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दिवाली की शुभकामनाएं

हम  चाहे लाख दिये और
मोमबत्तीया जलाऐ इनसे
हमारे  जीवन में रोशनी
होने वाली नही।

असली दिवाली तो उस दिन
ही समझना जिस दिन हमारे
भीतर का दिया जले।

उससे पहले तो सब अंधकार
ही है ।

और राम के घर लौटने
से हमारा  क्या लेना देना,
बात तो उस दिन बनेगी
जब हम अपने
भीतर लौटोगे

तभी  होगी असली दिवाली l

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स्वस्थ रहने के 12 सूत्र: जीवन शैली बदल कर रोग मुक्त रहें

हम सपरिवार रोग मुक्त रहें इस हेतु कार्य योजना

 

हमें अपनी जीवन शैली इस तरह की बनानी हैं क़ि हम बीमार ही न हो

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चैत्र नवरात्रि में नीम रस क्यों पीना चाहिए ?

चैत्र माह में गर्मी प्रारम्भ हो जाती हैl मौसम परिवर्तन के कारण अनेक रोग हो जाते हैl इनसे बचाव  के लिए आयुर्वेद में  प्रातः भूखे  पेट नौ दिन नीम रस पिने का  विधान हैl

नीम के बारे में हमारे ग्रंथों में कहा गया है-

निम्ब शीतों लघुग्राही कटुकोडग्रि वातनुत।

अध्यः श्रमतुट्कास ज्वरारुचिकृमि प्रणतु॥ 

नीम शीतल, हल्का, ग्राही पाक में चरपरा, हृदय को प्रिय, अग्नि, वात, परिश्रम, तृषा, ज्वर अरुचि, कृमि, व्रण, कफ, वमन, कुष्ठ और विभिन्न प्रमेह को नष्ट करता है। नीम में कई तरह के लाभदायी पदार्थ होते हैं।

  • नीम जूस मधुमेह रोगियों के लिये भी फायदेमंद है। अगर आप रोजाना नीम जूस पिएंगे तो आपका ब्लड़ शुगर लेवल बिल्कुल कंट्रोल में हो जाएगा।
  • नीम के रस की दो बूंदे आंखो में डालने से आंखो की रौशनी बढ़ती है और अगर कन्जंगक्टवाइटिस हो गया है, तो वह भी जल्द ठीक हो जाता है।
  •  शरीर पर चिकन पॉक्स के निशान को साफ करने के लिये, नीम के रस से मसाज करें। इसके अलावा त्वचा संबधि रोग, जैसे एक्जिमा और स्मॉल पॉक्स भी इसके रस पीने से दूर हो जाते हैं।
  •  नीम एक रक्त-शोधक औषधि है, यह बुरे कैलेस्ट्रोल को कम या नष्ट करता है। नीम का महीने में 10 दिन तक सेवन करते रहने से हार्ट अटैक की बीमारी दूर हो सकती है।
  •  मसूड़ों से खून आने और पायरिया होने पर नीम के तने की भीतरी छाल या पत्तों को पानी में औंटकर कुल्ला करने से लाभ होता है। इससे मसूड़े और दाँत मजबूत होते हैं। नीम के फूलों का काढ़ा बनाकर पीने से भी इसमें लाभ होता है। नीम का दातुन नित्य करने से दांतों के अन्दर पाये जाने वाले कीटाणु नष्ट होते हैं। दाँत चमकीला एवं मसूड़े मजबूत व निरोग होते हैं। इससे चित्त प्रसन्न रहता है।
  •  नीम के रस का फायदा मलेरिया रोग में किया जाता है।
  • नीम वाइरस के विकास को रोकता है और लीवर की कार्यक्षमता को मजबूत करता हैl

स्वास्थ्य सेतु में प्रातः नीम रस सुबह 7 बजे उपलब्ध है,आप पीने पधारेl

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बीमारी पहले मन में, मस्तिष्क में, फिर तन में

हमारा स्वास्थ्य पच्चीस प्रतिशत इस बात पर निर्भर करता है कि हम क्या करते हैं किन्तु हम क्या सोचते हैंे इस पर पचहत्तर प्रतिशत निर्भर करता है। मन यदि रुग्ण है तो व्यवहार और विचार भी रुग्ण ही होगें।
सामान्यतः रोग पहले हमारी भावनाओं में आते हंै, उसके बाद विचारो में आते है, फिर स्थूल देह में उनका प्रकटीकरण होता है। जैसा कि किरलियन फोटोग्राफी आज इसे प्रमाणित करती है। हमारे भाव-शरीर यानि आभामडण्ल में रोग के लक्षण छः माह पूर्व दिखने लगते हैं। जब किरलियन फोटोग्राफी हमारे भाव-शरीर का चित्र खींचती है तो भौतिक शरीर में होने वाली गांठ के छः माह पूर्व ही भाव-शरीर के चित्र में गांठ के स्थान पर काला धब्बा देखा जा सकता है। illness into health
मानव देह की सबसे छोटी इकाई कोशिका है। प्रत्येक कोशिका पदार्थ से बनी होती है। पदार्थ का वह सबसे छोटा कण है जिसका कोई आकार व भार होता है, उसे परमाणु कहते है। परमाणु को पुनः तोडने पर तरंग एवं कण बनते हैं जो कभी तरंग होता हंै व कभी कण-जिसे क्वान्टम कहते हैं। क्वान्टम वे ऊर्जा कण हैं जो अदृश्य हंै। प्रत्येक दृष्य पदार्थ के पीछे अदृश्य क्वान्टम का सहयोग होता है।

सूक्ष्म शरीर की विचार तरंगे व संवेदनाएॅ बाधित होती हैं तो शरीर के तल पर अनेक रोग उभर आते हंै।
मानव-मस्तिष्क एक सुपर कम्प्यूटर की तरह है जिसमंे बहुत सी धारणाओं के साफ्टवेअर लगे होते हैं। इम्प्रेशन्स के लेन देन से साफ्टवेअर अपडेट होते रहते हैं। इस की-बोर्ड का बटन दबाने पर मोनीटर पर वैसा ही परिणाम आता है, जैसा सीपीयू में उपलब्ध साफ्टवेअर प्रोसेस करता है। लक्ष्य प्राप्ति हेतु ’की-बोर्ड’ के बटन दबाने से परिणाम तो सी.पी.यू. में उपलब्ध प्रोग्राम होने पर ही आता है। अर्थात मानव देह ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति है। जिन तत्वो और शक्तियों से ब्रहाण्ड बना है, उन्ही से हमारा शरीर, मस्तिष्क एवं आत्मा बनती है। ‘यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे।’ सूक्ष्म और विराट दोनों एक है। मानव देह और ब्रह्माण्डीय देह एक ही है। यही सनातन घर्म का सार है।
जीवन-शैली बदल कर हम अपने रोग से लड सकते हैं। हम ही जाने-अनजाने अपने को बीमार करते हैं। रोग धीरे-धीरे पहले हमारे जेहन में आता है फिर शरीर में प्रकट होता है।

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आदर्श स्वास्थ्य एवं जीवन शैली पर पुनर्विचार की आवश्यकता

आरोग्यम् का उद्वेश्य व्यक्ति को स्वास्थ्य के प्रति जिम्मेदार बनाना है। चिकित्सा कार्य सेवा की जगह कमाने का जरिया बन गया है। दवा कम्पनियो ने इसका दोहन व शोेषण शुरू कर दिया है। ऐलोपेथी दवा के प्रभाव से सबसे अधिक मौेते हो रही है। यद्वपि इस विधा ने कई जाने बचाई भी है। हमारा उद्वेश्य ऐलोपेथी का विरोध करना नहीं है। उसका भी योगदान स्वीकार है। विज्ञापन की बदोलत व शार्टकट की खोज ने अन्य विश्वसनीय वेैकल्पिक चिकित्सा को भुला दिया है। चुकि ये मौते तत्समय नही होती है। दीर्घकाल में हानि पहुचाती है , अतः इनसे सम्बन्ध स्थापित करना कठिन है।
हम स्वस्थ रहने हेतु जन्मे है ।शरीर प्रकृति का दिया हुआ उपहार है । हमें उसे संभालना नहीं आता है । प्रकृति अनुरूप नही जीते हैं तभी बीमार होते हैं । प्रकृति की सहज व्यवस्था मनुष्य को स्वस्थ रखने की है । हमारी जीवन शैली रोगों के लिए जिम्मेदार है । मेरा रोग मेरे कारण है। मेरा स्वास्थ्य मेरी जिम्मेदारी है। दूसरो को इस हेतु दोष नही देता हॅू । बच्चा जन्मता स्वस्थ है व बुढापे में बीमार होकर करता है । इस यात्रा में रोग कहाॅ से आया व कौन लाया ? उसके लिये कौन जिम्मेदार है ? Related posts:

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होली शुभ हो! : शुभकामनाएँ कैसे ग्रहण करे ?

पुरे मन से दी शुभकामनाएँ अपने साथ कम्पन ,तरंग एवं ऊर्जा लाती है.उथला मन ,व्यस्त मन उन्हें नहीं ग्रहण कर सकता है. हमारी भी उन्हें ग्रहण करने की तैयारी होनी चाहिए। शान्त चित्त होने पर उनका अनुभव किया जा सकता है.
आज से हजारो वर्ष पूर्व इन त्यौहारों की संरचना की गई थी। आज के समय में इनका औचित्य समझना जरुरी है। अपने त्यौहारों को खुली आँख से देखना आवश्यक है।happy holi
मनुष्य उत्सव धर्मा है। वह सदैव आनन्द और मस्ती में पसन्द करता है। होली भी आनन्द दायक त्यौहार है।
हिरण्यकश्यप् की आदेश से ं अग्नि रोधी(फायर प्रुफ ) साड़ी पहन कर अग्नि में बैठने के उपरान्त होलीका भक्त प्रहलाद को उसके सद्गुणों के कारण जला नहीं पाती, बल्कि स्वयं जल जाती है।अथार्त  नकारात्मकता सत्य को मिटा नहीं सकती है।इस तरह बुराई पर अच्छाई की विजय का यह त्यौहार है। यह पतझड़ की विदाई पर खुशियां मनाने वाला त्यौहार है। बंसत के उल्लास का त्यौहार है।
होली जलाना दहन का प्रतीक है। अपने भीतर वर्ष भर के वैमनस्य, गंदगी व ईष्या को जलाने का त्यौहार है।यह मन के मैल को धोने का त्यौहार है। गाली, गलौच कर कड़वाहट को मिठास में बदलने का मौसम है।यह भीतर छिपी गन्दगी को बाहर लाने का अवसर है। मन की शुद्धता को उज्जवल करने का मौका पैदा कराता है।दूसरों का दिल न दुखाते हुए रंग डालने ,गंदे मजाक,हंसी उड़ाने, छेड़छाड़ करने व नंाचने गाने का त्यौहार है। इस तरह मन की भड़ास निकालने में यह त्यौहार सहायक है।
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जीवन एक रहस्य हैः इन्द्रियों द्वारा उसे नहीं जान सकते

हमारी ज्ञानेन्द्रियों की एक सीमा होती है। हम अपनी इन्द्रियों से ही संदेश ग्रहण करते है। सभी चीजे इस शरीर द्वारा समझी नही जा सकती हैं। निराकार व सूक्ष्म इन्द्रियगोचर नही हैं। रहस्य को रहस्य रहने देना है।Invisible निराकार को जब महावीर,बुद्व न समझा सके तो उसे कोई नहीं समझा सकता है। आत्मा को, निराकार को समझना कठिन हैं। जो अगोचर है उसे इन्द्रियों द्वारा नहीं समझा जा सकता है। जो ईश्वर न बताना चाहे वह हम क्यों जानना चाहतें हो। हम स्वयं को अनुभव द्वारा ही समझ सकते है। ससिम द्वारा असीम को नहीं समझा जा सकता है। मन तर्क से परे नहीं जा सकता है।
मनोविज्ञान ,तन्त्र, मन्त्र,पराशक्तियाँ,पुनर्जन्म ,ईश्वर का अस्तित्व, आत्मा का अस्तित्व,कर्म सिद्वान्त ,प्रकृति का निमार्ण या रहस्य ,सम्बन्धो में विचित्रता अगर अज्ञात है तो उसे अज्ञात ही रहने दो। इसे समझने-समझाने के क्रम में वैसे भी सारे संगठित धर्म कर्म काण्ड बन कर रह गए है। वे कहने कुछ जाते है व अनुयायी समझते कुछ ओर हैं। सत्य इस प्रक्रिया में लुप्त हो जाता है।