Articles · Life-Management · Meditation · Self-Healing

योग-प्राणायाम द्वारा रोग मुक्त हो

योग विज्ञान सम्पूर्ण जीवन कला सीखाता है । इसलिए दुःखों से सदा सदा के लिए मुक्त करने में सक्षम है । यह मात्र सिद्धान्त नहीं है । इसीलिए योग बड़ा महत्वपूर्ण है।
योग शरीर के जोड़ों की जड़ता को तोड़ते है। इनमें जमे विषाक्त द्रव्यों को निकालते है। जोड़ो को घुमाने से स्फूर्ति पैदा होती है व जोड़ बेहतर तरीकेे काम करने लगते है। शरीर के सभी संधियों व घूमावों की जड़ता को तोड़ते है। जोड़ों में लोच बढ़ाते है। मांसपेशियों के खींचाव को कम कर उन्हें नरम करते है। सूक्ष्म व्यायाम से जोड़ो को बल मिलता है। शरीर में व्याप्त अकड़न-जकड़न कम होती है। तन में व्याप्त जड़ता मिटती है। शरीर हल्का होता है व जोश बढ़ता है। इस तरह के संचालन से अंग स्वस्थ होते है। अन्दरुनी अवयवों को सूक्ष्मता से संतुलित करते है, इसतरह इनसे रोग ठीक हो जाते हैै।
नियमित प्राणायाम करने का परिणाम मानसिक स्थिति पर होता है और इससे हमारा नाडीसंस्थान भी प्रभावित होता है जिसके फलस्वरूप श्वसन भी बदल जाता है। इसका अर्थ यह हुआ कि यदि हमने हमारे श्वसन क्रिया को योग्य तरीके से बदल दिया और नियमित पालन किया तो हम अपनी भावनाओं पर एवं मन पर निश्चित रूप से नियंत्रण कर सकेगें। इस तरह रोगमुक्त रह सकते हैl

Related Posts:

जब कठिन आसन व प्राणायाम न कर सको तो सूक्ष्म व्यायाम करें

गहन रिलैक्स करने वाले साइक्लिक मेडिटेशन का परिचय

जवारे का रसः बीमारी में अमृत एवं प्राकृतिक प्रतिरोधक शक्ति जगाने हेतु

रोग मुक्त होने व विष मुक्त होने:ऑयल पुलिंग

Advertisements
Art of Living · Articles · Life-Management · Meditation · Self-Healing

खोए हुए हम खुद है और खोज रहे है भगवान को,सोए हुए हम खुद है और जगा रहे भगवान को

 हमें  अपना तो कुछ  पता नहीं और परमात्मा का पता करना चाहते है,यही विडम्बना हैl सामने पड़े पत्थर को जानते नहीं और विराट में समाये प्रभु को पाने चले हैl  प्रार्थना की जरूरत हमें है,उससे हमारे भीतर शक्ति जगती हैl परमात्मा को हमारी प्रार्थना की आवश्यकता नहीं है l परमात्मा हमारे भीतर है,किसी मूर्ति में छिपा हुआ नहीं हैl खुद को तराशने की आवश्यकता हैl मूर्ति  पूजा उसमे सहायक हो सकती है यदि पूजा समझ के की जाय l

 

 

 

कर्म कांड में डूबा हुआ व्यक्ति परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकता हैlअपने को स्वीकार कर इस क्षण जीने में ही उपलब्धी हैl वर्तमान में जीना ही परम जीवन को पाना है,परमात्मा को उपलब्ध होना हैl  जीवन अन्यत्र  कहीं नहीं ,जीवन अभी और यही हैl

Related Posts:

समस्या अन्दर है, बाहर नहीं, सुलझाए भी अंदर से

अन्तर्यात्रा, होश बढ़ाने में नादानुसंधान सहायक है

स्वस्थ रहने हेतु जम कर ताली बजाए

ऊर्जावान बने रहने व वजन घटाने सूर्य नमस्कार करें

 

Art of Living · Articles · Life-Management · Personality · Self-Healing · Spirituality · Stress Management · Uncategorized

मीठा खाने की आदत अफीम खाने से ज्यादा नशीली व हानिकारक

शक्कर एक तरह का जहर है जो कि मूख्यतः मोटापे, हृदयरोग,सभी तरह के दर्द व कैंसर का कारण है । भारतीय मनीषा ने भी इसे सफेद जहर बताया है । डाॅ0 मेराकोला ने इसके विरूद्ध बहुत कुछ लिखा है । डाॅ0 बिल मिसनर ने इसे प्राणघातक शक्कर-चम्मच से आत्महत्या बताया है । डाॅ0 लस्टींग ने अपनी वेब साईट डाॅक्टर में इसे विष कहा है । रे कुर्जवले इस सदी के एडिसन जो कि 10 वर्ष अतिरिक्त जीने अपने वार्षिक भोजन पर 70 लाख रूपया खर्च करते हैं ने अपने आहार में अतिरिक्त चीनी लेना बन्द कर दी है ।

अधिक शक्कर से वजन व फेट दोनों बढ़ते हैं । डाॅ0 एरान कैरोल तो स्वीटनर से भी चीनी को ज्यादा नुकसानदेह बताते हैं । चीनी खाने पर उसकी आदत नशीले पदार्थ की तरह बनती है । प्राकृतिक शर्करा जो फल व अनाज में तो उचित है । sugar is poision
हम जो चीनी बाहर से भोजन बनाने में प्रयोग करते हैं वह विष का कार्य करती है । यह शरीर के लिए घातक है । डिब्बाबन्द व प्रोसेस्ड फूड में चीनी ज्यादा होती है उससे बचे । अर्थात् पेय पदार्थ व मिठाईयांे के सेवन में संयम बरतना ही बेहतर है।

चीनी के विकल्प
आप जितनी कम चीनी खाएंगे, उतने ही स्वस्थ रहेंगे। मधुमेह पीडि़तों को चीनी का कम सेवन करना चाहिए। प्राकृतिक मिठास जैसे फल, अंजीर का सेवन करें। स्वस्थ लोग चीनी की बजाय गुड़, शहद, खजूर व फलों का सेवन करें। इससे चीनी की तुलना में खून में शुगर का स्तर कम तेजी से बढ़ता है। शहद चीनी का बेहतर व पोषक विकल्प है।
चीनी के कृत्रिम विकल्पों में स्टेविया,  प्रमुख हैं। स्टेविया सामान्य चीनी से 300 गुना अधिक मीठी है, पर इसके सेवन से खून में शर्करा का स्तर अधिक नहीं बढ़ता।
Related Posts:

 

Art of Living · Bloging · Life-Management · Meditation · Personality · Self-Healing · Spirituality · Stress Management

रोग मुक्त होने व विष मुक्त होने:ऑयल पुलिंग

मुहं में तेल का कुल्ला करने से शरीर के टोक्सिंस बाहर निकल जाते हैंl यह एक आयुर्वेदिक विधि है जिसे विज्ञान भी स्वीकारता हैंl डॉ .कराच जिन्होंने आयल-पुलिंग पर एक विस्तृत शोध किया है उन्होंने पाया है कि आयल-पुलिंग के बाद निकले एक बूंद थूक में जीवाणुओं के लगभग 500 प्रजातियाँ बाहर आ जाती हैं ,अर्थात शरीर से जीवाणुओं को बाहर करने में आयल-पुलिंग थेरेपी बड़ा ही कारगर होती है lब्रुश फाईफ ने “Oil Pulling Therapy: Detoxifying and Healing the body through Oral Cleansing” नाम से एक पुस्तक लिखी है जिसमे इसके लाभ बताएं हैl

एक चम्मच सुरजमुखी /नारियल /तिल्ली का तेल मुहं में भर कर १५ मिनट तक घुमाएँl इस तेल की एक भी बूंद निगलनी नहीं हैlप्रयोग के आधा घंटा पूर्व व आधा घंटा बाद तक कुछ लेना नहीं हैl आमतौर पर फायदे के लिए आॅयल पुलिंग तकनीक को कम से कम लगातार चालीस से पचास दिनों तक प्रयोग में लाये जाने के आवश्यकता होती हैl

आयल-पुलिंग के लाभ :-

*यह तकनीक एलर्जी को दूर करने में कारगर है !
*दमे के रोगीयों में भी इसे लाभकारी पाया गया है !
* उच्चरक्तचाप के रोगियों में भी इसे फायदेमंद देखा गया है !
*कब्ज ,माइग्रेन एवं इन्सोमनीया जैसी अवस्था में भी इस तकनीक का प्रयोग लाभकारी है l
* मसूड़ों और दाँतों से समबन्धित समस्याओं में इस तकनीक के तत्काल फायदे को महसूस किया जा सकता हैl

Related posts:

स्वास्थ्य सेतु क्या है ?

हमारी जीवन शैली रोगों की जनक हैं –स्वास्थ्य-सेतु

स्वयं को जगाने हेतु ओम साधना करें

विश्राम क्यों जरूरी : विश्राम न कर पाने के दुष्परिणाम

Art of Living · Life-Management · Meditation · Uncategorized

क्षमा प्रार्थी हूँ!

 

मान्यवर,

हमारे अपने कुछ कृत्य बताते है कि मैंने आपके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया।kshama-yachna आपकी उपेक्षा, अनसुनी, मनमाफिक अर्थ निकालने, उपयोग-दुरुपयोग कुछ न कुछ वह किया है जो करने योग्य नहीं था। करके माफी चाहना भी अच्छी बात तो नहीं है, लेकिन दूसरा कोई विकल्प इससे बेहतर नहीं सुझ रहा है। इस भार को कम करने हेतु स्वयं भी माफ करने का भाव रखता हूँ व आपसे यही अपेक्षा है। वैसे भाव का प्रस्फुटन मिलने / चर्चा करने पर उत्तम रहता है। लेकिन मजबूरी है सभी से व्यक्तिगत बात नहीं हो सकती है। अतः पाती को ही भाव समझे।
जयन्ती जैन
मीना जैन
स्वास्थ्य सेतुए ( holistic health forum)उदयपुर

रिलेटेड पोस्ट्स:

कब तक गलतियों व क्षमा का क्रम चलेगा ?

तनावमुक्ति का, सफल होने का उपाय : क्षमा करना

नाराजगी कैसे आत्म-विनाशक है ?

दिल के रोग – काॅलस्ट्रोल से कम, घृणा व इर्ष्या से अधिक होते

Art of Living · Articles · Spirituality · Stress Management · Uncategorized

स्वयं को जगाने हेतु ओम साधना करें

प्राचीन काल से ओम का जाप किया जाता रहा है । सभी सनातन धर्मो में इसको प्रमुखता दी है। ओम का उच्चारण होश के साथ करने से भीतरी यात्रा करने में मदद मिलती है।शरीर में होने वाली हलचलों पर ध्यान जाता है साथ ही होने वाले भाव भी दिखाई देने लगते हैं। इससे अपने को महसूस करना आता है। यह स्वयम् के भीतर उतरना है। यही आन्तरिक सत्संग है। इससे अपनी ज्योत प्रकट होती है। अपने भीतर के पट खुलते है। बाह्य आवरण, सीमाएं एवम् स्थूलता पिघलती है। सजगता पूर्वक ओम का जाप स्वयम् के प्रति सचेत बनाता हैं। इससे अपने को जानने में मदद मिलती है। बिना जागृति के ओम को जपने से शरीर शिथिल हो जाता है। ओम का उच्चारण अन्तर आत्मा को शुद्व करता है। कर्मो की अशुद्वि व अज्ञान के अन्धकार को दूर करता है।

ओम का अर्थ कोई निश्चित् नहीं है। यह निराकार, असीम, अद्धश्य व अनन्त के लिये प्रयुक्त होता है। कई बार इसे ईश्वर के लिये भी प्रयुक्त करते है।यह ध्वनियाात्मक अक्षर हैं।

किसी ध्वनि के लिए हम कंठनली और तालु का ध्वनि के आधाररूप में व्यवहार करते है। क्या ऐसी कोई भौतिक ध्वनि है, जिसकी कि अन्य सब ध्वनियों अभिव्यक्ति है, जो स्वभावतः ही दूसरी सब ध्वनियो को समझा सकती है। हाॅ, ‘ओम’ अ उ म् ही वह ध्वनि है, वही सारी ध्वनियों की भितिस्वरूप है। उसका प्रथम अक्षर ‘अ‘ सभी ध्वनियो का मूल है, वह सारी ध्वनियों की कुन्जी के समान है, वह जिव्हा या तालू के किसी अंश को स्र्पश किय बिना ही उच्चारित होता है ।‘म‘ ध्वनि-श्रंखला की अंतिम ध्वनि है। उसका उच्चारण करने में दोनो ओठो को बन्द करना पडता हैं। और ‘उ‘ ध्वनि जिव्हा के मूल से लेकर मुख की मध्यवर्ती ध्वनि के आधार की अंतिम सीमा तक मानो लुढकता आता है। इस प्रकार अ उ म् शब्द के द्वारा ध्वनि-उत्पादन की संपूर्ण क्रिया प्रकट हो जाती हैं । अतः वही स्वाभाविक वाचक ध्वनि है, वही ंविभिन्न ध्वनियों की जननी स्वरूप है। जितने प्रकार के शब्द उच्चारित हो सकते है-ओम् उन सभी का सूचक हैर्।

मन में उठने वाले प्रत्येक भाव का एक प्रतिरूप शब्द भी रहता है। इस शब्द एवं भाव को अलग नहीं किया जा सकता। एक ही वस्तु के बाहरी भाग को शब्द और अन्तर भाव को विचार या भाव कहते है। वाचक वाच्य का प्रकाशक होता है। अर्थात शब्द भाव का प्रतीक होता है।

महेश योगी के द्वारा प्रणीत भावातीत ध्यान – ट्रान्सिडेन्टल मेडीटेशन में मात्र शब्द विशेष को दोहराया जाता है। इसमें सजगता नहीं रहने से शरीर एवम् मन को विश्राम मिलता है। इससे व्यक्ति की कार्यक्षमता बढ जाती है, इसलिये यह बहुत लोकप्रिय हुआ है।

( To be continued)

Art of Living · Articles · Life-Management · Meditation · Personality · Spirituality

आत्मशक्ति/मस्तिष्क की क्षमता: मुनि अजितचन्द्र का महा श तावधान

जैन मुनि अजितचन्द्र सागर जी द्वारा दिनांक 04.03.2012 को मुम्बई में द्विशतावधान का प्रयोग किया गया ।

शतावधान
शतावधान

तीन हजार दर्शकों के साथ-साथ तत्कालिन विधान सभा स्पीकर श्री दिलीप पाटिल, उच्च न्यायालय के न्यायाधिश श्री कमल किशोर तातेड़ एवं न्यूरोलोजिस्ट डाॅ0 सुधीर शाह भी उपस्थित थे । दर्शकों द्वारा 200 प्रश्न व तथ्य रखे गए । जिनमे गणित के सवाल भी थे । मुनिश्री द्वारा सवालों व तथ्यों को पहले क्रमशः बताया फिर उलटा बताया गया । अन्त में लोगों ने प्रश्न क्रम बताया, उन्होने उत्तर दिया । फिर उन्होने उत्तर बताए उन्होने प्रश्न क्रम बताए । इससे हमारी आत्मा की शक्ति सिद्ध होती है ।

मुनि अजितचन्द्र ऊंझा में जन्म लिया एवं 12 वर्ष की उम्र में दिक्षा ग्रहण की । इसके बाद साढ़े छः वर्ष तक मौन रहे । उन्होने बताया कि साधना एवं ध्यान के द्वारा यह उपलब्धि प्राप्त की ।

इससे हमारी मस्तिष्क की अपार क्षमता का ज्ञान हमें होता है । हम उसका कितना प्रयोग कहां कर रहे हंै । चैतन्य-आत्मशक्ति का प्रयोग देख कर प्रेरित होने की आवश्यकता है ।

 

Related posts:

In record bid, Jain monk to recall on the spot 500 questions ..

Maha Shat-Avadhan by Munishri Ajitchandra Sagar-ji on 4th …