लक्ष्य एवं सफलता पर विवेकानन्द के प्रेरक अनमोल वचन

  • लक्ष्य को ही अपना जीवन-कार्य समझो। हर समय उसका चिन्तन करो, उसी का स्वप्न देखो और उसी के सहारे जीवित रहो।
  • अपने सामने एक ही साध्य रखना चाहिए। उस साध्य के सिद्ध होने तक दूसरी किसी बात की ओर ध्यान नहीं देना चाहिए। रात-दिन, सपने तक में-उसी की धुन रहे, तभी सफलता मिलती है।
  • भय से ही दुःख आते हैं, भय से ही मृत्यु होती है और भय से ही बुराइयां उत्पन्न होती हैं।
  • इस जीवन संसार में भूलों का गर्द-गुबार उठेगा ही। जो इतने नाजुक हैं कि इस गर्द-गुबार को सहन नहीं कर सकते, वे पंक्ति के बाहर निकलकर खड़े हो जाएं।
  • अशुभ की जड़ इस भ्रम में है कि हम देहमात्र हैं। यदि कोई मूलभूत या आदि पाप है तो वह यही है।
  • मन लाड़ले बच्चे के समान हेै। जेेैसे लाड़ला बच्चा सदैव अतृप्त रहता है, उसी तरह हमारा मन भी अतृप्त रहता है। अतएव मन का लाड़ कम करके उसे दबाकर रखना चाहिए।
  • न तो कष्टों का निमन्त्रण दो और न उसमें भागो। जो आता है, उसे झेलो। किसी चीज से प्रभावित न होना ही मुक्ति है।
  • विचार ही हमारे मुख्य प्रेरणा स्रोत होते हैं। मस्तिष्क को उच्चतम विचारों से भर दो। प्रतिदिन उनका श्रवण करो, प्रति मास उनका चिन्तन करो।
  • विश्व मंे केवल एक आत्मतत्त्व है, सब-कुछ उसी की अभिव्यक्तियां हैं।
  • जिसे स्वयं पर विश्वास नहीं, उसे ईश्वर मंे विश्वास नहीं हो सकता
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विवेकानन्द के प्रेरक अनमोल वचन

  • अन्तःकरण की परिपूर्णता में से ही वाणी मुखरित होती है और अन्तःकरण की परिपूर्णता के पश्चात् ही हाथ भी काम करते है।
  • बिना अनुभव के कोर शाब्दिक ज्ञान अच्छा है।
  • पवित्र और दृढ़ अभिलाषा सर्वशक्तिमान है।
  • यदि तुम्हारा अहंकार चला गया है तो किसी भी धर्म की पुस्तक की एक पंक्ति भी पढ़े बिना व किसी भी देवालय में पैर रखे बिना, तुम जहाँ बैठे हो, वहीं मोक्ष प्राप्त हो जाएगा।
  • अग्नि मंे घी की आहुति देने की अपेक्षा अपने अहंकार की आहुति दो।
  • मनुष्य ही परमात्मा का सर्वोच्च साक्षात् मन्दिर है; इसलिए साकार देवता की पूजा करो।
  • भय ही पतन और पाप का निश्चित कारण है।
  • हमारा उद्देश्य संसार में भलाई करना होना चाहिए, अपने गुणों की प्रशंसा करना नहीं।
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विलक्षण कंप्युटर यानि मानवीय मस्तिष्क पर क्षमता बढाने वाले प्रेरक वचन

  • मनुष्य का मस्तिष्क बंजर खेत की तरह है, जब तक इसमें बाहर से मसाला नहीं जाएगा इसमें कुछ भी पैदा न हो सकता है।
  • यदि तू मस्तिष्क को शान्त रख सकता है, तो तू विश्व पर विजयी होगा।
  • ईश्वर प्रत्येक मस्तिष्क को सच और झूठ में से एक को चुनने का अवसर देता है।
  • मानव मस्तिष्क ठीक एक पैराशूट की तरह है- जब तक वह खुला रहता है तभी तक कार्यशील रहता है।
  • दुर्बल शरीर मस्तिष्क को दुर्बल बना देता है।
  • शून्य मस्तिष्क शैतान की धर्मशाला है।
  • अलादीन के चिराग की कहानी कल्पित हो सकती हैं पर अपना मस्तिष्क सचमुच जादुई चिराग सिद्व होता है।

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ए. पी. जे. अब्दुल कलाम रचित प्रार्थना: अदम्य साहस जगाइए!

अदम्य साहस जगाइए!
मेरे प्रभु, तेरे चरणों में पहुँचे मेरी यह प्रार्थना
दूर कर दो, प्रभु, मेरे ह्नदय की क्षुद्रता,
दो मुझे शक्ति सहज भाव से
अपने आनंद और विषाद सहने की।
दो मुझे शक्ति
जिससे मेरा अनुराग तेरी सेवा में सुफल हो।
प्रभु, ऐसी शक्ति दो मुझे
कि दीनजन से किसी विमुख न होऊँ मैं
ऐसी शक्ति मुझे दो प्रभु,
कि उद्धत-उन्मत्त किसी शक्ति के आगे घुटने न टेकूँ कभी।
प्रभु ऐसी शक्ति दो मुझे
कि दिनानुदिन की क्षुद्रताओं के सम्मुख
सिर सदा मेरा ऊँचा रहे।
मेरे प्रभु, शक्ति दो मुझे
कि सादर-सप्रेम अपनी शक्ति-सामथ्र्य सारी
अर्पित कर पाऊँ मैं तुम्हारे श्रीचरणों में
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