Art of Living · Articles · Life-Management · Personality · Self-Healing · Stress Management

क्या आर ओ पेयजल स्वास्थ्य के लिए श्रेष्ठ है?

डीमिनरलाइज्ड/कम टीडीएस वाले पेयजल के कुप्रभाव

हमारी ५० प्रतिशत शरीर पानी से बना है.पानी का कार्य कोशिकाओं तक भोजन पहचाना है व विजातीय तत्वों को बाहर निकालना है.

पानी पिने की विधि

  • पानी हाथ की अंजुली से पीना चाहिये.
  • बैठ कर पानी पीना चाहिए.
  • गिलास को होठों से लगा कर  पानी  पिए .
  • पानी लो टीडीएस अथार्त ३०० टीडीएस का आदर्श है इससे कम होने पर पानी भूखा होने के कारण शरीर से खनिजों को शोषित कर लेता है. इससे शरीर में सुक्ष्म खनिजों की कमी होने से बहुत से रोग हो जाते है.
  • कम टी डी एस वाले पानी के पिने से  तृप्ति नहीं होती,कमजोरी ,ज्यादा  पेशाब आना , लाल रक्त कणिकाओ का कम होना,  सरदर्द  व अनियमित धडकन होती है.R O Water

अशुद्ध पानी                                                      : उसे  स्वस्थ करने के उपाय

गंदा  पानी/  जिसमे अघुलनशील तेरते कण  हो  –  सेंड फ़िल्टर  या फिटकरी डाल कर स्वस्थ  बनाए

बदबूदार व बेस्वाद   पानी                                    –       एक्टिवेटेड कार्बन फ़िल्टर  ( समय समय पर बदलते रहे   ) से स्वस्थ बनाए

कठोर पानी (जिसमे टी डी एस ५०० से ज्यादा हो )- आर ओ  से घटाए , लेकिन उसका टी डी एस ३००   के आसपास रखे  .

विषाणु-जीवाणु युक्त पानी                                     –          अल्ट्रावायलेट  रेज  फ़िल्टर या पानी को उबाल कर स्वस्थ बनाए

Related Posts:

हमारी जीवन शैली रोगों की जनक हैं –स्वास्थ्य-सेतु

योग-प्राणायाम के अभ्यास में आड़े आने वाली आंतरिक बाधाएं

समस्या अन्दर है, बाहर नहीं, सुलझाए भी अंदर से

 

Art of Living · Life-Management · Self-Healing · Uncategorized

स्वास्थ्य रक्षक भोजन

मुख्यतः हमारे रोगो का कारण हमारा भोजन है। पोषक भोजन नहीं करने के कारण हम बीमार होेते है। आवश्यक तत्व, खनिज एवं विटामिन जरूरी है। इनसे शरीर की प्रतिरोध शक्ति मजबूत रहती है ताकि रोग न पनप सके।स्वास्थ्य रक्षक भोजन
रोग का सामना भी हम आहार द्वारा कर सकते है। आहार को व्यवस्थित कर हम शरीर को ऊर्जावान व स्वस्थ रख सकते है।
सुबह का नाश्ता न करने से ह्नदय रोग होने की संभावना कम होती है।
नमक का अधिक प्रयोग गुर्दे का कार्य बढ़ाता है।
शक्कर भी अंततः वसा में बदलती है। इसलिए अतिरिक्त शक्कर भी वसा की तरह हानिकारक है। कम वसा मुक्त पैक्ड फूड को स्वादिष्ट बनाने के क्रम में अधिक शक्कर जोड़ी जाती है। प्रसंस्करित भोजन में शक्कर अधिक होती है।अतएव उससे बचने की जरूरत होती है।
जीवाणु विषाणु जनित रोगों को छोड़कर शेष रोग शरीर में किसी न किसी तत्व की अधिकता या कमी से होते है।

Art of Living · Life-Management · Meditation · Spirituality · Uncategorized

ओम जपने से भीतरी संतुलन बढ़ता

संतुलन स्थापित करने में सहायक

ओम जपना मात्र शरीरिक क्रिया नहीं हैं। इससे उत्पन्न ध्वनि शरीर को व्यवस्थित करती है। शरीर अपने निज स्वभाव को प्राप्त होता है। असंतुलन,विकृति व अराजकता का नाश होता है। हमारे शरीर के प्रत्येक अणु को शान्ति मिलती है। उन्हें ठीक होने में मदद मिलती है।

Om sadhanaओम जपना मानसिक ग्रन्थियों को भी खोलता है। योग व्यक्ति को व्यर्थ की सोच से ऊपर उठाता है तथा व्यक्ति के भीतर बैठी घृणा, ईष्र्या, लोभ, काम आदि को मिटाता है । हम अपनी नकारात्मकता को पहचानने लगते हैं, जिससे उसकी मात्रा घटती है। आत्म देह की पहचान जीवन की सार्थकता बताती है। शरीर से मन की शक्ति बहुत ज्यादा है और मन से आत्मा की शक्ति अनन्तगुना है। हम आत्मा की सत्ता को ही भूल गये हैं, जब हम आत्मा को जानेगें तो मन की शक्ति जाग्रत कर पायेगें। मन द्वारा स्वस्थ होने की क्षमता को पुनस्र्थापित करना है। देह को बनाने वाले डी.एन.ए. (डीआक्सीराइबो न्यूक्लिक एसीड- जीन) एवं डी.एन.ए. बनाने वाले मन को बदलता है।
भावो को गहन
इनको भावपूर्ण तरीके से, संकल्प के साथ करने पर पूरा लाभ मिलता है। ओम जपना को जोर से करने की आवश्यकता नहीं है। उन्हें भाव से करना है। समर्पण के साथ करना है। पूरी श्रद्धा के साथ करना है। विराट के साथ एक होकर करना है। भावमय होकर होश के जप के साथ करें तो लाभ पांच गुना बढ़ जाता है। ओम जपते हुए भावना करें कि दैवीय शक्तियों की कृपा बरस रही है, मुक्तलाभ पुरूषो के आशीर्वाद मुझे मिल रहे हैं।े ओम जपने से हमारे रक्त में आक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है। प्राणांे का प्रवाह शरीर में सुचारुरूप से होने लगता है। मन शान्त रहता है जिससे अन्तःस्त्रावी ग्रन्थियों से हारमोन्स का स्त्राव नियमित होनेलगता है। इससे मानव देह की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। इससे देह में व्याप्त रोग स्वतः ठीकहोने लगते हैं। बिना पर्याप्त आॅक्सीजन के स्नायुतंत्र और ग्रन्थितंत्र दोनों असंतुलित हो जाते हैं।

Related Posts:

स्वयं को जगाने हेतु ओम साधना करें

 

 

Articles · Bloging · Personality · Spirituality

महान् लेखक बनने की कंुजी और मोपासां

प्रसिद्ध फ्रासीसी साहित्यकार मोपासां ;डंनचंेेंदजद्धबचपन से ही लेखक बनने की जिद करने लगा था। तब उसकी समझदार मां अपने परिचित प्रसिद्ध लेखक फ्लोएर्बेट ;थ्संनइमतजद्ध के पास ले गई एवं उनको बताया कि मेरा बेटा लेखक बनना चाहता है। अतः वह आपसे लेखक बनने के सूत्र जानना चाहता है।GDMaupassant
वे उस समय व्यस्त थे। फ्लोएर्बेट ने एक माह बाद बुलाया।
ठीक एक माह बाद बच्चा मोपासां उनके पास पहुँच गया। उन्होने उसे पहचाना नहीं तब उसने अपनी मां का परिचय देकर बताया कि वह लेखक बनने के सूत्र सिखने आया था तब आपने एक माह बाद आने को कहा था।
तब फ्लोएर्बेट ने टेबल पर पड़ी एक किताब उसे दी और कहा कि इसे याद करके आओ।
मोपासां उस किताब को महीने भर में पूरी तरह याद कर फिर उनके पास पहुँच गया। तब गुरु ने फिर पूछा कि क्या पूरी किताब याद कर लीं।
मोपासां ने कहा-हां कहीं से भी पूछ लिजिए। वह किताब एक बड़ी डिक्शनरी थी।
फ्लोर्बेएट आश्चर्य से उस बालक को देखते रहे फिर पूछा कि खिड़की के बाहर से क्या दिखाई देता है?
बालक ने कहा ‘‘पे़ड’’- कौनसा पेड़-‘‘पाईन का पेड़’’
ओह, ठीक से देखो-‘‘ पास के तीसरे मकान की तीसरी मंजिल से एक लड़की झांक रही है।’’
‘‘और अच्छी तरह देखो’’
तब उसने कहां -‘‘आकाश में चिडि़या उड़ रही है।’’
हां, अब ठीक है।
वह पेड़ सिर्फ पेड़ नहीं है। वह तीन मंजिला मकान, खिड़की से झाँकती लड़की,, वह आसमान, वह चिडि़या, वे सभी उस पेड़ से जुड़े हुए है। पेड़ कभी अकेला नहीं हो सकता है। इसी तरह आदमी के मामले में उसके आस-पास का समाज, उसकी वंश-परम्परा, उसके नाते-रिश्ते के लोग, उसके दोस्त-यार, इन सबको मिला कर ही वह आदमी है। इस तरह वातावरण का भी योगदान होता है। इस तरह की विस्तृत दृष्टि चाहिए।तब जाकर ही साहित्य बनता है।
उसी दिन से मोपासां ने उन्हें अपना गुरु बनाकर उनके सूत्रों का अनुसरण कर एक महान् लेखक बने।

Related Posts:

प्रसिद्ध लेखक कैसे बने- विश्व प्रसिद्ध विलियम जिन्सेर की कृति ‘‘आॅन राईटिंग वेल’’

भाव एवं विचार ही हमारे निर्माता हैःराॅन्डा बर्न की ‘‘द सीक्रेट’’ का सार

मेरी नई पुस्तक “जियो तो ऐसे जियो” का एक परिचय

समस्या अन्दर है, बाहर नहीं, सुलझाए भी अंदर से

 

Art of Living · Articles · Life-Management · Meditation · Personality · Spirituality

आत्मशक्ति/मस्तिष्क की क्षमता: मुनि अजितचन्द्र का महा श तावधान

जैन मुनि अजितचन्द्र सागर जी द्वारा दिनांक 04.03.2012 को मुम्बई में द्विशतावधान का प्रयोग किया गया ।

शतावधान
शतावधान

तीन हजार दर्शकों के साथ-साथ तत्कालिन विधान सभा स्पीकर श्री दिलीप पाटिल, उच्च न्यायालय के न्यायाधिश श्री कमल किशोर तातेड़ एवं न्यूरोलोजिस्ट डाॅ0 सुधीर शाह भी उपस्थित थे । दर्शकों द्वारा 200 प्रश्न व तथ्य रखे गए । जिनमे गणित के सवाल भी थे । मुनिश्री द्वारा सवालों व तथ्यों को पहले क्रमशः बताया फिर उलटा बताया गया । अन्त में लोगों ने प्रश्न क्रम बताया, उन्होने उत्तर दिया । फिर उन्होने उत्तर बताए उन्होने प्रश्न क्रम बताए । इससे हमारी आत्मा की शक्ति सिद्ध होती है ।

मुनि अजितचन्द्र ऊंझा में जन्म लिया एवं 12 वर्ष की उम्र में दिक्षा ग्रहण की । इसके बाद साढ़े छः वर्ष तक मौन रहे । उन्होने बताया कि साधना एवं ध्यान के द्वारा यह उपलब्धि प्राप्त की ।

इससे हमारी मस्तिष्क की अपार क्षमता का ज्ञान हमें होता है । हम उसका कितना प्रयोग कहां कर रहे हंै । चैतन्य-आत्मशक्ति का प्रयोग देख कर प्रेरित होने की आवश्यकता है ।

 

Related posts:

In record bid, Jain monk to recall on the spot 500 questions ..

Maha Shat-Avadhan by Munishri Ajitchandra Sagar-ji on 4th …

 

Uncategorized

कब तक गलतियों व क्षमा का क्रम चलेगा ?

प्रिय आत्मन,

 

kshama-yachna

मुझसे गलतियां हुई है। मेरी चुकें बढी है, व्यवहार में रूखा हूं, आपके प्रति कुछ अप्रिय कहा है एवं किया है। इसका खेद है। औपचारिक क्षमा नहीं, दिल पर हाथ रख कर क्षमा चाहता हूं।

अपनें अन्तर में झांकनें पर भूले स्पष्ट दिखती है, जिसकी सजा भी आप दे सकतें हो।

एक प्रश्न मन में आता है कब तक यह क्रम गलतिया करना व क्षमा मांगता रहूगा?

क्षमा प्रार्थी

जयन्ती-मीना जैन

Related Posts:

चेतना की यात्रा से संज्ञान हुआः गड़बड़ है मन में अपराधी हूँ अपना व आपका-मिच्छामि दुक्कड़म

‘पद्मपुरा’ में प्रेतादि बाधा-निवारणः वैज्ञानिक रहस्य

तनावमुक्ति का, सफल होने का उपाय : क्षमा करना

 

Art of Living · Life-Management · Personality · Self-Healing · Stress Management

रोगों का असली कारण अचेतन में होता है

इस प्रगतिक्रम मंे उतरते-उतरते इन दिनों आरोग्यशास्त्र के क्षेत्र मंे इस तथ्य को खोज निकाला गया है कि शारीरिक रोगों के सन्दर्भ मंे आहार-विहार, विषाणु आक्रमण आदि को तो बहुत ही स्वल्प मात्रा में दोषी ठहराया जा सकता है। रुग्णता का असली कारण व्यक्ति की मनःस्थिति है।
सुविख्यात मनःशास्त्री एच. एलेनवर्गर के शोधग्रन्थ ‘‘ए हिस्ट्री आॅफ डायनिमक साइकियाट्री’’ के अनुसार शरीर की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष क्रियाओं पर पूरी तरह मानसिक अनुशासन ही काम करता है।
यह मोटा निष्कर्ष हुआ। बारीकी मंे उतरने पर पता चलता है कि अमुक शारीरिक लोग अमुक मनोविकार के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं और वे तब तक बने ही रहते हैं जब तक कि मानसिक स्थिति मंे कारगर परिवर्तन न हो।
आहार-विहारजन्य साधारण रोग तो शरीर की निरोधक जीवनी शक्ति ही अच्छी करती रहती है। उसी का श्रेय चिकित्सकों को मिल जाता है। सच्चाई तो यह है कि एक भी छोटे या बड़े रोग का शर्तिया इलाज अभी तक संसार के किसी भी कोने में, किसी भी चिकित्सक के हाथ नहीं लगा है। कोई भी औषधि अपने आश्वासन को पूरा कर सकने में सफल नहीं हुई है। अँधेरे मंे ढेले फेंकने जैसे प्रयास ही चिकित्सा क्षेत्र में चलते रहते हैं।
शरीर शास्त्री भी अब इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि आरोग्य और रुग्णता की कुंजी मनःक्षेत्र में सुरक्षित है। अब क्रमशः औषधि उपचार का महत्त्व घटता जा रहा है और मानसोपचार को प्रमुखता दी जा रही है।
मानव मन के विशेषज्ञ एरिके फ्राम के गं्रथ ‘‘मैंन फार हिमसेल्फ’’ के अनुसार मानसिक विकृतियों में से सामयिक उलझनों के कारण तो बहुत थोड़े से होते है।अधिकतर उनका कारण नैतिक होता है। भीतर दो व्यक्तित्व उत्पन्न हो जाते है और जिनमें निरन्तर संघर्ष चलता रहता है। फलस्वरूप रोग खड़े हो जाते है।
मनीषी एल. के फ्रैंक के ग्रंथ ‘‘सोशल एनालिसिस’’ के अनुसार विक्षिप्त, अर्ध-विक्षिप्त और विक्षिप्ता के सन्निकट सनकी लोगों से प्रायः आधा समाज भरा पड़ा है। यमलोक के अधिपति चित्रगुप्त को अचेतन मन ही समझा जाना चाहिए। उनका कार्य क्षेत्र यमलोक वह मन संस्थान जिसमें प्रतिफल को परिणत कर सकने की ईश्वर प्रदत क्षमता मौजूद है। यम, नियमन व्यवस्था एवं अनुशासन को कहते है। मस्तिष्क को यमलोक और उसकी मूलभूत सत्ता को , चित्त को चित्रगुप्त की संज्ञा देकर शास्त्रकारों ने सही चित्रण किया है। ईश्वर ने सर्वत्र स्व संचालित पद्वति रखी है।ताकि न्याय व्यवस्था अगल से न करनी पड़ी।