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स्वस्थ रहने हेतु जम कर ताली बजाए

ताली दुनिया का सर्वोत्तम एवं सरल सहज योग है l यदि प्रतिदिन यदि नियमित रूप से ताली बजाई जाये तो कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं को सुलझाया जा सकता है। ताली बजाने से पहले हमें सरसों या नारियल का तेल अपने हाथों पर लगा लेना चाहिए।

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डॉ. डोगरा के मुताबिक, इस थेरेपी के लिए सुबह का समय सर्वोत्तम है। सुबह-सुबह 20-30 मिनट तक ताली बजाने से आप स्वस्थ और सक्रिय रहेंगे। फिर किसी हठयोग या आसनों की जरूरत नहीं रहेगी। यदि दिन भर  में लगभग 1500 बार ताली बजाये  तो हम बिल्कुल स्वस्थ रहते हैं।

ताली बजाना मात्र एक  व्यायाम नहीं हैl ताली बजाने से हमारे दोनों हाथों के बिंदु दब जाते हैं जिसके कारण हमारे शरीर को बहुत ही लाभ पहुंचता है।एक्युप्रेशर विज्ञान के अनुसार हाथ की हथेलियों में शरीर के समस्त अंगों के संस्थान के बिंदू होते हैं। जब ताली बजाई जाती है तब इन बिन्दुओं पर बार-बार दबाब यानिप्रेशर पड़ता है जिससे शरीर की समस्त आन्तरिक संस्थान में उर्जा जाती है और सभी अंग अपना काम सुचारू रूप में करने लगते हैं।

ताली बजाने से शरीर के विकार खत्म होते हैं और वात, कफ और पित्त का संतुलन ठीक तरह से बना रहता है। मानसिक तनाव, चिंता और कब्ज के रोग भी ताली बजाने से खत्म होते हैं।लगातार ताली बाजाने से आपका शरीर बीमारियों से लड़ने में सक्षम होता है। जिससे कोई भी बीमारी आसानी से शरीर को नहीं लगती है।ताली बजाने से शरीर स्वस्थ और निरोग रहता है।

जब भी हम लगातार ताली बजाते हैं तो हमारे ब्लड में कोलेस्ट्रॉल कम होता है जिससे हमें हार्ट का खतरा कम रहता है। इस प्रकार की ताली बजाने से कब्ज, एसिडिटी, मूत्र, संक्रमण, खून की कमी व श्वांस लेने में तकलीफ जैसे रोगों में लाभ पहुंचता है।

जब हम लगातार ताली बजाते हैं, तो हमारी ऑक्सीजन का फ्लो सही तरीके से काम करता है, हमारे फेफड़ों में ऑक्सीजन सही तरीके से पहुंचती है, जिसके कारण हम हेल्दी रहते हैं। इसके अलावा हृदय रोग, मधुमेह, अस्थमा, गठिया आदि बीमारियों से हमें राहत मिलती हैl शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और बीमारियों से बचने के लिए भी क्लैपिंग करनी चाहिए।कहा तो यहां तक जाता है कि कीर्तन के समय हाथ ऊपर उठा कर ताली बजाने  में काफी शक्ति होती है। इससे हमारे हाथों की रेखाएं तक बदल जाती हैं।

ताली बजाने से बच्चों का दिमाग तेज़ होता है।  जब बच्चे लगातार ताली बजाते हैं तो उनकी लिखावट साफ हो जाती है।

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जीवन एक रहस्य हैः इन्द्रियों द्वारा उसे नहीं जान सकते

मेरी पुस्तक ‘तनाव छोड़ो ,सफलता पाओ’ से तनावरोधी कैप्सूल

 

 

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देह गगन के सात समंदर : सैन्नी एवं स्नोवा का आत्म खोजी उपन्यास:

देह गगन के सात समंदर वैसे एक कथ्य व शैली के हिसाब से उपन्यास है लेकिन वास्तव में यह एक आधुनिक उपनिषद की तरह है ।यह उपन्यास नहीं बल्कि जीवन शास्त्र है । इसमें स्वयं की खोज एवं स्वयं को पाने का वृतान्त है ।

सैन्नी एवं स्नोवा
सैन्नी एवं स्नोवा

यह एक रहस्यदर्शी, दार्शनिक एवं अन्र्तयात्रा वृतान्त है जो स्वयं की खोज में लगे हुए है । नायक एवं उसकी टोली देह के पार की अन्वेशक है । यह आत्मखोज परक उपन्यास है ।
प्रेम एवं मैत्री, अस्तित्व एवं सौन्दर्य, पुरूष और स्त्री एवं धर्म एवं अध्यात्म पर इसमे गहन चर्चा की हुई है । शब्द के पार जाने की कला इसमे बतायी हुई है । कला एवं कलाकार, कविता एवं साहित्य, मन एवं उसके पार पर बहुत विस्तृत चर्चा है ।

स्त्री व पुरूष सम्बन्धों में गहराई व आत्मीयता बढ़ने से जीवन का रहस्य समझा जा सकता है । पारम्परिक ढर्रे पर जीने से बेहोशी बढ़ती है । स्त्री-पुरूष सम्बन्धों में अपूर्णता जीवन में अपूर्णता का कारण है । स्वयं को जानने की दिशा में यह एक मार्ग है । अपने भीतर के विपरित लिंग से मिलने में बाहर का साथी मात्र सहायक है । असल तो अपनी ही देह के विपरित लिंग से मिलना है। दूसरों के बहाने हम अपने ही ठिकाने तलाश रहे हैं । सजगता व्यक्ति को नये आयाम देती है ।

नर-नारी के स्वाभाविक देहयोग और देहभोग तक से डरते रहेगें, जिसके बिना हम न स्वयं को जान सकते है, न ही दूसरे को । दमन व भय ने नारी को अधुरा बना दिया है । वह समर्पण व प्रेम से वंचित होने से खण्डित है ।
आज देह लोलुपता के विकास की जगह सहभागी चेतना का विकास आवश्यक है।आत्मा स्थिर या तैयार नहीं होती है । यह एक घटना है, संज्ञा नही है । इसे रचना पड़ता है । इसका निर्माण दृष्टा होने पर होता है ।

इसके लेखक मनाली के रहने वाले सैन्नी एक यायावर है जो हिमालय में घुमते हुए अपनी खोज में व्यस्त है। परम्परागत व संगठित धर्मों के विरूद्ध है। सच्चे अध्यात्म के राही है।

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मेरी आने वाली पुस्तक ‘तनाव छोड़ो ,सफलता पाओ’ के बारे में

 तनाव छोड़ो ,सफलता पाओ                              तनाव कम करने पर यह सम्पूर्ण पुस्तक है जिसमें 16 उपाय तनाव कम करने पर दर्षाऐ हैं । लेखक स्वयं ने अपने जीवन में अनेक तरह के तनाव भोगे हैं एवं उनका सामना सफलता पूर्वक किआ हैं। तनाव आधुनिक जीवनशैली एवं आधुनिक विज्ञान की देन है। बीमारियों का सबसे बड़ा कारण तनाव है। तनाव हमारी आदत में आ गया है, जीवन में घुस गया है। इसे जीतना अब सरल नहीं रहा है। यह दिखाई भी नहीं पड़ता है। मोटे तौर पर तनाव एक   मानसिक स्थिति है। यह हमारे दिमाग में रहता है। तनाव हमेशा सिर से शुरू होता है। घटनाएँ सदैव तनाव का कारण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि आप घटनाओं को किस रूप में लेते और उनसे प्रभावित होते हैं। घटना की व्याख्या एवं विश्लेषण से हमारा रवैया तय होता है। हमारा रवैया ही तनाव होने और नहीं होने का कारण है।
हम तनावग्रस्त होने के कारण एवं अपनी अनेक तरह की कमजोरियों के कारण अपने विपुल ऊर्जा भण्डार का पूरा उपयोग नहीं कर पाते हैं। अदृश्य तनाव भी बन्धन है। मनोवैज्ञानिक विकलागंता शारीरिक विकलागंता की अपेक्षा बहुत हानिप्रद होती है। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद आप परिस्थितियों एवं व्यक्तियों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया और अनुभवों की व्याख्या को तनाव के सम्बन्ध में पहचान सकेंगे और आप तनाव के प्रभावों को कम करने में पुस्तक में वर्णित उपायों का प्रयोग कर सकेंगे।
यह सात भागों में विभाजित हैं। पुस्तक के अन्त में 22 ऐसे लोगो के अनुभव हैं जिन्होने अपने तनाव कैसे दुर किए हैं। ये भी तनाव छोडने के अनुभूत उपाय हैं । इस तरह यह पुस्तक लेखक की अकेली न होकर 22 व्यक्यिों की भी हैं।

                                                                                                                                                                                                                        

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पूर्वाग्रह व निष्पक्ष तार्किकता को दर्शाती फिल्म ‘एक रूका हुआ फैसला’

अपने परिवार में निर्णय कैसे करने चाहिए । आपसी सदस्यों को कैसे समझाना । सामुहिक संवाद से निर्णय करने की कला इससे सीख सकते हैं ।यह दर्शाती है कि हम कैसे फैसले लेते हंै ? यह मानना छोड़ जांचना सिखाती है । फैसला करने के दौरान व्यक्तिगत मान्यता कैसे प्रभावित करती है ऐसा दिखाया गया है । Ek_Ruka_Hua_Faisla
‘एक रूका हुआ फैसला’ नामक हिन्दी फिल्म देखी जिससे निर्णय प्रवृति जांचने मिली कि कैसे हम अपने स्वार्थवश या अज्ञानवश जल्दबाजी में निर्णय करते हंै । अपनी-2 मान्यता के आधार पर सोचते हैं। यह बड़ा घातक है । इसमे दिखाया गया है कि धिरे-धिेरे संवाद से कैसे मान्यताएं बदलती है जिससे निर्णय बदलता जाता है ।
फिल्म में एक व्यक्ति पर आरोप है कि उसने अपने पिताजी का खुन कर दिया है। कोर्ट में गवाही हो चुकी है अब जुरी को यह निर्णय करना है कि वह कसुरवार है कि नहीं । फिल्म के प्रारम्भ में जूरी के ग्यारह सदस्य आरोपी को कसुरवार मानते हैं । मात्र एक सदस्य आरोपी पर संदेह कर अपनी बात रखता है। लेकिन फिल्म का नायक रैना अपना संतुलन नहीं खोते हुए विनम्रतापूर्वक दृढ़ता से अपनी बात रखता है कि शायद वह बेकसुर है । इस जब यह स्पष्ट होने लगता है कि यह एक जिन्दगी का सवाल है। इससे फिल्म आगे बढ़ती है। गवाही का सूक्ष्म परीक्षण होने लगता है। दूसरे जुरी के सदस्य भी अपने निर्णय पर पुर्नविचार करने लगते है। अपने पुर्वाग्रहांे को पहचानते हुए अपना निर्णय बदलने लगते हैं। अपने निर्णय के आधारों पर उन्हे शक होने लगता है। जल्दबाजी व अपनी लापरवाही दिखने लगती है। जो पहले वैसे ही मान लेते हैं वे अब अपने निर्णय को जांचने लगते है कि उन्होने मात्र किसी आवेश या मान्यतावश तो निर्णय नहीं कर लिया । इस क्रम मे जुरी के सभी सदस्य आपस में टकराते है एवं व्यक्तिगत आरोप भी लगाते हैं।सभी सदस्य धिरे-धिरे बदल कर उसे बेकसुर मानने लगते हैं । अन्त में सभी सदस्य आरोपी को बेगुनाह मानते हैं।
तर्क द्वारा शान्ति से अपनी बात खुले मन से करने पर सच्चाई की दिशा में प्रयत्न किए जा सकते हंै । किसी के साथ अपने पूर्वाग्रहों व अनुकरण के कारण अन्याय न करें । मनुष्य एवं मनुष्य के बीच सम्बन्ध न्याय पर ही टिके हुए हैं । अतः व्यवहार बढ़ाना है तो न्याय पर ध्यान देना चाहिए । निर्णय मान्यता के आधार पर नहीं लेकर जानकर लेने चाहिए ।

अंग्रेजी फिल्म ‘‘टवेल्व एन्ग्री मेन’’ से प्रेरित है । यह नाम ज्यादा सार्थक है । जुरी के सभी सदस्य क्षुब्ध व खफा है, गुस्से में है । उसका असर उनके निर्णयों पर आता है । जल्दबाजी के कारण व गम्भीरता से न तो सुनते हैं न ही तय करते है । किसी न किसी आवेश में बस तय कर लेते हैं । जबकि तय करने का कोई स्पष्ट ठोस तार्किक कारण उनके पास नहीं होता है। एक सदस्य को वहां से जरूरी जाना है इसलिए उसे कसूरवार मान कर भागना चाहता है । एक सदस्य सोचता है कि पुलिस ने पकड़ा है, चश्मदीद गवाह है । बस कसूरवार है । एक मानता है कि अधिकांश कसूरवार मान रहे हैं तो ठीक ही मानते होगें तो वह कसूरवार कह देता है । एक नया सदस्य है अधिक विचार न कर बहुमत का साथ देता है । बूढ़े सदस्य पूरा विश्लेषण न कर हां कर देते हैं । तार्किक सदस्य चश्मदीद गवाही व आरोपी की अपराधिक प्रवृति के कारण सजा देना चाहता है ।एक सदस्य निम्न जाति का होने से उसे अपराधी मान लेते हैं । सभी अलग-अलग अपने-अपने कारणों के आधार पर गुनहगार मानते हैं । फिल्म में पंकजकपूर व रैना की एक्टिंग बहुत ही सटीक है । पंकजकपूर का बेटा झगड़ा कर घर छोड़कर चला गया है इसलिए वह सभी बेटों को अपराधी मान लेता है कि बेटे दुष्ट ही होते हैं । वह अपने पुर्वाग्रह के कारण उसे कसुरवार मानते हैं। भावुक पंकज कपूर सारे बेेटों को गुनहगार मानने के कारण सजा देना चाहता है।
संतुलित सदस्य नायक शान्ति से विचार कर निर्णय चाहता है चूंकि उसे गुनहगार होने में संदेह है । माकूल शक का वह निराकरण चाहता है । नायक का कहना है कि चर्चा जारी रहनी चाहिए ताकि निर्णय लेने मे सुविधा हो ।
निर्णय के क्रम में व्यक्तिगत आरोप लगाते हैं एवं परस्पर झगड़ने लगते हैं । अपने-अपने भीतर की कूंठाए व पूर्वाग्रह को अच्छी तरह से दिखाया गया है । क्षेत्र, ऊंच-नीच, तेरा-मेरा बीच में आते है । जबकि उपराध स्वतन्त्र कर्म है, कोई भी भ्रष्ट नहीं है व ईमान से निर्णय करने आए हैं । किसी का निजी हित आरोपी से नहीं है । लेकिन स्वयं के आग्रह हावी है । दर्शक स्वयं अपना निर्णय बदलते जाते हैं व पूरी प्रक्रिया स्पष्टता से जांचने का महत्व समझने लगता है । बिना आधार व कारण के भी गलत निर्णय होता है । हम निरपेक्ष नहीं देखते हैं । देखने में आन्तरिक कारण होते हैं ।

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वीरेन्द्रकुमार जैन रचित प्रसिद्ध उपन्यास अनुत्तर योगी तीर्थंकर महावीर :समापन भाग

श्रेणिक, चेतना, चन्दनबाला, गोलक के चरित्र उज्जवल है । यथार्थवादी एवं अपनी भूमिका पूरे व सधे हुए हैं । कई बार महावीर वामणीय लगते हैं । आत्म जगत का पुरूषोतम हमारी समझ/पकड़ के बाहर रह जाता है ।
महाजनपद कालीन भारत में व्याप्त समस्त चितंन को समग्रता में लिखा है । वेद-अवेद, जैन-बौद्ध समस्त दर्शनों को महावीर के इस चरित्र को उत्कीर्ण करने में प्रयोग हुआ है । इन सबके बीच पुरूषोत्तम महावीर आगे बढ़ते चले जाते हैं ।
जैन धर्म में वर्णित अलौकिक घटनाएं महावीर के जीवन में वैसी ही स्वीकारी है । तब यह उपन्यास अतिशयोक्त लगता है । चमत्कार, अतिशय आदि का समावेश यद्यपि साकार प्रतीत होता है । महावीर कहीं भी कभी भी सामान्यजन नहीं लगते हैं सदैव पुरूषोत्तम की तरह सोचते हैं ।
यह एक सच्चे अर्थाें में भारतीय वीरासत है । महावीर अपनी यात्रा के क्रम सिी को कम नहीं बताते । सभी श्रेष्ठताओ को उघाड़ते जाते हैं । भारतीय ऋषियों द्वारा आत्म-यात्रा की पूरी गाथा इसमें है ।
जैनांे द्वारा सर्वज्ञता मानने से महावीर सदा ’’तीर्थंकर‘‘ की तरह व्यवहार करते हैं । उनकी सोच पूर्वजन्म से स्म्रण होने से सदैव हम से भिन्न है । वे किसी भी पार्थिव सुख को नहीं चाहते हैं न मानते है । वे सदैव कालातीत सुख की खोज करते बताए गए हैं । अतः पाठक महावीर में अपने को नहीं देख पाता है । महावीर साधना काल में किसी गुरू, आश्रम में जाते हैं या नहीं, पता नहीं लगता । उपन्यास में उपमाओं व अलंकारांे की बहुतायत है ।
वैसे पूरी जीवनी मनोवैज्ञानिक तलाश है । मन की स्थिति, स्वभाव, प्रकृति क अनुसार आगे बढ़ती है । साथ ही आत्मज्ञान ही सर्वज्ञान है । इसका मनोविज्ञान इसमे देखा जा सकता है । यहां तक की जैन मान्यताओं तक का मनोविज्ञान
प्रसिद्ध कवि-कथाकार और मौलिक चिन्तक वीरेन्द्रकुमार जैन ने अपने पारदर्शी विज़न-वातायन पर सीधी-सीधे महावीर का अन्तःसाक्षात्कार करके उन्हे निसर्ग विश्वपुरूष के रूप में निर्मित किया है । हजारों वर्षों के भारतीय पुराण-इतिहास, धर्म, संस्कृति, दर्शन, अध्यात्म का गम्भीर एवं तलस्पर्शी मन्थन करके कृतिकार ने यहां इतिहास के पट पर महावीर को जीवन्त और ज्वलन्त रूप् में अंकित किया है ।
वीरेन्द्रकुमार जैन अन्तश्चेतना के बेचैन अन्वेषी, प्रसिद्ध कवि-कथाकार एवं मौलिक चिन्तक हैं। लेखक एक प्रसिद्ध साहित्यकार है। जिन्होने योगी की तरह जीवन जीकर इसको लिखा है । भाषा पर इनका पूरा आधिपत्य है । अपने जीवन में अर्जित समस्त दर्शन,ज्ञान व अनुभव को इसमें समेटा है । जैन दर्शन को सर्वदर्शन का रूप दिया है। वर्ग विशेष के भगवान को सर्व का भगवान बनाया है । लेखक को इसे लिखने में 9 वर्ष लगे हैं ।
यह विश्व पुरूष महावीर पर श्रेष्ठ कृति है । इसकी पृष्ठभूमि विशाल एवं व्यापक है। इसमे लेखक ने महावीर को साम्प्रदायिक काराओं से मुक्त किया है । यह अपने आप में एक अनुपम एवं बेजोड़ रचना है । उक्त उपन्यास ईसा मसीह पर अंग्रजी में लिखा गया होता तो इसे नोबल पुरस्कार मिलता ।इसकी समीक्षा करते हुए कुबेरनाथ रामा ने इसे महाजन पद कालीन महाभारत कहा है ।

यह उपन्यास चार खण्डों में लिखा हुआ है । वैशाली का विद्रोही राजपुत्र, असिधारा पथ का यात्री, धर्म तीर्थ चक्र का प्रवर्तन एवं अनन्त पुरूष की जय यात्रा

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अनुत्तर योगी तीर्थंकर महावीर :वीरेन्द्रकुमार जैन रचित प्रसिद्ध उपन्यास

हिन्दी भाषा में लिखा हुआ एक महानतम् उपन्यास है, जिसको पढ़ने पर महाकाव्य का रस आता है । पहले भाग में महावीर की गृह त्याग के पूर्व की जीवनी है । इसका दूसरा भाग असिधारा पथ का यात्री तो योगी व्यक्ति को ही समझ में आता है जो साधना काल से सम्बन्धित है । तीसरा भाग केवल ज्ञान के बाद का है । इसको पढ़ते पढ़ते ध्यान लग जाता है । यह हमारी जडता, तेरा मेरा पन, साम्प्रदायिकता व कर्मकाण्ड को तोडता है । चैथा भाग महावीर से प्रेरित रूपान्तरण की गाथाओं से भरा है ।Anuttar Yogi
यह एक कट्टर जैन से उपर उठ कर लिखा गया उपन्यास है । इसमे दिगम्बर व श्वेताम्बर परम्पराओं की प्रचलित कथाओं को शामिल किया गया है । लेखक इसको खुल कर लिखता है । प्रकृति वर्णन बहुत है । लेखक इसमे व्यक्ति महावीर को तीर्थंकर महावीर बनने की जीवन यात्रा का वर्णन करता है। पढ़ते वक्त लगता है कि महावीर आस-पास ही कहीं है । पाठक उस काल में पहंच जाता है ।
महावीर को ऐतिहासिकता प्रदान करनें वाला यह उपन्यास उनकी पराऐतिहासिकता को भी इसमें शामिल कर देता है। यह ऐतिहासिक ही नहीं, पोराणिक जीवनी है, जिसके पात्र आज भी प्रासंगिक है। इसमें यथार्थ व कल्पना का ऐसा मिश्रण है जो सीधा पाठक को पचता जाता है। कहीं कोई शंका नहीं होती, पढते पढते पाठक अपनें को भी तोलनें लगता है। महावीर उसको अपनें लगनें लगतें है। इसमें हर तरह का सामजंस्य है। विरोध व वितण्डावाद कहीं नहीं है।
जीवनी, तर्क, मुल्य व घटनाऐ सब सच लगतें है व मन को छूते है। आत्मज्ञान में रूची हो तो यह पथ के कांटे हटाती है, मन में उजास भरती है, अपनी खोज में मदद करती है। अर्थात मन का अन्धेरा मिटानें में सहायक है । जैन दर्शन का पक्ष रखती है लेकिन सम्प्रदाय के बाडे से मुक्त करती है। वर्णन इस तरह है कि महावीर आज एवं अभी के लगतें है। उपयोगिता सर्वकालिक है । व्यक्ति से भगवान बनने की सिढी एवं आईना दोनों इसमें है। हमारें लिये आज सार्थक व उपयोगी है ।
इसको पढनें पर स्वयं का परीक्षण होता है। अपनी वृतियों, सोच व स्थिति को समझने में मदद मिलती है। अपनें मन के संकोच, दृष्टी व सीमाओं को देखनें का अवसर प्रदान करती है। इसको पढते पढते पाठक स्व को पानें लगता है। उसकी उलझनें सुलझनें लगती है। बहुत से प्रश्नों के उत्तर स्वतः मिलनें लगतें है ।
यह चित्रात्मक शैेली में लिखा गया है । भाषा उच्च श्रेणी की है । प्राकृतिक वर्णन सहज पठनीय है । पौराणिक प्रसंगों को आधुनिक संदर्भ में परोसा हुआ है । जैन पुराणो से भावान्तर कथाओं में मनोविज्ञानिक खोजे साकार हुई है। इसको पढ़ने से आध्यात्मिक यात्रा हो जाती है । अध्यात्म के गूढ़ रहस्य खुलते हैं । मुझे यह उपन्यास नहीं दर्शन का निचैड एवं हमारी संस्कृती का सार लगता है ।श्री जैन ने मन के पार के वर्णन बहुत अच्छी तरह किए हैं । चैथे आयाम की भाषा देना ध्यान के वश में है । रति, करूण व वैराग्य की गहराईयां बहुत साफ है । उनमे संवेदनाओं की सूक्ष्मता बहुत है । आन्तरिक प्यास व बाहरी दौड़ के संघर्ष का श्रेष्ठ चित्रण है ।

                                                                                                                                         ( To be continued…..)

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क्या किमो से कैन्सर ठीक होता है ? लोथर हरनाइसे की विश्व प्रसिद्ध कृति ‘‘किमोथेरेपी हिल्स कैन्सर एण्ड दी वर्ड इज फ्लेट’’

एलोपैथी के अतिरिक्त भी कैंसर का इलाज कई तरीकों से होता है । इसका उद्देश्य कैन्सर रोगियों को वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति से अवगत कराना है । इसने एलोपैथी के साथ-साथ वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों का अध्ययन कर बताया है कि बुडविझ प्रोटोकोल इनमे से श्रेष्ठतम है । यह कैंसर रोगियों एवं उनके सम्बन्धियों के लिए एक विश्व कोष है जिसको पढ़ कर उपचार कराने का सही निर्णय ले सकते हैं । लोथर हरनाइसे ने दुनिया भर में कई वर्षों तक शोध कर इसे लिखा है ।Chemotherapy heals cancer
इसके अनुसार रोगी को 3 म् का पालन करना चाहिए ।
पहला म् (इट हेल्दीवेल) स्वस्थ आहार से है । इसमे रोगी को ठण्डी विधि से तैयार अलसी का तेल व पनीर का मिक्सर विभिन्न सुखे मेवे व फलों के साथ दिया जाता है ।
बुडविझ के आहार के साथ-साथ दूसरा म् (एलीमीनेट टाॅक्सीन्स) शरीर के विषाक्त पदार्थो को बाहर निकालना है । इसमे एनिमा लगा कर शरीर को निर्विष बनाया जाता है । इसमे पहले शुद्ध पानी का एनिमा लगाया जाता है । इसके बाद काफी एनिमा व एल्डी तेल एनिमा प्रमुख है ।
तृतीय म् (ईनर्जी) ऊर्जा के जागरण से है । जीवन का लक्ष्य तय कर जीना मुख्य है । दिशा तय कर ही दशा बदली जा सकती है । इसमे आत्मदर्शन द्वारा सकारात्मक होना व स्वस्थ होने के भाव में जीना प्रमुख है ।

लेखक एक जाने माने कैंसर शौध विशेषज्ञ है । जो दुनिया भर में घुम-घुम कर सभी देशों में उपलब्ध कैंसर उपचार सम्बन्धी विधियों का विश्लेषण करते रहे हैं ।

यह पुस्तक मुलतः जर्मन भाषा में लिखी गयी है । इसका अंग्रेजी संस्करण उपलब्ध हैै

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