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हँस कर रोगों को भगाए

दुनिया में प्रसन्नता नामक औषधि का कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि इसके अनुपात मंे ही शेष दवाइयां काम करती है। हँसी मन की गाँठे खोलती है। प्रसन्नता से मतलब केवल शारीरिक हास्य से नहीं है। भीतरी पवित्रता से उबरने वाला प्रसन्न भाव चाहिए। ऐसे मन की अवस्था मंे न भय होता है न शिकायत और न विरोध।
रोगी को हास्यरस प्रधान कविताएं सुनाकर जो चिकित्सा करने की विधि चली, उसका उद्देश्य भी यही सकारात्मक विचारों के लायक विद्युत् प्रवाह को पैदा करना था।
थकान शरीर में अपच, कब्ज जैसी कुछ बीमारियों को उत्पन्न करके मन के जगत् को घबराहट से भर देती है।। अतः इस बात पर विश्वास पैदा करें कि प्रसन्नता एक देवता है, कल्पवृक्ष है, जो मनोवांछित फल प्रदान करती है। तभी तो जोश बिलिंग्स ने लिखा है कि औषधि मंे कोई आमोद-प्रमोद नहीं है, लेकिन आमोद-प्रमोद में औषधि खूब भरी हुई है।
अब तो वैज्ञानिक ढंग से यह प्रमाणित हो गया है कि मानव शरीर स्वयं ही दर्द निवारक एवं तनाव को कम करने वाले हारमोन्स पैदा करता है। हंसने से इण्डोरफिन नामक हारमोन सक्रिय होता है जो एक प्रभावशाली पेन किलर है।

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बीमारी पहले मन में, मस्तिष्क में, फिर तन में

हमारा स्वास्थ्य पच्चीस प्रतिशत इस बात पर निर्भर करता है कि हम क्या करते हैं किन्तु हम क्या सोचते हैंे इस पर पचहत्तर प्रतिशत निर्भर करता है। मन यदि रुग्ण है तो व्यवहार और विचार भी रुग्ण ही होगें।
सामान्यतः रोग पहले हमारी भावनाओं में आते हंै, उसके बाद विचारो में आते है, फिर स्थूल देह में उनका प्रकटीकरण होता है। जैसा कि किरलियन फोटोग्राफी आज इसे प्रमाणित करती है। हमारे भाव-शरीर यानि आभामडण्ल में रोग के लक्षण छः माह पूर्व दिखने लगते हैं। जब किरलियन फोटोग्राफी हमारे भाव-शरीर का चित्र खींचती है तो भौतिक शरीर में होने वाली गांठ के छः माह पूर्व ही भाव-शरीर के चित्र में गांठ के स्थान पर काला धब्बा देखा जा सकता है। illness into health
मानव देह की सबसे छोटी इकाई कोशिका है। प्रत्येक कोशिका पदार्थ से बनी होती है। पदार्थ का वह सबसे छोटा कण है जिसका कोई आकार व भार होता है, उसे परमाणु कहते है। परमाणु को पुनः तोडने पर तरंग एवं कण बनते हैं जो कभी तरंग होता हंै व कभी कण-जिसे क्वान्टम कहते हैं। क्वान्टम वे ऊर्जा कण हैं जो अदृश्य हंै। प्रत्येक दृष्य पदार्थ के पीछे अदृश्य क्वान्टम का सहयोग होता है।

सूक्ष्म शरीर की विचार तरंगे व संवेदनाएॅ बाधित होती हैं तो शरीर के तल पर अनेक रोग उभर आते हंै।
मानव-मस्तिष्क एक सुपर कम्प्यूटर की तरह है जिसमंे बहुत सी धारणाओं के साफ्टवेअर लगे होते हैं। इम्प्रेशन्स के लेन देन से साफ्टवेअर अपडेट होते रहते हैं। इस की-बोर्ड का बटन दबाने पर मोनीटर पर वैसा ही परिणाम आता है, जैसा सीपीयू में उपलब्ध साफ्टवेअर प्रोसेस करता है। लक्ष्य प्राप्ति हेतु ’की-बोर्ड’ के बटन दबाने से परिणाम तो सी.पी.यू. में उपलब्ध प्रोग्राम होने पर ही आता है। अर्थात मानव देह ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति है। जिन तत्वो और शक्तियों से ब्रहाण्ड बना है, उन्ही से हमारा शरीर, मस्तिष्क एवं आत्मा बनती है। ‘यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे।’ सूक्ष्म और विराट दोनों एक है। मानव देह और ब्रह्माण्डीय देह एक ही है। यही सनातन घर्म का सार है।
जीवन-शैली बदल कर हम अपने रोग से लड सकते हैं। हम ही जाने-अनजाने अपने को बीमार करते हैं। रोग धीरे-धीरे पहले हमारे जेहन में आता है फिर शरीर में प्रकट होता है।

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मैग्नीशियम की कमी दूर कर अधिकांश रोगों को भगाए

मांसपेशियों व जोड़ों के दर्द का कारण : मैग्नीशियम की कमी

अच्छे स्वास्थ्य के लिए मैग्नीशियम बहुत आवश्यक खनिज तत्व है। सम्पूरक के रुप  में मैग्नीशियम लिया जाना जरूरी है l यह चौथा सबसे प्रचुर मात्रा में खनिज शरीर में पाया जाता  है मैग्नीशियम ह्यूमन सेल का महत्वपूर्ण हिस्सा है जो बॉडी में 300 से भी ज्यादा एंजाइम्स को रेगुलेट कर हमें हेल्दी बनाता है। साथ ही सल्फेट ब्रेन टिशू बनाने में रोल निभाता है और बॉडी में न्यूट्रिएंट्स के एब्जॉर्प्शन को तेज करता है। ये बॉडी से हानिकारक तत्वों को भी निकालता है। डॉ  नार्मन शेअली जो की दर्द प्रबंधन के विशेषज्ञ है ने लिखा है कि  वृधावस्था सम्बन्धित सभी रोगों की जड़ में मैग्नीशियम की कमी होना हैl

शरीर में कैल्शियम और विटामिन सी का संचालन, स्नायुओं और मांसपेशियों की उपयुक्त कार्यशीलता और एन्जाइमों को सक्रिय बनाने के लिये मैग्नेशियम आवश्यक है। कैल्शियम-मैग्नेशियम सन्तुलन में गड़बड़ी आने से स्नायु-तंत्र दुर्बल हो जाता है। मांसपेशियों में खिंचाव,एंठन, शुन्यता, झनझनाहट का कारण मैग्नीशियम की कमी हैl रक्त नलिकाओं एवं स्न्नायुओं में जकड़न, दर्द  एवं असुविधा का कारण भी इसकी कमी हैl मैग्नेशियम के निम्न स्तरों और उच्च रक्तचाप में स्पष्ट अंतर्संबंध स्थापित हो चुका है। निम्न मैग्नेशियम स्तर से मधुमेह भी हो सकता है। यूरोलोजी जर्नल की एक रिर्पोट के अनुसार मैग्नेशियम और विटामिन बी६ गुर्दे और पित्ताशय की पथरी के खतरे को कम करने में प्रभावी थे। कठोर दैहिक व्यायाम शरीर के मैग्नेशियम की सुरक्षित निधि को क्षय कर देते है और संकुचन को कमजोर कर देते हैl थकान भी इसकी कमी से होती हैlव्यायाम एवं शारीरिक मेहनत करने वाले लोगों को मैग्नेशियम सम्पूरकों की आवश्यकता है।

शरीर में मैग्नीशियम के घटते स्तर के कारण तेज़ सिर दर्द होने के आसार रहते हैं लगातार इस तरह की कमी बनी रहने से माइग्रेन का दर्द होता हैl यह विशेषकर महिलाओं में देखा जाता है. यही नहीं महिलाओं में पीरियड के दौरान भी इस तरह का दर्द देखा जाता है. पीरियड के दौरान यदि मैग्नीशियम से भरपूर डाइट ली जाए तो दर्द दूर हो जाता हैl

ज्यादातर सभी खाद्य पदार्थों में मैग्नीशियम आसानी से उपलब्ध  होता हैl साबुत अनाज, फल,हरी पत्तेदार सब्जियां,नट्स,फलियां सेम जैसे शाकाहारी स्रोतों में  खूब होता  हैं l मटर, नट और बीज, टोफू, सोयाबीन का आटा, बादाम, काजू, केला ,कद्दू, अखरोट और पूरे अपरिष्कृत अनाज भी मैग्नीशियम के अच्छे स्रोत हैं।

मैग्नीशियम एक खनिज लवण है जिसे  भोजन नली पचा नहीं पाती हैl लेकिन त्वचा द्वारा इसका अवशोषण अच्छा हो जाता हैlमैग्नीशियम को लेने का सबसे सरल तरीका १०० gm  मेग्नीसियम  क्लोराइड को ५०० मिलीलीटर पानी में घोल ले l  इसे कांच की बोतल में भर लेl मैग्नीशियम क्लोराइड किसी भी लेब  के केमिकल  बेचने वाले की दुकान पर मिल जाएगा l इस घोल की मालिश भी त्वचा पर  २० मिनट तक करने से लाभ होता हैl  उक्त घोल का स्प्रे भी नहाने के बाद अपने शरीर पर मल सकते है l फिर खाने के आधे घंटे के बाद एक  चम्मच ले l इस तरह मैग्नीशियम की कमी पूरी कर हम स्वस्थ रह सकते हैंl

डॉ मार्क साइरस ने  अपनी पुस्तक ‘ट्रान्सडर्मल  मैग्नीशियम थेरेपी’ में लिखा है कि डॉक्टर्स का  ध्यान इस  पर है लेकिन वे रोगों के इलाज में रूचि रखते है, स्वस्थ रखना उनका पेशा नही हैl

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योग-प्राणायाम के अभ्यास में आड़े आने वाली आंतरिक बाधाएं

योग चिकित्सा हम जारी क्यों नहीं रख पाते हैं ? हम गोलियां खाकर क्यों ठीक होना चाहते हैं ? रोग तो हम पैदा करते है लेकिन चाहते हैं कि डाॅक्टर ठीक कर दे । मनुष्य सरल रास्ता पसंद करता है । हम कठोर कदम पसंद नही करते हैं । सुविधा पसंद क्यों हो गए हैं ? ठीक होना सब चाहते हैं लेकिन सरल रास्ते से व अपनी शर्तों पर इसलिए ठीक नहीं हो पाते है ।
योगासन व प्राणायाम करते वक्त बहुत से विघ्न आते हैं । मन कहता है कि अरे इन आसनों से क्या हो जाएगा । ज्यादा योग मत करो । कभी मन नहीं लगता है । कभी ब्रेक लेने का मन करता है। कभी शरीर जंभाई लेने लगता है । कभी थकान का भाव मन में आता है । कभी कमजोरी लगती है । कभी कहीं दर्द उठता है ।

young woman training in yoga pose on rubber mat isolated
हम योग क्यों नहीं करते है ? अधिकांश लोगों को योग करना सुहाता नहीं है । योग करने में समस्याएं क्या है ? इसका महत्व नहीं जानने वाले योग नहीं करते हैं । योगाभ्यास जारी रखने में प्रमुख बहाने वाली बाधाएं निम्न प्रकार से हैः-
1. आत्मछवि – हम अपने मन में अपनी छवि रखते हैं । यह जब खराब होती है तो व्यक्ति यथा स्थिति वादी रहता है । ऐसे मे वह परिवर्तन का विरोध करता है । वह अपनी आदतों को बदलना नहीं चाहता है व उसमे स्वयं को सुरक्षित समझता है । ऐसे लोग हताश हो जाते हैं ।
2. नजरिया – स्वस्थ दृष्टिकोण के अभाव में व्यक्ति अच्छी तरह सोच नहीं सकता है । उसे योग प्राणायाम बोरियत लगते हैं । वह अपने पूर्वाग्रहों के कारण उसका महत्व समझ नहीं पाता है ।
3. लगाव – कुछ व्यक्यिों का लक्ष्य स्पष्ट नहीं होता है । अतः स्वास्थ्य को महत्व नहीं देते हैं । धन व शोहरत कमाने में डुबे रहते हैं । योग से स्वयं अपना लगाव नहीं स्थापित कर पाते हैं । कामुक व पेटु व्यक्ति योग पसंद नहीं करता है । इनके पास योग नहीं करने के अनेक बहाने होते हैं ।
4. योग की शक्ति पर अविश्वास – हमें योग की शक्ति पर भरोसा नहीं होता है । ‘‘योग से क्या हो जाएगा’’ की तरह की बात करते हैं । उन्हे सदैव संशय रहता है । ऐसे व्यक्ति योग नहीं करते हैं ।
5. गलतफहमियां – कुछ व्यक्ति गलतफहमियों के कारण योगाभ्यास नहीं करते हैं । वे अपनी सुविधा अनुसार बातों की व्याख्या कर लेते हैं । ऐसे व्यक्तियो के मन में योग के प्रति कोई दुर्भावना होती है । वे योग का सही मूल्य नहीं जानते हैं।
6. बीमारी – शरीर बीमारी के कारण योग करने में असमर्थ होता है इसलिए बीमार लोग नियमित योग कर नही पाते । रोगी के कुछ अंग जकड़ जाते हैं या कड़क हो जाते हैं । शारीरिक कमजोरी के कारण कुछ लोग योग कर नहीं पाते हैं ।
7. आलस्य – कुछ व्यक्ति सुस्ती के कारण योग नहीं कर पाते हैं । योग करते वक्त उन्हे जंभाई आती है । प्रतिदिन चाहकर भी ऐसे व्यक्ति योग निरन्तर कर नहीं पाते हैं । समय नही का रोना सदैव रोते रहते हैं ।
8. लापरवाही – कुछ साथी ‘सब चलेगा’ के भाव में जीते हैं । अतः योग करना उन्हे कठिन लगता है । अतः स्वयं के प्रति भी जिम्मेदारी नहीं लेते हैं । ऐसे लोग कार्याें की प्राथमिकता तय नहीं करते हैं । जो प्रत्यक्ष होता है वही करते है । वे सबके लिए दूसरों को दोष देते हैं । ऐसे लोग खुद सकारात्मक नहीं होते हैं ।
9. थकान – सदा थकान अनुभव करने वाले भी योगासन अच्छी तरह कर नहीं पाते हैं । कुछ लोग थकान के कारण योग करने से डरते हैं ।
10. अज्ञान-अशिक्षा

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कौनसा तेल खाए ?

डाॅक्टर बुडवीज तलने के लिए बहुअसंत्रप्त तेल ( poly unsaturated oil) प्रयोग करने के विरुद्ध थी। संतृप्त वसा को गर्म करने पर आॅक्सीकृत नहीं होते हैं और इसलिए गर्म करने पर उनमें एचएनई भी नहीं बनते हैं। Edible Oil इसलिए घी, मक्खन और नारियल का तेल कई दशकों से मानव स्वास्थ्य को रोगग्रस्त करने की बदनामी झेलने के बाद आज कल पुनः आहार शास्त्रियों के चेहते बने हुए हैं। ये शरीर में ओमेगा 3 और ओमेगा 6 का अनुपात भी सामान्य बनाए रखते हैं।
गृहणियों को खाना बनाने के लिए रिफाइंड तेल का प्रयोग नहीं करना चाहिए। बल्कि फील्टर्ड तेल का प्रयोग करना चाहिए। इससे भी अच्छा कच्ची घाणी से निकला तेल होता है। हमें कच्ची घाणी से निकला नारियल तेल ,सरसों का तेल या तिल का तेल काम में लेना चाहिए। क्योंकि ये तेल हानिकारक नहीं होते है।
सबसे बढि़या तेल जैतून का तेल होता है जो हमारे यहाँ बहुत मंहगा मिलता है। इसके बाद तिल का तेल (शीसेम आॅयल) एवं सरसों का तेल खाना चाहिए। मूंगफली के तेल में कोलोस्ट्राल की मात्रा ज्यादा होती है अतः वह भी कम खाना चाहिए।

वैसे एक मत है कि हमें अपने आसपास जो तिलहन उगता है उसीका तेल खाना चाहिए।

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आदर्श स्वास्थ्य एवं जीवन शैली पर पुनर्विचार की आवश्यकता

आरोग्यम् का उद्वेश्य व्यक्ति को स्वास्थ्य के प्रति जिम्मेदार बनाना है। चिकित्सा कार्य सेवा की जगह कमाने का जरिया बन गया है। दवा कम्पनियो ने इसका दोहन व शोेषण शुरू कर दिया है। ऐलोपेथी दवा के प्रभाव से सबसे अधिक मौेते हो रही है। यद्वपि इस विधा ने कई जाने बचाई भी है। हमारा उद्वेश्य ऐलोपेथी का विरोध करना नहीं है। उसका भी योगदान स्वीकार है। विज्ञापन की बदोलत व शार्टकट की खोज ने अन्य विश्वसनीय वेैकल्पिक चिकित्सा को भुला दिया है। चुकि ये मौते तत्समय नही होती है। दीर्घकाल में हानि पहुचाती है , अतः इनसे सम्बन्ध स्थापित करना कठिन है।
हम स्वस्थ रहने हेतु जन्मे है ।शरीर प्रकृति का दिया हुआ उपहार है । हमें उसे संभालना नहीं आता है । प्रकृति अनुरूप नही जीते हैं तभी बीमार होते हैं । प्रकृति की सहज व्यवस्था मनुष्य को स्वस्थ रखने की है । हमारी जीवन शैली रोगों के लिए जिम्मेदार है । मेरा रोग मेरे कारण है। मेरा स्वास्थ्य मेरी जिम्मेदारी है। दूसरो को इस हेतु दोष नही देता हॅू । बच्चा जन्मता स्वस्थ है व बुढापे में बीमार होकर करता है । इस यात्रा में रोग कहाॅ से आया व कौन लाया ? उसके लिये कौन जिम्मेदार है ? Related posts:

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हर रोज सर्वश्रेष्ठ कार्य कैसे करें

हम जैसा जीना चाहते हैं वैसा जी सकते हैं । प्रतिदिन स्वयं को भेजने वाली सूचनाएं बदल कर हम अपना जीवन बदल सकते हैं । हम हर रोज ठप्पे से नहीं जी पाते हैं । हम जो भी जैसा भी जीते हैं, परिणाम पाते हैं उसके पीछे उस क्षण का हमारा व्यवहार होता है । व्यवहार परिणाम लाता है । हमारा व्यवहार जीवन को प्रतिभाशाली बनाता है । अतः उसे प्रभावित करने वाले कारक क्या है ? हम जो सोचते है, तदनुरूप व्यवहार बनाता है । इस सोच का भी कारण हमारा महसूस करना है ।
व्यवहार सोच व महसूस करने से तय होता है । जैसा हम महसूस करते है उसी अनुरूप विचार आते हैं । ये दोनो परस्पर जुड़े हुए हैं । हम अपनी भावनाओं के आधार पर महसूस करते हैं । भावनाएं ऊर्जा से बनती है । भावनाओं को बदलना चेतन रूप से कठिन है । हम इसके बहाव में होते हैं । अतः इसको बदलने हमारा आगत तन्त्र बदलना होगा । अतः इनका निर्धारण हमारा शरीर रचना विज्ञान तय करता है ।Networking
हमारे शरीर में सीग्नलों का प्रवाह चलता है । निरन्तर हमारे शरीर में संदेशों का प्रवाह चलता है । हम इन सूचनाओं को पकड़ नहीं पाते हैं । जब हम कहते हैं कि मेरा मूड़ खराब है । यह हम तब कहते हैं कि मन मे निराशा के भाव है, नकारात्मक विचार चल रहे हैं व थकान लग रही है । आगे कुछ अच्छा होने की आशा नहीं है । अर्थात जब हम इन सब के संदेश-संकेत पढ़ पाते है । अर्थात जब संकेतो को ग्रहण नहीं कर हम अपना कार्य करते जाते है तो हमारे कार्यों का सही परिणाम नहीं आता है । ऐसे मे हम अपना सर्वश्रेेष्ठ नहीं दे पाते है । अर्थात हम सक्षम होते हुए भी परिणाम नहीं ला पाते है । इसलिए सचेत होकर शरीर में होने वाले परिवर्तनों को पकड़ना दिन को शानदार बना सकते हैं । तभी तो शानदार क्रिकेट खेलने वाला सचिन तेंदूलकर भी हमेशा बढि़या नहीं खेल पाता है । किसी दिन उसका प्रदर्शन ठीक नहीं रहता है । यह सब उसके शरीर मे चल रहे संदेशो को नहीं समझ कर उनका शिकार होने से होता है । जब वह अपनी भाव व मनस्थिति को समझ पाता है तो उसेे बेहतर भी बना सकता है ।
हम अपने शरीर में चलने वाले संदेशों व संकेतों के प्रति सचेत होकर उनको अपने पक्ष में कर सके तो हमारा प्रत्येक दिन सर्वश्रेष्ठ परिणाम दे सकता है । अन्यथा हम परिस्थितियों के शिकार भी हो जाते हैं व पता बाद में पड़ता है । ये सीग्नल, वैद्युतिक, चुम्बकीय, रसायनिक व अनेक प्रकार के होते हैं । इन कम्पनों से ही भावनाएं बनती/बिगड़ती है । हम आखिर स्वयं को किस तरह की सूचनाएं या संकेत (सिग्नल) फिड कर रहे हैं। इनकी भूमिका पहचानना इसलिए महत्वपूर्ण है । ताकि हम अपनी ‘इनपुट’ बदल कर दिन को शानदार बना सकते हैं ।
हम अपनी सूचनाओं से स्वयं कैसे प्रभावित होते हैं इसे देखने के लिए हार्ट रेट वेरिएबलिटी ;भ्त्टद्ध रिपोर्ट देख सकते है। इसे देखने हार्टरेट जांचने की मशीन अपने कान पर लगाएं । तब आप अपने हार्ट पर उसके प्रभाव के सिग्नल्स को तरंग की तरह देख सकते हैं ।
इस तरह की ई.एम. वेव ;म्डण्ॅंअमद्ध नामक एक हार्टमेथ कम्पनी ने मशीन बनाई है जो हमारी पल्स रेट व भ्त्ट को बताती है । इसे हम अपने कान से लगा कर अपने कम्प्यूटर पर तरंग के रूप में देख नाप सकते हैं । यह हमारे हृदय में लयबद्धता को भी बताती है । जब यह लयबद्धता (ब्वीमतमदबल) 100 प्रतिशत बताती है इसका मतलब यह है कि हृदय हमारा लयबद्ध चल रहा है । उस पर कोई अतिरिक्त भार नहीं पड़ रहा है ।
इस मशीन की सहायता से हम अपनी श्वांस को लयबद्ध भी कर विश्राम पा सकते हैं । इसमें उपर जाते ग्राफ के समय श्वास लेनी है व नीचे आते ग्राफ के समय श्वांस छोड़नी है । इस तरह श्वांस को लयबद्ध करना हृदय की शक्ति को बढ़ाता है एवं उसे स्वस्थ बनाता है ।