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क्षमा प्रार्थी हूँ!

 

मान्यवर,

हमारे अपने कुछ कृत्य बताते है कि मैंने आपके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया।kshama-yachna आपकी उपेक्षा, अनसुनी, मनमाफिक अर्थ निकालने, उपयोग-दुरुपयोग कुछ न कुछ वह किया है जो करने योग्य नहीं था। करके माफी चाहना भी अच्छी बात तो नहीं है, लेकिन दूसरा कोई विकल्प इससे बेहतर नहीं सुझ रहा है। इस भार को कम करने हेतु स्वयं भी माफ करने का भाव रखता हूँ व आपसे यही अपेक्षा है। वैसे भाव का प्रस्फुटन मिलने / चर्चा करने पर उत्तम रहता है। लेकिन मजबूरी है सभी से व्यक्तिगत बात नहीं हो सकती है। अतः पाती को ही भाव समझे।
जयन्ती जैन
मीना जैन
स्वास्थ्य सेतुए ( holistic health forum)उदयपुर

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महान् लेखक बनने की कंुजी और मोपासां

प्रसिद्ध फ्रासीसी साहित्यकार मोपासां ;डंनचंेेंदजद्धबचपन से ही लेखक बनने की जिद करने लगा था। तब उसकी समझदार मां अपने परिचित प्रसिद्ध लेखक फ्लोएर्बेट ;थ्संनइमतजद्ध के पास ले गई एवं उनको बताया कि मेरा बेटा लेखक बनना चाहता है। अतः वह आपसे लेखक बनने के सूत्र जानना चाहता है।GDMaupassant
वे उस समय व्यस्त थे। फ्लोएर्बेट ने एक माह बाद बुलाया।
ठीक एक माह बाद बच्चा मोपासां उनके पास पहुँच गया। उन्होने उसे पहचाना नहीं तब उसने अपनी मां का परिचय देकर बताया कि वह लेखक बनने के सूत्र सिखने आया था तब आपने एक माह बाद आने को कहा था।
तब फ्लोएर्बेट ने टेबल पर पड़ी एक किताब उसे दी और कहा कि इसे याद करके आओ।
मोपासां उस किताब को महीने भर में पूरी तरह याद कर फिर उनके पास पहुँच गया। तब गुरु ने फिर पूछा कि क्या पूरी किताब याद कर लीं।
मोपासां ने कहा-हां कहीं से भी पूछ लिजिए। वह किताब एक बड़ी डिक्शनरी थी।
फ्लोर्बेएट आश्चर्य से उस बालक को देखते रहे फिर पूछा कि खिड़की के बाहर से क्या दिखाई देता है?
बालक ने कहा ‘‘पे़ड’’- कौनसा पेड़-‘‘पाईन का पेड़’’
ओह, ठीक से देखो-‘‘ पास के तीसरे मकान की तीसरी मंजिल से एक लड़की झांक रही है।’’
‘‘और अच्छी तरह देखो’’
तब उसने कहां -‘‘आकाश में चिडि़या उड़ रही है।’’
हां, अब ठीक है।
वह पेड़ सिर्फ पेड़ नहीं है। वह तीन मंजिला मकान, खिड़की से झाँकती लड़की,, वह आसमान, वह चिडि़या, वे सभी उस पेड़ से जुड़े हुए है। पेड़ कभी अकेला नहीं हो सकता है। इसी तरह आदमी के मामले में उसके आस-पास का समाज, उसकी वंश-परम्परा, उसके नाते-रिश्ते के लोग, उसके दोस्त-यार, इन सबको मिला कर ही वह आदमी है। इस तरह वातावरण का भी योगदान होता है। इस तरह की विस्तृत दृष्टि चाहिए।तब जाकर ही साहित्य बनता है।
उसी दिन से मोपासां ने उन्हें अपना गुरु बनाकर उनके सूत्रों का अनुसरण कर एक महान् लेखक बने।

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समस्या अन्दर है, बाहर नहीं, सुलझाए भी अंदर से

 

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समस्या अन्दर है, बाहर नहीं, सुलझाए भी अंदर से

हम सब अपनी आदतों, सोच व मूल्यों के कारण परेशान है। बिना परिक्षण अपनी आदतों, सोच व मूल्यों का सही मानते हैं । इसलिए दूसरों की गलतियां प्रतीत होती है । Egg-break by Inside forceLet-life-starts-from-within-you-inspirational-words-life-quotesजबकि पर की तरह वे भी अपनी आदतांे, सोच व मूल्यों की गुलाम है । इसके बाहर देख नहीं पाते हैं । इन्हे ही हम सही मानते हैं व इनके साथ एकमेक होकर इन्हे ही ’स्व’ मान लेते हैं । इन्ही केे आधार पर हम प्रतिक्रिया करते हैं । इन्ही के अनुसार जीते हैं । अर्थात दुःख, झंझट व निराशा के कारण बाहर नहीं हमारे भीतर है । पूर्व जन्म के कर्म, पाप व पर इसके लिए दोषी नहीं है । इसका निदान अपनी बुरी आदतों, प्रतिबद्ध सोच व मूल्यों को बदल कर ही संभव है । बंधन अन्दर है तो मुक्ति सही माने भी वहीं से प्राप्त करनी पड़ेगी ।
दूसरों की कही छोटी बातें, वैसे ही कही बातें अपने पूर्वाग्रहों के कारण बुरी लगती है व फिर इन्ही पर सोच-सोच कर दुःखी होते हैं ।

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संसार में झंझट/टकराहट स्वाभाविक है, यहाँ कहीं सुख नहीं है :जो है उसका आनन्द लेना सीखो((अंतिम भाग)

मेरी, या किसी की किस्मत कोई नहीं निगल सकता है। बहुत चालाक व घमण्डी होंगे। हमारा क्या बिगाड़ लेगें। हमें उनके घर जाकर कौनसा रहना है। बदमाश व्यापारी को भी वक्त सर्वेंक्षण निभाते है, जैसे निभा लेना। अपने-अपने गीत अपनी तरह से गाने ही पड़ते है। संसार या सत्य से भागने का विकल्प अधिक बुरा है।
अधुरापन, अपूर्णता, थोड़ी बेईमानी, थोड़ी सच्चाई, कभी खुषी कभी गम को ही संसार कहते है। यहाँ सब चलता है। इन सब के बीच रास्ता अपनी अक्ल से निकालना पड़ता है। फिर भी हँसना पड़ता है, हँसाना पड़ता है। एक तर्क, घटना, बात लेकर रोते रहने में सार नहीं है। इस क्रम में बहुत कुछ खोना पड़ सकता है। अतः बीच का व्यावहारिक पथ चुनों, संतुलित रहो। भावुक होने की जरुरत नहीं है। सब कुछ दाँव पर नहीं लगा है। हमारा जीवन हमारे हाथ में है। हमें कोई दुःखी नहीं कर सकता। हम अपने मालिक है। आप अनावश्यक खीचों मत। तुरन्त निर्णय करो। दो घोड़ों की सवारी न करें। मेरी बेहोशी अब अधिक नहीं चलेगी। जागो! जागो!
पूर्ण सुखी होने के आकांक्षी हो तो ‘‘जो है’’ उसका आनन्द लेना सीखो। संसार में तो इसी तरह होना निश्चित है। जब इसमें रहना है तो जैसा है वैसा स्वीकार करो, इसे अधुरा ही स्वीकारों। जीवन सहने का दूसरा नाम है। थोड़ा बहुत बेवकूफ बनना व सहना उचित है। संसार में थोड़े धोखे खाना भी सफल जीवन हेतु जरुरी है। इनसे सबक लो, इनको पहचानों व शान्त रहो। मानव की अपनी सीमाएँ है। व्यवहार की सीमाएँ है। दूसरे भी किसी न किसी से बँधे हुए है। वे कोई बुद्ध पुरुष नहीं है। उनकी अपनी समझ अनुसार कुछ गलती की है तो क्षमा कर आगे देखो। अत्यधिक मीनमेख घातक है। वे तो आपके स्नेह के आकांक्षी है। हमें मूर्ख बनाना, धोखा देना उनका व्यवसाय नहीं है। तीर्थकरों का जीवन बताता है कि संसार में सुख नहीं है। तभी तो वे आत्मज्ञान की राह पकड़ते हेतु वन को जाते है।

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देह गगन के सात समंदर : सैन्नी एवं स्नोवा का आत्म खोजी उपन्यास:

देह गगन के सात समंदर वैसे एक कथ्य व शैली के हिसाब से उपन्यास है लेकिन वास्तव में यह एक आधुनिक उपनिषद की तरह है ।यह उपन्यास नहीं बल्कि जीवन शास्त्र है । इसमें स्वयं की खोज एवं स्वयं को पाने का वृतान्त है ।

सैन्नी एवं स्नोवा
सैन्नी एवं स्नोवा

यह एक रहस्यदर्शी, दार्शनिक एवं अन्र्तयात्रा वृतान्त है जो स्वयं की खोज में लगे हुए है । नायक एवं उसकी टोली देह के पार की अन्वेशक है । यह आत्मखोज परक उपन्यास है ।
प्रेम एवं मैत्री, अस्तित्व एवं सौन्दर्य, पुरूष और स्त्री एवं धर्म एवं अध्यात्म पर इसमे गहन चर्चा की हुई है । शब्द के पार जाने की कला इसमे बतायी हुई है । कला एवं कलाकार, कविता एवं साहित्य, मन एवं उसके पार पर बहुत विस्तृत चर्चा है ।

स्त्री व पुरूष सम्बन्धों में गहराई व आत्मीयता बढ़ने से जीवन का रहस्य समझा जा सकता है । पारम्परिक ढर्रे पर जीने से बेहोशी बढ़ती है । स्त्री-पुरूष सम्बन्धों में अपूर्णता जीवन में अपूर्णता का कारण है । स्वयं को जानने की दिशा में यह एक मार्ग है । अपने भीतर के विपरित लिंग से मिलने में बाहर का साथी मात्र सहायक है । असल तो अपनी ही देह के विपरित लिंग से मिलना है। दूसरों के बहाने हम अपने ही ठिकाने तलाश रहे हैं । सजगता व्यक्ति को नये आयाम देती है ।

नर-नारी के स्वाभाविक देहयोग और देहभोग तक से डरते रहेगें, जिसके बिना हम न स्वयं को जान सकते है, न ही दूसरे को । दमन व भय ने नारी को अधुरा बना दिया है । वह समर्पण व प्रेम से वंचित होने से खण्डित है ।
आज देह लोलुपता के विकास की जगह सहभागी चेतना का विकास आवश्यक है।आत्मा स्थिर या तैयार नहीं होती है । यह एक घटना है, संज्ञा नही है । इसे रचना पड़ता है । इसका निर्माण दृष्टा होने पर होता है ।

इसके लेखक मनाली के रहने वाले सैन्नी एक यायावर है जो हिमालय में घुमते हुए अपनी खोज में व्यस्त है। परम्परागत व संगठित धर्मों के विरूद्ध है। सच्चे अध्यात्म के राही है।

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प्राणिक हीलिंग क्या है व इससे उपचार कैसे होता है ?(अंतिम भाग)

इस विधि द्वारा जब अपना व मित्रों पर उपचार किया तो इसका ज्ञान हुआ। यह बहुत कारगार व श्रेष्ठ विद्या है जो कई रहस्यों को खोलती है । ऋषि-मुनि कैसे आशिर्वाद देते थे जो पूरे होते थे । गंावों में मन्त्रित पानी देना, नीम की पतियां व झाडु से झाड़ना, झाड़ फुंक का आधार प्राणिक हीलिंग में मिला । sarve bhavantuइसमे हमारे आभामण्डल की सफाई व इसे ऊर्जित कर उपचार किया जाता है। प्राण ऊर्जा ही स्थूल शरीर बनाती है। अतः प्राण् ऊर्जा को व्यवस्थत करनें से स्थूल शरीर ठीक होता है। शरीर अपनी चिकित्सा करने में दक्ष है। प्राणऊर्जा शरीर के रसायन की बदलनें में समर्थ है।यह इसे बढ़ाता है।प्राण शरीर से आई नकारात्मकता व कालीऊर्जा को सफाई कर कम किया जाता है व अर्जित करनें के क्रम में स्वस्थ्य ऊर्जा दी जाती है। प्राण शरीर की दरारें भर जाती है व स्थ्वास्थ्य किरणें संग्रहित की जाती है।
यह सामान्य रोगों में तो बहुत कारगर है लेकिन जटिल रोगों में रोगी के जीवन की गुणवता जरूर बढ़ाता है । रोगी अन्य दवाईयां भी लेता है । स्थूल शरीर में प्रकट हुआ रोग स्थूल दवाओं से भी ठीक होता है। अतः अन्य दवाऐं लेतें रहना है। यह रोगी के ठीक होने की क्षमता को तीन गुणा बढ़ाता है । सफलता के लिए उन्नत प्राणिक हिलर चाहिए । व्यक्ति स्वयं भी सीख कर अपना उपचार कर सकता है । मुझे छोटे-छोटे प्रयोगों द्वारा इसकी यथार्थता का परिचय मिला । मैं इसकी सहायता से अपनों की सामान्य चिकित्सा भी करने लगा हूं । अभी मैं इसका विद्यार्थी हूं । इसलिए इस परअधिक कहना कठिन है । आप अपने विचार प्रस्तुत कर सकते हैं ।

 

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प्राणिक हीलिंग क्या है व इससे उपचार कैसे होता है ?

बिना दवा के रोग ठीक करने की कला प्राणिक हीलिंग है।प्राणशक्ति उपचार एक पुराना विज्ञान एवं उपचार की एक कला है जो सम्पूर्ण दृश्य शरीर के लिए प्राणशक्ति जैसा कि ओजस्वी ऊर्जा अर्थात सूक्ष्म ऊर्जा का उपयोग करती है । प्राण को बढ़ाने हेतू ही प्राणायाम करते हैं ।Pranic Healingमास्टर चो कोक् सुई द्वारा यह पुनः खोजी जाकर स्थापित की गई है । इसके परीक्षण हेतु 2 वर्कशाॅप किए । प्राचीन विद्या जिसे सीखने में वर्षाें लगते थे वह दो दिन में सीखी जा सकती है ।
यह कोई जादु, अन्ध विश्वास या सम्मोहन कला नहीं है । यह कोई परासामान्य विद्या नहीं, बल्कि प्रकृति के उन नियमों पर आधारित है जिससे हम अनभिज्ञ हैं । यह एक वैज्ञानिक विद्या है जो प्राण ऊर्जा पर आधारित है । प्राण शरीर और इसमें स्थित चक्रों को देख कर रोग का पता लगाया जाता है। इलाज के पूर्व इसी द्वारा जांच की जाती है । इस ऊर्जा से कई प्रकार के रोगों का उपचार किया जाता है । रैकी, एक्यूप्रेशर, स्पर्श चिकित्सा, मानसिक उपचार, विश्वास उपचार, एक्यूपन्चर, चुम्बक थैरेपी, आदि अनेक चिकित्सा प्रणालियां प्राण ऊर्जा पर ही आधारित है ।
क्या यह प्लेस्बो प्रभाव है या वास्तव में इससे उपचार होता है । प्राण सूक्ष्म ऊर्जाएं होती है जो स्थूल शरीर बनाती है । इसी सूक्ष्म शरीर को आभामण्डल कहते हैं । किरलियन फोटोग्राफी द्वारा आभामण्डल का फोटो लेना इसका प्रमाण है । इसमे रोगी को स्पर्श नहीं किया जाता है न ही कोई दवाई दी जाती है ।

( to be continued……..)