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धारणाओं को बदल कर कैसे रोग भगानाः लुईस हे की प्रसिद्ध कृति हील यौर बाॅडी

लुईस हे

इस पुस्तक का मुख्य प्रतिपाध विचार बदल कर बीमारियों का इलाज करना है क्योंकि रोग की जड़ में विचार होते है। इसमंे बताया गया है कि कौनसी बीमारी किस सोच  या धारणा के कारण होती है, और धारणा बदल कर उसे कैसे ठीक किया जाय। यह इस विषय की यह प्रथम और अनुभूत कृति है। लेखिका स्वयं को वैजाइना का कैंसर था, उसने स्वयं सोच बदल कर एवं शरीर को विषमुक्त कर अपना कैंसर ठीक किया है। पुस्तक मंे लिखा है कि यदि रोगी  मानसिक काम करने के लिए सहमत और माफ करने के लिए तत्पर तथा दुर्भावनाओं को निकाल फेंकने के लिए तैयार है, तो उसकी लगभग सभी बीमारियों का इलाज विचारों को बदल कर किया जा सकता है। पुस्तक में विचारों के कारण होने वाली बीमारियों  एवं ठीक होने के लिए नए विचार एवं धारणाओं  की सूची प्रस्तुुत की है। तद्नुसार  अपने विचार बदल कर रोग ठीक किया जा सकता है।  हम ही स्वास्थ्य के कर्ता है। हम ही अपनी बीमारी पैदा करते है। ‘‘जैसा मन वैसा तन’’ वाली कहावत वैज्ञानिक तौर पर सत्य साबित हो चुकी है। यह पुस्तक आपको अपने भीतर छिपे आपके उस सेल्फ को तलाशने मंे सहायता करती है। जो प्रेम और आत्म स्वीकृति से भरा हुआ है और उससे आपका स्वास्थ्य उत्तम होगा।लुईस हे विश्व प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु एवं फैद हीलर है। एवं उसने दर्जनों पुस्तकें लिखी है। जिनमें से यू केन हील यौर लाइफ विश्व प्रसिद्ध है। बचपन में दुष्कर्म के कारण हुए कैंसर को स्वयं ने विचार बदल कर ठीक किया है। एवं इसी को आधार बनाकर लिखा है। वह कोई बात सैद्धान्तिक नहीं लिखती है। व्यावहारिक एवं अनुभूत बात लिखी है कि व्यक्ति विचार बदल कर अपने रोग को ठीक कर सकता है। पढ़ कर जीवन में उतारने योग्य कृति है अनुवाद व छपाई अच्छी है । कीमत समीचीन है।

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असाध्य रोगों का सामना कैसे करेंः उक्त पुस्तिका डाउनलोड करें

आर एम लाला की कृति कैंसर पर विजय

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विश्वास स्वस्थ बनाने मंे दवाइयों से ज्यादा प्रभावशाली : सच्ची घटना

सकारात्मकता से चमत्कार

बर्नी सीगल ने अपनी पुस्तक लव, मेडिसन एंड मिराकल øप्रेम, दवा और चमत्कार} मंे एक अध्याय‘‘ स्वस्थ होने की साझेदारी’’ पर लिखा है। उन्होंने जो उदाहरण उद्धत किए हैं, उनमें एक राइट नाम के मरीज का है। कोई इलाज कारगर नहीं हो रहा था और नारंगी के आकार की गांठेे उनके गले, बगलों, जांघों, सीने और पेट में थीं राइट को आशा थी कि क्रेब्योजेन नामक एक नई दवा का, जिसका मूल्यांकन हो रहा था, परीक्षण उस पर किया जाएगा। वह दी गई। गांठें जिन पर तब रेडियोथैरेपी का भी असर नहीं हो रहा था,‘‘बर्फ के गोले की तरह’’ पिघल गईं। बहुत ही प्रसन्नचित होकर वह अपने पसंद के शौक- अपने खुद के विमान को चलाने को पूरा करने चल दिया।

दो माह के अंदर क्रेब्योजेन के बारे में परस्पर-विरोधी समाचार आए। वह अपनी आखिरी उम्मीद से भी हाथ धोने लगा और फिर पहले वाली विषादपूर्ण स्थिति मंे लौट आया। राइट के डाॅक्टर, ब्रूनो क्लोप्फेर, ने उसे बताया कि पुरानी जानकारियां दवा के उस भंडार से संबंधित थीं जो खराब हो चुका था, और उसका इलाज नई‘‘अति परिष्कृत’’ दवा से किया जायेगा। खूब धूमधाम के डाॅक्टरों ने उसे सिर्फ सादा पानी का इंजेक्शन लगाया। परिणाम बिल्कुल अविश्वसनीय रहा। गांठे फिर पिघल गई और वह फिर विमान उड़ाने लायक स्वस्थ हो गया। तब उसने अमरीकी मेडिकल ऐसोसिशन के इस अधिकृत फैसले को पढ़ाः‘‘राष्ट्रव्यापी परीक्षण दिखाते हैं कि कैंसर के इलाज में क्रेब्योजेन कोई उपयोगी दवा नहीं है।’’ कुछ दिन के अंदर राइट को फिर हाॅस्पिटल मंे दाखिल कराया गया और दो दिन बाद वह मर गया। यह उदाहरण दिखाता है कि कभी-कभी विश्वास स्वस्थ बनाने मंे दवाइयों से ज्यादा प्रभावशाली होता है।

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विज्ञान की नज़र से क्या पुनर्जन्म होता है?

पुनर्जन्म आज एक धार्मिक सिद्धान्त मात्र नहीं है। इस पर विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों एवं परामनोवैज्ञानिक शोध संस्थानों में ठोस कार्य हुआ है। वर्तमान में यह अंधविश्वास नहीं बल्कि वैज्ञानिक तथ्य के रुप में स्वीकारा जा चुका है।
पुनरागमन को प्रमाणित करने वाले अनेक प्रमाण आज विद्यमान हैं। इनमें से सबसे बड़ा प्रमाण ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत है। विज्ञान के सर्वमान्य संरक्षण सिद्धांत के अनुसार ऊर्जा का किसी भी अवस्था में विनाश नहीं होता है, मात्र ऊर्जा का रुप परिवर्तन हो सकता है। अर्थात जिस प्रकार ऊर्जा नष्ट नहीं होती, वैसे ही चेतना का नाश नहीं हो सकता।चेतना को वैज्ञानिक शब्दावली में ऊर्जा की शुद्धतम अवस्था कह सकते हैं। चेतना सत्ता का मात्र एक शरीर से निकल कर नए शरीर में प्रवेश संभव है। पुनर्जन्म का भी यही सिद्धांत है।
पुनर्जन्म का दूसरा प्रत्यक्ष प्रमाण पूर्वजन्म की स्मुति युक्त बालकों का जन्म लेना है। बालकों के पूर्वजन्म की स्मृति की परीक्षा आजकल दार्शनिक और परामनोवैज्ञानिक करते हैं। पूर्वभव के संस्कारों के बिना मोर्जाट चार वर्ष की अवस्थ्सा में संगीत नहीं कम्पोज कर सकता था। लार्ड मेकाले और विचारक मील चलना सीखने से पूर्व लिखना सीख गए थे। वैज्ञानिक जान गाॅस तब तीन वर्ष का था तभी अपने पिताजी की गणितीय त्रुटियों को ठीक करता था। इससे प्रकट है कि पूर्वभव में ऐसे बालकों को अपने क्षेत्र में विशेष महारत हासिल थी। तभी वर्तमान जीवन में संस्कार मौजूद रहे।
प्रथमतः शिशु जन्म लेते ही रोता है। स्तनपान करने पर चुप हो जाता है। कष्ट में रोना ओर अनुकूल स्थिति में प्रसन्नता प्रकट करता है। शिशु बतख स्वतः तैरना सीख जाती है। इस तरह की घटनाएं हमें विवश करती हैं यह सोचने के लिए कि जीव पूर्वजन्म के संस्कार लेकर आता है। वरन नन्हें शिशुओं को कौन सिखाता है?
डाॅ. स्टीवेन्सन ने अपने अनुसंधान के दौरान कुछ ऐसे मामले भी देखे हैं जिसमें व्यक्ति के शरीर पर उसके पूर्वजन्म के चिन्ह मौजूद हैं। यद्यपि आत्मा का रुपान्तरण तो समझ में आता है लेकिन दैहिक चिन्हों का पुनःप्रकटन आज भी एक पहेली है।
डाॅ. हेमेन्द्र नाथ बनर्जी का कथन है कि कभी-कभी वर्तमान की बीमारी का कारण पिछले जन्म में भी हो सकता है। श्रीमती रोजन वर्ग की चिकित्सा इसी तरह हुई। आग को देखते ही थर-थर कांप जाने वाली उक्त महिला का जब कोई भी डाॅक्टर इलाज नहीं कर सका। तब थककर वे मनोचिकित्सक के पास गई। वहां जब उन्हें सम्मोहित कर पूर्वभव की याद कराई  कई, तो रोजन वर्ग ने बताया कि वे पिछले जन्म में जल कर मर गई थीं। अतः उन्हें उसका अनुभव करा कर समझा दिया गया, तो वे बिल्कुल स्वस्थ हो गई। इसके अतिरिक्त वैज्ञानिकों ने विल्सन कलाउड चेम्बर परीक्षण में चूहे की आत्मा की तस्वीर तक खींची है। क्या इससे यह प्रमाणित नहीं होता है कि मृत्यु पर चेतना का शरीर से निर्गमन हो जाता है?
सम्पूर्ण विश्व के सभी धर्मो, वर्गों, जातियों एवं समाजों में पुनर्जन्म के सिद्धांतों किसी न किसी रुप में मान्यता प्राप्त है।
अंततः इस कम्प्युटर युग में भी यह स्पष्ट है कि पुनर्जन्म का सिद्धांत विज्ञान सम्मत है। आधुनिक तकनीकी शब्दावली में पुनर्जन्म के सिद्धांत को इस तरह समझ सकते हैं। आत्मा का अदृश्य कम्प्युटर है और शरीर एक रोबोट है। हम कर्मों के माध्यम से कम्प्युटर में जैसा प्रोग्राम फीड करते हैं वैसा ही फल पाते हैं। कम्प्युटर पुराना रोबोट खराब को जाने पर अपने कर्मों के हिसाब से नया रोबोट बना लेता है।
पुनर्जन्म के विपक्ष में भी अनेक तर्क एवं प्रक्ष खड़े हैं। यह पहेली शब्दों द्वारा नहीं सुलझाई जा सकती है। जीवन के प्रति समग्र सजगता एवं अवधान ही इसका उत्तर दे सकते हैं। संस्कारों की नदी में बढ़ने वाला मन इसे नहीं समझ सकता है।

पुनर्जन्म आज एक धार्मिक सिद्धान्त मात्र नहीं है। इस पर विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों एवं परामनोवैज्ञानिक शोध संस्थानों में ठोस कार्य हुआ है। वर्तमान में यह अंधविश्वास नहीं बल्कि वैज्ञानिक तथ्य के रुप में स्वीकारा जा चुका है।
पुनरागमन को प्रमाणित करने वाले अनेक प्रमाण आज विद्यमान हैं। इनमें से सबसे बड़ा प्रमाण ऊर्जा संरक्षण का सिद्धांत है। विज्ञान के सर्वमान्य संरक्षण सिद्धांत के अनुसार ऊर्जा का किसी भी अवस्था में विनाश नहीं होता है, मात्र ऊर्जा का रुप परिवर्तन हो सकता है। अर्थात जिस प्रकार ऊर्जा नष्ट नहीं होती, वैसे ही चेतना का नाश नहीं हो सकता।चेतना को वैज्ञानिक शब्दावली में ऊर्जा की शुद्धतम अवस्था कह सकते हैं। चेतना सत्ता का मात्र एक शरीर से निकल कर नए शरीर में प्रवेश संभव है। पुनर्जन्म का भी यही सिद्धांत है।
पुनर्जन्म का दूसरा प्रत्यक्ष प्रमाण पूर्वजन्म की स्मुति युक्त बालकों का जन्म लेना है। बालकों के पूर्वजन्म की स्मृति की परीक्षा आजकल दार्शनिक और परामनोवैज्ञानिक करते हैं। पूर्वभव के संस्कारों के बिना मोर्जाट चार वर्ष की अवस्थ्सा में संगीत नहीं कम्पोज कर सकता था। लार्ड मेकाले और विचारक मील चलना सीखने से पूर्व लिखना सीख गए थे। वैज्ञानिक जान गाॅस तब तीन वर्ष का था तभी अपने पिताजी की गणितीय त्रुटियों को ठीक करता था। इससे प्रकट है कि पूर्वभव में ऐसे बालकों को अपने क्षेत्र में विशेष महारत हासिल थी। तभी वर्तमान जीवन में संस्कार मौजूद रहे।
प्रथमतः शिशु जन्म लेते ही रोता है। स्तनपान करने पर चुप हो जाता है। कष्ट में रोना ओर अनुकूल स्थिति में प्रसन्नता प्रकट करता है। शिशु बतख स्वतः तैरना सीख जाती है। इस तरह की घटनाएं हमें विवश करती हैं यह सोचने के लिए कि जीव पूर्वजन्म के संस्कार लेकर आता है। वरन नन्हें शिशुओं को कौन सिखाता है?
डाॅ. स्टीवेन्सन ने अपने अनुसंधान के दौरान कुछ ऐसे मामले भी देखे हैं जिसमें व्यक्ति के शरीर पर उसके पूर्वजन्म के चिन्ह मौजूद हैं। यद्यपि आत्मा का रुपान्तरण तो समझ में आता है लेकिन दैहिक चिन्हों का पुनःप्रकटन आज भी एक पहेली है।
डाॅ. हेमेन्द्र नाथ बनर्जी का कथन है कि कभी-कभी वर्तमान की बीमारी का कारण पिछले जन्म में भी हो सकता है। श्रीमती रोजन वर्ग की चिकित्सा इसी तरह हुई। आग को देखते ही थर-थर कांप जाने वाली उक्त महिला का जब कोई भी डाॅक्टर इलाज नहीं कर सका। तब थककर वे मनोचिकित्सक के पास गई। वहां जब उन्हें सम्मोहित कर पूर्वभव की याद कराई  कई, तो रोजन वर्ग ने बताया कि वे पिछले जन्म में जल कर मर गई थीं। अतः उन्हें उसका अनुभव करा कर समझा दिया गया, तो वे बिल्कुल स्वस्थ हो गई। इसके अतिरिक्त वैज्ञानिकों ने विल्सन कलाउड चेम्बर परीक्षण में चूहे की आत्मा की तस्वीर तक खींची है। क्या इससे यह प्रमाणित नहीं होता है कि मृत्यु पर चेतना का शरीर से निर्गमन हो जाता है?
सम्पूर्ण विश्व के सभी धर्मो, वर्गों, जातियों एवं समाजों में पुनर्जन्म के सिद्धांतों किसी न किसी रुप में मान्यता प्राप्त है।
अंततः इस कम्प्युटर युग में भी यह स्पष्ट है कि पुनर्जन्म का सिद्धांत विज्ञान सम्मत है। आधुनिक तकनीकी शब्दावली में पुनर्जन्म के सिद्धांत को इस तरह समझ सकते हैं। आत्मा का अदृश्य कम्प्युटर है और शरीर एक रोबोट है। हम कर्मों के माध्यम से कम्प्युटर में जैसा प्रोग्राम फीड करते हैं वैसा ही फल पाते हैं। कम्प्युटर पुराना रोबोट खराब को जाने पर अपने कर्मों के हिसाब से नया रोबोट बना लेता है।
पुनर्जन्म के विपक्ष में भी अनेक तर्क एवं प्रक्ष खड़े हैं। यह पहेली शब्दों द्वारा नहीं सुलझाई जा सकती है। जीवन के प्रति समग्र सजगता एवं अवधान ही इसका उत्तर दे सकते हैं। संस्कारों की नदी में बढ़ने वाला मन इसे नहीं समझ सकता है।

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Art of Living · Meditation · Spirituality · Stress Management

कैसे पाए अपनी प्रार्थना का प्रतिउत्तर ?

मैने शक्ति मांगी और प्रभु ने कठिनाईयाॅ दी
ताकि मैं मजबुत बनूॅ।

मैने बुद्धि माॅंगी और प्रभु ने मुझे समस्याएॅ दी
ताकि मैं उपाय खोजूॅ।
मैने समृद्धि माॅंगी और प्रभु ने मुझे ताकत व मस्तिष्क दिये
ताकि मैं प्राप्त कर सकूॅ।
मैने साहस माॅगा और प्रभु ने मुझे खतरे दिये
ताकि मैं जीत सकूॅ।
मैने धैर्य माॅंगा और प्रभु ने मुझे ऐसी स्थिति दी
कि मुझे मजबूरन इन्तजारी करनी पडे।
मैने प्रेम माॅगा और प्रभु ने मुझे दुखी साथी दिये
ताकि मैं सेवा कर सकूॅ।
मैने तेरी कृपा चाहीं और प्रभु ने मुझे अवसर दिये।
जो मैने चाहा वह मुझे कभी न मिला
लेकिन जिसकी आवश्यकता थी वह सदा मिला।

इस तरह मेरी प्रार्थना सुनी गई।

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अवचेतन मन क्या है एवं इसका उपयोग कैसे करे ?

मनोवैज्ञानिकों ने मन को दो बड़े  भागों में विभक्त किया है।
1.    चेतन मन  – मस्तिष्क का वह भाग, जिसमें होने वाली क्रियाओं की जानकारी हमे होता हैं, चेतन मस्तिष्क है।  यह वस्तुनिष्ठ एवं तर्क पर आधारित होता है।
2.    अवचेतन मन –    जाग्रत मस्तिष्क के परे मस्तिष्क का हिस्सा अवचेतन मन होता है। हमें इसकी जानकारी नहीं होती। इसका अनुभव कम ही होता है।

Iceberg

उदाहरण के रूप में समझें तो इसकी स्थिति पानी में तैरते हीमखण्ड (Iceberg)की तरह है। हिमखण्ड का मात्र 10 प्रतिशत भाग पानी की सतह से ऊपर दिखाई देता है और शेष 90 प्रतिशत भाग सतह से नीचे रहता है। चेतन  मस्तिष्क भी सम्पूर्ण मस्तिष्क का दस प्रतिशत ही होता है।  मस्तिष्क का नब्बे प्रतिशत भाग साधारणतया अवचेतन मन होता है।

मस्तिष्क का विभाजन जैसा कुछ नहीं होता जैसा कि उदाहरण दिया गया है। ऐसा केवल आपको समझाने के लिए को  बताया है।  अवचेतन मन को प्रयत्नपूर्वक चेतन मन मे परिवर्तित किया जा सकता है और तब वह चेतन मन का हिस्सा बन जाता है।  अभी जो चेतन मन है वह कल अवचेतन हो जाता है।
सारे निर्णय चेतन मन ही करता है।  अवचेतन मन सारी तैयारी, प्रबन्ध या व्यवस्था करता है।  चेतन मस्तिष्क यह तय करता है कि क्या करना है, और अवचेतन मस्तिष्क यह तय करता है कि उसे ‘कैसे’ मूर्तरूप दिया जाय ।
हमारे सारे अनुभव, जानकारी हमारे अवचेतन में संचित रहते हैं।  परन्तु जब-कभी हम उनका उपयोग करना चाहते हैं,  वे चेतन का हिस्सा बन जाते हैं। सिग्मण्ड फ्रायड के अनुसार हमारी दमित इच्छाएँ एवं विचार अवचेतन में संचित रहते हैं। ये हमारे व्यक्तित्व को बनाते व प्रभावित करते हैं और हमारे व्यवहार एवं आचार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
शेक्सपीयर ने कहा, “ हमारा तन बगीचा है और हम इसके बागवान हैं।”  तो आप एक बागवान हैं जो विचारों के बीजों कों अवचेतन मस्तिष्क में बोते हैं, जो हमारे आदतन विचारों के अनुरूप होते हैं।  हम जैसा अपने अवचेतन में बोएँगे वैसा ही फल हमें प्राप्त होगा।  तदनुसार ही हमारा शरीर एवं बोध प्रकट होता है।  इसलिए प्रत्येक विचार एक कारण है एवं प्रत्येक दशा एक प्रभाव है ।   इसी कारण, यह आवश्यक है कि हम अपने विचारों को ऐसा बनाएँ ताकि हम इच्छित स्थिति को प्राप्त कर सकें।

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ऊर्जावान बनाती है प्रार्थना

हमारा सबसे बड़ा सहायक कौन है? अस्तित्व कहो या परमात्मा  से बढ़कर हमारा कोई सहायक धरती पर नहीं है। इस ईश्वर की शक्ति को पहचानना एवं प्रयोग करने की कला का नाम प्रार्थना है। तभी तो हमारे पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा है ईश्वर को हमारे भीतर महसूस करने की शक्ति को प्रार्थना कहते है। उन्होंने लिखा है कि ईश्वर के साथ हर काम में मेरी सहभागिता है। मुझे मालूम था कि जितनी योग्यता मेरे पास है अच्छा काम करने के लिए उससे और ज्यादा योग्यता होना जरूरी है। इसलिए मुझे मदद की आवश्यकता है और वह सिर्फ ईश्वर ही दे सकता है। मैने खुद को अपनी योग्यता का सही-सही अनुमान लगाया और इसे पचास फिसदी तक बढ़ा दिया फिर मैं अपने ईश्वर के हाथों सौंप देता था। इसी भागीदारी में मुझे वह सारी शक्तियां मिली जिसकी मुझे जरूरत थी और वास्तव में आज भी महसूस करता हुं कि वह शक्ति मुझमें बह रही है। यह प्रार्थना का परिणाम है। तभी तो महात्मा गांधी ने एक जगह लिखा है- ‘प्रार्थना की शक्ति के बिना मैं कभी का पागल हो गया होता।’
प्रार्थना का अर्थ अपनी आत्मा की अर्थात ईश्वर की उच्चतर शक्ति के पास पहँुचाना होता है। प्रार्थना जीवन के प्रति एक दृष्टिकोण है। यह स्वयं को समर्पण कर देना और वास्तविकता को स्वीकार करना है। जब शरीर और मस्तिष्क ब्रह्माण्ड की स्वरलहरियों से सामंजस्य में हों तब प्रेम की भावनाऐं उमड़ पड़ती है। प्रार्थना मांग नहीं है, सहज भाव से बिना किसी क्षुद्र मांग के परमात्मा को पुकारना है।
जहाँ व्यक्ति की सीमा समाप्त होती है, वहीं से परमात्मा की सीमा प्रारम्भ होती है। अर्थात जहाँ हमारे प्रयत्न वांछित परिणाम नहीं ला पाते हंैै, तब प्रार्थना करनी चाहिये। जब प्रयत्न की सीमा आ जाए तो प्रार्थना करो। प्रार्थना किससे करे व क्यों करे? उसकी विषयवस्तु क्या हो? स्वरूप क्या हो? यह सब सोच कर तय करें। इसमें हरेक को अपने लिए सर्वोत्तम तरीका खोजना होता है। इसमें भटकाव आते है, तो आने दीजिए। कोई प्रार्थना का  बंधा-बंधाया तरीका नहीं है। वैसे प्रत्येक व्यक्ति की प्रार्थना अपने तरह की होगी क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के मानसिक बैंक में अलग-अलग धन जमा होता हैं। मात्र धन की मात्रा ही नहीं, धन का प्रकार भी भिन्न – भिन्न होता है, मन में छिपे संस्कार एवं सोच भिन्न -भिन्न होते है। अतः प्रार्थना का तरीका व विषय अलग-अलग होते है।
प्रार्थना करने से स्वयं पर भरोसा आता हंै, कार्य का भार घटता है, एवं अपनी भूमिका के तनाव से राहत मिलती है। निराशा एवं नकारात्मकता से राहत मिलती हैं, प्रार्थना करने से प्रसन्नता, भक्ति, कृपा, आशीष मिलते हैं जिससे हमारे तनाव घटते है।
प्रार्थना पर बहुत वैज्ञानिक शोध हो चुके है। ‘हीलिंग वर्डसः दि पाॅवर आॅफ प्रेयर एंड द प्रैक्टिस औॅफ मेडिसिन’ में लैरी डोस्सी दावा करते हैं कि कभी-कभी प्रार्थना दवाओं और शल्य क्रिया से भी ज्यादा शक्तिशाली ढंग से काम करती है। जैसा डाॅ. अलेक्सिस करैल ने लिखा है- प्रार्थना की शक्ति ब्रह्माण्डीय गुरूत्वाकर्षण जैसी वास्तविक शक्ति है । वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो प्रार्थना करने पर हम ग्रहणशील होते हंै। हमारे मस्तिष्क के कम्पन अल्फा स्तर के कम्पनों से मिलते हंै जो कि प्रकृति की उच्च शक्ति के कम्पन्नो से मिलते-जुलते है। इससे हमारी क्षमता बढ़ जाती है। ड्यूक युनिवर्सिटी के मेडिकल सेन्टर, डरहम में 1998 में शोध से प्रकट हुआ कि प्रार्थना करने से 40 प्रतिशत उच्च रक्तचाप घटता है। आधुनिक शोधों से यह भी पुष्ट हुआ है कि प्रार्थना किए हुए बीज जल्दी अंकुरित होते है।
श्री मसारू इमोटो ने ‘‘द मैसेज फ्रोम वाॅटर’’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक में पानी पर प्रार्थना के कई प्रयोगों का वर्णन किया है। पानी को निम्न तापमान पर जमा कर उसके क्रिस्टलों के फोटो खीचे। इससे उनके क्रिस्टलों की रचना प्रकट होती है। श्री इमोटो ने फूजिवाड़ा बांध के पानी के निम्न तापमान पर जमे क्रिस्टलों के फोटो लिये। तब पानी के क्रिस्टल्स बिखरे-बिखरे थे । एक सामूहिक प्रार्थना का आयोजन करने के बाद इसी पानी को निम्न तापमान पर जमा कर उनके क्रिस्टलों के फोटो लिए तो वे निश्चित आकार में सुन्दर तरीके से जमे हुए मिले। यह प्रार्थना की शक्ति को दर्शाता है।
प्रार्थना करने से स्वयं में शक्ति पैदा होती है। प्रार्थना जीने का उत्साह बढ़ाती है, यह स्वयं को प्रेरित करती है। प्रार्थना करने से व्यक्ति अस्तित्व से जुड़ता है। उसे अपनी त्वचा एवं शरीर के पार भी स्वयं के होने का बोध होता है। प्रार्थना एक भाव दशा है, अहोभाव है, कृतज्ञता ज्ञापन है, गीत है। यह मन को बल देती है।
अवचेतन मन की शक्ति जगाने का पारम्परिक तरीका प्रार्थना हैं जब आप ईमानदारी एवं दिल से किसी बात के लिए प्रार्थना करते हैं, तो आप अपने दिमाग में अपनी इच्छाओं के बीज बोते हैं। यह आपके विचारों को इच्छानुकूल स्वरूप देने में प्रवृत्त होती है। यही बीज भविष्य में जाकर कर्मो का खाद पानी पाकर वृक्ष बनता है। मेरी समझ में प्रार्थना का यही एक मात्र अर्थ है। अस्तु, आप होशपूर्वक उपलब्ध दशाओं की प्रार्थना रूपी बीज के होने से जानकारी प्राप्त करते हैं एवं इसी के अनुरूप योजना बनाते हैं। पश्चिम में इसे ही मानस दर्शन कहते हंै।
प्रार्थना आपकेा तैयार करती है। परन्तु प्रार्थना चेतन और अवचेतन में सामंजस्य निर्माण करने वाली होनी चाहिए। तभी प्रार्थना से अच्छे परिणाम प्राप्त हो सकते है, तभी उन परिस्थितियों का निर्माण होता है जो आपके लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता करती है। जो कुछ भी आपके अवचेतन मस्तिष्क में होता है वही जीवन में व्यक्त होता है। अवचेतन मस्तिष्क उन्नत बुद्धिमता का भण्डार है।
इस्लाम में भी दुआ मांगने पर बहुत जोर है। चर्च में भी प्रार्थनाएँ की जाती हैं। हिन्दु मन्दिरों में इसे पूजा-पाठ के नाम से करते है। गुरूद्वारों में भी कीर्तन के रूप में प्रार्थनाएँ ही की जाती है।
प्रार्थना जिव्हा से की जा सकती है। दूसरा मन से यानि एकाग्रता एवं श्रृद्धा से भी की जाती है, लेकिन दिल से यानि समग्रता एवं समर्पणभाव से की गई प्रार्थना ही अधिक शक्तिशाली होती है। परिवार के सभी सदस्य मिलकर प्रार्थना करें तो सदस्यों में परस्पर प्रेम बढ़ता है। तभी घरो में आरती करते समय  सभी सदस्यों का उपस्थित होना जरूरी होता था।