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जीवन में संतोष कैसे प्राप्त करना ?

अपनी पसन्द अनुसार जिओ तो संतोष मिलेगा।
हम अपने को नहीं जानते है। हम स्वयं को दूसरों की आँख से देखते है। अपने मूल्य व चाहत भी हम तय नहीं करते है। समाज सारी धारणाएँ देता है, उसी आलोक में हम जीते है। हमारी अपनी कोई स्वतन्त्र दृष्टि व विचार नहीं है। 54 वर्ष पूरे हो गये फिर भी यह पता नहीं कि मुझे क्या प्रिय है क्या अप्रिय है? जिस कार्य को करने में मजा आता है वही कार्य करों। ये दस दिन तुम्हारे है। अपने मन के अनुसार जीओ। अपने तई आप आजाद हो।
मुझे कमाने हेतु 10 दिन कुछ नहीं करना है। समाज से किसी स्वीकृति पाने की जरुरत नहीं है। किसी को दिखाने की आवश्यकता नहीं है। कुछ बाहर से पाना नहीं है। अपने को मेरे साथ रहना है। मुझे मौज से रहना है। कोई गुरु, मन्त्र, स्वार्थ, तन्त्र आपको नचाने नहीं आ रहा है।
मैं अपने से क्या चाहता हूँ? मुझे क्या अच्छा लगता है? मेरा जी कहाँ है? मुझे कहाँ से खुशी मिलती है। मुझे शान्ति कहाँ से मिलती है?
जीत की खुशी, प्राप्ति या स्वीकृति की खुशी के अतिरिक्त मुझे क्या चाहिए। दूसरों से कुछ नहीं चाहिए।
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धारणा कैसे यकीन कराती जबकि वह सत्य नहीं होता है?

धारणा कैसे सफलता में सहायक है?हमारे जीवन में धारणाओं  का बड़ा  महत्व है। हम धारणाओं से संचालित होते है। हमारा मस्तिष्क स्वतन्त्र रुप से कार्य नहीं करता है। वह पूर्वाग्रहांे से चलता है। इसका ताजा उदारहण मैं अपने जीवन से देना चाहता हूँ। बिटिया टी. सी. एस. में जोइन करने जा रही  थी। उसे मेरा पेन कार्ड गारन्टर होने से चाहिए था। मैंने अपने डाªइविंग लाइसेन्स की प्रति करा कर दे दी। उसने सही मान कर रख ली।
दिल्ली जाकर उसे पता चला कि पेन कार्ड की बजाय डाªइविंग लाइसेन्स है। मैंने जबकि तीन बार उसके दस्तावेज चैक किए, गलती न दिखी। क्योंकि मेरे मन में धारणा थी कि यह पेन कार्ड की प्रति है।
धारणाओं से मत चलो। सजगता से जीओं, वर्तमान में जीओं। मन में बसी पूर्व धारणा के आधार पर फैसलें मत करों। धारणा से व्यक्ति अंधा हो जाता है। तभी तो सामने ड्राइविंग लाइसेन्स था और मुझे वह पेन कार्ड दिख रहा था। यह धारणा का कमाल है। वैसे यह नकारात्मक उदारहण है।

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सिर्फ व्यक्तिगत कमजोरी के आधार पर किसी को दोष देना ठीक नहीं

यदि किसी के व्यक्तिगत जीवन में कोई कमजोरी है, या कुछ गड़बड़ है इसलिए उससे दूर न जाएं । व्यक्तिगत कमजोरी किसमें नहीं होती है। अपनी कमजोरी को व्यक्ति स्वयं भी पसन्द नहीं करता है। इसलिए उसकी कमजोरी को अनदेखी करें व व्यक्तिगत विशेषताओं को देखें। बहुत घनिष्ठता भले ही न बढ़ाएं लेकिल व्यवहार जरुर रखें। सम्बन्धों का आधार अच्छाईयाँ होना चाहिए। ज्यादा मीन मेख अहंकार खोजता है उससे बचें।
हमें किसी का मूल्यांकन उसकी कमजोरी के आधार पर नहीं बल्कि उसकी विशेषताओं के आधार पर करों। हमें मोती चुनने चाहिए। जीवन अच्छाई-बुराईं के मेल से बनता है। किसी में भी सारी अच्छाईयाँ या सारी बुराईयाँ नहीं हो सकती है। किसी की चारित्रीक कमजोरी उसकी अपनी समस्या है। यदि वह अच्छा प्रशिक्षक है तो उससे प्रशिक्षण लेने में ऐतराज न होना चाहिए। आपका मतलब अपने प्रशिक्षण से रखो। तभी मेरे मित्र गिरधारीजी इस तरह भेद कर व्यक्ति से परहेज नहीं रखते है। तभी तो गांधीजी ने कहाँ था कि घृणा पाप से करों पापी से नहीं। यह अच्छी बात मुझे सिखनी है।
यदि आपको कोई आपकी कमजोरी के कारण सम्बन्ध न रखें तो आपको कैसा लगेगा? आपमंे ही नहीं सबमंे कुछ न कुछ अच्छाईयाँ होती है।अच्छाईयाँ देखें।
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