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थकान मिटाने हेतु हर्बल पेय, सम्मेद शिखर पर जो पिलाते है उसे घर बनाएं

सम्मेद शिखर की यात्रा पर जो पेय  हमें ऊंचाई पर थकान उतारने  कोठी की तरफ से मिलता है,यह रेसिपी उसी से ली हुई हैl वास्तव में यह एक आयुर्वेदिक पेय है जो निम्न मसालों से तैयार करते है । इसके सेवन से सभी प्रकार की थकान तत्काल मिट जाती है । एक पाव हर्बल पेय बनाने हेतु निम्न मात्रा में सामग्री लें ।
1. सौंठ – 60 ग्राम
2. काली मिर्च – 25 ग्राम
3. सौंफ – 25 ग्राम
4. धनिया – 25 ग्राम
5. तेज पता – 25 ग्राम
6. ईलाइची छोटी – 12 ग्राम
7. ईलाइची बड़ी – 12 ग्राम
8. दाल चीनी – 12 ग्राम
9. लौंग – 12 ग्राम
10. अजवाईन – 12 ग्राम
11. जायफल – 3 ग्राम
12. पीपल – 3ग्राम
इन उपरोक्त सामग्री को अलग-अलग कुट पीस कर पाउडर बनाकर फिर मिक्स करे । एक कप पानी में उपरोक्त एक चम्मच मिक्स पाउडर को उबाल कर स्वादानुसार शक्कर मिलावें । इस प्रकार ऊर्जा पेय पिने के लिए तैयार है । यह सम्मेदशिखर की 20 किमी0 पैदल यात्रा करने पर पिलाया जाता है । यात्री थकान उतार कर पुनः 10 किमी0 चलते हैं । यह बढि़या हर्बल चाय है, पीकर लाभ देखें ।

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रोग प्रतिरोध क्षमता बढ़ाने हेतु नियमित गिलोय का सेवन करें

 

गिलोय को आयुर्वेद में अमृता भी कहा जाता है क्योंकि यह त्रिदोष नाशक हैl नीम पर चढी हुई गिलोय उसी का गुण अवशोषित कर लेती है ,इस कारण आयुर्वेद में वही गिलोय श्रेष्ठ मानी गई है जिसकी बेल नीम पर चढी हुई हो ।

कैंसर की बीमारी में 6 से 8 इंच की इसकी डंडी लें इसमें wheat grass का जूस और 5-7 पत्ते तुलसी के और 4-5 पत्ते नीम के डालकर सबको कूटकर काढ़ा बना लें।

मधुमेह ,बुखार व  वात व्याधि में यह बहुत गुणकारी हैl

गिलोय में एंटी ओक्सिडेंट गुण प्रचुर मात्रा में पाए जाते है | गिलोय के सेवन से शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता में विकास होता है , जिससे व्यक्ति जल्दी बीमार नहीं होता एवं लम्बे समय तक स्वस्थ रहता है | गिलोय के रस का नियमित सेवन करने से शरीर के गुर्दे और जिगर स्वस्थ रहता है | शरीर में मूत्र सम्बन्धी विकारो में भी गिलोय अच्छा परिणाम देती है  | नियमित सेवन करने से शरीर बीमारियों से बच सकता है |

 

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ओम जपने से भीतरी संतुलन बढ़ता

संतुलन स्थापित करने में सहायक

ओम जपना मात्र शरीरिक क्रिया नहीं हैं। इससे उत्पन्न ध्वनि शरीर को व्यवस्थित करती है। शरीर अपने निज स्वभाव को प्राप्त होता है। असंतुलन,विकृति व अराजकता का नाश होता है। हमारे शरीर के प्रत्येक अणु को शान्ति मिलती है। उन्हें ठीक होने में मदद मिलती है।

Om sadhanaओम जपना मानसिक ग्रन्थियों को भी खोलता है। योग व्यक्ति को व्यर्थ की सोच से ऊपर उठाता है तथा व्यक्ति के भीतर बैठी घृणा, ईष्र्या, लोभ, काम आदि को मिटाता है । हम अपनी नकारात्मकता को पहचानने लगते हैं, जिससे उसकी मात्रा घटती है। आत्म देह की पहचान जीवन की सार्थकता बताती है। शरीर से मन की शक्ति बहुत ज्यादा है और मन से आत्मा की शक्ति अनन्तगुना है। हम आत्मा की सत्ता को ही भूल गये हैं, जब हम आत्मा को जानेगें तो मन की शक्ति जाग्रत कर पायेगें। मन द्वारा स्वस्थ होने की क्षमता को पुनस्र्थापित करना है। देह को बनाने वाले डी.एन.ए. (डीआक्सीराइबो न्यूक्लिक एसीड- जीन) एवं डी.एन.ए. बनाने वाले मन को बदलता है।
भावो को गहन
इनको भावपूर्ण तरीके से, संकल्प के साथ करने पर पूरा लाभ मिलता है। ओम जपना को जोर से करने की आवश्यकता नहीं है। उन्हें भाव से करना है। समर्पण के साथ करना है। पूरी श्रद्धा के साथ करना है। विराट के साथ एक होकर करना है। भावमय होकर होश के जप के साथ करें तो लाभ पांच गुना बढ़ जाता है। ओम जपते हुए भावना करें कि दैवीय शक्तियों की कृपा बरस रही है, मुक्तलाभ पुरूषो के आशीर्वाद मुझे मिल रहे हैं।े ओम जपने से हमारे रक्त में आक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है। प्राणांे का प्रवाह शरीर में सुचारुरूप से होने लगता है। मन शान्त रहता है जिससे अन्तःस्त्रावी ग्रन्थियों से हारमोन्स का स्त्राव नियमित होनेलगता है। इससे मानव देह की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। इससे देह में व्याप्त रोग स्वतः ठीकहोने लगते हैं। बिना पर्याप्त आॅक्सीजन के स्नायुतंत्र और ग्रन्थितंत्र दोनों असंतुलित हो जाते हैं।

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चीनी तम्बाकु से तीन गुना अधिक हानिकारक

शक्कर एक तरह का जहर है जो कि मूख्यतः मोटापे, हृदयरोग व कैंसर का कारण है । भारतीय मनीषा ने भी इसे सफेद जहर बताया है ।tobacco डाॅ0 मेराकोला ने इसके विरूद्ध बहुत कुछ लिखा है । डाॅ0 बिल मिसनर ने इसे प्राणघातक शक्कर-चम्मच से आत्महत्या बताया है । डाॅ0 लस्टींग ने अपनी वेब साईट डाॅक्टर में इसे विष कहा है । रे कुर्जवले इस सदी के एडिसन जो कि 10 वर्ष अतिरिक्त जीने अपने वार्षिक भोजन पर 70 लाख रूपया खर्च करते हैं ने अपने आहार में अतिरिक्त चीनी लेना बन्द कर दी है ।

 
अधिक शक्कर से वजन व फेट दोनों बढ़ते हैं । डाॅ0 एरान कैरोल तो स्वीटनर से भी चीनी को ज्यादा नुकसानदेह बताते हैं । चीनी खाने पर उसकी आदत नशीले पदार्थ की तरह बनती है । प्राकृतिक शर्करा जो फल व अनाज में तो उचित है । sugar is poision
हम जो चीनी बाहर से भोजन बनाने में प्रयोग करते हैं वह विष का कार्य करती है । यह शरीर के लिए घातक है । डिब्बाबन्द व प्रोसेस्ड फूड में चीनी ज्यादा होती है उससे बचे । अर्थात् पेय पदार्थ व मिठाईयांे के सेवन में संयम बरतना ही बेहतर है।

 

 

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होली शुभ हो! : शुभकामनाएँ कैसे ग्रहण करे ?

पुरे मन से दी शुभकामनाएँ अपने साथ कम्पन ,तरंग एवं ऊर्जा लाती है.उथला मन ,व्यस्त मन उन्हें नहीं ग्रहण कर सकता है. हमारी भी उन्हें ग्रहण करने की तैयारी होनी चाहिए। शान्त चित्त होने पर उनका अनुभव किया जा सकता है.
आज से हजारो वर्ष पूर्व इन त्यौहारों की संरचना की गई थी। आज के समय में इनका औचित्य समझना जरुरी है। अपने त्यौहारों को खुली आँख से देखना आवश्यक है।happy holi
मनुष्य उत्सव धर्मा है। वह सदैव आनन्द और मस्ती में पसन्द करता है। होली भी आनन्द दायक त्यौहार है।
हिरण्यकश्यप् की आदेश से ं अग्नि रोधी(फायर प्रुफ ) साड़ी पहन कर अग्नि में बैठने के उपरान्त होलीका भक्त प्रहलाद को उसके सद्गुणों के कारण जला नहीं पाती, बल्कि स्वयं जल जाती है।अथार्त  नकारात्मकता सत्य को मिटा नहीं सकती है।इस तरह बुराई पर अच्छाई की विजय का यह त्यौहार है। यह पतझड़ की विदाई पर खुशियां मनाने वाला त्यौहार है। बंसत के उल्लास का त्यौहार है।
होली जलाना दहन का प्रतीक है। अपने भीतर वर्ष भर के वैमनस्य, गंदगी व ईष्या को जलाने का त्यौहार है।यह मन के मैल को धोने का त्यौहार है। गाली, गलौच कर कड़वाहट को मिठास में बदलने का मौसम है।यह भीतर छिपी गन्दगी को बाहर लाने का अवसर है। मन की शुद्धता को उज्जवल करने का मौका पैदा कराता है।दूसरों का दिल न दुखाते हुए रंग डालने ,गंदे मजाक,हंसी उड़ाने, छेड़छाड़ करने व नंाचने गाने का त्यौहार है। इस तरह मन की भड़ास निकालने में यह त्यौहार सहायक है।
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हर रोज सर्वश्रेष्ठ कार्य कैसे करें

हम जैसा जीना चाहते हैं वैसा जी सकते हैं । प्रतिदिन स्वयं को भेजने वाली सूचनाएं बदल कर हम अपना जीवन बदल सकते हैं । हम हर रोज ठप्पे से नहीं जी पाते हैं । हम जो भी जैसा भी जीते हैं, परिणाम पाते हैं उसके पीछे उस क्षण का हमारा व्यवहार होता है । व्यवहार परिणाम लाता है । हमारा व्यवहार जीवन को प्रतिभाशाली बनाता है । अतः उसे प्रभावित करने वाले कारक क्या है ? हम जो सोचते है, तदनुरूप व्यवहार बनाता है । इस सोच का भी कारण हमारा महसूस करना है ।
व्यवहार सोच व महसूस करने से तय होता है । जैसा हम महसूस करते है उसी अनुरूप विचार आते हैं । ये दोनो परस्पर जुड़े हुए हैं । हम अपनी भावनाओं के आधार पर महसूस करते हैं । भावनाएं ऊर्जा से बनती है । भावनाओं को बदलना चेतन रूप से कठिन है । हम इसके बहाव में होते हैं । अतः इसको बदलने हमारा आगत तन्त्र बदलना होगा । अतः इनका निर्धारण हमारा शरीर रचना विज्ञान तय करता है ।Networking
हमारे शरीर में सीग्नलों का प्रवाह चलता है । निरन्तर हमारे शरीर में संदेशों का प्रवाह चलता है । हम इन सूचनाओं को पकड़ नहीं पाते हैं । जब हम कहते हैं कि मेरा मूड़ खराब है । यह हम तब कहते हैं कि मन मे निराशा के भाव है, नकारात्मक विचार चल रहे हैं व थकान लग रही है । आगे कुछ अच्छा होने की आशा नहीं है । अर्थात जब हम इन सब के संदेश-संकेत पढ़ पाते है । अर्थात जब संकेतो को ग्रहण नहीं कर हम अपना कार्य करते जाते है तो हमारे कार्यों का सही परिणाम नहीं आता है । ऐसे मे हम अपना सर्वश्रेेष्ठ नहीं दे पाते है । अर्थात हम सक्षम होते हुए भी परिणाम नहीं ला पाते है । इसलिए सचेत होकर शरीर में होने वाले परिवर्तनों को पकड़ना दिन को शानदार बना सकते हैं । तभी तो शानदार क्रिकेट खेलने वाला सचिन तेंदूलकर भी हमेशा बढि़या नहीं खेल पाता है । किसी दिन उसका प्रदर्शन ठीक नहीं रहता है । यह सब उसके शरीर मे चल रहे संदेशो को नहीं समझ कर उनका शिकार होने से होता है । जब वह अपनी भाव व मनस्थिति को समझ पाता है तो उसेे बेहतर भी बना सकता है ।
हम अपने शरीर में चलने वाले संदेशों व संकेतों के प्रति सचेत होकर उनको अपने पक्ष में कर सके तो हमारा प्रत्येक दिन सर्वश्रेष्ठ परिणाम दे सकता है । अन्यथा हम परिस्थितियों के शिकार भी हो जाते हैं व पता बाद में पड़ता है । ये सीग्नल, वैद्युतिक, चुम्बकीय, रसायनिक व अनेक प्रकार के होते हैं । इन कम्पनों से ही भावनाएं बनती/बिगड़ती है । हम आखिर स्वयं को किस तरह की सूचनाएं या संकेत (सिग्नल) फिड कर रहे हैं। इनकी भूमिका पहचानना इसलिए महत्वपूर्ण है । ताकि हम अपनी ‘इनपुट’ बदल कर दिन को शानदार बना सकते हैं ।
हम अपनी सूचनाओं से स्वयं कैसे प्रभावित होते हैं इसे देखने के लिए हार्ट रेट वेरिएबलिटी ;भ्त्टद्ध रिपोर्ट देख सकते है। इसे देखने हार्टरेट जांचने की मशीन अपने कान पर लगाएं । तब आप अपने हार्ट पर उसके प्रभाव के सिग्नल्स को तरंग की तरह देख सकते हैं ।
इस तरह की ई.एम. वेव ;म्डण्ॅंअमद्ध नामक एक हार्टमेथ कम्पनी ने मशीन बनाई है जो हमारी पल्स रेट व भ्त्ट को बताती है । इसे हम अपने कान से लगा कर अपने कम्प्यूटर पर तरंग के रूप में देख नाप सकते हैं । यह हमारे हृदय में लयबद्धता को भी बताती है । जब यह लयबद्धता (ब्वीमतमदबल) 100 प्रतिशत बताती है इसका मतलब यह है कि हृदय हमारा लयबद्ध चल रहा है । उस पर कोई अतिरिक्त भार नहीं पड़ रहा है ।
इस मशीन की सहायता से हम अपनी श्वांस को लयबद्ध भी कर विश्राम पा सकते हैं । इसमें उपर जाते ग्राफ के समय श्वास लेनी है व नीचे आते ग्राफ के समय श्वांस छोड़नी है । इस तरह श्वांस को लयबद्ध करना हृदय की शक्ति को बढ़ाता है एवं उसे स्वस्थ बनाता है ।

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संसार में झंझट/टकराहट स्वाभाविक है, यहाँ कहीं सुख नहीं है :जो है उसका आनन्द लेना सीखो((अंतिम भाग)

मेरी, या किसी की किस्मत कोई नहीं निगल सकता है। बहुत चालाक व घमण्डी होंगे। हमारा क्या बिगाड़ लेगें। हमें उनके घर जाकर कौनसा रहना है। बदमाश व्यापारी को भी वक्त सर्वेंक्षण निभाते है, जैसे निभा लेना। अपने-अपने गीत अपनी तरह से गाने ही पड़ते है। संसार या सत्य से भागने का विकल्प अधिक बुरा है।
अधुरापन, अपूर्णता, थोड़ी बेईमानी, थोड़ी सच्चाई, कभी खुषी कभी गम को ही संसार कहते है। यहाँ सब चलता है। इन सब के बीच रास्ता अपनी अक्ल से निकालना पड़ता है। फिर भी हँसना पड़ता है, हँसाना पड़ता है। एक तर्क, घटना, बात लेकर रोते रहने में सार नहीं है। इस क्रम में बहुत कुछ खोना पड़ सकता है। अतः बीच का व्यावहारिक पथ चुनों, संतुलित रहो। भावुक होने की जरुरत नहीं है। सब कुछ दाँव पर नहीं लगा है। हमारा जीवन हमारे हाथ में है। हमें कोई दुःखी नहीं कर सकता। हम अपने मालिक है। आप अनावश्यक खीचों मत। तुरन्त निर्णय करो। दो घोड़ों की सवारी न करें। मेरी बेहोशी अब अधिक नहीं चलेगी। जागो! जागो!
पूर्ण सुखी होने के आकांक्षी हो तो ‘‘जो है’’ उसका आनन्द लेना सीखो। संसार में तो इसी तरह होना निश्चित है। जब इसमें रहना है तो जैसा है वैसा स्वीकार करो, इसे अधुरा ही स्वीकारों। जीवन सहने का दूसरा नाम है। थोड़ा बहुत बेवकूफ बनना व सहना उचित है। संसार में थोड़े धोखे खाना भी सफल जीवन हेतु जरुरी है। इनसे सबक लो, इनको पहचानों व शान्त रहो। मानव की अपनी सीमाएँ है। व्यवहार की सीमाएँ है। दूसरे भी किसी न किसी से बँधे हुए है। वे कोई बुद्ध पुरुष नहीं है। उनकी अपनी समझ अनुसार कुछ गलती की है तो क्षमा कर आगे देखो। अत्यधिक मीनमेख घातक है। वे तो आपके स्नेह के आकांक्षी है। हमें मूर्ख बनाना, धोखा देना उनका व्यवसाय नहीं है। तीर्थकरों का जीवन बताता है कि संसार में सुख नहीं है। तभी तो वे आत्मज्ञान की राह पकड़ते हेतु वन को जाते है।

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