हेलन केलर के प्रेरक अनमोल वचन

हेलेन केलर अन्धी व बहरी होकर बहुत सफल जीवन जीती है एक दर्जन से अधिक पुस्तके लिखी एवं सारी दुनिया में प्रेरक गुरू के रूप में जानी जाती रही । जिसे 3 वर्ष एक शब्द सीखने में लगते हैं। वह 2बार हवाई जहाज उडाती हैं एवं पूरे विश्व में मानवता पर वार्ता के लिए बुलाई जाती हैं।उनके प्रेरक वचन:

  • आत्म विश्वास–    मैं जिसे खोज रही हूँ वह बाहर नहीं, मेरे भीतर है।
  • महत्वाकांक्षा-जिसका आकाश में उड़ने का इरादा हो वह  रेंगने के लिए कभी सहमत नहीं होता है।

    Helen Keller
  • जीवन–  यदि जीवन में सिर्फ खुशियां ही होती तो हम बहादुरी और धैर्य को जीवन में कभी नहीं सीख पाते।
  • –  मैं जीवन की अमरता में विश्वास करती हूँ क्योंकि मेरी इच्छायें कभी समाप्त नहीं होती।
  • विश्वास -यकीन करें, कभी कोई भी निराशावादी तारों को नहीं खोज पाता, न ही कोई अनखोजी   जगहों पर जा पाता और न ही कोई मानव नया स्वर्ग खोज पाता।
  • – ज्ञान , प्रेम, प्रकाश एवं लक्ष्य/सपना है।
  • प्रेम–  जीवन में सबसे सुन्दर व सर्वोंत्तम चीजें जो है वो दिखती नहीं है, न ही उन्हें छुआ जा सकता है। उसे सिर्फ ह्नदय में महसूस करना पड़ता है।
  • –  यह आश्चर्य है कि लोग बहुत सारा अच्छा समय दुर्जनों से लड़ने में बीता देते है। यदि ये लोग इसी समय और ऊर्जा को अपनो से प्रेम करने में लगाए तो दुर्जनों का अन्त स्वतः हो जायेगा।
  • प्रसन्न्ता–   जब आप प्रसन्न नहीं हो तो भी जीवन में करने के लिए बहुत कुछ है। जब तक आप दूसरों का दर्द कम कर सकते हो तब तक जीवन बेकार नहीं है।
  • -यद्यपि संसार दुःखों से भरा हुआ है लेकिन उसको जीतने के उपाय भी बहुत है।
  •    जीवन में सबसे दुर्भाग्यशाली वह है जिसके पास आँखें तो है लेकिन दृष्टिकोण  (वीजन) नहीं  है।
  • ऐकता – अकेले हम थोड़ा कर सकते है लेकिन मिल कर बहुत कुछ कर सकते है।

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14 वर्षीय लड़की जाँन आॅफ आर्क ने अवचेतन मन को विकसित कर फौज का नेतृत्व किया

मैंरे आदर्श एवं प्रेरणा स्रोत :डाॅ. स्टीफन हाॅकिंगमेरी आदर्श प्रेरणापुंज

तेजस्वी धावक विल्मा रुडोल्फअन्र्तप्रेरणा सुने और जीना सीखें

सफलता का पथ दिखाने वाली महत्वपूर्ण पुस्तकें


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14 वर्षीय लड़की जाँन आॅफ आर्क ने अवचेतन मन को विकसित कर फौज का नेतृत्व किया

हमारी भूतपूर्व प्रधानमंत्री इदिंरा गाँधी की रोल माॅडल जाँन आॅफ आर्क थी। वह अपने कठिन समय में इसी से प्रेरणा प्राप्त करती थी।
फ्रँास का ब्रिटेन से एक सौ वर्षाें से युद्ध चल रहा था। दोनों देशों का जन-जीवन तबाह हो चुका था। ऐसे में एक साधारण किसान की अनपढ़ लड़की ने युद्ध की निरर्थकता एवं निरन्तर होती हानि को समझा। अवचेतन मन की शक्ति को विकसित कर उसने इस युद्ध का नेतृत्व किया। अपनी अवचेतन मस्तिष्क को जगाने वह प्रतिदिन ईश्वर से युद्ध की समाप्ति के लिए प्रार्थना करती थी। ईश्वर में उसका दृढ़ विश्वास था। उसने प्रार्थना के द्वारा परम शक्ति के साथ भावनात्मक संबंध विकसित किया । इससे उसका आत्मविश्वास विकसित हुआ। इस तरह उसने अवचेतन मस्तिष्क की शक्ति का प्रयोग अपने देश के पक्ष में किया।
एक दिन उसने  अन्तरात्मा की आवाज़ सुनी, ”तुम्हारा जन्म इस युद्ध की समाप्ति के लिये हुआ है।“  उसने अपनी अन्तरात्मा की आवाज पर विश्वास किया और सम्राट जाॅन डफन से मिली। इस पर उसका किसी ने विश्वास नहीं किया। तब उसने अपनी क्षमता की परीक्षा चर्च एवं सम्राट के दरबारियों के सामने उत्तीर्ण की। सबको विश्वास हो गया कि यह कोई साधारण लड़की नहीं है अपितु वह एक वरदान प्राप्त नायिका हैं। उसका जन्म लड़ाई की समाप्ति के लिये हुआ है।
उस चैदह वर्षीय गांव की अनपढ़ लड़की, जाॅन आॅफ आर्क  ;श्रवंद व ि।तबद्ध ने फ्रांसीसी सेना का नेतृत्व किया। उसने युद्ध लड़ा और 31 मई 1431 को जीवित जला दी गई। उसके बलिदान ने युद्ध को समाप्त कर दिया।

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मेरी आदर्श प्रेरणापुंज तेजस्वी धावक विल्मा रुडोल्फ

खेल के मैदान में अपनी श्रेष्ठता हासिल करने के लिए व्यक्ति को अमूमन तन, मन व आत्मा तीनों से श्रेष्ठ होना होता है। शक्ति के लिए शारीरिक तंदुरस्ती चाहिए, निश्चित परिस्थिति में समय पर अपना प्रदर्शन करनेे हेतु मानसिक सन्तुलन चाहिए व मूल्यों के अनुरूप जीने हेतु आत्म-बल चाहिए। इन तीनों ही प्रकार की क्षमताओं का का श्रेष्ठतम संगम खिलाडी में होता है। इसलिय  मेरा एक आदर्श खेल जगत से है। श्रेष्ठ खिलाड़ी वही बन सकता है, जो इन तीनों में दक्षता के साथ सन्तुलन बना सके।

Wilma rudolph
Wilma rudolph

अमेरिका के टेनेसी प्रान्त में एक रेलवे कूली के घर में 1940 में विल्मा ने जन्म लिया, जिसकी मां घर-घर जाकर झाड़ू-पोछे लगाती थी। वह नौ वर्ष तक जमीन पर कभी पांव रख कर नहीं चल सकी। चूंकि उसको चार वर्ष की उम्र में लकवा हो गया था। तब तक वह केलिपर्स के सहारे चलती थी। डाॅक्टरों ने कहा कि वह कभी भी जमीन  पर अपने कदम सीधे नहीं रख पायेगी।

उसकी मां बड़ी धर्मपरायण, सकारात्मक मनोवृत्ति वाली साहसी महिला थी। मां की आदर्शवादी बातें सुन कर विल्मा ने कहा, ‘‘मां, मैं क्या कर सकती हूं जबकि मैं चल ही नहीं पाती हूं ?’’
‘‘मेरी बेटी, तुम चाहो जो प्राप्त कर सकती हो।’’ मां का उत्तर था।
‘‘क्या मैं दुनिया की सबसे तेज धावक बन सकती हूं ?’’
‘‘क्यों नहीं मेरी बेटी’’, ‘‘कैसे ? जबकि डाॅक्टरों के अनुसार मेरे लिए चल पाना संभव नहीं है।’’
‘‘ईश्वर में विश्वास, स्वयं पर भरोसा, मेहनत और लगन से तुम जो चाहो वह प्राप्त कर सकती हो।’’
इस पर मां की प्रेरणा व हिम्मत से 9 वर्ष की विल्मा ने केलिपर्स उतार फेंके व चलना प्रारम्भ किया। अचानक केलिपर्स उतार देने के बाद चलने के प्रयास में कई बार जख्मी होती रही, दर्द झेलती रही; लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी और कोई सहारा नहीं लिया। अन्ततोगत्वा साल-सवा साल के बाद वह बिना केलिपर्स के चलने में कामयाब हो गई। इस प्रकार 13 वर्ष की उम्र में उसने अपनी पहली दौड़ प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और वह सबसे पीछे रही। उसके बाद दूसरी, तीसरी, चैथी दौड़ प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेती रही और हमेशा आखिरी स्थान पर आती रही। लेकिन वह पीछे नहीं हटी। निरन्तर दौड़ प्रतियोगिताओं में भाग लेती रही, और अन्ततोगत्वा उसने एक दिन प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया।
15 वर्ष की उम्र में विल्मा टेनेसी स्टेट युनिवर्सिटी गयी, जहां वह एड टेम्पल नाम के एक कोच से मिली। विल्मा ने अपनी यह ख्वाहिश बताई कि मैं दुनिया की सबसे तेज धाविका बनना चाहती हूं। तब टेम्पल ने कहा, ‘‘तुम्हारी इसी इच्छाशक्ति की वजह से कोई भी तुम्हे नहीं रोक सकता, और साथ में मैं भी तुम्हारी मदद करूंगा। दौड़ की तकनीकी बारीकियां मैं तुम्हें सिखाऊंगा।’’
आखिर वह दिन आया जब विल्मा ओलम्पिक में हिस्सा ले रही थी। ओलम्पिक में दुनिया के सबसे तेज दौड़ने वालों से मुकाबला करना पड़ता है। विल्मा का मुकाबला जुत्ता हेन से था, जिसे कोई भी हरा नहीं पाया था। पहली दौड़ 100 मीटर की थी। इसमें विल्मा ने जुत्ता को हरा कर अपना पहला गोल्ड मेडल जीता। दूसरी दौड़ 200 मीटर की थी। इसमें भी विल्मा ने जुत्ता को दूसरी बार हराया और उसने दूसरा गोल्ड मेडल जीता। तीसरी दौड़ 400 मीटर की रिले रेस थी और विल्मा का मुकाबला एक बार फिर जुत्ता से ही था। रिले में रेस का आखिरी हिस्सा टीम का सबसे तेज एथलीट ही दौड़ता है। विल्मा की टीम के तीन लोग रिले रेस के शुरूआती तीन हिस्से में दौड़े और आसानी से बेटन बदली। जब विल्मा के दौड़ने की बारी आई, उससे बेटन छूट गयी। लेकिन विल्मा ने देख लिया कि दुसरे छोर पर जुत्ता हेन तेजी से दौड़ी चली आ रही है। विल्मा ने गिरी हुई बेटन उठायी और मशीन की तरह तेजी से दौड़ी तथा जुत्ता को तीसरी बार भी हराया और अपना तीसरा गोल्ड मेडल जीता। यह बात इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गयी कि एक लकवाग्रस्त महिला 1960 केे रोम ओलम्पिक में दुनिया की सबसे तेज धावक बन गयी।

wilma rudolph
Wilma Rudolph

विल्मा से हमें क्या सीखना चाहिये ? इससे हमें शिक्षा मिलती है कि कामयाब लोग कठिनाइयों के बावजूद सफलता हासिल करते हैं, न कि तब जब कठिनाईयां नहीं होती। विल्मा शारीरिक रूप से अक्षम थी फिर भी धावक बनी। हमारी समस्या तो मात्र मनोवैज्ञानिक अक्षमता की है जिसे हम आसानी से दूर कर सकते हैं।
क्या आपने पोलियोग्रस्त अवस्था में विल्मा का उपरोक्त फोटो देखा है ? नहीं, तो देखो और पूछो कि एक लकवाग्रस्त महिला यदि आला धावक बन सकती है तो आप क्या कुछ नही प्राप्त कर सकते ? इन मनोवैज्ञानिक बाधाओं को आप आत्मविश्वास की सहायता से सरलता से पार कर सकते हैं।
110 करोड़ के देश में आज तक एथलेटिक्स में हम एक भी मेडल ओलम्पिक में नहीं जीत सके हैं। क्यों ? इस प्रकार आप भी अपना आदर्श चुन सकते हैं जो विवेकानन्द, सुभाषचन्द्र बोस, रतन टाटा अथवा ए पी जे अब्दुल कलाम या कोई अन्य भी हो सकते है।