लिखने में बाँधाए दूर कर सफल लेखक बने

राईटर्स ब्लाक
एक औसत व्यक्ति अभ्यास के अभाव में सोचता है कि वह लिख नहीं सकता। लिखने के लिए किसी खास कौशल की जरूरत नहीं है। मात्र अभ्यास एवं स्वयं पर विश्वास की जरूरत है। निम्न कारणों से व्यक्ति लेखक नहीं बन पाता है। उन कारणों को राईटर्स ब्लाक कहते है। जिनका विश्लेषण निम्न प्रकार है।ेेेेे
1. टेलेन्ट/प्रतिभा नहीं
कई बार बचपन मंे ठोकरें खाने के कारण या टोका-टोकी के कारण स्वयं को प्रतिभाहीन मान लेते है। ऐसे में हम स्वयं पर भरोसा नहीं करते है। व्यक्तिगत प्रतिभा दब जाती है लेकिन टैलेंट हम में हे ही।
2. रचनात्मकता
मनुष्य मात्र में नया कुछ करने की सहज प्रवृति होती है। लेकिन बचपन के दबाव के कारण व्यक्तित्व कुन्ठित हो जाता है। तब वह नई चीज करने में स्वयं को अक्षम पाता है।writer
3. समय
हम कई बार अपनी प्राथमिकताएँ सही तरह से तय नहीं कर पाते है। ऐसे में हमेशा व्यस्त रहते है। शीथल अवस्था में ही सृजन सम्भव है।
4. भाग्य
कई बार हम अपनी अक्षमताओं को भाग्य का नाम दे देते है। जबकि हम प्रयत्न ही नहीं करते है।
5. लिखने की कला
लिखने के अभ्यास एव थोड़े से प्रयत्न से मार्ग  मिल जाता है l

6.छपेगी नहीं

प्रारम्भ में हमें अपने लेखन पर भरोसा नहीं होता है। वह छपेगा या नहीं, वह छपने योग्य है या नहीं , वह पाठकों को पसन्द आयेगा या नह एवंीं सोचते रहते है इस से मार्ग मिल जाता हैतरह के भय के होने पर लिखना कठिन हो जाता है।

Advertisements

प्रेरणा एवं प्रतिभा दोनो आगे बढ़ने में सहायक

फ्रांसीसी साहित्यकार विक्टर ह्यूगो, ने लिखा है कि प्रेरणा एवं प्रतिभा दोनो एक ही हैInspiration जो व्यक्ति प्रेरित होता है वही प्रतिभाशाली होता है । प्रेरित का अर्थ अपनी क्षमता पर भरोसा करना व कुछ पाने के लिए प्रयत्न करना है । प्रतिभा का अर्थ कार्य करने की क्षमता व कुशलता का होना । प्रतिभा प्रेरणा के अभाव में व्यर्थ है। प्रेरणा भी प्रतिभा के अभाव में व्यर्थ है । प्रेरित होने पर ही प्रतिभा सार्थक होती है । बिना प्रतिभा के प्रेरणा उपादेय नही है ।

प्रतिभा व प्रेरणा दोनो अंधे व लंगड़े की मित्रता के समान है । जंगल में आग लगने पर अंधे के कंधे पर लंगड़ा सवार होकर दोनो जंगल से पार हो जाते हैं । दोनो साथ ही कार्यकारी है । प्रतिभा प्रेरणा का परिणाम है । प्रतिभा प्रेरणा के पंखो से ही उड़ती है । प्रतिभा की जड़ें प्रेरणा में ही होती है । प्रेरणा हो तो कोई अक्षमता नहीं होती । अन्धी होकर हेलन केलर दो बार हवाई जहाज उड़ाती है । तभी तो प्रेरक वक्ता प्रतिभा बढाने पर जोर देते हैं । इन दोनो के सहयोग से ही जीवन में मनचाही सफलता प्राप्त की जा सकती है ।

पटकथा कैसे लिखें पर वर्कशाॅपः गौरव पंजवानी, ’सैकण्डमैरीज डाॅट काॅम’ के निर्देशक द्वारा

उदयपुर इन्टरनेशनल फिल्म फेस्टीवल के क्रम में स्क्रिप्टराईटिंग पर वर्कशाॅप के दूसरें दिन श्री गौरव पंजवानी द्वारा ली गयी । मैने भी इसमे भाग लियज्ञं पंजवानी पहले एड फिल्मे एवं लघु फिल्में बनाते थे । उनकी चर्चित लघू फिल्म फैसपेक नामक है ।
उन्होने प्रारम्भ में बताया कि पटकथा लिखने के कोई नियम नहीं हो सकते है।कभी भी, कहीं भी किसी भी तरहकी स्थिति में लिखि जा सकती है।यह सृजन का कार्य है, इस हेतु लिखनें का मन होना चाहिये । यह नियमो से परे रूचि और सृजन का काम है।
उपन्यास कहानी की जीवनी है ।इसमें विस्तार से बारीक चीजों का वर्णन होता है ।जैसे खिडकी से झांकती लडकी का वर्णन करतें वक्त आकाश मेंबादल, उडती चिडियां, पडोैस में खडा पेड या सडक पर की हलचल की दास्तान भी महत्वपुर्ण है ।अर्थात विस्तार से लिखना चाहिये फिल्मी पटकथा में भी जितना विस्तृत वर्णन होता है,वह उतना ही महत्वपुर्ण है ।
पात्रों को सामान्य से विशिष्ठ बनाय अर्थात लार्जर देन लाईफ। स्टिरियोटाईप पात्रों में कोई विशिष्ठता जोडकर उसमे ंप्राण फुंके ।इसके लिये हमारें पुराण, महाभारत एवं रामायण उपयोगी है ।पात्र एवं धटनाओं को नया रंग देनें की जरूरत है ।
पटकथा के फिल्म निर्माण पर श्रोताओं को उस धटना का एहसास होना चाहिये ।दर्शक हाल भूलकर वहां पहूंच जाना चाहिये ।
पटकथा लिखतें समय विषय या लक्ष्य पर न्याय करना जरूरी है ।पूर ेविषय का खूलासा एवं परिणाम आना चाहिये ।अपनें बीज को पूरा वृक्ष बनाओं ।इसमेंव् यक्तिगत मूल्य बीच में न आनेें दो ।दर्शक का मनोरजंन या स्वयं के सृजन का सूख ध्यानमें रखों। टी.वी. धारावाहिकों की पटकथा लिखनें का अभ्यास इसमें उपादेय है । पटकथा लिखें, पुनर्ःलिखे । जब तक स्वयं सन्तुष्ठ न हो जाये संशोधन करते रहे । यह अभ्यास तकनिकी बारिकीयां सिखा देगा
ं व्यवसायिक सिनेमा के साथ-2 अब कला फिल्मों के भी दर्शक बढे हैं ।
फार्मूला िफल्में ही सिर्फ नहीं चलती है ।सिनेमा में नये प्रयोग करनें के अवसर बढे है ।अतः नई लहर पैदा करें ।

पटकथा कैसे लिखें पर वर्कशाॅपः सुभाषकपूर ’फॅस गए ओबामा’ के निर्देशक द्वारा

उदयपुर इन्टरनेशनल फिल्म फेस्टीवल के क्रम में स्क्रिप्ट राईटिंग पर वर्कशाॅप दिनांक 15.09.2012 को उदयपुर में श्री सुभाषकपूर द्वारा ली गयी । मैने भी इसमे भाग लिया ।
सुभाषकपूर की पहली फिल्म सलाम इण्डिया थी । ये सिधे पत्रकारिता से फिल्म निर्माण व निर्देशन में आये हैं । इन्होने कोई फिल्म कला का औपचारिक प्रशिक्षण नहीं लिया है । अपनी फिल्म निर्माण की प्यास एवं रूची के बलबुते पर इस क्षेत्र में सफलता पाई । सफल पटकथा लेखक बनने के लिए लिखने का जुनून होना प्रथम शर्त है ।
सुभाषकपूर ने बताया कि फिल्म का आधार पटकथा ही होता है । इसमे कथा भी सामान्य एवं ज्ञात ही होती है । मात्र प्रस्तुतीकरण नवीन तरह का एवं अपने आप में रूचीप्रद व विशिष्ट होता है । अतः लेखक को बात अपने अन्दाज में इस तरह प्रस्तुत करनी चाहिए कि वह दर्शकोें को डूबा दे । पटकथा दर्शकों के वर्ग को तय कर उसके अनुरूप लिखनी चाहिए । हरेक वर्ग का अपना सोच, स्तर, बिम्बो की समझ, मूल्य, सपने एवं द्वन्द भिन्न-भिन्न होते हैं । यानि उनकी मनोवृति व अवचेतन को ध्यान में रख कर संवाद एवं पटकथा लिखनी चाहिए । वैसे संवाद लेखन पटकथा से भिन्न व्यक्ति भी कर सकता है । नाटक, स्क्रीन-प्ले व पटकथा में अन्तर होता है । बार-बार लिखने से कला स्वतः ही विकसित होती है ।
वैसे डायरेक्टर एवं कथा लेखक के बीच निरन्तर संवाद एवं समझ होने पर अच्छी पटकथा बनती है । डायरेक्टर पटकथा को दृश्यों के रूप में देखता है । संपादक भी पटकथा को माॅजता है ।

Related posts:

टीवी सिरिअल व फिल्म की पटकथा कैसे लिखे?

सफलता का मंत्रः रतन टाटा के अनुसार- दूसरा भाग

2. बुद्धिमता
मनुष्य के पास मात्र ज्ञान, सूचना या जानकारी होने से सफलता नहीं मिलती । ज्ञान का उपयोग करने की कुशलता होनी चाहिये । वास्तव में ज्ञान का उपयोग अपने पक्ष में करने की कला को ही बुद्धि कहते हैं। मात्र आई. क्यू. से काम पूरा नहीं होता हैं। जीवन में भावनात्मक सन्तुलन (ई. क्यू.) की बड़ी आवश्यकता हैं। परिस्थिति, काल, देश केे अनुसार निर्णय करने में बुद्धि की बड़ी भूमिका हैं। अपनी मात्र धारणाओं व दृष्टि अनुसार न चलें । विवेक से तय करें । तोल मोल के फैसले ले ।
अपनी अक्ल से चलें । चमचों की आंख से न देखें ।
हार्वड विश्वविधालय के प्रोफेसर गार्डनर ने बताया है कि बुद्धि एक तरह की नहीं होती हैं। बहुमुखी बुद्धिमता की धारणा दी है । उनके अनुसार व्यक्ति में मुख्यतः सात तरह की बुद्धि होती हैं। इसमें से प्रत्येक का विकास अलग-अलग व्यक्तियों में अलग-अलग मा़त्रा में होता हैं।
1. तार्किक/गणितीय
2. भाषायी/शाब्दिक,
3. शारीरिक/गतिक,
4. संगीतीय/आवाज,
5. दृश्य/आकाशीय,
6. दूसरे व्यक्यिों से सम्बन्धित,
7. आत्मिक, (इन्टर परसनल)
जानकारी, ज्ञान, सूचनाओं को अपने पक्ष में प्रयोग करना । उस आधार पर सटीक निर्णय करना ।

( To be continued…)