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ब्लाग में भाषा कैसी लिखनी ?

लेख शब्दों का जमावड़ा होता है। सही शब्द का प्रयोग लेखन में  जरुरी है। सरल लिखें व उपयुक्त शब्द प्रयुक्त करें। हर शब्द का एक विशिष्ठ अर्थ होता है। जिसके लिए उसे बनाया गया होता है। अतः उसे ही प्रयुक्त करें। विशिष्ठ शब्द उपलब्ध हो तो जनरल शब्द का प्रयोग नहीं करते है। हिन्दी  भाषा का बराबरी का शब्द उपलब्ध हो तो ऊर्दू या  संस्कृत शब्द न लिखें। पुरानी भाषा शुद्ध होती थी, उसमें अंगे्रजी के शब्द नहीं लिखते थे। प्रारम्भ में संस्कृत निष्ठ हिन्दी चली, फिर ऊर्दू मिक्स हुई, आजकल अंग्रेजी के शब्द बोल-चाल में घूस गए है। जैसाकि यह आजकल हम अखबारों के लेखों में देख सकते है।
एक वाक्य में एक ही विचार हो। दो विचार होने से वाक्य कठिन हो जाता है। दुरुह वाक्य न लिखें। इनको पढ़ने से स्पष्टता नहीं होती है। अतः सरल वाक्य लिखें। छोटे वाक्य लिखें।
सब पेरग्राफ में भाषा समान हो। सब में सरल,या मिश्रित तो सब में मिश्रित । कहीं कठिन ,कहीं सरल ठीक नहीं है। दूसरे की भाषा की नकल न करें। कभी लिखना पड़े तो अपने शब्दों में लिखें।
बोलचाल की भाषा/ साहित्यिक भाषा/ मिश्रित भाषा क्षेत्र/विशेष की भाषा/ जाति विशेष की भाषा/  अभिजात्य वर्ग की भाषा/ निम्न वर्ग की भाषा धार्मिक  भाषा/ वैज्ञानिक भाषा।
लेकिन हमें सरल व चित्रात्मक भाषा में लिखना श्रेष्ठ हैं जिसको पाठक सरलता से समझ जाए।

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टिप्पणी का शास्त्र और मनोविज्ञान: टिप्पणी कैसे प्राप्त करे – अंतिम भाग

टिप्पणी प्राप्त करने के छ:अनुभूत  मन्त्र

चिट्ठाकारी  में टिप्पणी  श्वास के समान हें । ब्लागर टिप्पणी प्राप्त कर गुदगुदाता है। सार्थक टिप्पणी सबको अच्छी लगती है। यह हमारे ब्लाग की जीत होती है। इसका मतलब है कि लोग हमे पढ़ते है, हम अच्छा लिखते है। अतः टिप्पणी पसंद की जाती है। टिप्पणी प्राप्त करने हेतु छ:अनुभूत मन्त्र निम्न प्रकार है जिनका प्रयोग करने से आपके टिप्पणिया की संख्या बढ़ सकती है।

1 रूचिकर विषय वस्तु

चिट्ठाकारी में विषयवस्तु  राजा के समान हें । आपकी विषय वस्तु सामयिक व अच्छी, समर्थ व उपयोगी हो , जो आम पाठक के मन की हो तो पाठक उस पर प्रतिक्रिया किये बिना रह नही सकता है। जब पाठक को पढने मेे रस आयेगा तो उसकी सोच उस पर बनेगी। जब सोच मे भिन्नता होगी तो वह टिप्पणी के रूप मे अपने विचाार जरूर प्रकट करेगा। इस तरह अच्छा एवं रूचिकर विषय होने से टिप्पणी प्राप्त हो सकती है।

2 टिप्पणी खुले मन से दे

देने में कंजूसी व आलस्य न करे।भाई समीरलाल जी  को आदर्श  बनाये  । किसी मित्र ने लिखा है कि टिप्पणी करना शादी में लिफाफा देने के समान है। टिप्पणी करने में हर्ज नहीं हैं परन्तु अपने ब्लाॅग पर ट्राफिक लाने टिप्पणी करना ठीक  है क्या ? टिप्पणी कर टिप्पणी पाना क्या पत्नी को रानी कह कर स्वयं राजा बनना नहीं है? क्या यह नैतिक दृष्टि से सहीं है या नहीं कहना कटिन है। लकिन टिप्पणिया करने से टिप्पणिया अधिक प्राप्त होती है । अतः  दुसरो के चिट्ठे पर जम कर  टिप्पणी करे।एक मित्र के अनुसार  इससे संवाद होता है एवं परिचय बढता है। नैतिकता अनैतिकता के विवाह में उलझना यहाॅ ठीक नहीं  मानता हुँ।

3 टिप्पणी मांगे
अपने चिट्टे के अन्त मे पाठको से टिप्पणी प्राप्त करने हेतु आग्रह करे। जैसा कि बिना मागें माँ भी भोजन नहीं परोसती है। इससे पाठक टिप्पणी करना पसंद करेगा। अपनी पोस्ट के अंन्त मे लिखे श् एक टिप्पणी दे। श्

4 प्रश्न पुछे
अपने ब्लाग को विचारोत्तेजक बनाकर कुछ प्रशन पुछे। पाठक अपने विचार रखने को बाध्य होगे जिससे आपको टिप्पणी प्राप्त हो जाएगी।विवादास्पद लिखे जिससे टिप्पणीया मिलेगी।

5 प्राप्त टिप्पणी का जवाब दे
टिप्पणीकार जवाब पा कर अगली बार टिप्पणी करेगा। अतः प्राप्त टिप्पणियो का जवाब दे।

6आलेख का अन्त खुला रखे
अपने आलेख को निश्चित शब्दो मे अन्त न करे। उपसंहार  स्पष्ट रूप से पूरा न करे। इससे पाठक पूरा करने के क्रम मे टिप्पणी देंगे।

सम्बन्धित महत्वपुर्ण पोस्टेः

इस ( डील की ) लड़ाई मे एक टिप्पणी की याचना है।
टिप्पणीयो़ मे क्या नहीं जमता मुझे।
टिप्पणीकारी से सबसे ज्यादा लाभ कैसे पाए।

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टिप्पणी का शास्त्र और मनोविज्ञान: भाग- दो

टिप्पणी कौनसी पोस्ट पर करे व टिप्पणी मे क्या लिखे?

प्रत्येक उस पोस्ट पर टिप्पणी करें जो आपको आपको सुहाती है, पढ़ने पर कुछ नया ज्ञान  सीखाती है, । कुछ नया ज्ञान एवं विचार देती है। यदि पढ़ने मे रस आता है तो उसकी मिठास को पहचाने व दुसरो तक टिप्पणी द्वारा पहुचांए। ब्लाॅग में आपने क्या पाया ? अगर आपने कुछ अच्छा या बुरा पाया हैं उसकी सूचना ब्लाॅगर को देना चाहते है तो जरूर टिप्पणी करे। ताकि ब्लाॅगर को अपने आलेख के मुल्यांकन का  अवसर मिले।
टिप्पणियाँ भी पोस्ट की समृद्व करती है। यही तो टिप्पणी करने का उद्वेश्य है। टिप्पणी अपने आप मे एक तरह से पोस्टमार्टम रपट भी हैं।पाठक को  अपना विश्लेषण  दर्शाने का हक है।

टिप्पणी करने के आधार क्या हो सकते है?

पोस्ट पढ़ने पर आपके मन मे जो भी प्रतिक्रिया होती है उसे लिख दे। आपको अच्छी लगी हो क्या बात अच्छी लगी व अच्छी लगने के आधार लिखे।  यदि पोस्ट मे लिखे पर सन्तुष्ट नहीं है तो उसका कारण लिखे। पोस्ट पर सुझ्ााव भी दिये जा सकते है। सुझ्ााव का तर्क एवं आधार लिखे।अपनी असहमति भी सकारण पोस्ट पर लिखे। इसी तरह का आपका अनुभव हो जो दुसरो को भी कुछ नई बात या नई सोचने की दिशा देता है तो उसे जरूर लिखे। समर्थक दोहे, शायरी, महापुरूषो के अनमोल वचन, सुक्ति या सम्बन्धित वैज्ञानिक शोध का उल्लेख कर टिप्पणी की गुणवत्ता बढ़ाई जा सकती है।

इसमे पूरे विषय को कवर किया हैं ? सभी आयाम एवं पक्ष स्पष्ट है? कहीं  कोई पुर्वागृह तो नहीं है? कहीं बात अधुरी , अस्पष्ट , असंगत तो नहीं है? ब्लाॅगर अपनी बात सही कर पाया है या नहीं ?उसकी भाषा, विषय के प्रति समझ , अभिव्यक्ति व शैली कैसी है? इस पर भी टिप्पणी की जा सकती है।

टिप्पणी में क्या लिखना चाहिए?

वैसे तो टिप्पणीयाॅ व्यक्तिगत होती है। पाठक की निजी प्रतिक्रिया है। सबकी अपनी आजादी है। अपनी आजादी है तो अगले की भी आजादीे का सम्मान रखें। टिप्पणी की भाषा सरल व सकारात्मक भाषा मे करें। कलिश्ट एवं असंगत टिप्पणी न करे। नकारात्मक द्वश्टिकोण भी मधुर शब्दो मे लिखे व व्यक्तिगत आक्षेप न करे। न किसी की खिल्ली उड़ाए। न ही भिन्नता पर अंगुली बेवजह उठाएं। आलेख मे अनावश्यक त्रुटियां न खोजे, न उल्लेख करे। उलाहना न लिखे। बता सके तो बीमारी की बजाए टिप्पणी मे औषधि दें।

’’ जमाये रहिये जी ’’ ’’मामला तो तगडा है, सर’’ ’’अच्छा,महान’’ ’’वाह’’ ’’खुब लिखा’’, ’’सहमत हुॅ’’, ’’सही लिखा’’ इस तरह की टिप्पणी सार्थक नहीं है। इस तरह की औपचारिक टिप्पणी न करें । पूर्वाग्रह मुक्त होकर  वस्तुनिष्ठ तरीके से टिप्पणी करें।  ठोस व काम की बात टिप्पणी में होनी चाहिए । सार्थक टिप्पणी करें। अपने उसी तरह के अनुभव साझा करे या अनुभव बाटें।
टिप्पणी करते समय मर्यादित रहंे। एक सीमा न लाॅधे। टिप्पणीकार परीक्षक नहीं है। नकारात्मक टिप्पणी रचनात्मक व सार्थक होनी चाहिए । र्दुभावनावश टिप्पणी नहीं  करनी चाहिए । टिप्पणिया भी विवाद पैदा करती है । जैसा कि विगत में ’’मौहल्ला’’ नामक ब्लाॅग पर टिप्पणी ने गर्मागर्म विवाद पैदा किया। नारद ब्लाॅग एग्रीगेटर भी इसका शिकार हुआ। अतः संयत भाषा में टिप्पणीै करें ।  आलोचना नर्म भाषा में करें, अप्रत्यक्ष रूप से करें अपने पर जोर न देते हुए विनम्र शैली मे करें ।

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टिप्पणी का शास्त्र और मनोविज्ञान भाग- एक

टिप्पणी क्या है व किस पर करें ?

टिप्पणी क्या है?
टिप्पणी का अर्थ महज अपनी कड़ी पर प्रतिक्रिया का प्राप्त होना है। टिप्पणी करना सवांद स्थापित करना है। अपनी सोच को उस विषय पर साझा करना है ।टिप्पणीयां अच्छी लगती है। चूकिं इसका मतलब है कि हमेें किसी ने पढ़ा है, हम उपयोगी लिखते है दूसरे हमारे चिट्ठे को प्रसन्द करते है सकारात्मक टिप्पणीयां अप्रत्यक्ष रूप से हमारी तारीफ है जो हम सब चाहते है। चिट्ठे की सार्थकता का विश्लेषण टिप्पणी मे होता है। आलोचना के परिवार की छोटी सदस्य टिप्पणी है। समीक्षा भी इसी परिवार की बुर्जूग है। टिप्पणी करना महज एक कला नहीं है। यह महज अपनी प्रतिक्रिया नहीं है। इसके पीछे एक मनोविज्ञान है और अर्थशास्त्र भी है।
ब्लाॅग एक निजी डायरी है,जो इण्टरनेट पर रखी जाती है एवं  सार्वजनिक की जाती है। यह जन संचार का एक सर्वश्रेष्ठ लोकतान्त्रिक  माध्यम है। जहाॅ न लिखने वाला मजबुर है न पढने वाला बाध्य है।  यह आम व्यक्ति की पत्रकारिता है।यदि हमें अपनें पर भरोसा है तो सब ठीक है।

ज्यादा टिप्पणी प्राप्त करने से ब्लाॅग सार्थक, बढिया व सफल नहीं हो जाता है। किसी पोस्ट को प्राप्त टिप्पणियों की संख्या से से आॅकना उचित नहीं है। यह आप के ब्लाॅेग की गुणवता को नहीं प्रदर्शित करता है। सभी चीजे मात्र संख्या से तय नहीं होती है। यदि पोस्ट में दम है, विषय वस्तु में दम है तो स्वतः ही धीरे धीरे इसको पाठक मिलेगें । दूसरी बात कि हम अपनी पोस्ट बहुत से लोगो को पढाना ही क्यों चाहते हैं ? हमें दूसरों की प्रतिक्रिया क्यों चाहिए ? हमारा लिखने के  कर्म पर ही तो अधिकार है। टिप्पणी प्राप्त करना ही चिट्ठा लिखने को ध्येय नहीं है। आपकी बात दुनिया में प्रस्तुत हो गई है, यह महत्वपूर्ण है।

किस चिट्ठे पर  टिप्पणी करनी चाहिए?

कही से आप ब्लाॅगर से भिन्न दृष्टिकोण रखते है तो उसकी चर्चा करेें। जब उससे ब्लाॅग की विषयवस्तु समृद्ध होती हो, ऐसी बात जरूर कहें ।जिससे छुटी बात पूरी हो ऐसे में टिप्पणी जरूर करनी चाहिए। चिट्ठे में  रहीं कमी का उल्लेख भी किया जा सकता है।आप इस पर क्या सोचते है? अपनी भिन्न सोच हो तो जरूर टिप्पणी करें ।
यद्यपि हिन्दी भाषा में लिखने वाले नये ब्लाॅगरो को प्रोत्साहन देने हेतु  टिप्पणी करना उचित  एवं आवश्यक है। ब्लाॅग जगत में टिप्पणी एक आवश्यक अंग है। मैं टिप्पणी के खिलाफ नहीं हुॅ ।

टिप्पणियों पर निम्न ब्लाॅग सार्थक व उपयोगी पाये जिनकी चर्चा बिना इस विषय पर बात पूरी नहीं की जा सकती:-
टिप्पणी करते आप अपने लिए

टिप्पणी_ करी करी न करी

चिट्ठों पर टिप्पणी न करें!

ब्लाग पर टिप्पणी का महत्व

टिपियावाली के दोहे …!

टिपेरतन्त्र के चारण

निम्न दोनों विषयों पर अगलें ब्लाॅग में चर्चा करेगें ।
टिप्पणी क्यों करें व क्या करेें ?
टिप्पणी प्राप्त करने के मंत्र

(निरन्तर…………………)