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शिक्षान्तर का अलिखित संविधान जिन पर आधारित हैं

शिक्षान्तरः एक जीवन आन्दोलन
  • सरकार, बाजार एवं मीडिया जैसी व्यवस्थाओं से हमारी कोई माँग नहीं है।
  • हम किसी व्यक्तिवादी सोच का अनुकरण नहीं करते। हम सबके साथ खुले रुप से विचार बाँटने एवं संवाद को तैयार है।
  • हमारा कोई प्रतिद्धन्द्धी नहीं है। हम किसी प्रकार की हार-जीत या प्रतिस्पद्र्धा मंे विष्वास नहीं करते।
  • हमारा कोई बना-बनाया रास्ता नहीं है। सब आपसी समझ के साथ अपने जीवन में नए प्रयोग करते हैै।
  • हम विचार और प्रक्रिया को अलग नहीं मानते, बल्कि एक-दूसरे के पूरक के रुप में देखते है।
  • हमारा कोई लीडर या प्रतिनिधि नहीं है।
  • हम हर व्यक्ति की क्षमता व योग्यता में पूर्ण विष्वास करते है।
  • भीड़ एकत्रित करने के बजाय लोगों से रिष्ते बनाना हमारे लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है।
  • हमारी सीखने की प्रक्रिया में गलतियों का महत्वपूर्ण स्थान है।
  • हम सरकार, उद्योगपतियों एवं किसी संस्था से कोई अनुदान नहीं लेते।व्यक्तिगत रुप से किसी भी प्रकार के सहयोग का हम स्वागत करते है।
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मनीष जैन (शिक्षान्तर) : मेरे स्कूल में सिखाये गये 10 झूठ

10. पश्चिमी विज्ञान व तकनीकीकरण ही हमारी सब समस्याओं का हल कर सकती है।
9. बड़े बम व बड़ी सेना से ही हमारी सुरक्षा हो सकती है एवं उन्हीं के द्वारा हमें पूर्ण शान्ति मिल सकती है।
8. प्रतिस्पर्धा व निजी स्वार्थ से ही मेरी क्षमता का विकास हो सकता है। मुझे जीत और खुशी तभी मिल सकती है जब दूसरों की हार हो।
7.पश्चिमी संसदीय लोकतन्त्र की व्यवस्था आम आदमी को असली निर्णय लेने की ‘शक्ति’ एवं ‘चोईस’ प्रदान करती है एवं अपनी आवाज को बुलन्द करने के अवसर प्रदान करती है। हमारी पुराने समय की राजा-महराजाओं की व्यवस्था तानाशाही थी और वर्तमान की व्यवस्था हमको पूर्ण स्वतंत्रता और समानता का अधिकार प्रदान करती है।
6. जीवन के सभी सुख पैसे से ही प्राप्त हो सकते हैं, हम पैसे के बिना कुछ नहीं कर सकते। अगर देश के कुछ लोग अमीर हो जायेंगे तो उनका धन अपने आप धीरे-धीरे सब गरीब लोग के पास पहुंच जायेगा और उससे फायदा हो जायेगा।
5. गरीबी का कारण गरीब लोगों की आलस व बेवकूफी है; अमेरिका व यूरोप (खासकर के गोरी चमड़ी वाले) के लोग आर्थिक दृष्टि से अमीर इसलिए हैं क्योंकि वह ज्यादा बु़ि़द्धमान व मेहनती है।
4. प्रकृति हमारी दुश्मन है क्योंकि यह हमें बहुत नुक्सान पहुँचाती है। मुझे उसे दबाकर, शोषित कर अपने नियंत्रण मंे रखना चाहिये।
3. अंग्रेजी भाषा उच्च व परिष्कृत है और मेरी स्थानीय भाषा मेवाड़ी पिछड़ी और एकांगी है।
2. मेरे जीवन का मकसद उपभोग है, मैं जितना ज्यादा उपभोग करुँगा उतनी ज्यादा जीवन में सफलता हासिल करुँगा।
1. भारत 1947 से आजाद है और मैं आजाद प्राणी हूँ।
(शिक्षान्तर  आंदोलन द्वारा प्रकाशित ‘‘स्कूली व्यवस्था व मानसिकता का प्रतिरोध’’ से साभार)

क्या आपको  अपने स्कूल में सिखाये गए किसी झूठ  की याद आती हें ? कृपया लिखे

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शिक्षान्तर आंदोलन का परिचय

शिक्षान्तर आंदोलन की शुरुआत उन सभी संस्थाओं एवं ताकतों को गहराई से समझकर चुनौती देने के लिए हुई जो कि मानसिक नियंत्रण कर इन्सान को गुलाम बनाती हैं। यह एक दुःखद विषय है कि आज फैक्ट्री स्कूलिंग स्वाभाविक रुप से सीखने, अभिव्यक्त करने एवं सृजन करने की विभिन्न क्षमताओं व प्रक्रियाओं को नष्ट कर एकाधिकार स्थापित कर रही है जो कि प्रकृति, हमारे रिश्तों, पारंपरिक ज्ञान सभी के लिए अत्यंत घातक है। यह आन्दोलन ऐसे अवसर और स्थान खड़े करने के लिये प्रतिबद्ध है जहां साथ मिलकर शिक्षा और विकास को स्थापित प्रणालियों की अर्थपूर्ण समीक्षा कर सकें। स्वाभाविक रुप से सीखने की प्रक्रियाओं व क्षमताओं को बढ़ाने की जिम्मेदारी हमारे खुद के नियंत्रण मंे ले पाएं। स्वराज के लिये नये रास्ते खोज पाएं एवं प्रयोग कर पाएं।इसके लिए स्वराज युनिवर्सिटी की स्थापना की है। शिक्षांतर की कोर टीम उदयपुर (राजस्थान, भारत) में स्थित है जो कि विश्व स्तर तक के विभिन्न साथियों एवं सलाहकारों के साथ क्रियात्मक शोध द्वारा कार्य करती है। इसके बारे में अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए निम्न पते पर संपर्क करेंः

21 फतेहपुरा, उदयपुर-313004, राजस्थानफोन-(0294) 2451303
website: http://www.swaraj. org/ shikshantar
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शिक्षा एवं विकास की धारणाओं को चुनौैती देते हावर्ड स्नातक मनीष जैन से मुलाकात

श्री मनीष जैन, संस्थापक शिक्षान्तर आन्दोलन से मिलने पर गत माह बहुत सी बातें स्पष्ट हुई। हमारी शिक्षा एवं विकास सम्बन्धी हमारी अवधारणाएं सही नहीं है। तभी तथाकथित रुप से सफल व्यक्ति भी व्यथित है। बढ़ता असंतोष व अराजक व्यवस्था के मूल में हमारी शिक्षा एवं विकास दोषी है। अतः इन धारणाओं को बदलने  की सख्त जरुरत है। वर्तमान शिक्षा प्रणाली मनुष्य को तोता बनाने में कुशल है। उक्त प्रणाली से मात्र पैसा और पद (शक्ति) कमाने की ही कुशलता आती हैे। इसे ही जीवन का ध्येय मान लिया गया। वर्तमान शिक्षा प्रतियोगिता सिखाती है, अपने साथीै को धक्का देकर आगे बढ़ना सिखाती है। प्रतिद्वन्दिता में मानवीय मूल्यों की हत्या हो जाती है। विकास के नाम पर प्राकृतिक श्रौतो का बेहिसाब दोहन हो रहा है। विकास के नाम पर मात्र सुविधा और साधन जुटाये जाते है। इस उपक्रम में भी मानवता का लोप होता जा रहा है। तभी  सब कुछ पाकर भी मनुष्य सुखी नहीं है।
श्री मनीष जैन ,हार्वड विश्वविद्यालय से शिक्षा में ग्रेज्युट है एवं उन्होंने वाॅल स्टीªट एवं संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजन्सियों में काम कर चुके है। वहां भी उन्हें असमानता एवं शोषण मिला । इस दौरान् उन्होंने अनुभव किया कि मानव समाज सही राह  पर नहीं है। राज्य सरकारे एवं संस्थायें भी सही दिशा में नहीं चल रही है। अतःबुनियादी बदलाव हेतु  शिक्षा एवं विकास की अवधारणाओं में परिवर्तन की जरुरत है। जिसके लिए उन्होंने उदयपुर में शिक्षान्तर आन्दोलन चला रहे है।जिसकी विस्तृत जानकारी अगले ब्लाॅग में दी जायेगी।