रहस्य महत्वपूर्ण है,उन्हें रहस्य ही रहने दो

प्रकृति  ने हमसे कुछ रहस्य छिपाएं रखे है उसके अपने कारण है l हम उनको जानने के बाद लाभान्वित कम होंगे व हानि उससे अधिक होनी है ,इसलिए प्रक्रति ने गुप्त रखे है l बनाने वाले की शक्ति एवं बुद्धि पर शंका  न करें , हम सीमित समझ  वाले  व्यक्ति है l

जितना जानना जरूरी है उतना जानने की व्यवस्था उसकी तरफ से पहले से ही हैl अस्तित्व ने प्रत्येक जीव को उसकी आवश्यकता अनुसार इन्द्रिया दी है ताकि  वह जान सके l वर्तमान में रहते हुए सौ प्रतिशत जी सके  इसलिए भविष्य का ज्ञान नहीं दिया हैl  हमें  वर्तमान में रहने का अधिकार है, होनहार यानि परिणाम पर  हम किसी  का वश नहीं है l इसीलिए भगवतगीता का उपदेश अपने कर्तव्य करने  का  है l

शशांक भाई  तभी तो अपने कोर्स के दौरान सब घोषित  नहीं करते  है l सिर्फ अगली कक्षा  में आने का समय बताते है,  वहां क्या करेंगे नहीं बताते है l इस रहस्य से विस्मय एवं आनन्द आता है,पूर्वाग्रह बना नहीं पाते ,पूरा ध्यान दे पाते है l इससे करने में डूब जाने का अवसर  पैदा होता  है l

हमारा अहंकार सब जानना चाहता है ,वरन जानकर बाधा ही पैदा करता है  l हमारा मन हमें  जानने पर उलझा देता है  l

हमारी इच्छाएँ एवं समझ जरूरी नहीं है कि सदैव  हमारे लिए उपयोगी हो l उनकी अपनी सीमा है l सीमीत समझ से उस अखिल नियन्ता को हम नहीं पकड़ सकते है lकृति अपने  निर्माता को नहीं बूझ सकती है l  शब्दों द्वारा रहस्यों को जानना मानसिक है ,उथला है l उससे कुछ गहन नहीं घटता है,रूपांतरण नहीं होता है l वह अनुभव नहीं बनता है l जीवन में रहस्य की बड़ी भूमिका है उसे समझने की जरूरत है l

योगिक जीवन शैली जीने एवं स्वयं की खोज में यह उपयोगी है l अंतर्यात्रा में रहस्य सहायक है lरहस्य को रहस्य ही रहने दो  एवं उसका आनन्द उठाओl

इमरटीयस साइंटिस्ट डॉ मंजू रे की प्रेस वार्ता -स्वास्थ्य सेतु , उदयपुर में

कैंसर  शोध अंतिम चरण में : डॉ  मंजू रे

कैंसर को रोकने एवम उपचार पर इनका  गहन शोध चल रहा है l  इनके अनुसार मिथाइलग्लॉक्सल, जो हमारे शरीर में ऊर्जा बनते समय भी बनता है, से ट्युमर को रोका और खत्म किया जा सकता है. इसका अन्य कोशिकओं पर दुष्प्रभाव नहीं पड़ता है l इसमें कैन्सर के अंतिम स्टेज तक के 75 प्रतिशत रोगी ठीक हुए है l

विटामिन सी के खोजकर्ता नोबल पुरुस्कार  विजेता डॉ अल्बर्ट स्जेंट ग्योर्गी ,हंगरी के वैज्ञानिक ने भी इस पर कार्य किया था l  डॉ मंजू रे  ने इस शोध को आगे बढाया है l बहुत से वैज्ञानिक मिथाइल ग्ल्योक्साल पर शोध कर चुके हैं. उनका कहना है कि मिथायल  ग्लायाक्सोल की कोशिकओं में कमी के कारण कैंसर होता है l

शांति स्वरूप भटनागर एवं अनेक पुरुस्कार विजेता डॉक्टर मंजू रे  एक मॉलिक्यूलर एन्जायोमोजी  एवं कैंसर बायोकेमिस्ट्री की मुख्य शोधकर्ता  है l वह कौंसिल ऑफ़ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च ( CSIR), इंडियन कौंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च , यु जी सी,डिपार्टमेंट ऑफ़ साइंस एंड  टेक्नोलॉजी ,लाइफ केयर इनोवेशन ,बोस इंस्टिट्यूट ,कलकत्ता में कैंसर चिकित्सा पर शोध कर रही है l  अपने पति  डॉ शुभांकर रे  और उनकी  टीम में ओंकोलोजिस्ट  डॉ  संजय दास ,ओंकोलोजिस्ट डॉ  अरविन्द कुलकर्णी ,  डॉ  संतजित  दत्ता ( फिजिशियन ) डॉ अभिमन्यु  बासु ( सर्जन ) एवं उनके बहुत से  शोधार्थी उनके साथ है l उनके 57  शोध पत्र अंतर्राष्ट्रीय जर्नल्स में प्रकाशित हो चुके है l

डॉ मंजू रे ने हिम्मत और लगन से ट्रायल के नियमो के अनुसार और  डी सी जी आई  -सरकारी  मंजूरी  के बाद कैंसर में मिथाइल ग्ल्योक्साल पर  क्लिनिकल ट्रायल  कर रही हैं.

लेकिन भारत में इस ट्रायल को पूरा करने में बहुत सी बाधाओं से इन्हें झूझना पर रहा है .वर्तमान में उन्हें   इस कार्य  में धन की कमी है l

सक्सेज स्टोरी 1: तीन माह  में लीवर कैंसर एंड सिरोसिस  में चमत्कारिक आराम

योगेश शर्मा,उम्र ५५ वर्ष , एक  पशु चिकित्सक है l उनका लीवर सिरोसिस  एवं  कैंसर में  हो गया l अलो डॉक्टरों  की लंबी चिकित्सा के बाद  उन्हें जवाब दे दिया की अस सप्ताह भर शेष है l इस बीच म्रत्यु की इंतजारी के बीच मेरे साडू भाई   ने डॉ मंजू रे के बारे में बताया व मिथाइल गल्य्क्सोल लेना उनके निर्देशानुसार शुरू किया l दो माह के भीतर में ठीक हो गया व  चौथे माह से ऑफिस जाना शरू कर  दिया l

सक्सेज स्टोरी 2:  लंग कैंसर  में आराम

अनिल पॉल ,उम्र  ६५ वर्ष , फार्मा मार्केटिंग से जुड़े है l वह  स्वयं आहार एवं पोषक  तत्वों के विशेषज्ञ है l उनको श्वास की तकलीफ हुई जिसे जाँच पर लंग कैंसर बताया, दोनों फेफड़ें  प्रभावित हो चुके थे l दायाँ फेफड़ा पूरी तरह  सिकुड़  कर निष्क्रिय हो चूका थे l डॉक्टरों ने  बताया की इसका सम्पूर्ण इलाज नहीं है, जीवन खतरें में है ,कुछ दिन बढ़ाए जा सकते हैl

इनके परिवार में कैंसर एक महामारी सा था. इनके पिता की मृत्यु लंग कैंसर से, माताजी की मृत्यु ब्रैस्टकैंसर से और छोटे भाई की भी लग कैंसर से हुई थी.

खोजी होने के कारण नेट से  रिसर्च पेपर्स पड़ते हुए डॉ मंजू रे के शोध के बारे में पढ़ा और पत्नी के संग कोलकोता पहुँच गये l डॉ मंजू रे से मिलकर इनकी ट्रायल का हिस्सा हो गये l इनकी एक्सपेरिमेंटल  मेडिसिन निरन्तर लेने लगे l प्रथम माह से ही बीमारी में राहत शुरू हो गई , आज छ माह में लगता है की जैसे कोई  रोग ही नहीं है l

कैंसर के इलाज की खोज अंतिम चरण में : डॉ मंजू रे

 

शांति स्वरूप भटनागर पुरुस्कार विजेता डॉक्टर मंजू रे  एक मॉलिक्यूलर एन्जायोमोजी  एवं कैंसर बायोकेमिस्ट्री की मुख्य शोधकर्ता  है l वह कौंसिल ऑफ़ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च ( CSIR) -बोस इंस्टिट्यूट ,कलकत्ता में कैंसर चिकित्सा पर शोधरत  है l विगत तीस  वर्षो की शोध का परिणाम आ गया है l

डॉ  मंजू रे की फर्स्ट ट्रायल  २००१  में  १९  कैंसर की अंतिम अवस्था के रोगियों पर हुई ,जिसमे ७० प्रतिशत रोगी पूरी तरह ठीक हुए l

सेकंड ट्रायल में  २००० से २००५ तक चली  जिसमे ४६ रोगियों को दवा दी गई l इसमें सभी तरह के  कैंसर  रोगी थे l उनमें से १८ रोगी पूरी तरह ठीक हुए  एवं १८  रोगी का बीमारी का बढ़ना रुका व आशिंक रूप से ठीक हुए ,इस तरह  ७८ प्रतिशत रोगी ठीक हुए l

बी  सेकंड  ट्रायल  २००५  से २००८ के बीच हुई जिसमे २३ रोगियों पर परीक्षण हुआ जिसमे से ११ पुरे ठीक एवं ७ रोगियो का कैंसर बढ़ा नहीं व आशिंक ठीक हुए l इस तरह ७५ प्रतिशत सफलता मिली l

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हीरो होते नहीं, गढ़े जाते है

असली में नायक पैदा होते नहीं है ,उन्हें अपने मतलब से गढ़ा जाता है l कोई व्यक्ति महानायक  होता कम है लेकिन रचा अधिक जाता है ,इसमें कोई बुराई नहीं हैl  हमे प्रेरणाएँ जीवन में आगे बढाती है इसलिए नायको की  समाज को जरूरत रहती है l नायक हमारी सोयी शक्तियाँ  जगाते है l

राजकुमारों को  पढ़ाने, समझाने लिखी पंचतंत्र  की कहानियों के चरित्रों को  बच्चे असली मान लेते है l इसी तरह बात आगे चलते चलते रामायण व महाभारत रच दिए जाते है ,उनके नायक भगवान बन जाते है l व्यस्त समाज को इन्हें मानने में सुविधा है, प्रतिकार में अधिक ऊर्जा लगानी पडती है ,अत उसे चुपचाप मानने में अधिक सुविधा होती है l

पंचकर्म कार सर्विसिंग के समान स्वस्थ रहने कराते रहें

panchakarma

 

शोधन चिकित्सा में शरीर का भिन्न भिन्न प्रकार से साफ किया जाता है जो दोषों को शरीर से बाहर निकाल कर रोगों को जड़ से समाप्त करती है।l  शरीर में नित्य सफाई चलती रहती है ,इस उपक्रम में कुछ विषाक्त पदार्थ वह बाहर छोड़ता रहता है l इसी सफाई को ढंग से करने को आयुर्वेद में पंचकर्म कहते है l स्वस्थ रहने वर्षा ऋतु में विरेचन ,शरद में बस्ती एवं बसंत में वमन आदि विशेषज्ञ से  कराएँ ताकि शरीर युवा रहे l स्वास्थ्य सेतु में वार्ता   के दौरान डॉ श्रीराम शर्मा, शोधन चिकित्सा विशेषज्ञ  ने  बताया  कि वर्षभर में तीन-चार  बार शरीर का शोधन कराते रहे l आयुर्वेद के अनुसार आहार लें  तो रोग नहीँ होंगे l

योग समुह में सीखें,लेकिन अभ्यास अकेले में करना चाहिए, साथ ही योगिक जीवन जिएँ  तभी पूरा लाभ मिलेगा  l