14 वर्षीय लड़की जाँन आॅफ आर्क ने अवचेतन मन को विकसित कर फौज का नेतृत्व किया

हमारी भूतपूर्व प्रधानमंत्री इदिंरा गाँधी की रोल माॅडल जाँन आॅफ आर्क थी। वह अपने कठिन समय में इसी से प्रेरणा प्राप्त करती थी।
फ्रँास का ब्रिटेन से एक सौ वर्षाें से युद्ध चल रहा था। दोनों देशों का जन-जीवन तबाह हो चुका था। ऐसे में एक साधारण किसान की अनपढ़ लड़की ने युद्ध की निरर्थकता एवं निरन्तर होती हानि को समझा। अवचेतन मन की शक्ति को विकसित कर उसने इस युद्ध का नेतृत्व किया। अपनी अवचेतन मस्तिष्क को जगाने वह प्रतिदिन ईश्वर से युद्ध की समाप्ति के लिए प्रार्थना करती थी। ईश्वर में उसका दृढ़ विश्वास था। उसने प्रार्थना के द्वारा परम शक्ति के साथ भावनात्मक संबंध विकसित किया । इससे उसका आत्मविश्वास विकसित हुआ। इस तरह उसने अवचेतन मस्तिष्क की शक्ति का प्रयोग अपने देश के पक्ष में किया।
एक दिन उसने  अन्तरात्मा की आवाज़ सुनी, ”तुम्हारा जन्म इस युद्ध की समाप्ति के लिये हुआ है।“  उसने अपनी अन्तरात्मा की आवाज पर विश्वास किया और सम्राट जाॅन डफन से मिली। इस पर उसका किसी ने विश्वास नहीं किया। तब उसने अपनी क्षमता की परीक्षा चर्च एवं सम्राट के दरबारियों के सामने उत्तीर्ण की। सबको विश्वास हो गया कि यह कोई साधारण लड़की नहीं है अपितु वह एक वरदान प्राप्त नायिका हैं। उसका जन्म लड़ाई की समाप्ति के लिये हुआ है।
उस चैदह वर्षीय गांव की अनपढ़ लड़की, जाॅन आॅफ आर्क  ;श्रवंद व ि।तबद्ध ने फ्रांसीसी सेना का नेतृत्व किया। उसने युद्ध लड़ा और 31 मई 1431 को जीवित जला दी गई। उसके बलिदान ने युद्ध को समाप्त कर दिया।

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आपका मस्तिष्क दुनिया का सबसे बड़ा सुपर कम्प्यूटर

विश्व के सबसे बड़े सुपर कम्प्यूटर का मालिक अमेरिका नहीं है। विश्व के सबसे बड़े सुपर कम्प्यूटर के मालिक आप हैं। यह आपके बालों के ठीक नीचे है। फिर भी हमारी हालत दयनीय क्यों है ? क्योंकि इस सुपर कम्प्यूटर को आॅपरेट करना हमको नहीं आता है, और यह यंत्र हमें चलाने वाला बन गया है। जिसे मनुष्य को चलाना चाहिये वह मनुष्य को चला रहा है। यंत्र बेचारा क्या करे, आॅपरेटर के अभाव में स्वयं चल पड़ा है। यह व्यक्तिगत कम्प्यूटर सार्वजनिक हो गया है। यह चेतन कम्प्यूटर यांत्रिक रूप से चल रहा है, क्योंकि इसे समाज, विचारधारा, पड़ौसी, अतीत, इज्जत, महत्त्वाकांक्षा, भय आदि शक्तियां चला रहीं हैं। जब जिसका कोई मालिक नहीं होता तो सारी दुनिया उसकी मालिक हो जाती है। आप सोये हुए हैं और अन्य शक्तियां आपके कम्प्यूटर को चला रही हैं जिसका नतीजा सामने है।
हमारा समस्त जीवन नकारात्मक हो गया है। हम स्वतः ही अपने को नहीं पर को देखते हैं। जगत की या स्वयं की हर कमी, हर चीज के लिये दूसरों को जिम्मेदार ठहराते हैं। सदैव खामियों, कमजोरियों को ही देखते हैं। हम इच्छापूर्वक विचार करते नहीं है। विचार हमको जहां-तहां ले जाते हैं। हम कईं बार नकारात्मक आवेग में फंस जाते हैं।
आपके मस्तिष्क की प्रत्येक कोशिका एक समय में 3 करोड़ घटनाएं प्रोसेस कर सकती हैं जो कि दनिया के सबसे बड़े सुपर कमप्यूटर की गति से बहुत अधिक है। एक मानव मस्तिष्क में 28 अरब कोशिकाएं होती हैं।
आज का विकसित विज्ञान भी मस्तिष्क के बराबर की क्षमता का कम्प्यूटर बनाये तो उसे 10 घन किलोमीटर जगह चाहिये। 10 किलोमीटर लम्बी, 10 किलोमीटर चैड़ी एवं 10 किलोमीटर ऊंची जगह की जरुरत पड़ती है।
हमारी किसी की भी दुनिया में कार्बन काॅपी नहीं है। हम सब अद्वितीय एवं अनुपम है।
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आप कृष्ण से बेहतर है!

आपकी स्थिति कृष्ण से बेहतर है!अरे! हॅसने की जरुरत नहीं है।

इसके लिए श्री कृष्ण के जीवन से अपने जीवन की परिस्थिति की तुलना करने की जरुरत है।

हमारे में से किसे का जन्म जेल में नहीे हुआ। जबकि योगेश्वर कृष्ण का जन्म जेल में हुआ था। उनके मां बाप दोनों राजा होकर कंस के वहाँ बन्दी थे। आपके मां बाप आपके जन्म के समय बन्दी तो न थे।

किसी ने तुम्हें स्तनों पर जहर लगाकर दूध तो न पिलाया ? जबकि पूतना ने कृष्ण को मारने के लिए यह किया था। मां बाप के होते हुए कृष्ण यशोदा  केे पास पले।हमारे मे से अधिकतर लोगों का पालन पोषण तो हमारी मां ने ही किया है।

बचपन में उन्हें गाय चराने भेजा गया। मुख्यतः हममे से किसी को भी जानवरों को चराने के लिए तो नहीं भेजा गया।

कम से कम आपके मामा आपको मारना तो नहीं चाहते थे ?

कृष्ण को उनकी प्रेमिका राधा बिछुड़ने के बाद शेष जीवन में फिर कभी ना मिली।

राजा होकर महाभारत के युद्ध में अर्जुन का रथ संचालन करना पड़ा। आज की भाषा में कहे तो वाहन चालक की भूमिका निभानी पड़ी। फिर चिन्ता की क्या बात है।

हुई न आपकी स्थिति कृष्ण से बेहतर

विपरीत परिस्थितियों के होते हुए महान् कार्य किये। यदि अपनी आत्म छवि एवं आत्म विश्वास है तो आप भी अपना सोचा प्राप्त कर सकते है। आपकी आत्म छवि ही आपको सफलता व सुख दिला सकती है।


एकाग्रता बढ़ाने की पतंजलि की विधि

एकाग्रता बढ़ाने की यह प्राचीन पद्धति है। पतंजलि ने 5000 वर्ष पूर्व इस पद्धति का विकास किया था। कुछ लोग इसे ‘त्राटक’ कहते हैं। योगी और संत इसका अभ्यास परा-मनोवैज्ञानिक शक्ति के विकास के लिये भी करते हैं। परन्तु मैने दो वर्ष तक इसका अभ्यास किया और पाया कि एकाग्रता बढ़ाने में यह काफी उपयोगी है।

 
Patanjali's Technique for Concentration (To dowload click here)

आधुनिक वैज्ञानिक शोधों ने भी यह सिद्ध कर दिया है। इससे आत्मविश्वास पैदा होता है, योग्यता बढ़ती है, और आपके मस्तिष्क की शक्ति का विकास कई प्रकार से होता है। यह विधि आपकी स्मरण-शक्ति को तीक्ष्ण बनाती है । प्राचीन ऋषियों द्वारा प्रयोग की गई यह बहुत ही उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण पद्धति है।

समय– अच्छा यह है कि इसका अभ्यास सूर्योदय के समय किया जाए। किन्तु यदि अन्य समय में भी इसका अभ्यास करें तो कोई हानि नहीं है।

स्थान– किसी शान्त स्थान में बैठकर अभ्यास करें। जिससे कोई अन्य व्यक्ति आपको बाधा न पहुँचाए।

प्रथम चरण-स्क्रीनपर बने पीले बिंदु  आरामपूर्वक देखें।

द्वितीय चरण – जब भी आप बिन्दु को देखें,   हमेशा सोचिये   – “मेरे विचार पीत बिन्दु के पीछे जा रहे हैं”। इस अभ्यास के मध्य आँखों में पानी आ सकता है, चिन्ता न करें। आँखों को बन्द करें, अभ्यास स्थगित कर दें। यदि पुनः अभ्यास करना चाहें, तो आँखों को धीरे-से खोलें। आप इसे कुछ मिनट के लिये और दोहरा सकते हैं।

अन्त में, आँखों पर ठंडे पानी के छीटे मारकर इन्हें धो लें। एक बात का ध्यान रखें, आपका पेट खाली भी न हो और अधिक भरा भी न हो।

यदि आप चश्में का उपयोग करते हैं तो अभ्यास के समय चश्मा न लगाएँ। यदि आप पीत बिन्दु को नहीं देख पाते हैं तो अपनी आँखें बन्द करें एवं भौंहों के मध्य में चित्त एकाग्र करें । इसे अन्तः़त्राटक कहते हंै। कम-से-कम तीन सप्ताह तक इसका अभ्यास करें। परन्तु, यदि आप इससे अधिक लाभ पाना चाहते हैं तो निरन्तर अपनी सुविधानुसार करते रहें।

वेब दुनिया में इस ब्लाग की चर्चाःरूको मत ,जब तक लक्ष्य हासिल न कर सको

यह पँचासवी पोस्ट हैं। इस अवसर पर हिन्दी के नामी पोर्टल वेब दुनिया में प्रकाशित ब्लोग की खबर को ही पुनः पहुँचाना चाहता हूँ। रविन्द्र व्यास ने रूको मत ,जब तक लक्ष्य हासिल न कर सको के नाम लिखा हैं।