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कौनसा तेल खाए ?

डाॅक्टर बुडवीज तलने के लिए बहुअसंत्रप्त तेल ( poly unsaturated oil) प्रयोग करने के विरुद्ध थी। संतृप्त वसा को गर्म करने पर आॅक्सीकृत नहीं होते हैं और इसलिए गर्म करने पर उनमें एचएनई भी नहीं बनते हैं। Edible Oil इसलिए घी, मक्खन और नारियल का तेल कई दशकों से मानव स्वास्थ्य को रोगग्रस्त करने की बदनामी झेलने के बाद आज कल पुनः आहार शास्त्रियों के चेहते बने हुए हैं। ये शरीर में ओमेगा 3 और ओमेगा 6 का अनुपात भी सामान्य बनाए रखते हैं।
गृहणियों को खाना बनाने के लिए रिफाइंड तेल का प्रयोग नहीं करना चाहिए। बल्कि फील्टर्ड तेल का प्रयोग करना चाहिए। इससे भी अच्छा कच्ची घाणी से निकला तेल होता है। हमें कच्ची घाणी से निकला नारियल तेल ,सरसों का तेल या तिल का तेल काम में लेना चाहिए। क्योंकि ये तेल हानिकारक नहीं होते है।
सबसे बढि़या तेल जैतून का तेल होता है जो हमारे यहाँ बहुत मंहगा मिलता है। इसके बाद तिल का तेल (शीसेम आॅयल) एवं सरसों का तेल खाना चाहिए। मूंगफली के तेल में कोलोस्ट्राल की मात्रा ज्यादा होती है अतः वह भी कम खाना चाहिए।

वैसे एक मत है कि हमें अपने आसपास जो तिलहन उगता है उसीका तेल खाना चाहिए।

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समझ कैसे बढ़ाना व समझदार कैसे होना ?

 

सबकी परस्पर भूमिका जान कर जीने से समझ बढ़ती है । मात्र मानने से नही जानने से समझ बढ़ती है । किसी परम्परा, शास्त्र, व्यक्ति द्वारा मेरी समझ नहीं बढ़ाई जा सकती है ।जांचने  की विधि अपने अनुभव से जानना समझ है । मात्र मुझे ही इन सब सूचनाओं को परे रख कर स्वयं जांचना पड़ेगा कि मान्यताऐं सही है या नहीं । स्वयं अपने तई जानी गई बातें ही जानना है । मेरा जानने में ही समझ है । मानना परतन्त्रता है । मानना संवेदनाओं के अधिन है । यह बेहोशी है । उनसे स्वयं के वैभव को प्राप्त नहीं किया जा सकता । विवेक, ज्ञान, विज्ञान एवं जानना समझ के ही रूप है । यह व्यक्ति, शास्त्र व उपकरण पर आधारित न होकर सहज स्वीकृति से होता है ।
समझदार कैसे होना ?
व्यवस्था, न्याय व मानव को जान कर मानना है । अस्तित्वगत सच्चाई-प्रकृति के सत्य को जानना है । इसके प्रति सचेत होना है कि व्यवस्था चारों अवस्थाओं के अनुरूप जीने में है । इस चक्र में अपनी भूमिका अनुरूप जीना है । इस चक्र में बाधा नहीं बनना है । अपने कृत्य, व्यवहार व सोच व्यवस्था अनुकूल हो । अपने निजी लाभ हेतु व्यवस्था में विघ्न नहीं पैदा करना है ।
विनीशजी को आप समझदार क्यों मानते हंै ? उनके जीवन में वे सार्वभौम-प्राकृतिक व्यवस्था अनुरूप जीते हैं । सभी के साथ सम्बन्ध जानने के कारण न्यायपूर्ण आचरण करते हैं । धन इकट्ठा कर समृद्ध नहीं होना चाहते चूंकि स्वयं को पूर्ण मानते हैं । धन से अधिक सुविधाएं खरीद कर स्वयं को सुरक्षित रखना नहीं चाहते हैं । अपने प्रति आश्वस्त है । भय-प्रलोभन से कार्य नहीं करते हैं ।

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हर रोज सर्वश्रेष्ठ कार्य कैसे करें

हम जैसा जीना चाहते हैं वैसा जी सकते हैं । प्रतिदिन स्वयं को भेजने वाली सूचनाएं बदल कर हम अपना जीवन बदल सकते हैं । हम हर रोज ठप्पे से नहीं जी पाते हैं । हम जो भी जैसा भी जीते हैं, परिणाम पाते हैं उसके पीछे उस क्षण का हमारा व्यवहार होता है । व्यवहार परिणाम लाता है । हमारा व्यवहार जीवन को प्रतिभाशाली बनाता है । अतः उसे प्रभावित करने वाले कारक क्या है ? हम जो सोचते है, तदनुरूप व्यवहार बनाता है । इस सोच का भी कारण हमारा महसूस करना है ।
व्यवहार सोच व महसूस करने से तय होता है । जैसा हम महसूस करते है उसी अनुरूप विचार आते हैं । ये दोनो परस्पर जुड़े हुए हैं । हम अपनी भावनाओं के आधार पर महसूस करते हैं । भावनाएं ऊर्जा से बनती है । भावनाओं को बदलना चेतन रूप से कठिन है । हम इसके बहाव में होते हैं । अतः इसको बदलने हमारा आगत तन्त्र बदलना होगा । अतः इनका निर्धारण हमारा शरीर रचना विज्ञान तय करता है ।Networking
हमारे शरीर में सीग्नलों का प्रवाह चलता है । निरन्तर हमारे शरीर में संदेशों का प्रवाह चलता है । हम इन सूचनाओं को पकड़ नहीं पाते हैं । जब हम कहते हैं कि मेरा मूड़ खराब है । यह हम तब कहते हैं कि मन मे निराशा के भाव है, नकारात्मक विचार चल रहे हैं व थकान लग रही है । आगे कुछ अच्छा होने की आशा नहीं है । अर्थात जब हम इन सब के संदेश-संकेत पढ़ पाते है । अर्थात जब संकेतो को ग्रहण नहीं कर हम अपना कार्य करते जाते है तो हमारे कार्यों का सही परिणाम नहीं आता है । ऐसे मे हम अपना सर्वश्रेेष्ठ नहीं दे पाते है । अर्थात हम सक्षम होते हुए भी परिणाम नहीं ला पाते है । इसलिए सचेत होकर शरीर में होने वाले परिवर्तनों को पकड़ना दिन को शानदार बना सकते हैं । तभी तो शानदार क्रिकेट खेलने वाला सचिन तेंदूलकर भी हमेशा बढि़या नहीं खेल पाता है । किसी दिन उसका प्रदर्शन ठीक नहीं रहता है । यह सब उसके शरीर मे चल रहे संदेशो को नहीं समझ कर उनका शिकार होने से होता है । जब वह अपनी भाव व मनस्थिति को समझ पाता है तो उसेे बेहतर भी बना सकता है ।
हम अपने शरीर में चलने वाले संदेशों व संकेतों के प्रति सचेत होकर उनको अपने पक्ष में कर सके तो हमारा प्रत्येक दिन सर्वश्रेष्ठ परिणाम दे सकता है । अन्यथा हम परिस्थितियों के शिकार भी हो जाते हैं व पता बाद में पड़ता है । ये सीग्नल, वैद्युतिक, चुम्बकीय, रसायनिक व अनेक प्रकार के होते हैं । इन कम्पनों से ही भावनाएं बनती/बिगड़ती है । हम आखिर स्वयं को किस तरह की सूचनाएं या संकेत (सिग्नल) फिड कर रहे हैं। इनकी भूमिका पहचानना इसलिए महत्वपूर्ण है । ताकि हम अपनी ‘इनपुट’ बदल कर दिन को शानदार बना सकते हैं ।
हम अपनी सूचनाओं से स्वयं कैसे प्रभावित होते हैं इसे देखने के लिए हार्ट रेट वेरिएबलिटी ;भ्त्टद्ध रिपोर्ट देख सकते है। इसे देखने हार्टरेट जांचने की मशीन अपने कान पर लगाएं । तब आप अपने हार्ट पर उसके प्रभाव के सिग्नल्स को तरंग की तरह देख सकते हैं ।
इस तरह की ई.एम. वेव ;म्डण्ॅंअमद्ध नामक एक हार्टमेथ कम्पनी ने मशीन बनाई है जो हमारी पल्स रेट व भ्त्ट को बताती है । इसे हम अपने कान से लगा कर अपने कम्प्यूटर पर तरंग के रूप में देख नाप सकते हैं । यह हमारे हृदय में लयबद्धता को भी बताती है । जब यह लयबद्धता (ब्वीमतमदबल) 100 प्रतिशत बताती है इसका मतलब यह है कि हृदय हमारा लयबद्ध चल रहा है । उस पर कोई अतिरिक्त भार नहीं पड़ रहा है ।
इस मशीन की सहायता से हम अपनी श्वांस को लयबद्ध भी कर विश्राम पा सकते हैं । इसमें उपर जाते ग्राफ के समय श्वास लेनी है व नीचे आते ग्राफ के समय श्वांस छोड़नी है । इस तरह श्वांस को लयबद्ध करना हृदय की शक्ति को बढ़ाता है एवं उसे स्वस्थ बनाता है ।

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संसार में झंझट/टकराहट स्वाभाविक है, यहाँ कहीं सुख नहीं है :जो है उसका आनन्द लेना सीखो((अंतिम भाग)

मेरी, या किसी की किस्मत कोई नहीं निगल सकता है। बहुत चालाक व घमण्डी होंगे। हमारा क्या बिगाड़ लेगें। हमें उनके घर जाकर कौनसा रहना है। बदमाश व्यापारी को भी वक्त सर्वेंक्षण निभाते है, जैसे निभा लेना। अपने-अपने गीत अपनी तरह से गाने ही पड़ते है। संसार या सत्य से भागने का विकल्प अधिक बुरा है।
अधुरापन, अपूर्णता, थोड़ी बेईमानी, थोड़ी सच्चाई, कभी खुषी कभी गम को ही संसार कहते है। यहाँ सब चलता है। इन सब के बीच रास्ता अपनी अक्ल से निकालना पड़ता है। फिर भी हँसना पड़ता है, हँसाना पड़ता है। एक तर्क, घटना, बात लेकर रोते रहने में सार नहीं है। इस क्रम में बहुत कुछ खोना पड़ सकता है। अतः बीच का व्यावहारिक पथ चुनों, संतुलित रहो। भावुक होने की जरुरत नहीं है। सब कुछ दाँव पर नहीं लगा है। हमारा जीवन हमारे हाथ में है। हमें कोई दुःखी नहीं कर सकता। हम अपने मालिक है। आप अनावश्यक खीचों मत। तुरन्त निर्णय करो। दो घोड़ों की सवारी न करें। मेरी बेहोशी अब अधिक नहीं चलेगी। जागो! जागो!
पूर्ण सुखी होने के आकांक्षी हो तो ‘‘जो है’’ उसका आनन्द लेना सीखो। संसार में तो इसी तरह होना निश्चित है। जब इसमें रहना है तो जैसा है वैसा स्वीकार करो, इसे अधुरा ही स्वीकारों। जीवन सहने का दूसरा नाम है। थोड़ा बहुत बेवकूफ बनना व सहना उचित है। संसार में थोड़े धोखे खाना भी सफल जीवन हेतु जरुरी है। इनसे सबक लो, इनको पहचानों व शान्त रहो। मानव की अपनी सीमाएँ है। व्यवहार की सीमाएँ है। दूसरे भी किसी न किसी से बँधे हुए है। वे कोई बुद्ध पुरुष नहीं है। उनकी अपनी समझ अनुसार कुछ गलती की है तो क्षमा कर आगे देखो। अत्यधिक मीनमेख घातक है। वे तो आपके स्नेह के आकांक्षी है। हमें मूर्ख बनाना, धोखा देना उनका व्यवसाय नहीं है। तीर्थकरों का जीवन बताता है कि संसार में सुख नहीं है। तभी तो वे आत्मज्ञान की राह पकड़ते हेतु वन को जाते है।

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मेरी  पुस्तक ‘तनाव छोड़ो ,सफलता पाओ’ के बारे में

रोगों का असली कारण अचेतन में होता है

अन्तर्जगत के सिकन्दर कैसे बनना ?

 

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मेरी आने वाली पुस्तक ‘तनाव छोड़ो ,सफलता पाओ’ के बारे में

 तनाव छोड़ो ,सफलता पाओ                              तनाव कम करने पर यह सम्पूर्ण पुस्तक है जिसमें 16 उपाय तनाव कम करने पर दर्षाऐ हैं । लेखक स्वयं ने अपने जीवन में अनेक तरह के तनाव भोगे हैं एवं उनका सामना सफलता पूर्वक किआ हैं। तनाव आधुनिक जीवनशैली एवं आधुनिक विज्ञान की देन है। बीमारियों का सबसे बड़ा कारण तनाव है। तनाव हमारी आदत में आ गया है, जीवन में घुस गया है। इसे जीतना अब सरल नहीं रहा है। यह दिखाई भी नहीं पड़ता है। मोटे तौर पर तनाव एक   मानसिक स्थिति है। यह हमारे दिमाग में रहता है। तनाव हमेशा सिर से शुरू होता है। घटनाएँ सदैव तनाव का कारण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि आप घटनाओं को किस रूप में लेते और उनसे प्रभावित होते हैं। घटना की व्याख्या एवं विश्लेषण से हमारा रवैया तय होता है। हमारा रवैया ही तनाव होने और नहीं होने का कारण है।
हम तनावग्रस्त होने के कारण एवं अपनी अनेक तरह की कमजोरियों के कारण अपने विपुल ऊर्जा भण्डार का पूरा उपयोग नहीं कर पाते हैं। अदृश्य तनाव भी बन्धन है। मनोवैज्ञानिक विकलागंता शारीरिक विकलागंता की अपेक्षा बहुत हानिप्रद होती है। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद आप परिस्थितियों एवं व्यक्तियों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया और अनुभवों की व्याख्या को तनाव के सम्बन्ध में पहचान सकेंगे और आप तनाव के प्रभावों को कम करने में पुस्तक में वर्णित उपायों का प्रयोग कर सकेंगे।
यह सात भागों में विभाजित हैं। पुस्तक के अन्त में 22 ऐसे लोगो के अनुभव हैं जिन्होने अपने तनाव कैसे दुर किए हैं। ये भी तनाव छोडने के अनुभूत उपाय हैं । इस तरह यह पुस्तक लेखक की अकेली न होकर 22 व्यक्यिों की भी हैं।

                                                                                                                                                                                                                        

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छवियों के पीछे जीवन: टूटता मन

मीडिया ने हमारी पारम्परिक सांस्कृतिक एकता को खत्म कर दिया है । टीवी पर नामी कलाकारों के कार्यक्रम देख कर उन कलाकारों को अच्छा मान हम अपना गाना, नाचना व नाटक करना भुलते जा रहे हैं । इससे हम सृजनशील रहते व मस्ती लुटते थे । आज टीवी, कम्प्यूटर पर इनको देख कर निष्क्रीय व निठल्ले होते जा रहे हैं । कर्ता से हम देखने वाले होते जा रहे हैं । इससे भावनात्मक विकास व लगाव कम हो गया है व हम एकाकी होते जा रहे हैं । दूसरों को श्रेष्ठ मानने से स्वयं हीन भावना बढ़ा रहे हैं । image
टीवी/इन्टरनेट ने एक काल्पनिक दुनिया रच दी है । जिसमे व्यक्ति जीते हुए वास्तव में स्वयं से पलायन करता है । उसका मन एक काल्पनिक दुनिया में विचरण करता है । तब वह वास्तविक दुनिया से कट जाता है । काल्पनिक जगतवत् वह व्यवहार अपनों से करता है व वैसी प्रतिक्रिया की आशा करता है । जब उसे इस अनुरूप आचरण नहीं मिलता है तो वह निराश हो जाता है । इस प्रकार अपनों से दूर होता जाता है । वास्तविक जगत उसे कचोटने लगता है । काल्पनिक जगत ओर रूचिकर लगता जाता है । सितारे नायक बन जाते हैं । इस तरह यथार्थ से कटना अवसाद को बढ़ाता है । व्यक्ति को अकेला कर देता है व तनावग्रस्त रहता है ।
टीवी में दिखाये जाने वाले नारी/पुरूष वास्तव में वैसे नहीं होते हैं । उनकी ग्लेमरस व मेचों छवि निर्मित होती है । इसे बनाने में तकनीकी, मशीनों व ढेर सारे व्यक्तियों की भूमिका होती है । वह छवि वास्तविक नहीं होती है । इसमे उनकी मात्र अदाकारी होती है । वास्तविक जीवन में दूर-दूर तक भी वैसे वे नही हो सकते हैं न ही होते हैं । हमारे मनोरंजन या कोई उत्पादन बेचने वैसी छवि जानबुझ कर प्रस्तुत की जाती है ताकि हम उसे वैसा माने । उस मोहक छवि को हम मन में बसा कर जीवन में खोजते हैं, जो कहीं हो नहीं सकती है तब न मिलने पर उदास होते हैं ।
मीडिया से हम थोड़ा बहुत मनोरंजन पाते हैं लेकिन छवियां मन में बैठाने से कहीं अकेले पड़ जाते हैं । टीवी देखने से सम्बन्ध उपेक्षित होते जा रहे हैं । सम्बन्धों मंे संवाद की कमी होती जा रही है । सूचनात्मक सवांद तो मोबाईल से बढ़ा है लेकिन भावनात्मक लगाव परस्पर घटते जा रहे हैं । नए मूल्य अनुसार भावनाओं को कमजोरी माना जाता है । सम्बन्धियों व मित्रों के घर जाना कम हो गया है व वहां जाने पर भी कई बार सब टीवी देखने लगते हैं । स्वयं की निगाह में कमतर मिलने पर टुटते हैं । अंततोगत्वा हमें यह निष्क्रिय मनोरंजन छोटा भी बना देता है ।
हमारे पूर्वज जीवन भर में जितनी सुन्दर स्त्रियां नहीं देखते थे, उससे ज्यादा हम एक दिन में टीवी पर देखते हैं । इस तरह सुन्दरता का भूत खड़ा किया जाता है । इससे दर्शक भटक जाता है । वैसी छवियां/सुन्दरता जीवन में खोजता है । इस तरह व्यक्ति असंतुष्ट हो जाता है एवं नारी हीन भावना की शिकार होती है । टीवी पर आने वाले तीन चैथाई कार्यक्रमों में अप्रत्यक्ष रूप से सेक्सूलिटी/कामवासना बढ़ाने वाले होते हैे । नारी सौन्दर्य का मादक बना कर दिखाया जाता है । बच्चे इन्हे देख कर शीघ्र्र अवांछित सीख जाते हैं । आज सेक्सुलिटी की बाढ़ टीवी की देन है । दिन भर इस तरह के कार्यक्रमों को देखने से भला चंगा व्यक्ति भ्रष्ट हो जाता है।
टीवी से मधुमेह, मोटापा व हृदय रोग होते हैं । एक शोध केे अनुसार एक घंटा टीवी देखने से 22 मिनट उम्र घटती है । टीवी देखने से बच्चों की आंखे कमजोर होती है इससे उन्हे चश्मा पहनना पड़ता है । टीवी मनोरंजन कम व हमे भटकाता ज्यादा है । मन को बेलगाम यह करता है । मन को अस्थिर यह करता है। उसे गहरे कुएं मे यह धकेलता है । अतृप्त यह करता है । निराशा व बेचैनी यह फैलाता है। सपने यह दिखाता है । दिन में तारे यह दिखाता है । टीवी अशान्ति का डिब्बा है । इसे बुद्धु बक्सा वैसे ही नहीं कहते हैं ? हम इससे सपने खरीदते हैं । छवियां ग्रहण करते हैं । यथार्थ से दूर होते हैं ।

बच्चों को पंख देता है, साथ ही काट भी डालता है । नन्हे मन को युवा बना देता है । डायलाॅगबाजी सीखा देता है । बच्चों मे भेद भूला देता है । बच्चे को शैतान बनाता है । नए तरह के अन्धविश्वास सीखाता है । यथार्थ से दूर करता है । एक काल्पनिक जगत में जीना सीखाता है ।
टीवी कैसे घर वालों को बेघर बनाता है । यह घर में आग लगाता है । दर्शकों को भटकाता है । भेजा खराब करता है । सम्बन्धों को विकृत करता है । अपनों में दूरी पैदा करता है ।

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क्या कार्य पूरा करने हेतु ‘‘छोटा रास्ता’’ चुनना उचित है ?

जीवन में हम सब ‘‘शोर्ट कट’’ खोजते हैं । अंधी दौड़ में शीघ्र जीतने हेतु ‘‘छोटा रास्ता’’ चुनना अच्छा लगता है । Shortcutछोटे रास्ते से चल कर पाई सफलता उतनी महत्वपूर्ण नहीं है । साध्य व साधन का पवित्र होना आवश्यक है । हमें शोर्ट कट से प्राप्त वस्तु का मूल्य पता नहीं पड़ता है । उसका महत्व समझ मंे नहीं आता है । शोर्ट कट कई बार महत्वपूर्ण को भूला देता है व गैर जरूरी महत्वपूर्ण हो जाते हैं । इससे प्राथमिकताओं के चयन में गड़बड़ी होने से अव्यवस्था व अशान्ति मिलते हैं ।
छोटे रास्ते से चल कर अन्ततोगत्वा जीतने का प्रमाण नहीं मिलता है । कई बार छोटे रास्ते अव्यवस्था उपजाते हैं । बेईमानी बढ़ाते हैं, दूसरों का हक छिनते है, कामचोरी बढ़ाते हैं जो जीवन-मूल्यों के विरूद्ध है । जीवन मूल्यों को खो कर कुछ भी पाना अर्थहीन है । मात्र छोटे रास्ते से मेहनत बचती है व सरलता से तत्काल कार्य सिद्ध हो जाता है । अन्ततोगत्वा छोटा रास्ता चुनने वाले को दीर्घकाल में हमेशा हानि होती है ।
आज के रोगी वैकल्पिक चिकित्सा को दीर्घ होने के कारण उसे न चुन कर एलौपैथी को पसंद करते हैं क्योंकि उसमे तत्काल लाभ होता है । यद्यपि एैलोपैथी की दवाईयां के पाश्र्व प्रभाव हानिकारक होते हैं । हमने टी.एन. का उसी तर्ज पर जिज्ञासु का आपरेशन कराना चुना ।
तभी किसी ने लिखा है कि
रास्ता चलना स्वच्छ चाहे फेर हो, काम करना उत्तम चाहे देर हो ।
भोजन करना मां से चाहे जहर हो, सलाह लेना भाई से चाहे बैर हो ।।

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