाता है?
डाॅ. स्टीवेन्सन ने अपने अनुसंधान के दौरान कुछ ऐसे मामले भी देखे हैं जिसमें व्यक्ति के शरीर पर उसके पूर्वजन्म के चिन्ह मौजूद हैं। यद्यपि आत्मा का रुपान्तरण तो समझ में आता है लेकिन दैहिक चिन्हों का पुनःप्रकटन आज भी एक पहेली है।
डाॅ. हेमेन्द्र नाथ बनर्जी का कथन है कि कभी-कभी वर्तमान की बीमारी का कारण पिछले जन्म में भी हो सकता है। श्रीमती रोजन वर्ग की चिकित्सा इसी तरह हुई। आग को देखते ही थर-थर कांप जाने वाली उक्त महिला का जब कोई भी डाॅक्टर इलाज नहीं कर सका। तब थककर वे मनोचिकित्सक के पास गई। वहां जब उन्हें सम्मोहित कर पूर्वभव की याद कराई  कई, तो रोजन वर्ग ने बताया कि वे पिछले जन्म में जल कर मर गई थीं। अतः उन्हें उसका अनुभव करा कर समझा दिया गया, तो वे बिल्कुल स्वस्थ हो गई। इसके अतिरिक्त वैज्ञानिकों ने विल्सन कलाउड चेम्बर परीक्षण में चूहे की आत्मा की तस्वीर तक खींची है। क्या इससे यह प्रमाणित नहीं होता है कि मृत्यु पर चेतना का शरीर से निर्गमन हो जाता है?
सम्पूर्ण विश्व के सभी धर्मो, वर्गों, जातियों एवं समाजों में पुनर्जन्म के सिद्धांतों किसी न किसी रुप में मान्यता प्राप्त है।
अंततः इस कम्प्युटर युग में भी यह स्पष्ट है कि पुनर्जन्म का सिद्धांत विज्ञान सम्मत है। आधुनिक तकनीकी शब्दावली में पुनर्जन्म के सिद्धांत को इस तरह समझ सकते हैं। आत्मा का अदृश्य कम्प्युटर है और शरीर एक रोबोट है। हम कर्मों के माध्यम से कम्प्युटर में जैसा प्रोग्राम फीड करते हैं वैसा ही फल पाते हैं। कम्प्युटर पुराना रोबोट खराब को जाने पर अपने कर्मों के हिसाब से नया रोबोट बना लेता है।
पुनर्जन्म के विपक्ष में भी अनेक तर्क एवं प्रक्ष खड़े हैं। यह पहेली शब्दों द्वारा नहीं सुलझाई जा सकती है। जीवन के प्रति समग्र सजगता एवं अवधान ही इसका उत्तर दे सकते हैं। संस्कारों की नदी में बहने वाला मन इसे नहीं समझ सकता है।

 

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विपरीत स्थिति में कैसे जीना :जियो तो ऐसे जियो

जीवन भर हम दूसरों के साथ कैसे रहें ,यह सीखतें हैं,लेकिन स्वयं को भूल जाते है। जबकि अपने प्रथम मित्र तो हम स्वयं हैं। यदि हम अपने साथ सुख एवं खुशी से नहीं रह सकते हैं तो जीवन का क्या अर्थ हैं। हमारी उपलब्धियां एवं जीतने का क्या अर्थ हैं। स्वयं को खोकर कुछ भी पा ले तो बेकार हैं। इस ’स्वयं’ को सुव्यवस्थित करने की कला का नाम जीवन प्रबन्धन हैं। हम स्वयं को पाकर ही जीवन को जान पाते हैं, यही है जीवन प्रबन्धन ।

हो सकता है, जीवन जीने के इन सूत्रो , विधियों, तरिको या उपायो से आप पहले से ही अवगत हों , फिर भी आप इनकी शक्ति को कम न समझे । ये वे उपाय हैं, जो आपको जीवन जीने की कला सिखा सकते हैं। मार्ग पर चलना प्रारंभ करेंगे आगे बढेंगे तभी तक्ष्य को प्राप्त कर पाएंगे
हमारा जीवन अपने मस्तिष्क देह,अर्थ , परिवार, समाज ,मृत्यु व चेतना संबद्व हैं। इसलिए यह पुस्तक सात भागों में विभाजित हैं। प्रत्येक भाग के साथ अतिरिक्त पाठय-सामग्री के रूप में कुछ श्रेष्ठ पुस्तकों का उल्लेख हैं। प्रत्येक पाठ के आगे -पिछे सम्बंधित विषयों पर अनमोल वचन दिए हुए हैं।

इसमें विद्ववान लेखक द्वारा कहानी, तर्क ,शोध, व्यक्तिगत अनुभव एवं उदारण द्वारा अपनी बात स्पष्ट की गई हैं। अपने जीवन में अतियोें से बचने व संतुलन स्थापित करने की विधा सिखाती है यह पुस्तक । जीवन प्रबंधन,धन और कैसे जिएं – को यह विस्तार से बताती हैं। हमें अपने लक्ष्य स्पष्ट करने, उन्हे प्राप्त करने में यह पुस्तक भरपुर मदद करती हैं।

प्रकाशन :      प्रभात प्रकाशन , 4 /19  आसफ अली रोड ,  नई दिल्ली -110002

पेज – 176,      कीमत – 125

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मीठा खाने का नशा कोकेन से ज्यादा नशीला व हानिकारक

शक्कर एक तरह का जहर है जो कि मूख्यतः मोटापे, हृदयरोग,सभी तरह के दर्द व कैंसर का कारण है । भारतीय मनीषा ने भी इसे सफेद जहर बताया है । डाॅ0 मेराकोला ने इसके विरूद्ध बहुत कुछ लिखा है । डाॅ0 बिल मिसनर ने इसे प्राणघातक शक्कर-चम्मच से आत्महत्या बताया है । डाॅ0 लस्टींग ने अपनी वेब साईट डाॅक्टर में इसे विष कहा है । रे कुर्जवले इस सदी के एडिसन जो कि 10 वर्ष अतिरिक्त जीने अपने वार्षिक भोजन पर 70 लाख रूपया खर्च करते हैं ने अपने आहार में अतिरिक्त चीनी लेना बन्द कर दी है ।

अधिक शक्कर से वजन व फेट दोनों बढ़ते हैं । डाॅ0 एरान कैरोल तो स्वीटनर से भी चीनी को ज्यादा नुकसानदेह बताते हैं । चीनी खाने पर उसकी आदत नशीले पदार्थ की तरह बनती है । प्राकृतिक शर्करा जो फल व अनाज में तो उचित है । sugar is poision
हम जो चीनी बाहर से भोजन बनाने में प्रयोग करते हैं वह विष का कार्य करती है । यह शरीर के लिए घातक है । डिब्बाबन्द व प्रोसेस्ड फूड में चीनी ज्यादा होती है उससे बचे । अर्थात् पेय पदार्थ व मिठाईयांे के सेवन में संयम बरतना ही बेहतर है।

चीनी के विकल्प
आप जितनी कम चीनी खाएंगे, उतने ही स्वस्थ रहेंगे। मधुमेह पीडि़तों को चीनी का कम सेवन करना चाहिए। प्राकृतिक मिठास जैसे फल, अंजीर का सेवन करें। स्वस्थ लोग चीनी की बजाय गुड़, शहद, खजूर व फलों का सेवन करें। इससे चीनी की तुलना में खून में शुगर का स्तर कम तेजी से बढ़ता है। शहद चीनी का बेहतर व पोषक विकल्प है।
चीनी के कृत्रिम विकल्पों में स्टेविया,  प्रमुख हैं। स्टेविया सामान्य चीनी से 300 गुना अधिक मीठी है, पर इसके सेवन से खून में शर्करा का स्तर अधिक नहीं बढ़ता।
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PH एवं आहार : अम्लता की बजाय क्षारीय भोजन ले

हमारे रक्त में अम्ल एवं क्षार दोनो होते हैं । स्वस्थ रहने के लिए इनमे संतुलन आवश्यक है । हमारा भोजन भी दोनों तरह का होता है । हमारे शरीर में अम्लता घातक है, अतः क्षारीय आहार संतुलन लाता है । अम्लता की स्थिति में हाइड्रोजन आयन शरीर को थोड़ा अम्लीय बनाते हैं । क्षारीय भोजन हाइड्रोजन आयन कम करता है । जो शरीर के लिए लाभदायक है । इसलिए रक्त की अम्लता को कम करने के लिए 80 प्रतिशत क्षारीय आहार लेना चाहिए ।Ph- Acid- alkaline diet
भोजन से रक्त बनता है । अम्ल एवं क्षार की मात्रा को नापने के लिए एक पैमाना तय किया है जिसे पीएच कहते हैं । किसी पदार्थ मंे अम्ल या क्षार के स्तर को की मानक ईकाइ पीएच है । पीएच को मान 7 से अधिक अर्थात वस्तु क्षारीय है । शुद्ध पानी का पीएच 7 होता है । पीएच बराबर होने पर पाचन व अन्य क्रियाएं सुचारू रूप से होती है । तभी हमारे शरीर की उपापचय क्रिया सही होती है एवं हारमोन्स सही कार्य कर पाते हैं एवं उनका सही स्त्राव होता है । तभी शरीर की प्रतिरोध क्षमता बढ़ती है ।
बढ़ता प्रदूषण, रसायनों का सेवन व तनाव से शरीर में अम्लता की मात्रा बढ़ती है । तभी आजकल रक्त मे पीएच 7.4 से कम हो गया है । 7.4 आदर्श पीएच माना जाता है । इससे उपर पीएच का बढ़ना क्षारीय व इसका 7.4 से कम होना एसीडीक होना बताता है। आजकल हमारा रक्त का पीएच 6 या 6.5 रहता है । इसी से कैंसर जैसी घातक बीमारियां होती है । शरीर की प्रतिरोधक क्षमता भी कम हो गई है । शरीर में दर्द इसी से रहता है । पित्त का बढ़ना, बुखार आना, चिढ़ना सब अम्लता बढ़ने से होता है ।
निम्बू, अंगुर आदि फल खट्टे होते हैं लेकिन पाचन पर ये क्षारीय प्रभाव उत्पन्न करते हैं । इनके अन्तर स्वभाव से नही बल्कि पचने पर जो प्रभाव होता है उसके कारण क्षारीय माना जाता है । पाचन पर जो खनिज तत्व बनाते हैं व सब क्षारीय होते हैं ।
अम्लीय आहार – मनुष्य द्वारा निर्मित आहार प्रायः अम्लीय होता है जिससे एसीडिटी होती है । जैसे तले-भूने पदार्थ, दाल, चावल, कचैरी, सेव, नमकीन, चाय, काॅफी, शराब, तंबाकु, डेयरी उत्पाद, प्रसंस्कृत भोजन, मांस, चीनी, मिठाईयां, नमक, चासनी युक्त फल, गर्म दूध आदि के सेवन से अम्लता बढ़ती है ।
क्षारीय आहार – प्रकृति द्वारा प्रदत आहार (अपक्वाहार) प्रायः क्षारीय प्रभाव उत्पन्न करते हैं । जैसे ताजे फल, सब्जियां, अंकुरित अनाज, पानी में भीगे किशमिश, अंजीर, धारोष्ण दूध, फलियां, छाछ, नारियल, खजूर तरकारी, सुखे मेवे, आदि पाचन पर क्षारीय हैं ।ज्वारे का रस क्षारीय होता है । यह हमारे शरीर को एल्कलाइन बनाता है । शरीर के द्रव्यों को क्षारीय बनाता है । खाने का सोड़ा क्षारीय बनाता है ।

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