सॉवरक्रॉट कैंसर रोकने व ठीक करने में सहायक

सॉवरक्रॉट क्या है?

बंदगोभी/पत्ता गोभी के फर्मेंटेशन द्वारा तैयार होता है। डॉ बुडविज ने अपने कैंसर विरोधी प्रोटोकॉल में बताया हैl फर्मेंटेशन एक जीवरसायन प्रक्रिया है जिसमें सॉवरक्रॉट छाछ की तरह एक तरह का जर्मन   लोकप्रिय प्रोबायोटिक हैl  यह जीवाणुओं द्वारा कार्बोहाइड्रेट का फर्मन्टेसन से बनता है, जो लेक्टोबेसीलाई (LABs) द्वारा सम्पन्न होती है। सॉवरक्रॉट में लेक्टिक एसिड बनाने वाले जीवाणु बंदगोभी को जल्दी जल्दी फर्मेंट करना शुरू कर देते हैं। ये लेक्टोबेसीलाई (LABs) पीएच कम करते हैं, माध्यम को अम्लीय बनाते हैं और यह अम्लीय माध्यम अनावश्यक हानिकारक जीवाणुओं के लिए उपयुक्त नहीं होता है। सॉवरक्रॉट बनाते समय हमारा मुख्य उद्देश्य लेक्टोबेसीलाई के विकास हेतु उपयुक्त वातावरण बनाये रखना होता है।

फिनलैंड की अनुसंधानकर्ता इवा लिज़ा रेहानेन और साथियों ने सॉवरक्रॉट में कैंसर-रोधी तत्वों का पता लगाया है। इवा के अनुसार बन्दगोभी को खमीर करने पर कुछ एंजाइम्स बनते हैं जो उनके ग्लुकोसाइनालेट को विघटित कर कैंसर-रोधी आइसोथायोसायनेट बनाते हैं।

कैंसर-रोधी होने के साथ साथ सॉवरक्रॉट पाचनक्रिया में बहुत सहायक हैं। इसे खमीर करने की प्रक्रिया में लेक्टोबेसीलस जीवाणु पैदा होते हैं जो पाचन में सहायता करते हैं, विटामिन्स की मात्रा बढ़ाते हैं, विभिन्न लाभदायक एंजाइम बनाते हैं और पाचन-पथ में मित्र जीवाणुओं की सेना में वृद्धि करते हैं। हर स्वास्थ्य समस्या या रोग में पाचन का बहुत सहायक है। प्रातकाल खाली पेट इसे लेते हैl

 

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दिवाली की शुभकामनाएं

हम  चाहे लाख दिये और
मोमबत्तीया जलाऐ इनसे
हमारे  जीवन में रोशनी
होने वाली नही।

असली दिवाली तो उस दिन
ही समझना जिस दिन हमारे
भीतर का दिया जले।

उससे पहले तो सब अंधकार
ही है ।

और राम के घर लौटने
से हमारा  क्या लेना देना,
बात तो उस दिन बनेगी
जब हम अपने
भीतर लौटोगे

तभी  होगी असली दिवाली l

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जीवन ऊर्जा बढ़ाने प्राण मुद्रा लगाएँ

प्राण मुद्रा को प्राणशक्ति का केंद्र माना जाता है और इसको करने से प्राणशक्ति बढ़ती है । इस मुद्रा में छोटी अँगुली (कनिष्ठा) और अनामिका (सूर्य अँगुली) दोनों को अँगूठे से स्पर्श कराना होता है । और बाकी छूट गई अँगुलियों को सीधा रखने से अंग्रेजी का ‘वी’बन जाता हैl

प्राण मुद्रा के लाभ

  • प्राण मुद्रा से आँखों की रौशनी बढती है साथ ही साथआँखों से जुड़ी कई परेशानियां भी दूर होती है।
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने से कई परेशानिया जैसे की बार बार -बार सर्दी-जुकाम होना, बुखार आना होती है| इसके अभ्यास से आपका प्रतिरोधक तंत्र मजबूत बनता है|
  • जिन महिलाओ को मासिक धर्म के दौरान बहुत दर्द होता है उन्हें इसे करने से फायदा मिलता है|
  • जिन लोगो की सहनशीलता कम होती है और लगातार थकान बनी रहती है, उन्हें इस मुद्रा को करने से ताकत मिलती है|
  • यह त्वचा के रोगों को भी ठीक करता है| इससे लाल त्वचा, त्वचा पर चकत्ते, पित्ती आदि रोग ठीक होते है|
  • उच्च रक्तचाप के मरीजो के लिए भी यह आसन लाभदायक है|
  • यदि आपको छोटी छोटी बात पर क्रोध आता है और चिड़चिड़ापन महसूस होता है तो इसे करने से इन सभी चीजों में कमी आती है|
  • अन्य समस्याए जिसमे प्राण मुद्रा को करने से फायदा मिलता है:-

थॉयरायड का बढ़ना

जोड़ों में अस्थिरता

भूलने की आदत

नींद न आना (अनिद्रा)

पेट में जलन

कब्ज और एसिडिटी

मूत्र मार्ग में जलन होना

दुर्गंधयुक्त पसीना

पीलिया

समय से पहले बुढ़ापा आना

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क्या बच्चे को स्कूल भेजना चाहिए :शिक्षान्तर आंदोलन का परिचय

I Q बढ़ाने की पतंजलि की विधि

नाम को सार्थक करती डाक्टर बिस्वरूप रॉय चौधरी की पुस्तक “हॉस्पिटल से जिंदा कैसे लोंटे?”

जो व्यक्ति दवाईया  लेता है,उसे दो बार ठीक होना पड़ता है,एक बीमारी के असर से और दूसरा दवाई के असर से l

–  विलीयम ओस्लर

 

यह मेडीकल भ्रष्टाचार पर भारत की पहली पुस्तक हैl इसमें बताया गया है कि दवाइयों  के बिना भी कैसे ठीक हो सकते है?

डाक्टर बिस्वरूप रॉय चौधरी की पुस्तक “हॉस्पिटल से जिंदा कैसे लोंटे?”

आज हमारी बीमारी  बड़ी समस्या है लेकिन वही डॉक्टर व दवा कंपनियों के लिए एक व्यापार का अवसर हैl उनके लिए यह वरदान है,समस्या तो हमारी हैl वे इसे  सही भुनाते हैl हम अपनी जीवन शैली बिगाड़ कर यह मोका उनको परोसते हैl हम अपने स्वास्थ्य की जिम्मेदारी नहीं लेकर उनकी शरण में जाते है इसमें उनकी कोई गलती नहीं हैl  जल्दबाजी  करते हुए ,अव्यवस्थित हम जीते है,रसायन युक्त पक्व आहार लेकर पेट खराब करते हैl

कोशिकाओं के अंदर की दोषयुक्त रासायनिक प्रतिक्रियाओं  को दवाओ से ठीक करने की कोशिश ठीक वैसी ही होगी जैसे कि आपके घर में मच्छर हो और आप उसे मारने के लिये मिसाइल या रोकेट लांचर का इस्तेमाल करें l

क्या होस्पिटल के डॉक्टरो व कर्मचारियों  से भूले नहीं होती है?

क्या अस्पताल रोगमुक्ति के केंद्र है या यमराज के घर है?

इस तरह के अनेक प्रश्नों के उत्तर इस पुस्तक में दिए हुएं हैl  वास्तव में इसमें स्वास्थ्य उधोग का  वह सच  बताया हुआ है जो आपकी ज़िन्दगी बदल  देगा l

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स्वस्थ रहने हेतु विटामिन डी अति आवश्यक है

नकारात्मक भावनाएं निकाले एवं स्वस

बीमारी पहले मन में, मस्तिष्क में, फिर तन में

हमारा स्वास्थ्य पच्चीस प्रतिशत इस बात पर निर्भर करता है कि हम क्या करते हैं किन्तु हम क्या सोचते हैंे इस पर पचहत्तर प्रतिशत निर्भर करता है। मन यदि रुग्ण है तो व्यवहार और विचार भी रुग्ण ही होगें।
सामान्यतः रोग पहले हमारी भावनाओं में आते हंै, उसके बाद विचारो में आते है, फिर स्थूल देह में उनका प्रकटीकरण होता है। जैसा कि किरलियन फोटोग्राफी आज इसे प्रमाणित करती है। हमारे भाव-शरीर यानि आभामडण्ल में रोग के लक्षण छः माह पूर्व दिखने लगते हैं। जब किरलियन फोटोग्राफी हमारे भाव-शरीर का चित्र खींचती है तो भौतिक शरीर में होने वाली गांठ के छः माह पूर्व ही भाव-शरीर के चित्र में गांठ के स्थान पर काला धब्बा देखा जा सकता है। illness into health
मानव देह की सबसे छोटी इकाई कोशिका है। प्रत्येक कोशिका पदार्थ से बनी होती है। पदार्थ का वह सबसे छोटा कण है जिसका कोई आकार व भार होता है, उसे परमाणु कहते है। परमाणु को पुनः तोडने पर तरंग एवं कण बनते हैं जो कभी तरंग होता हंै व कभी कण-जिसे क्वान्टम कहते हैं। क्वान्टम वे ऊर्जा कण हैं जो अदृश्य हंै। प्रत्येक दृष्य पदार्थ के पीछे अदृश्य क्वान्टम का सहयोग होता है।

सूक्ष्म शरीर की विचार तरंगे व संवेदनाएॅ बाधित होती हैं तो शरीर के तल पर अनेक रोग उभर आते हंै।
मानव-मस्तिष्क एक सुपर कम्प्यूटर की तरह है जिसमंे बहुत सी धारणाओं के साफ्टवेअर लगे होते हैं। इम्प्रेशन्स के लेन देन से साफ्टवेअर अपडेट होते रहते हैं। इस की-बोर्ड का बटन दबाने पर मोनीटर पर वैसा ही परिणाम आता है, जैसा सीपीयू में उपलब्ध साफ्टवेअर प्रोसेस करता है। लक्ष्य प्राप्ति हेतु ’की-बोर्ड’ के बटन दबाने से परिणाम तो सी.पी.यू. में उपलब्ध प्रोग्राम होने पर ही आता है। अर्थात मानव देह ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति है। जिन तत्वो और शक्तियों से ब्रहाण्ड बना है, उन्ही से हमारा शरीर, मस्तिष्क एवं आत्मा बनती है। ‘यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे।’ सूक्ष्म और विराट दोनों एक है। मानव देह और ब्रह्माण्डीय देह एक ही है। यही सनातन घर्म का सार है।
जीवन-शैली बदल कर हम अपने रोग से लड सकते हैं। हम ही जाने-अनजाने अपने को बीमार करते हैं। रोग धीरे-धीरे पहले हमारे जेहन में आता है फिर शरीर में प्रकट होता है।