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चैत्र नवरात्रि में नीम रस क्यों पीना चाहिए ?

चैत्र माह में गर्मी प्रारम्भ हो जाती हैl मौसम परिवर्तन के कारण अनेक रोग हो जाते हैl इनसे बचाव  के लिए आयुर्वेद में  प्रातः भूखे  पेट नौ दिन नीम रस पिने का  विधान हैl

नीम के बारे में हमारे ग्रंथों में कहा गया है-

निम्ब शीतों लघुग्राही कटुकोडग्रि वातनुत।

अध्यः श्रमतुट्कास ज्वरारुचिकृमि प्रणतु॥ 

नीम शीतल, हल्का, ग्राही पाक में चरपरा, हृदय को प्रिय, अग्नि, वात, परिश्रम, तृषा, ज्वर अरुचि, कृमि, व्रण, कफ, वमन, कुष्ठ और विभिन्न प्रमेह को नष्ट करता है। नीम में कई तरह के लाभदायी पदार्थ होते हैं।

  • नीम जूस मधुमेह रोगियों के लिये भी फायदेमंद है। अगर आप रोजाना नीम जूस पिएंगे तो आपका ब्लड़ शुगर लेवल बिल्कुल कंट्रोल में हो जाएगा।
  • नीम के रस की दो बूंदे आंखो में डालने से आंखो की रौशनी बढ़ती है और अगर कन्जंगक्टवाइटिस हो गया है, तो वह भी जल्द ठीक हो जाता है।
  •  शरीर पर चिकन पॉक्स के निशान को साफ करने के लिये, नीम के रस से मसाज करें। इसके अलावा त्वचा संबधि रोग, जैसे एक्जिमा और स्मॉल पॉक्स भी इसके रस पीने से दूर हो जाते हैं।
  •  नीम एक रक्त-शोधक औषधि है, यह बुरे कैलेस्ट्रोल को कम या नष्ट करता है। नीम का महीने में 10 दिन तक सेवन करते रहने से हार्ट अटैक की बीमारी दूर हो सकती है।
  •  मसूड़ों से खून आने और पायरिया होने पर नीम के तने की भीतरी छाल या पत्तों को पानी में औंटकर कुल्ला करने से लाभ होता है। इससे मसूड़े और दाँत मजबूत होते हैं। नीम के फूलों का काढ़ा बनाकर पीने से भी इसमें लाभ होता है। नीम का दातुन नित्य करने से दांतों के अन्दर पाये जाने वाले कीटाणु नष्ट होते हैं। दाँत चमकीला एवं मसूड़े मजबूत व निरोग होते हैं। इससे चित्त प्रसन्न रहता है।
  •  नीम के रस का फायदा मलेरिया रोग में किया जाता है।
  • नीम वाइरस के विकास को रोकता है और लीवर की कार्यक्षमता को मजबूत करता हैl

स्वास्थ्य सेतु में प्रातः नीम रस सुबह 7 बजे उपलब्ध है,आप पीने पधारेl

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स्वस्थ रहने हेतु जम कर ताली बजाए

ताली दुनिया का सर्वोत्तम एवं सरल सहज योग है l यदि प्रतिदिन यदि नियमित रूप से ताली बजाई जाये तो कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं को सुलझाया जा सकता है। ताली बजाने से पहले हमें सरसों या नारियल का तेल अपने हाथों पर लगा लेना चाहिए।

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डॉ. डोगरा के मुताबिक, इस थेरेपी के लिए सुबह का समय सर्वोत्तम है। सुबह-सुबह 20-30 मिनट तक ताली बजाने से आप स्वस्थ और सक्रिय रहेंगे। फिर किसी हठयोग या आसनों की जरूरत नहीं रहेगी। यदि दिन भर  में लगभग 1500 बार ताली बजाये  तो हम बिल्कुल स्वस्थ रहते हैं।

ताली बजाना मात्र एक  व्यायाम नहीं हैl ताली बजाने से हमारे दोनों हाथों के बिंदु दब जाते हैं जिसके कारण हमारे शरीर को बहुत ही लाभ पहुंचता है।एक्युप्रेशर विज्ञान के अनुसार हाथ की हथेलियों में शरीर के समस्त अंगों के संस्थान के बिंदू होते हैं। जब ताली बजाई जाती है तब इन बिन्दुओं पर बार-बार दबाब यानिप्रेशर पड़ता है जिससे शरीर की समस्त आन्तरिक संस्थान में उर्जा जाती है और सभी अंग अपना काम सुचारू रूप में करने लगते हैं।

ताली बजाने से शरीर के विकार खत्म होते हैं और वात, कफ और पित्त का संतुलन ठीक तरह से बना रहता है। मानसिक तनाव, चिंता और कब्ज के रोग भी ताली बजाने से खत्म होते हैं।लगातार ताली बाजाने से आपका शरीर बीमारियों से लड़ने में सक्षम होता है। जिससे कोई भी बीमारी आसानी से शरीर को नहीं लगती है।ताली बजाने से शरीर स्वस्थ और निरोग रहता है।

जब भी हम लगातार ताली बजाते हैं तो हमारे ब्लड में कोलेस्ट्रॉल कम होता है जिससे हमें हार्ट का खतरा कम रहता है। इस प्रकार की ताली बजाने से कब्ज, एसिडिटी, मूत्र, संक्रमण, खून की कमी व श्वांस लेने में तकलीफ जैसे रोगों में लाभ पहुंचता है।

जब हम लगातार ताली बजाते हैं, तो हमारी ऑक्सीजन का फ्लो सही तरीके से काम करता है, हमारे फेफड़ों में ऑक्सीजन सही तरीके से पहुंचती है, जिसके कारण हम हेल्दी रहते हैं। इसके अलावा हृदय रोग, मधुमेह, अस्थमा, गठिया आदि बीमारियों से हमें राहत मिलती हैl शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और बीमारियों से बचने के लिए भी क्लैपिंग करनी चाहिए।कहा तो यहां तक जाता है कि कीर्तन के समय हाथ ऊपर उठा कर ताली बजाने  में काफी शक्ति होती है। इससे हमारे हाथों की रेखाएं तक बदल जाती हैं।

ताली बजाने से बच्चों का दिमाग तेज़ होता है।  जब बच्चे लगातार ताली बजाते हैं तो उनकी लिखावट साफ हो जाती है।

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हमारी जीवन शैली रोगों की जनक हैं –स्वास्थ्य-सेतु

आज हमारी जीवन शैली बाजारवाद, उपभोक्तावाद एवम् जल्दबाजी से विक्रत हो गई है । हमारा भोजन स्वाद के अधीन हो गया, पोषकता को भूल गये । श्वास की लय टूट गयी है ,उतावल ने उसे असहज बना दिया । हमको व्यस्तता ने स्वंय के प्रति अंधा बना दिया है। हम आदतों के पुतले हो गये । अतः जीवन शैली रोगों की जनक है ।प्रतिक्रियात्मक शैली ने सहजता हमसे छीन ली है । हमारी सोच एवं आपाधापी हमें स्वस्थ नहीं रहने देती है ।सोच सम्यक् नही होने से जीवन भी सम्यक नहीं रहता है । सोच विरोधाभाषी होने से शरीर के स्त्राव भी संतुलित नहीं रहते है । शरीर की प्रज्ञा भी सही दिशा में कार्य नहीं कर पाती है । जीवन में खुशी की लहर रह नहीं पाती है । शरीर में खिंचाव बढते है जिससे रोग बढते है।  I am resposible for my illness
जो अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रह कर निरन्तर निरोगी रहना चाहते है, अपने परिवार एवं इष्ट मित्रांे को आर्दश रूप में स्वस्थ रखना चाहते है। यह ग्रुप उनके लिये है। समग्र चिकित्सा में विश्वास करते है। वैकल्पिक चिकित्सा भी लेने को तत्पर है। चिकित्सा के बाजारीकरण को समझते है। दवा माफिया के प्रपंच से अवगत है। यह उन मित्रो के लिये जो नई संभावना खोजना चाहते है।

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योग-प्राणायाम के अभ्यास में आड़े आने वाली आंतरिक बाधाएं

योग चिकित्सा हम जारी क्यों नहीं रख पाते हैं ? हम गोलियां खाकर क्यों ठीक होना चाहते हैं ? रोग तो हम पैदा करते है लेकिन चाहते हैं कि डाॅक्टर ठीक कर दे । मनुष्य सरल रास्ता पसंद करता है । हम कठोर कदम पसंद नही करते हैं । सुविधा पसंद क्यों हो गए हैं ? ठीक होना सब चाहते हैं लेकिन सरल रास्ते से व अपनी शर्तों पर इसलिए ठीक नहीं हो पाते है ।
योगासन व प्राणायाम करते वक्त बहुत से विघ्न आते हैं । मन कहता है कि अरे इन आसनों से क्या हो जाएगा । ज्यादा योग मत करो । कभी मन नहीं लगता है । कभी ब्रेक लेने का मन करता है। कभी शरीर जंभाई लेने लगता है । कभी थकान का भाव मन में आता है । कभी कमजोरी लगती है । कभी कहीं दर्द उठता है ।

young woman training in yoga pose on rubber mat isolated
हम योग क्यों नहीं करते है ? अधिकांश लोगों को योग करना सुहाता नहीं है । योग करने में समस्याएं क्या है ? इसका महत्व नहीं जानने वाले योग नहीं करते हैं । योगाभ्यास जारी रखने में प्रमुख बहाने वाली बाधाएं निम्न प्रकार से हैः-
1. आत्मछवि – हम अपने मन में अपनी छवि रखते हैं । यह जब खराब होती है तो व्यक्ति यथा स्थिति वादी रहता है । ऐसे मे वह परिवर्तन का विरोध करता है । वह अपनी आदतों को बदलना नहीं चाहता है व उसमे स्वयं को सुरक्षित समझता है । ऐसे लोग हताश हो जाते हैं ।
2. नजरिया – स्वस्थ दृष्टिकोण के अभाव में व्यक्ति अच्छी तरह सोच नहीं सकता है । उसे योग प्राणायाम बोरियत लगते हैं । वह अपने पूर्वाग्रहों के कारण उसका महत्व समझ नहीं पाता है ।
3. लगाव – कुछ व्यक्यिों का लक्ष्य स्पष्ट नहीं होता है । अतः स्वास्थ्य को महत्व नहीं देते हैं । धन व शोहरत कमाने में डुबे रहते हैं । योग से स्वयं अपना लगाव नहीं स्थापित कर पाते हैं । कामुक व पेटु व्यक्ति योग पसंद नहीं करता है । इनके पास योग नहीं करने के अनेक बहाने होते हैं ।
4. योग की शक्ति पर अविश्वास – हमें योग की शक्ति पर भरोसा नहीं होता है । ‘‘योग से क्या हो जाएगा’’ की तरह की बात करते हैं । उन्हे सदैव संशय रहता है । ऐसे व्यक्ति योग नहीं करते हैं ।
5. गलतफहमियां – कुछ व्यक्ति गलतफहमियों के कारण योगाभ्यास नहीं करते हैं । वे अपनी सुविधा अनुसार बातों की व्याख्या कर लेते हैं । ऐसे व्यक्तियो के मन में योग के प्रति कोई दुर्भावना होती है । वे योग का सही मूल्य नहीं जानते हैं।
6. बीमारी – शरीर बीमारी के कारण योग करने में असमर्थ होता है इसलिए बीमार लोग नियमित योग कर नही पाते । रोगी के कुछ अंग जकड़ जाते हैं या कड़क हो जाते हैं । शारीरिक कमजोरी के कारण कुछ लोग योग कर नहीं पाते हैं ।
7. आलस्य – कुछ व्यक्ति सुस्ती के कारण योग नहीं कर पाते हैं । योग करते वक्त उन्हे जंभाई आती है । प्रतिदिन चाहकर भी ऐसे व्यक्ति योग निरन्तर कर नहीं पाते हैं । समय नही का रोना सदैव रोते रहते हैं ।
8. लापरवाही – कुछ साथी ‘सब चलेगा’ के भाव में जीते हैं । अतः योग करना उन्हे कठिन लगता है । अतः स्वयं के प्रति भी जिम्मेदारी नहीं लेते हैं । ऐसे लोग कार्याें की प्राथमिकता तय नहीं करते हैं । जो प्रत्यक्ष होता है वही करते है । वे सबके लिए दूसरों को दोष देते हैं । ऐसे लोग खुद सकारात्मक नहीं होते हैं ।
9. थकान – सदा थकान अनुभव करने वाले भी योगासन अच्छी तरह कर नहीं पाते हैं । कुछ लोग थकान के कारण योग करने से डरते हैं ।
10. अज्ञान-अशिक्षा

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देह गगन के सात समंदर : सैन्नी एवं स्नोवा का आत्म खोजी उपन्यास:

देह गगन के सात समंदर वैसे एक कथ्य व शैली के हिसाब से उपन्यास है लेकिन वास्तव में यह एक आधुनिक उपनिषद की तरह है ।यह उपन्यास नहीं बल्कि जीवन शास्त्र है । इसमें स्वयं की खोज एवं स्वयं को पाने का वृतान्त है ।

सैन्नी एवं स्नोवा
सैन्नी एवं स्नोवा

यह एक रहस्यदर्शी, दार्शनिक एवं अन्र्तयात्रा वृतान्त है जो स्वयं की खोज में लगे हुए है । नायक एवं उसकी टोली देह के पार की अन्वेशक है । यह आत्मखोज परक उपन्यास है ।
प्रेम एवं मैत्री, अस्तित्व एवं सौन्दर्य, पुरूष और स्त्री एवं धर्म एवं अध्यात्म पर इसमे गहन चर्चा की हुई है । शब्द के पार जाने की कला इसमे बतायी हुई है । कला एवं कलाकार, कविता एवं साहित्य, मन एवं उसके पार पर बहुत विस्तृत चर्चा है ।

स्त्री व पुरूष सम्बन्धों में गहराई व आत्मीयता बढ़ने से जीवन का रहस्य समझा जा सकता है । पारम्परिक ढर्रे पर जीने से बेहोशी बढ़ती है । स्त्री-पुरूष सम्बन्धों में अपूर्णता जीवन में अपूर्णता का कारण है । स्वयं को जानने की दिशा में यह एक मार्ग है । अपने भीतर के विपरित लिंग से मिलने में बाहर का साथी मात्र सहायक है । असल तो अपनी ही देह के विपरित लिंग से मिलना है। दूसरों के बहाने हम अपने ही ठिकाने तलाश रहे हैं । सजगता व्यक्ति को नये आयाम देती है ।

नर-नारी के स्वाभाविक देहयोग और देहभोग तक से डरते रहेगें, जिसके बिना हम न स्वयं को जान सकते है, न ही दूसरे को । दमन व भय ने नारी को अधुरा बना दिया है । वह समर्पण व प्रेम से वंचित होने से खण्डित है ।
आज देह लोलुपता के विकास की जगह सहभागी चेतना का विकास आवश्यक है।आत्मा स्थिर या तैयार नहीं होती है । यह एक घटना है, संज्ञा नही है । इसे रचना पड़ता है । इसका निर्माण दृष्टा होने पर होता है ।

इसके लेखक मनाली के रहने वाले सैन्नी एक यायावर है जो हिमालय में घुमते हुए अपनी खोज में व्यस्त है। परम्परागत व संगठित धर्मों के विरूद्ध है। सच्चे अध्यात्म के राही है।

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मेरी आने वाली पुस्तक ‘तनाव छोड़ो ,सफलता पाओ’ के बारे में

 तनाव छोड़ो ,सफलता पाओ                              तनाव कम करने पर यह सम्पूर्ण पुस्तक है जिसमें 16 उपाय तनाव कम करने पर दर्षाऐ हैं । लेखक स्वयं ने अपने जीवन में अनेक तरह के तनाव भोगे हैं एवं उनका सामना सफलता पूर्वक किआ हैं। तनाव आधुनिक जीवनशैली एवं आधुनिक विज्ञान की देन है। बीमारियों का सबसे बड़ा कारण तनाव है। तनाव हमारी आदत में आ गया है, जीवन में घुस गया है। इसे जीतना अब सरल नहीं रहा है। यह दिखाई भी नहीं पड़ता है। मोटे तौर पर तनाव एक   मानसिक स्थिति है। यह हमारे दिमाग में रहता है। तनाव हमेशा सिर से शुरू होता है। घटनाएँ सदैव तनाव का कारण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि आप घटनाओं को किस रूप में लेते और उनसे प्रभावित होते हैं। घटना की व्याख्या एवं विश्लेषण से हमारा रवैया तय होता है। हमारा रवैया ही तनाव होने और नहीं होने का कारण है।
हम तनावग्रस्त होने के कारण एवं अपनी अनेक तरह की कमजोरियों के कारण अपने विपुल ऊर्जा भण्डार का पूरा उपयोग नहीं कर पाते हैं। अदृश्य तनाव भी बन्धन है। मनोवैज्ञानिक विकलागंता शारीरिक विकलागंता की अपेक्षा बहुत हानिप्रद होती है। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद आप परिस्थितियों एवं व्यक्तियों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया और अनुभवों की व्याख्या को तनाव के सम्बन्ध में पहचान सकेंगे और आप तनाव के प्रभावों को कम करने में पुस्तक में वर्णित उपायों का प्रयोग कर सकेंगे।
यह सात भागों में विभाजित हैं। पुस्तक के अन्त में 22 ऐसे लोगो के अनुभव हैं जिन्होने अपने तनाव कैसे दुर किए हैं। ये भी तनाव छोडने के अनुभूत उपाय हैं । इस तरह यह पुस्तक लेखक की अकेली न होकर 22 व्यक्यिों की भी हैं।

                                                                                                                                                                                                                        

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प्रणव की गुंजन से कैंसर ठीक होता है

प्रतिदिन हमें आधा घंटे तक ऊँ का उच्चारण करना चाहिए है। ऊँ दुनिया का सबसे पवित्र अक्षर माना गया है। जिसका कोई निश्चित अर्थ नहीं है। यह निराकार व असीम को प्रकट करने वाला अक्षर है। उसका शब्दों द्वारा कोई अर्थ नहीं बताया जा सकता है। यह हमारे सूक्ष्म शरीर को ठीक करता है, लयबद्ध करता है। cancer
यह एक श्रेष्ठतम प्राणायाम है। ऊँकार की ध्वनि करने से शरीर के कम्पन सुधरते है। मन शरीर व भावों में संतुलन आता है। ऊँ की ध्वनि करने से उत्पन्न कम्पन हमारी भावनाओं को सुहाते है, दिल को अच्छे लगते है। मन के शोर को कम करते है। स्वयं के प्रति सजग करते है। इस तरह के कम्पन से अशान्ति कम होती है, शान्ति बढ़ती है। स्नायु तन्त्र शिथिल होता है। उत्तेजना कम होती है। अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ संतुलित होकर अपना स्त्राव सही करती है। शरीर में फैले विषैले पदार्थ बाहर निकलते है। हमारी रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ती है।
ऊँकार की ध्वनि से उत्पन्न कम्पन हमारे शरीर के स्नायुतन्त्र को संतुलित करते है। इनमें उत्पन्न विकार का शमन करते है। इससे उत्पन्न ध्वनि शरीर को व्यवस्थित करती है। शरीर अपने निज स्वभाव को प्राप्त होता है। असंतुलन,विकृति व अराजकता का नाश होता है। हमारे शरीर के प्रत्येक अणु को शान्ति मिलती है। उन्हें ठीक होने में मदद मिलती है।
श्री श्री रविशंकर ने कहा है कि प्रतिदिन आधा घंटा तक ऊँ का उच्चारण करने से कैंसर तक ठीक हो जाता है। उनका एक अनुयायी रोज गुंजन कर अपना कैंसर ठीक कर चुका है। उादहरण स्वरूप वह बताते है कि एक जर्मन व्यक्ति जो कि ऊँ से अनभिज्ञ था। लेकिन उसने अपनी बीमारी का सामना करने प्रातः उठ कर ऊँ के समान ध्वनि आधे घंटे तक करता था। वह इससे ठीक हो गया।

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