तनाव मिटाने व स्वस्थ रहने मेग्निसियम स्नान करें

मेग्निसियम एक महत्वपूर्ण खनिज है जो की हमारे शरीर में होने वाली  तीन सौ  क्रियाओ   में जरूरी है l यह हमें शाकाहारी भोजन से आवश्यक मात्र जितना नहीं मिलता है l इसके अभाव में हम थक जाते है व शरीर बीमार पड जाता है l इसका अवशोषण त्वचा के द्वारा  अच्छा होता है इसलिए मेग्निसिम स्नान स्वस्थ होने का सरल तरीका हैlwoman-relaxing-in-bathtub_23-2147835569

एक कप मेग्निसियम क्लोराइड या एप्सोम साल्ट (मेग्निसियम सल्फेट ) टब में गुनगुने पानी में गोल कर  बीस से तिस मिनट स्नान करें l  पहले चार दिन रोज ले व बाद में सप्ताह में एक बार ले l आपके शरीर में मेग्निसियम के पहुँच जाने से आपका स्वास्थ उतरोत्तर ठीक हो जायेगा l

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स्थाई रूप से पाचन ठीक करने व ऊर्जावान बनने त्रिफला रसायन ले

त्रिफला तीन श्रेष्ठ औषधियों हरड, बहेडा व आंवला के पिसे मिश्रण से बने चूर्ण को कहते है।जो की मानव-जाति को हमारी प्रकृति का एक अनमोल उपहार हैl त्रिफला सर्व रोगनाशक रोग प्रतिरोधक और आरोग्य प्रदान करने वाली  महा औषधि है। त्रिफला से कायाकल्प होता है, त्रिफला एक श्रेष्ठ रसायन, एन्टिबायोटिक व ऐन्टिसेप्टिक है इसे आयुर्वेद का पेन्सिलिन भी कहा जाता है।सुबह के वक्त त्रिफला लेना पोषक होता है जबकि शाम को यह रेचक (पेट साफ़ करने वाला) होता है। त्रिफला का प्रयोग शरीर में वात पित्त और कफ़ का संतुलन बनाए रखता है।

इस त्रिफला में एक भाग हरड,दो भाग बहेडा व तिन भाग आवला लेते है l  प्रातः खाली पेट एक चम्मच उक्त चूर्ण   निम्नानुसार समय  पर ले व उसके बाद एक घंटे तक कुछ और न ले l

1.शिशिर ऋतू में ( 14 जनवरी से 13 मार्च) 5 ग्राम त्रिफला को आठवां भाग छोटी पीपल का चूर्ण मिलाकर सेवन करें।
2.बसंत ऋतू में (14 मार्च से 13 मई) 5 ग्राम त्रिफला को बराबर का शहद मिलाकर सेवन करें।
3.ग्रीष्म ऋतू में (14 मई से 13 जुलाई ) 5 ग्राम त्रिफला को चोथा भाग गुड़ मिलाकर सेवन करें।
4.वर्षा ऋतू में (14 जुलाई से 13 सितम्बर) 5 ग्राम त्रिफला को छठा भाग सैंधा नमक मिलाकर सेवन करें।
5.शरद ऋतू में(14 सितम्बर से 13 नवम्बर) 5 ग्राम त्रिफला को चोथा भाग देशी खांड/शक्कर मिलाकर सेवन करें।
6.हेमंत ऋतू में (14 नवम्बर से 13 जनवरी) 5 ग्राम त्रिफला को छठा भाग सौंठ का चूर्ण मिलाकर सेवन करें।

आयुर्वेद में  बारह वर्ष तक लेने का विधान है इससे पूरा  शरीर नया बन जाता है l लेकिन   वर्ष भर तक लेने से पाचन  सम्बन्धी सारी तकलीफे दूर होती है l

इस सम्बन्धी कोई प्रश्न होतो यहाँ पूछ सकते है l

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श्री अरविन्द की ‘सावित्री’ को पढ़ना ही योग है

 

श्री अरविन्द रचित महाकाव्य  सावित्री  में सनातन अध्यात्म का सार हैं l इसके पढने मात्र से साधना हो जाती  हैं अथार्त हमारे अनसुलझे  आघात अन्दर ही अन्दर सुलझते जाते  है l जीवन  में व्याप्त अँध प्रव्रर्तियो  का ज्ञान होने से  मुक्त होना शुरू हो जाता हैं l अहम ,काम,लोभ  एवं छल  विसर्जित होते हैं, जडत्व  टूटता जाता है l स्वत: ही प्रार्थना व समर्पण उदित होने लगते है हैl  पाठक के भीतर की ग्रन्थिया खुलती जाती हैl  इससे  चक्रों का शोधन  होता है  जिससे कुंडलिनी जागने लगती है l अपने भीतर का मार्ग खुलता जाता है l

 

जीवन में दिव्यता का प्रवेश धीरे धीरे होना प्रारम्भ होता है l रचना के भावलोक में पहुचने से पाठक का मन प्रकाशित  होता जाता हैं l  केन्द्रित होने पर आत्म ज्ञान के पट खुलने लगते है,यही तो सच्चा  योग है l

परवरिश सिखाने वाली अनूठी एवं प्रेक्टिकल किताब : संतान-निर्माण

 संतान-निर्माण के लिए बाल-मनोविज्ञान और प्रत्येक बच्चे के अनूठेपन को ध्यान रखकर बच्चे को पालना होगा।लेखक ने  नये इंसान को निर्मित करने के लिए कुछ चीजें बुनियादी रूप से बदलने की आवश्यकता बताई है l  बच्चे परिवार से आचरण सीखते हैं, वे कहने से अधिक हमारे व्यवहार से सीखते हैंl वे हमारी वृत्तियां, काम करने के तरीके, सोचने के ढंग अनुभव आदि से सीखते है l वे हमसे सफलता और आनंद के उच्च शिखर पर पहुँचने या नाकामयाबी का नज़रिया भी ले सकते हैं। भविष्य की चुनौतियाँ हमसे अलग तरह की होंगी, हमें उनकी परवरिश करने की कला सीखनी होगी।लेखक एक बच्चे का पिता है  एवं गर्भाधान आदि संस्कारो का स्वयं अनुभवी है l
यह पुस्तक परवरिश के साथ ही स्व-प्रबंधन के सूत्र समेटे है, यह बच्चे को समझने उसकी प्रतिभा को पहचानने, जड़ों से जोड़ने तथा उसकी असीम संभावनाओं को पंख देने में मदद करेगी, विषय क्रम में संतान-जन्म, स्वास्थ्य, मन, अन्तर्सम्बन्ध, शिक्षा, संवाद, आचरण, प्रतिभा-पहचान, नवाचार, कॅरियर-चयन आदि बहुत कुछ है। पुस्तक में अभिभावकों के सामने आने वाली कठिनाइयों के समाधान हैं, यह परवरिश पर अनूठी पुस्तक है।

संतान-निर्माण   (परवरिश के प्रभावी सूत्र) 

लेखक – धीरज कुमार अरोड़ा

पृष्ठ -135,                         कीमत – 80/- मात्र

प्रकाशक – रिद्धी पब्लिकेशन,जयपुर, उदयपुर

शौच करने की सही विधि ताकि बवासीर आदि रोग न हो

विधिपूर्वक शौच करने से दातों के रोग, लकवा ,बवासीर व् कई अन्य रोग नहीं होते हैl  उषःपान(प्रातः जल सेवन) के बाद कुछ देर घुमने से मलत्याग सरलता से होता हैl न हो तो पवन मुक्तासन,ताड़ासन व कटी  चक्रासन करें l

विधि:

भारतीयशैली के टॉयलेट का उपयोग करें l  शौच  हेतु  उकड़ू आसन में बैठेl  पश्चिमी शैली की टॉयलेट के प्रयोग में मलद्वार पूरा नहीं खुलता है, न हीं पेट पर दबाव पड़ता हैl

दोनों हाथ ठुड्डी को पकडे रहे व दांत भींच कर रखे l  शौच या पेशाब के समय दांतों के जबड़ों को आपस में दबाकर रखने से दांत मजबूत रहते हैं।

मल छोड़ते वक्त दांतों को और भींचे और श्वास फेकेंl

शौच करते वक्त मुहं बंद रखे l  तत्समय पढ़ना – बोलना उचित नहीं हैl

सहजता से मलत्याग न होने पर कुछ लोग जोर लगाकर शौच करते हैं किंतु ऐसा करना ठीक नहीं हैl

मल आपके स्वास्थ्य को दर्शाता है, बहुत सूखा या पतला, दुर्गन्धयुक्त, चिपचिपा, रक्त या  सफ़ेद झाग युक्त मल रोग को दर्शाता हैl

 

इजरायली शोधकर्ता डॉ. बेरको सिकिरोव ने अपने शोध के निष्कर्ष में पाया कि सिटिंग मेथड कब्जियत का करण बनती है, जिसके कारण व्यक्ति को मल त्यागने के लिए लगभग तीन गुना अधिक जोर लगाना पड़ता है, जिसके कारण चक्कर और हृदयतंत्र की गड़बड़ियों के कारण लोग मर जाते हैं।