प्रतिरोध क्षमता बढ़ाने व स्वस्थ रहने हेतु विटामिन डी अति आवश्यक है

विटामिन डी प्रतिरोध शक्ति बढ़ाता हैl अथार्त बीमारीयों से निपटने व स्वस्थ रहने के लिए यह आवश्यक हैl विटामिन-डी शरीर के विकास, हड्डियों के विकास और स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी है। धूप के संपर्क में आने पर त्वचा इसका निर्माण करने लगती है। हालांकि यह विटामिन खाने की कुछ चीज़ों से भी प्राप्त होता है,लेकिन इनमें यह बहुत ही कम मात्रा में होता है।  विटामिन डी वसा-घुलनशील विटामिन होता है जो शरीर को कैल्सियम सोखने में मदद करता है।

वयस्कों में विटामिन-डी की कमी के लक्षण

– दर्द या तेज दर्द

– कमजोरी एवं थकान

-ओस्टियोपोरोशिस-  घुटनों , पसलियों और पैरों आदि की हड्डियों में दर्द,

– कार्डियोवेस्क्युलर रोग

– याददाश्त कमजोर होना

विटामिनडी मधुमेउच्च रक्तचाप, ग्लुकोल इनटॉलरेंस और मल्टिपल स्क्लेरोसिस आदि बीमारियों से बचाव और इलाज में महत्वपूर्ण हो सकता है। मोटापा : रक्त में मौजूद विटामिन-डी को फैट की कोशिकाएं अवशोषित कर लेती हैं, जिससे शरीर को इसका फायदा नहीं मिल पाता है।
इसके मुख्य स्रोतों में अंडे का पीला भाग, मछली के तेल, विटामिन डी युक्त दूध और मक्खन होते हैं। इनके अलावा मुख्य स्रोत धूप सेंकना होता है।आज के समय में तो विटामिन डी की गोली लेना ही उपयुक्त हैl

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चीनी तम्बाकु से तीन गुना अधिक हानिकारक

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चीनी तम्बाकु से तीन गुना अधिक हानिकारक

शक्कर एक तरह का जहर है जो कि मूख्यतः मोटापे, हृदयरोग व कैंसर का कारण है । भारतीय मनीषा ने भी इसे सफेद जहर बताया है ।tobacco डाॅ0 मेराकोला ने इसके विरूद्ध बहुत कुछ लिखा है । डाॅ0 बिल मिसनर ने इसे प्राणघातक शक्कर-चम्मच से आत्महत्या बताया है । डाॅ0 लस्टींग ने अपनी वेब साईट डाॅक्टर में इसे विष कहा है । रे कुर्जवले इस सदी के एडिसन जो कि 10 वर्ष अतिरिक्त जीने अपने वार्षिक भोजन पर 70 लाख रूपया खर्च करते हैं ने अपने आहार में अतिरिक्त चीनी लेना बन्द कर दी है ।

 
अधिक शक्कर से वजन व फेट दोनों बढ़ते हैं । डाॅ0 एरान कैरोल तो स्वीटनर से भी चीनी को ज्यादा नुकसानदेह बताते हैं । चीनी खाने पर उसकी आदत नशीले पदार्थ की तरह बनती है । प्राकृतिक शर्करा जो फल व अनाज में तो उचित है । sugar is poision
हम जो चीनी बाहर से भोजन बनाने में प्रयोग करते हैं वह विष का कार्य करती है । यह शरीर के लिए घातक है । डिब्बाबन्द व प्रोसेस्ड फूड में चीनी ज्यादा होती है उससे बचे । अर्थात् पेय पदार्थ व मिठाईयांे के सेवन में संयम बरतना ही बेहतर है।

 

 

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मेरी  पुस्तक “जियो तो ऐसे जियो” का एक परिचय

मेरी  पुस्तक ‘तनाव छोड़ो ,सफलता पाओ’ के बारे में

समस्या अन्दर है, बाहर नहीं, सुलझाए भी अंदर से

हम सब अपनी आदतों, सोच व मूल्यों के कारण परेशान है। बिना परिक्षण अपनी आदतों, सोच व मूल्यों का सही मानते हैं । इसलिए दूसरों की गलतियां प्रतीत होती है । Egg-break by Inside forceLet-life-starts-from-within-you-inspirational-words-life-quotesजबकि पर की तरह वे भी अपनी आदतांे, सोच व मूल्यों की गुलाम है । इसके बाहर देख नहीं पाते हैं । इन्हे ही हम सही मानते हैं व इनके साथ एकमेक होकर इन्हे ही ’स्व’ मान लेते हैं । इन्ही केे आधार पर हम प्रतिक्रिया करते हैं । इन्ही के अनुसार जीते हैं । अर्थात दुःख, झंझट व निराशा के कारण बाहर नहीं हमारे भीतर है । पूर्व जन्म के कर्म, पाप व पर इसके लिए दोषी नहीं है । इसका निदान अपनी बुरी आदतों, प्रतिबद्ध सोच व मूल्यों को बदल कर ही संभव है । बंधन अन्दर है तो मुक्ति सही माने भी वहीं से प्राप्त करनी पड़ेगी ।
दूसरों की कही छोटी बातें, वैसे ही कही बातें अपने पूर्वाग्रहों के कारण बुरी लगती है व फिर इन्ही पर सोच-सोच कर दुःखी होते हैं ।

कैसे पढ़े प्राचीन जैन शास्त्र ?

आज अधिकांश साधु भी परम्परावादी, स्थितिपालक और साम्प्रदायिक दृष्टि रखने वाले हेैं। स्वतन्त्र चिन्तन के अभाव में वे नवीन तथ्य ग्रहण नहीं कर सकते। अपरिग्रह के अग्रदूत कहला कर जो गाड़ी-समेत संघ चलाते हों, जो तन्त्र-मन्त्र करते हों, वे ‘गोम्मटसार’ को नहीं समझ सकते। जहाँ साधु का अधिकांश वक्त अपने अनुयायियों से घिरे रहने में व्यतीत होता हो, जो चेले ढँढ़ने में /नयी कर्मकाण्डी व्यवस्थाओं में ही दिन-रात रहते हों, वे ‘समयसार’ की मर्म-महिमा को कैसे जान सकते हैं? परिशोधित कषायों में डूबे साधु ‘कषायपाहुड’ के रहस्य को भला कैसे पकड़ पायेंगे?jain mantra

भौतिकवादी युग में स्वस्थ ज्ञानवर्द्धन का एकमात्र श्रेष्ठ साधन स्वाध्याय है। शेष सभी रुढि़यों की भेंट चढ़ कर अपना महत्व खो चुके हेैं। ऐसे में शास्त्र के मर्म को समझना बहुत जरुरी है। अनेक कारणों से मूल शास्त्रकारों के प्रयोजन एवं मन्तव्य को आज पकड़ना कठिन हो गया है। इनमें मुख्य हैं आज के श्रावक का मानसिक स्तर, जीवन-मूल्यों एवं उसके आधारों में परिवर्तन।इतिहास एवं परिस्थितियों की भिन्नता भी एक सबल कारण है। भाषायी भिन्नता ने इस खाई को और चैड़ा कर दिया है। इधर मध्यकालीन टीकाकारों ने तत्कालीन आवश्यकता का ध्यान रख कर धर्म की सुरक्षा एवं प्रचार के लोभ में शास्त्रों में मनमाने परिवर्तन किये। इसके साथ ही आज का यश-लोभी आगम-संपादक उसे और कठिन बनाता जा रहा है; अतः आज शास्त्र को पचाना काफी मुश्किल हो गया है।

स्वाध्याय एक कला है। शास्त्रगत सत्य एवं परिणामों के आधार पर जैन शास्त्र मूलतः अनुयोग-पद्धति के आधार पर लिखे गये हैं। संसार के अन्य किसी भी धर्म के पास यह सुविधा नहीं हैं। जिनमत में मोटे रुप से शास्त्रों को चार अनुयोगों में बाँटा गया है। प्राथमिक भूमिका वाले अध्येता के लिए प्रथमानुयोग है। कर्मफल और लोकालोक(यूनिवर्स) की संरचना के जिज्ञासु के लिए करणानुयोग है। व्यवहारी श्रद्धालुओं के लिए चरणानुयोग है, जिसमें आचरण-संहिता निबद्ध है। तार्किक एवं अनुभवी के लिए द्रव्यानुयोग है।

धर्म में जिनकी रुचि और तत्परता नहीं है ऐसे लोगों को आकर्षित करने के लिए प्रथमानुयोग है। यह कथानुयोग है, जिसमें अतिशयोकितपूर्ण भाषा एवं आलंकारिक शैली में पुराण आदि लिखे गये हैं। यही कारण है कि अनेक स्थलों पर प्रथमानुयोग कपोल-कल्पित प्रतीत होता है। अरे भाई, तीव्र कषाय-ग्रस्त जीवों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने, उन्हें धर्म से परिचित कराने आदि के लिए चमत्कारिक कथन किये जाते हैं। अद्भुत रस से पाठक तत्काल प्रभावित होते हैं। पाप-पुण्य से जुड़ी कथाएँ धर्म-भीरुओं को नैतिकता सिखाती है; अतः ऐसी कथाओं में तथ्यों की सत्यता नहीं, बल्कि उनका प्रयोजन उपादेय होता है। प्रयोजन सत्य है, इसलिए घटनाओं की छानबीन व्यावहारिक नहीं है। शलाका पुरुषों के जीवन’वृत्तों में इतिहास न ढँढ़ कर, हमें उनके लक्ष्य पर ध्यान देना चाहिये। कवि एवं कथाकार को इतिहास की कुर्सी पर बैठा कर उनमें दोष ढँढ़ना बुद्धिमता नहीं है; इसलिए कथानुयोग का अध्ययन साहित्यिक विवेक के साथ करना चाहिये अन्यथा हमारी पुराण-सम्पदा भी आपको गप्पाष्टक लगेगी।

करणानुयोग का संबध कर्म-सिद्धान्त एवं भूगोल से है। वैसे यह तकनीकी अनुयोग अति जिज्ञासुओं के लिए है। यह पूर्णतः केवलज्ञान पर आधारित है; इसलिए छद्मस्यों (सांसारिक) के अनुभव इसे समझने में बाधा डालते हैं। इसमें तर्क-वितर्क से कोई निर्णय नहीं लिया जा सकता है। गुणस्थान, मार्गणा-स्थान आदि के अध्ययन परिणामों को स्थिर करते हैं। इनके अभ्यास से मोह-क्षय होता है। मोटे रुप में कहें तो यह बुद्धिजीवियों-का-अनुयोग है। द्रव्यानुयोग में प्रत्येक तथ्य के पीछे कोई-न-कोई कारण है; अतः इसकी गहरी खोज-बीन आज बहुत आवश्यक है।

चरित्र की पवित्रता बनाये रखने के लिए बाह्य साधनों का निरुपण चरणानुयोग में किया जाता है। इसमें श्रावक एवं साधुओं की आचरण-संहिता का विस्तृत विवेचन हुआ है। व्रतों का स्वरुप एवं वर्णन, भक्ष्य-अभक्ष्य खाद्याओं की सूची, अतिचारों के वर्णन, एवं संयम को प्राप्त करने की प्रविधि इस अनुयोग की मुख्य विषय-वस्तु है। स्वेच्छारिता को नियन्त्रित करने के लिए निरुपित अनेक बातें आज के वैज्ञानिक संदर्भो में ठीक न भी बैठती हों तो भी इन्हें ग्रहण करना चाहिये। भला जैन आचरण-संहिता संसार-वर्धक कैसे हो सकती है? स्वास्थ्य-विज्ञान के विरुद्ध हुए एकाध कथन के कारण संपूर्ण शास्त्र को झूठा नहीं माना जाना चाहिए। कषायें छुड़ाना बहुत कठिन हैं; अतः अनेक तरह की बातें यहाँ मात्र शरीर-मोह को कम करने के लिए लिखी होती हैं; जिन्हें सही संदर्भ में लेना चाहिये।

द्रव्यानुयोग सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। इसे ‘न्याय-शास्त्र-का अनुयोग’ कहना अनुचित नहीं होगा। इसमें द्रव्य, गुण, पर्याय अर्थात् ‘वस्तु-स्वभाव’ का निरुपण हुआ है। संपूर्ण जगत् के स्वभाव का इसमें लेखा-जोखा हैं। न्याय की कसौटी पर सप्त तत्त्वों एवं आत्मा-का-निर्णय यहीं प्रमाणित हुआ है। प्रमाण, नय एवं भेद-विज्ञान द्वारा इस अनुयोग में ‘वस्तु-स्वरुप’ का तर्कसंगत निरुपण किया गया है।

वैसे शास्त्रों में अनुयोगों का मिला-जुला रुप ही उपलब्ध हैं; अतः पाठक को प्रासंगिकता का ध्यान रख कर ही अनुयोग-स्वाध्याय करना चाहिये। किसी भी एक अनुयोग का अध्ययन करने से एकाकी दृष्टिकोण बनता है; अतः अनुयोगों का तुलनात्मक स्वाध्याय करना ही उचित है।

स्वाध्यायर्थी को अनुयोग-पद्धति के अतिरिक्त भी अनेक अन्य बातों का ध्यान रखना चाहिये। सबसे पहले तो यह कि किसी भी शास्त्र के कथन को निरपेक्ष न समझें। कोई भी वाक्य शब्दों-की-सीमा में निषद्ध होता है; अतः वह एक समय में एक ही अर्थ प्रकट कर सकता है; अर्थात् वाक्य सदैव सापेक्ष होते हैं, इसलिये अपेक्षा को दिन की रोशनी की तरह ज्ञात करके पढ़ना चाहिये। ऐकान्तिक दृष्टि की अपेक्षा अनेकान्त और स्याद्वाद के प्रकाश में शासत्रों को पढ़ना चाहिये।इसी तरह शास्त्र के प्रणेता के जीवन-वृत्त एवं उसके काल को जानना भी शास्त्र-की-गहराइयों तक पहुँचने के लिए आवश्यक है; अर्थात् शास्त्र का अर्थ क्षेत्र, काल, भाव, और प्रसंग के अनुसार ही समझना चाहिये। इसके अतिरिक्त प्रत्येक शब्द को समझने से पूर्व उसका भावार्थ मतार्थ, आगमार्थ, शब्दार्थ और नयार्थ भी खोजना-जानना चाहिये।

समन्वयवादी दृष्टि विकास समग्र ज्ञान के परिवेश में ही होता है। मनोविज्ञान, दर्शनशास्त्र, व्याकरण, और साहित्य का अभ्यास शास्त्र-की-गहराई में उतरने के लिए आवश्यक है। प्रत्येक वाक्य का अर्थ निचोड़ते वक्त शब्द-शक्तियाँ (लक्षण, अभिदा, व्यन्जना) पर ध्यान देना भी आवश्यक है। साहित्य की सभी विधाओं का ज्ञानी और प्रत्येक विधा की विशेषताओं एवं कमियों का जानकार ही शास्त्र के मर्म को जान सकता है।

सब जानते हैं कि शास्त्र पूर्ण वितरागी द्वारा नहीं लिखे गये हैं। श्रतु केवली एवं अन्य सभी रचनाकारों को श्रतु का राग रहता है, तभी वे उसे लिपिबद्ध कर पाते हैं। इसके अलावा आज श्रतु-संपदा शुद्ध एवं पूर्ण रुप से उपलब्ध भी नहीं है। इसमें प्रयोजनानुसार बहुत सारे अनावश्यक वक्तव्य भी संक्षिप्त हुए हैं, जो जैन सिद्धान्त-के-अनुरुप नहीं हैं। जिस तरह हम पानी को छान कर और गैहूँ आदि को बीन कर काम में लेते हैं, वैसे ही शास्त्र को भी विवेक के छन्ने में छानना और तर्क की रोशनी में बीनना चाहिये। फल में गुटली, छिलके आदि बेकार होते हैं; किन्तु उनका फल की सुरक्षा एवं संरचना के लिए होना आवश्यक है। इसी प्रकार शास्त्र में भी कई-कई बातें होती है; जो अस्तित्व के लिए जरुरी भले ही हों, किन्तु अर्थ-बोध से जिनका संबन्ध अक्सर नहीं होता है; अतः शास्त्र को एक तटस्थ समीक्षक की दृष्टि से पढ़ना चाहिये।

आचार्य समन्तभद्र ने शास्त्र की परीक्षा को अनिवार्य मानते हुए छह मानदण्ड निर्धारित किये हैं। उनके अनुसार वही आप्त वाक्य है, जो तर्क द्वारा अकाट्य हो; जो प्रत्यक्ष और अनुमान के विरुद्ध हो। इसी तरह पूर्वापर विरुद्ध होने पर भी कोई कथन जिनवाणी के ढाँचे में नहीं माना जा सकता। जैनागम का प्रत्येक अंश तत्त्वों-पदेशक एवं सर्वकल्याणकारक होता है। अन्तिम कसौटी है; प्रत्येक वाक्य संसार मार्ग का भंजक होता है। उक्त कसौटियों पर प्रत्येक कथन की परीक्षा करके ही शास्त्र का ग्रहण किया जाना चाहिये। कोई भी कथन जितने-जितने अंशों में उक्त कसौटियों के विरुद्ध है, उतने-उतने अंशों में वह जैनत्व के भी विरुद्ध है; शास्त्र-समस्त नहीं है।

जिनमत का अनुयायी आज जाति, पंथ ओैर सम्प्रदाय के मोह-जाल में जकड़ा हुआ है। सब जानते हैं कि शुद्ध एवं सात्त्विक तथ्य को एक मोही व्यक्ति ठीक से गले नहीं उतार सकता। एक सरल एवं सदाचारी व्यक्ति ही आत्मज्ञान को पचा सकता है। कुटिल व्यक्ति सीधी-सच्ची बात को ग्रहण नहीं कर सकता। तीव्र व्यक्ति नैतिकता की बात पढ़ तो सकता है, लेकिन उसे भलीभाँति पचा नहीं सकता। दिन-भर आपके व्यापार-व्यवसाय में लूट-खसोट करने वाला श्रावक ‘रत्नकरण्ड श्रावकाचार को गले नहीं उतार पायेगा। यौन स्वतन्त्रता की समर्थक आधुनिक युवतियाँ भला अंजना के चरित्र को कैसे समझ सकती हैं? अर्थात् स्वाध्याय करने पर भी चरित्र की शुद्धता के बिना आत्मज्ञान रुच नहीं सकता।

आज अधिकांश साधु भी परम्परावादी, स्थितिपालक एवं साम्प्रदायिक दृष्टिकोण रखते हैं। स्वतन्त्र चिन्तन के अभाव में वे नवीन तथ्य ग्रहण नहीं कर सकते। अपरिग्रह के अग्रदूत कहला कर जो गाड़ी-सहित संघ चलाते हों, जो तन्त्र मन्त्र करते हों, वे ‘गोम्मटसार’ को नहीं समझ सकते। जहाँ साधु का अधिकांश समय अपने अनुयांयियों से घिरे रहने में ही व्यतीत होता हो, जो चेले ढूँढ़ने एवं कर्मकाण्डी व्यवस्थाओं में ही दिन-रात डूबे रहते हों; वे ‘समयसार’ की मर्म-महिमा कैसे जान सकते हैं? परिशोधित कषायों में डूबे साधु ‘कषाय पाहुड’ के रहस्य को कैसे पकड़ पायेगे?

जिनागम-का-स्वाध्याय शब्दों का खेल नहीं है, जिसे हर साक्षर व्यक्ति खेल सके। खुली चित्तवुत्ति, विशाल दृष्टिकोण, लीक से हट कर सोचने की क्षमता, निर्णय लेने की शक्ति, एवं तर्क तथा तारतम्यता का विवेक जिसमें है वही शास्त्रों के अंतरंग तथ्यों को समझ सकता है। जिसमें चरित्र की पवित्रता है और व्याकरण एवं साहित्य का ज्ञाता है तथा प्रकृति को खुली किताब की तरह पढ़ सकता है, वही शास्त्र की गहराइयों को समझ सकता है। आचार्य कुन्दकुन्द के शास्त्र को आचार्य कुन्दकुन्द की मनोभूमिका में उत्तर कर ही अच्छी तरह समझा जा सकता है।

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होली शुभ हो! : शुभकामनाएँ कैसे ग्रहण करे ?

पुरे मन से दी शुभकामनाएँ अपने साथ कम्पन ,तरंग एवं ऊर्जा लाती है.उथला मन ,व्यस्त मन उन्हें नहीं ग्रहण कर सकता है. हमारी भी उन्हें ग्रहण करने की तैयारी होनी चाहिए। शान्त चित्त होने पर उनका अनुभव किया जा सकता है.
आज से हजारो वर्ष पूर्व इन त्यौहारों की संरचना की गई थी। आज के समय में इनका औचित्य समझना जरुरी है। अपने त्यौहारों को खुली आँख से देखना आवश्यक है।happy holi
मनुष्य उत्सव धर्मा है। वह सदैव आनन्द और मस्ती में पसन्द करता है। होली भी आनन्द दायक त्यौहार है।
हिरण्यकश्यप् की आदेश से ं अग्नि रोधी(फायर प्रुफ ) साड़ी पहन कर अग्नि में बैठने के उपरान्त होलीका भक्त प्रहलाद को उसके सद्गुणों के कारण जला नहीं पाती, बल्कि स्वयं जल जाती है।अथार्त  नकारात्मकता सत्य को मिटा नहीं सकती है।इस तरह बुराई पर अच्छाई की विजय का यह त्यौहार है। यह पतझड़ की विदाई पर खुशियां मनाने वाला त्यौहार है। बंसत के उल्लास का त्यौहार है।
होली जलाना दहन का प्रतीक है। अपने भीतर वर्ष भर के वैमनस्य, गंदगी व ईष्या को जलाने का त्यौहार है।यह मन के मैल को धोने का त्यौहार है। गाली, गलौच कर कड़वाहट को मिठास में बदलने का मौसम है।यह भीतर छिपी गन्दगी को बाहर लाने का अवसर है। मन की शुद्धता को उज्जवल करने का मौका पैदा कराता है।दूसरों का दिल न दुखाते हुए रंग डालने ,गंदे मजाक,हंसी उड़ाने, छेड़छाड़ करने व नंाचने गाने का त्यौहार है। इस तरह मन की भड़ास निकालने में यह त्यौहार सहायक है।
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