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प्रणव साधना से अनाहद नाद

अनाहद नाद को सुनने में सहायक

ओम साधना का उद्वेश्य अनाहद नाद को सुनना है । यह वह ध्वनि है जो हमारे कान के सुनने की क्षमता के बाहर की ध्वनि है। यह आकाशीय एवम् ब्रह्माण्डिय ध्वनि है जो निरन्तर हमारे चारांे ओर विद्वमान है। ओम शब्द में सगुण, निगुर्ण एवम् निर्विशेष आदि सभी भाव विधमान् है। अनाहद सुनने से दिव्यता बढती है।दिव्य शक्तियां जाग्रत होती है।

यह अभ्यास अन्र्तध्यान में सहायक है । इसको करने से शरीर में लयबद्धता बढ़ती है। यह होश बढ़ाता है। इसको करने से शरीर में अराजकता कम होती है । यह ध्यान के पूर्व का अभ्यास है । इसको करने से ध्यान गहरा होता है ।

यह एक श्रेष्ठतम प्राणायाम है। ऊँकार की ध्वनि करने से शरीर के कम्पन सुधरते है। मन शरीर व भावों में संतुलन आता है। ऊँ की ध्वनि करने से उत्पन्न कम्पन हमारी भावनाओं को सुहाते है, दिल को अच्छे लगते है। मन के शोर को कम करते है। स्वयं के प्रति सजग करते है। इस तरह के कम्पन से अशान्ति कम होती है, शान्ति बढ़ती है। स्नायु तन्त्र शिथिल होता है। उत्तेजना कम होती है। अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ संतुलित होकर अपना स्त्राव सही करती है। शरीर में फैले विषैले पदार्थ बाहर निकलते है। हमारी रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है। ओम साधना एक प्राणायाम ही नहीं बल्कि श्रेष्ठतम ध्यान भी है।

 

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दृश्य ही अर्थयुक्त /सत्य नहीं : सारभूत दिखाई न देनेवाला हैं

जगत में दिखनेवाला ही अर्थयुक्त नहीं है जो नहीं दिखता हैं वह कई बार वह महत्वपूर्ण होता हैं । जीवन में जो दृश्य प्रमाण को ही मानते है वे अधूरे हैं । शायद यहाॅ सारभूत अदृश्य है, सूक्ष्म हैं, अरूपी हैं । जीवन में सारभूत दिखाई न देनेवाला हैं । इन सबका कारण दिख जाए वह आप जान पाए यह जरूरी नहीं हैं । इसको पहचानने वाले जीवन के सत्य को पहचान पाते हैं । इसी पर ओशो द्वारा सुनाई गई एक कहानी याद आती हैं । Role of invisible -Rumi

एक फकीर, एक सन्यासी प्रभु की खोज में पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा था । वह किसी मार्गदर्शक की तलाश में था–कोई उसकी प्रेरणा बन सके, कोई उसे जीवन के रास्ते की दिशा बता सके। और आखिर उसे एक वृद्ध सन्यासी मिल गया राह पर ही, और वह वृद्ध सन्यासी के साथ सहयात्री हो गया । लेकिन उस वृद्ध सन्यासी ने कहा कि ‘मेरी एक शर्त है, यदि मेरे साथ चलना हो–और वह शर्त यह है कि मैं जो कुछ भी करूं, तुम उसके संबंध में धैर्य रखोगे और प्रश्न नहीं उठा सकोगे। मेैं जो कुछ भी करूं, उस संबंध में मेेैं ही न बताऊं, तब तक तुम पूछ न सकोगे । अगर इतना धैर्य और संयम रख सको तो मेरे साथ चल सकते हो।’
उस युवक ने यह शर्त स्वीकार कर ली और वे दोनों संन्यासी यात्रा पर निकले। पहली ही रात वे एक नदी के किनारे सोये और सुबह ही उस नदी पर बंधी हुई नाव में बैठकर उन्होने नदी पार की। मल्लाह ने उन्हें सन्यासी समझकर मुफ्त पदी के पार पहुंचा दिया। नदी के पार पहंुचते-पहंुचते युवा संन्यासी ने देखा कि बूढा संन्यासी चोरी-छिपे नाव में छेद कर रहा है । नाव का मल्लाह तो नदी के उस तरफ ले जा रहा है, और बूढा सन्यासी नाव में छेद कर रहा है। वह युवा संन्यासी बहुत हैरान हुआ-यह उपकार का बदला ? मुफ्त में उन्हें नदी पार करवाई जा रही है। उस गरीब मल्लाह की नाव में किया जा रहा है यह छेद ?
भूल गया शर्त को। कल रात ही शर्त तय की थी । नाव से उतरकर वे दो कदम भी आगे नहीं बढें होगें कि यूवा संन्यासी ने पूछा कि ‘सुनिये ! यह तो आश्चर्य की बात हुई कि एक संन्यासी होकर- जिस मल्लाह ने प्रेम से नदी पार करवाई है, मुफ्त सेवा की है सुबह-सुबह , उसकी नाव में छेद करने की बात मेरी समझ में नहीं आती, कि उसकी नाव में आप छेद करें ? यह कौन-सा बदला हुआ-नेकी के लिये बदी से , भलाई का बुराई से?
उस बूढे संन्यासी ने कहा , ‘शर्त तोड दी तुमने । सांझ को हमने तय किया था कि तुम पूछोगे नहीं । मेंरे से विदा हो जाओ। अगर विदा होते हो तो मैं कारण बताऐ देता हॅूं । और अगर साथ चलना हो तो आगे ध्यान रहे, दुबारा पूछा तो फिर साथ टूूट जायेगा।’
युवा सन्यासी को ख्याल आया। उसने क्षमा मांगी। उसे हैरानी हुई कि वह इतना भी संयम न रख सका, इतना भी धैर्य न रख सका। लेकिन दूसरे दिन फिर संयम टूटने की बात आ गई। वे एक जंगल से गुजर रहे थे, और उस जंगल में उस देश का सम्राट शिकार खेलने आया। उसने सन्यासियों को देखकर बहुत आदर किया, उन्हें अपने घोडो पर सवार किया और वे सब राजधानी की तरफ वापस लौटने लगे। वृद्ध सन्यासी के पास राजा ने अपने एकमात्र पुत्र युवा राजकुमार को घोडे़ पर बिठा दिया। घोडे दौड़ने लगे राजधानी की तरफ। राजा के घोडे आगे निकल गये । दोनो सन्यासियों के घोडे़ पीछे रह गये। बूढे सन्यासी के साथ राजा का बच्चा भी बैठा हुआ है, वह एकमात्र बेटा है उसका। जब वे दोनों अकेले रह गये, उस बूढे सन्यासी ने उस युवा राजकुमार की नीचे उतारा और उसके हाथ को मरोडकर तोड दिया। उसे झाडी में धक्का देकर अपने सन्यासी साथी से कहा: ‘भागो जल्दी।’
यह तो बरदाश्त के बाहर था। फिर भूल गया शर्त । उसने कहा:हैरानी की बात है यह ं।
जिस राजा ने हमारा स्वागत किया, घोडों पर सवारी दी, महलों में ठहरने का निमन्त्रण दिया- जिसपे इतना विश्वास किया, जिसने अपने बेटे के घोडे पर तुम्हें बिठाया, उसके एक मात्र बेटे का हाथ मरोडकर तुम जंगल में छोड आये हो। यह क्या है ? यह मेरी समझ के बाहर हेै। मैं इसका उत्तर चाहता हॅू।
बूढे ने का:तुमने फिर शर्त तोड दी । और मैंने कहा था कि दूसरी बार तुम शर्त तोडोगे, तो विदा हो जायेंगे। अब हम विदा हो जाते है। और दोनो का उत्त्तर मैं तूम्हेें दिेये देता हॅूं। जाओ लौटकर पता लगाओ-तुम्हें ज्ञात होगा कि वह नाव, वह मल्लाह इसी किनारे पर रात छोड गया। और रात एक गांव पर डाका डालने वाले लोग उसी नाव पर सवार होकर डाका डालेंगे । मैं उसमें छेद कर आया हॅू । एक गांव में डाका बच जाएगा ।
राजा के लड़के को मैने हाथ मरोड़कर छोड़ दिया है जंगल में । तुम पता लगाना- यह राजा अत्यन्त दुष्ट एवं कू्रर, और आततायी हैं । इसका लड़का उससे भी कू्रर और आततायी होने को हैं । लेकिन उस राज्य का एक नियम है कि गद्दी पर वही बैठ सकता है, जिसके सब अंग ठीक हो । मैंने उसका हाथ मरोड़ दिया है, वह अपंग हो गया, अब वह गद्दी पर बैठने का अधिकारी नहीं रहा । सैकड़ों वर्षो से इस देश की प्रजा पीडि़त हैं, वह पीडि़त परम्परा से मुक्त हो सकेगी ।
अब तुम विदा हो जाओ ।
मैं क्षमा चाहता हॅू ।
तुम्हें, जो प्रगट दिखाई पड़ता है, वही दिखाई पड़ता हैं; जो अप्रगट है, जो अदृश्य है, वह दिखाई नहीं पड़ता । और जो आदमी प्रगट पर ही ठहर जाता है, वह कभी सत्य की खोज नहीं कर सकता हैं । मैं तुमसे क्षमा चाहता हॅू ; हमारे रास्ते अलग जाते हैं ।

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छवियों के पीछे जीवन: टूटता मन

मीडिया ने हमारी पारम्परिक सांस्कृतिक एकता को खत्म कर दिया है । टीवी पर नामी कलाकारों के कार्यक्रम देख कर उन कलाकारों को अच्छा मान हम अपना गाना, नाचना व नाटक करना भुलते जा रहे हैं । इससे हम सृजनशील रहते व मस्ती लुटते थे । आज टीवी, कम्प्यूटर पर इनको देख कर निष्क्रीय व निठल्ले होते जा रहे हैं । कर्ता से हम देखने वाले होते जा रहे हैं । इससे भावनात्मक विकास व लगाव कम हो गया है व हम एकाकी होते जा रहे हैं । दूसरों को श्रेष्ठ मानने से स्वयं हीन भावना बढ़ा रहे हैं । image
टीवी/इन्टरनेट ने एक काल्पनिक दुनिया रच दी है । जिसमे व्यक्ति जीते हुए वास्तव में स्वयं से पलायन करता है । उसका मन एक काल्पनिक दुनिया में विचरण करता है । तब वह वास्तविक दुनिया से कट जाता है । काल्पनिक जगतवत् वह व्यवहार अपनों से करता है व वैसी प्रतिक्रिया की आशा करता है । जब उसे इस अनुरूप आचरण नहीं मिलता है तो वह निराश हो जाता है । इस प्रकार अपनों से दूर होता जाता है । वास्तविक जगत उसे कचोटने लगता है । काल्पनिक जगत ओर रूचिकर लगता जाता है । सितारे नायक बन जाते हैं । इस तरह यथार्थ से कटना अवसाद को बढ़ाता है । व्यक्ति को अकेला कर देता है व तनावग्रस्त रहता है ।
टीवी में दिखाये जाने वाले नारी/पुरूष वास्तव में वैसे नहीं होते हैं । उनकी ग्लेमरस व मेचों छवि निर्मित होती है । इसे बनाने में तकनीकी, मशीनों व ढेर सारे व्यक्तियों की भूमिका होती है । वह छवि वास्तविक नहीं होती है । इसमे उनकी मात्र अदाकारी होती है । वास्तविक जीवन में दूर-दूर तक भी वैसे वे नही हो सकते हैं न ही होते हैं । हमारे मनोरंजन या कोई उत्पादन बेचने वैसी छवि जानबुझ कर प्रस्तुत की जाती है ताकि हम उसे वैसा माने । उस मोहक छवि को हम मन में बसा कर जीवन में खोजते हैं, जो कहीं हो नहीं सकती है तब न मिलने पर उदास होते हैं ।
मीडिया से हम थोड़ा बहुत मनोरंजन पाते हैं लेकिन छवियां मन में बैठाने से कहीं अकेले पड़ जाते हैं । टीवी देखने से सम्बन्ध उपेक्षित होते जा रहे हैं । सम्बन्धों मंे संवाद की कमी होती जा रही है । सूचनात्मक सवांद तो मोबाईल से बढ़ा है लेकिन भावनात्मक लगाव परस्पर घटते जा रहे हैं । नए मूल्य अनुसार भावनाओं को कमजोरी माना जाता है । सम्बन्धियों व मित्रों के घर जाना कम हो गया है व वहां जाने पर भी कई बार सब टीवी देखने लगते हैं । स्वयं की निगाह में कमतर मिलने पर टुटते हैं । अंततोगत्वा हमें यह निष्क्रिय मनोरंजन छोटा भी बना देता है ।
हमारे पूर्वज जीवन भर में जितनी सुन्दर स्त्रियां नहीं देखते थे, उससे ज्यादा हम एक दिन में टीवी पर देखते हैं । इस तरह सुन्दरता का भूत खड़ा किया जाता है । इससे दर्शक भटक जाता है । वैसी छवियां/सुन्दरता जीवन में खोजता है । इस तरह व्यक्ति असंतुष्ट हो जाता है एवं नारी हीन भावना की शिकार होती है । टीवी पर आने वाले तीन चैथाई कार्यक्रमों में अप्रत्यक्ष रूप से सेक्सूलिटी/कामवासना बढ़ाने वाले होते हैे । नारी सौन्दर्य का मादक बना कर दिखाया जाता है । बच्चे इन्हे देख कर शीघ्र्र अवांछित सीख जाते हैं । आज सेक्सुलिटी की बाढ़ टीवी की देन है । दिन भर इस तरह के कार्यक्रमों को देखने से भला चंगा व्यक्ति भ्रष्ट हो जाता है।
टीवी से मधुमेह, मोटापा व हृदय रोग होते हैं । एक शोध केे अनुसार एक घंटा टीवी देखने से 22 मिनट उम्र घटती है । टीवी देखने से बच्चों की आंखे कमजोर होती है इससे उन्हे चश्मा पहनना पड़ता है । टीवी मनोरंजन कम व हमे भटकाता ज्यादा है । मन को बेलगाम यह करता है । मन को अस्थिर यह करता है। उसे गहरे कुएं मे यह धकेलता है । अतृप्त यह करता है । निराशा व बेचैनी यह फैलाता है। सपने यह दिखाता है । दिन में तारे यह दिखाता है । टीवी अशान्ति का डिब्बा है । इसे बुद्धु बक्सा वैसे ही नहीं कहते हैं ? हम इससे सपने खरीदते हैं । छवियां ग्रहण करते हैं । यथार्थ से दूर होते हैं ।

बच्चों को पंख देता है, साथ ही काट भी डालता है । नन्हे मन को युवा बना देता है । डायलाॅगबाजी सीखा देता है । बच्चों मे भेद भूला देता है । बच्चे को शैतान बनाता है । नए तरह के अन्धविश्वास सीखाता है । यथार्थ से दूर करता है । एक काल्पनिक जगत में जीना सीखाता है ।
टीवी कैसे घर वालों को बेघर बनाता है । यह घर में आग लगाता है । दर्शकों को भटकाता है । भेजा खराब करता है । सम्बन्धों को विकृत करता है । अपनों में दूरी पैदा करता है ।

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जीवन शैली बदलेंः आत्मचिकित्सक बनें

स्वस्थ होने में साझेदारी

एक बार जब रोग हो गया है तो रोने, मूड़ खराब करने, चिन्ता करने से यह ठीक नहीं होगा। मात्र जीवन का उद्देश्य एवं भाव समझने व उसका ध्यान रखने से जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदल सकती है, फलस्वरूप रोगी अपने दर्द व भय का सामना बेहतर तरीके से कर सकता है। जीवन में उद्देश्य होने से पीड़ा कम हो जाती है। अर्थात जीवन का लक्ष्य बनाएं। वर्तमान में जीएं।

केवल डाॅक्टर और दवाई ही इलाज नहीं करते वरन् ये सहयोगी है, रोगी के भीतर के डाॅक्टर के कार्य में ।डाॅ. अस्लाम ने बताया है कि ‘‘मजबूत जिजीविषा और मस्तिष्क के संतुलित होने से अन्तःस्त्र्रावी ग्रन्थियां स्वस्थ बनाने वाले रसायन बनाती है।’’

जीवन के अस्तित्व में, ईश्वर में, अपनी चिकित्सा में आस्था रखने से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। सकारात्मक भाव व विचारों से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। अर्थात् स्वस्थ होने में विचारों की महत्वपूर्ण भूमिका है। विचार अनुकूलन की शक्ति का प्रयोग करें…………… स्वस्थ होने के विचार निरन्तर करते रहे।
जीवन शक्ति बढ़ाने के लिए प्रार्थना करें।

प्रभु आप जीवन के स्रोत हो
मुझे खुलकर अपना मधु पीने दो
मेरे दिल के अन्दर आप उठोे
अनन्त सम्भावनाओं को खोलो।

रोग हमारे अन्तर्मन की अराजकता व असंतुलन को दर्शाते है। मन के लयबद्ध व शान्त होने पर सब कुछ ठीक हो सकता है।

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बीमारी क्या कहती है?

स्वस्थ रहने के लिए अम्लता से बचे एवं क्षारीय खुराक लें

दिल के रोग – काॅलस्ट्रोल से कम, घृणा व इर्ष्या से अधिक होते

 

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हमारी हानि आलोचना से कैसे होती है ?

दूसरों के दोषों की चर्चा करना, दोषों को ध्यान में रखना आलोचना करना है ।criticise हम आलोचना करते वक्त अपना समय व ऊर्जा बेकार करते हैं । बुराई करना नकारात्मक ऊर्जा को बढ़ाना है । बुराई करते वक्त हम अपनी प्रसन्नता व आशा तोड़ते हैं । दूसरों की आलोचना हमें स्वयं से स्वयं को दूर करती है । इसमे हम अनावश्यक भटक जाते हैं । दूसरों केे गुण-दोषों की समीक्षा कर उसका महत्व बढ़ाना है ।
आलोचना ईष्र्या से भी की जाती है ं आलोचना का क्रम तुलनात्मकता को बढ़ाता है । तुलना करने पर अहं बढ़ता या घटता है । तुलना सहज स्वीकृति के विरूद्ध है । इससे अशान्ति बढ़ती है ।
दूसरों की बुराई करने में जो रस आता है वह हमारे मन व शरीर को दूषित करता है । यह दूषण आत्म विनाशक है । आलोचना करने से झगड़ा भी हो सकता है । यह हमारी नकारात्मकता को बढ़ाता है । दूसरों को अनुपस्थिति में दोष देना हमारे अहंकार का पोषण है ।
आलोचना करने पर गठिया होता है ।

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स्वस्थ रहने के लिए अम्लता से बचे एवं क्षारीय खुराक लें

हमारे रक्त में अम्ल एवं क्षार दोनो होते हैं । स्वस्थ रहने के लिए इनमे संतुलन आवश्यक है । हमारा भोजन भी दोनों तरह का होता है । हमारे शरीर में अम्लता घातक है, अतः क्षारीय आहार संतुलन लाता है । अम्लता की स्थिति में हाइड्रोजन आयन शरीर को थोड़ा अम्लीय बनाते हैं । क्षारीय भोजन हाइड्रोजन आयन कम करता है । जो शरीर के लिए लाभदायक है । इसलिए रक्त की अम्लता को कम करने के लिए 80 प्रतिशत क्षारीय आहार लेना चाहिए ।Ph- Acid- alkaline diet
भोजन से रक्त बनता है । अम्ल एवं क्षार की मात्रा को नापने के लिए एक पैमाना तय किया है जिसे पीएच कहते हैं । किसी पदार्थ मंे अम्ल या क्षार के स्तर को की मानक ईकाइ पीएच है । पीएच को मान 7 से अधिक अर्थात वस्तु क्षारीय है । शुद्ध पानी का पीएच 7 होता है । पीएच बराबर होने पर पाचन व अन्य क्रियाएं सुचारू रूप से होती है । तभी हमारे शरीर की उपापचय क्रिया सही होती है एवं हारमोन्स सही कार्य कर पाते हैं एवं उनका सही स्त्राव होता है । तभी शरीर की प्रतिरोध क्षमता बढ़ती है ।
बढ़ता प्रदूषण, रसायनों का सेवन व तनाव से शरीर में अम्लता की मात्रा बढ़ती है । तभी आजकल रक्त मे पीएच 7.4 से कम हो गया है । 7.4 आदर्श पीएच माना जाता है । इससे उपर पीएच का बढ़ना क्षारीय व इसका 7.4 से कम होना एसीडीक होना बताता है। आजकल हमारा रक्त का पीएच 6 या 6.5 रहता है । इसी से कैंसर जैसी घातक बीमारियां होती है । शरीर की प्रतिरोधक क्षमता भी कम हो गई है । शरीर में दर्द इसी से रहता है । पित्त का बढ़ना, बुखार आना, चिढ़ना सब अम्लता बढ़ने से होता है ।
निम्बू, अंगुर आदि फल खट्टे होते हैं लेकिन पाचन पर ये क्षारीय प्रभाव उत्पन्न करते हैं । इनके अन्तर स्वभाव से नही बल्कि पचने पर जो प्रभाव होता है उसके कारण क्षारीय माना जाता है । पाचन पर जो खनिज तत्व बनाते हैं व सब क्षारीय होते हैं ।
अम्लीय आहार – मनुष्य द्वारा निर्मित आहार प्रायः अम्लीय होता है जिससे एसीडिटी होती है । जैसे तले-भूने पदार्थ, दाल, चावल, कचैरी, सेव, नमकीन, चाय, काॅफी, शराब, तंबाकु, डेयरी उत्पाद, प्रसंस्कृत भोजन, मांस, चीनी, मिठाईयां, नमक, चासनी युक्त फल, गर्म दूध आदि के सेवन से अम्लता बढ़ती है ।
क्षारीय आहार – प्रकृति द्वारा प्रदत आहार (अपक्वाहार) प्रायः क्षारीय प्रभाव उत्पन्न करते हैं । जैसे ताजे फल, सब्जियां, अंकुरित अनाज, पानी में भीगे किशमिश, अंजीर, धारोष्ण दूध, फलियां, छाछ, नारियल, खजूर तरकारी, सुखे मेवे, आदि पाचन पर क्षारीय हैं ।ज्वारे का रस क्षारीय होता है । यह हमारे शरीर को एल्कलाइन बनाता है । शरीर के द्रव्यों को क्षारीय बनाता है । खाने का सोड़ा क्षारीय बनाता है ।

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हर रोज सर्वश्रेष्ठ कार्य कैसे करें व मस्ती से कैसे जिए ?

हम जैसा जीना चाहते हैं वैसा जी सकते हैं । प्रतिदिन स्वयं को भेजने वाली सूचनाएं बदल कर हम अपना जीवन बदल सकते हैं । हम हर रोज ठप्पे से नहीं जी पाते हैं । हम जो भी जैसा भी जीते हैं, परिणाम पाते हैं उसके पीछे उस क्षण का हमारा व्यवहार होता है । व्यवहार परिणाम लाता है । हमारा व्यवहार जीवन को प्रतिभाशाली बनाता है । अतः उसे प्रभावित करने वाले कारक क्या है ? हम जो सोचते है, तदनुरूप व्यवहार बनाता है । इस सोच का भी कारण हमारा महसूस करना है । Being brilliant
व्यवहार सोच व महसूस करने से तय होता है । जैसा हम महसूस करते है उसी अनुरूप विचार आते हैं । ये दोनो परस्पर जुड़े हुए हैं । हम अपनी भावनाओं के आधार पर महसूस करते हैं । भावनाएं ऊर्जा से बनती है । भावनाओं को बदलना चेतन रूप से कठिन है । हम इसके बहाव में होते हैं । अतः इसको बदलने हमारा आगत तन्त्र बदलना होगा । अतः इनका निर्धारण हमारा शरीर रचना विज्ञान तय करता है ।
हमारे शरीर में सीग्नलों का प्रवाह चलता है । निरन्तर हमारे शरीर में संदेशों का प्रवाह चलता है । हम इन सूचनाओं को पकड़ नहीं पाते हैं । जब हम कहते हैं कि मेरा मूड़ खराब है । यह हम तब कहते हैं कि मन मे निराशा के भाव है, नकारात्मक विचार चल रहे हैं व थकान लग रही है । आगे कुछ अच्छा होने की आशा नहीं है । अर्थात जब हम इन सब के संदेश-संकेत पढ़ पाते है । अर्थात जब संकेतो को ग्रहण नहीं कर हम अपना कार्य करते जाते है तो हमारे कार्यों का सही परिणाम नहीं आता है । ऐसे मे हम अपना सर्वश्रेेष्ठ नहीं दे पाते है । अर्थात हम सक्षम होते हुए भी परिणाम नहीं ला पाते है । इसलिए सचेत होकर शरीर में होने वाले परिवर्तनों को पकड़ना दिन को शानदार बना सकते हैं । तभी तो शानदार क्रिकेट खेलने वाला सचिन तेंदूलकर भी हमेशा बढि़या नहीं खेल पाता है । किसी दिन उसका प्रदर्शन ठीक नहीं रहता है । यह सब उसके शरीर मे चल रहे संदेशो को नहीं समझ कर उनका शिकार होने से होता है । जब वह अपनी भाव व मनस्थिति को समझ पाता है तो उसेे बेहतर भी बना सकता है ।

                                                                                                                                                     (To be Continued……)