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तनाव का सामना गुंजन से करें

अपने दबाव व तनाव का सामना गुंजन करके करें। भौरों की तरह गंुजन करो। बस गुनगुनाओं। इस प्रकार गुंजन करने से हमारे सारे दबाव समाप्त हो जाते है। दबी हुई इच्छाएँ व वासनाएँ गंुजन करने से निकल जाती है। वैसे आधा घंटे प्रातः काल सीधे बैठ कर गंुजन करो व दिन में जब भी मौका, मिले गंुजन करें।

गंुजन एक तरह का प्राणायाम है। भ्रामरी प्राणायाम का यह सरल रूप है। गुुंजन करने से हमारा ध्यान बढ़ता है। गुंजन करने से व्यक्ति स्वयं के पास आता है। इससे स्वयं को जानने में सहायता मिलती है। यह स्वयं पास जाने की मार्ग है, स्वयं से जुड़ने में सहायक है। अपने भटकते मन को नियन्त्रित करने का यह सरल मार्ग है। तभी तो कहते है कि जब गुनगुनाती हुई स्त्री खाना बनाती है तो उसका स्वाद बढ़ जाता है। गंुजन करना मन्त्रों का उच्चारण करने के समान है। गुंजन करने से मन्त्र शक्ति जाग्रत होती है। यह मन्त्र के गुनगुनाने की समान है।

इससे हमारी अवांछित जल्दबाजी पर नियन्त्रण होता है। मन में उठते विचारों पर लगाम लगती है। भागम-भाग पर ब्रेक लगता है। व्यक्ति भटकने से बच जाता है। इससे गुस्सा कम होता है, इससे जीवन मंे संतुलन बढ़ता है। इस तरह भावनात्मक संतुलन स्थापित होता है।

गुंजन करो और प्रसन्न रहो।

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सफल होने मानसिक थकान/तनाव केैसे मिटाएं?

एक्क्ीसवीं सदी की सबसे बड़ी समस्या मानसिक थकान है। हम सभी थक गये है। जीवन में कहीं भी  विश्राम नहीं मिलता है।दिमाग हमेशा दौड़ता रहता है।निरन्तर हम विचारों में खोये रहते है। जल्दबाजी एवं विचार करने से हम थक जाते है। मानसिक थकान से हम ज्यादा परेशान है। थकान अमूमन विचार करने से उत्पन्न होती है। विचार करने वाला बैठे-बैठे तनाव बढ़ाता है। हमारी सारी परेशानी मानसिक थकान से है।लेट कर आराम करने से मानसिक थकान नहीं मिटती। हमारी समस्या मानसिक थकान की है। थका हुआ व्यक्ति सफलता प्राप्त नहीं कर सकता है।
Lion also Tired
हम थक कर विश्राम करने घर जाते है। यदि हम थकेगें नहीं तो कभी भी विश्राम को प्राप्त नहीं कर सकते है। हम मनोरंजन करते हुए भी थक जाते है। क्योंकि मनोरंजन मंे विचार बने रहते है।
जब बच्चे एक तरह के खिलोने से खेलते हुए थक जाते है तो नए खिलोने चाहते है। एक खेल से थक कर  दूसरा खेल खोजते है। अपने प्रयत्न  बदलते रहते है। बड़े भी जीवन भर यही करते है। एक उपल्बिधी से दूसरे उपल्बिधी हेतु भागते रहते है। इससे थकान नहीं मिटती है।
इसके विपरित शारीरिक थकान हमें प्रसन्नता देती है। तभी तो खिलाड़ी खेल के मेैदान में थकते नहीं है खेल कर प्रसन्न होते है। तभी तो शारीरिक श्रम का बड़ा महत्व है। तभी गांधीजी ने एक बार कहा था कि अपने श्रम की  रोटी ही मिठी लगती है।अर्थात् मानसिक थकान से बचने हेतु हमें शारीरिक श्रम करना होगा। प्रातःकालीन भ्रमण, व्यायाम, योग, प्राणायाम आदि इसमें सहायक है। जब भी आपको थकान लगें तो शारीरिक श्रम करें। इससे आपकी मानसिक थकान मिट जाएगी। अर्थात् तनाव का सामना करने में श्रम का बड़ा महत्व है।
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जीवन ऊर्जा का क्रिड़ा स्थल: तनाव न पाले

हमारा जीवन ऊर्जा की बहती नदी समान है। हमारी सारी क्रियाएं, सोच व भावों का आधार ऊर्जा है। मनुष्य इन ऊर्जाओं का जोड़ है। जीवन ऊर्जाओं का खेल है।सफलता असफलता बहुत महत्वपूर्ण नहीं है। यह हमारी सोच पर निर्भर है। अन्यथा सब ऊर्जा का अभिव्यक्तिकरण है। इसलिए यहाँ पाने-खोने की कोई बात नहीं है। जीत-हार, मेरा-तेरा, प्यार-घृणा,सब ऊर्जा पथ है। नैतिक अनैतिक समाज तय करता है। शरीर इन सबको नहीं जानता है। इसलिए इसमें व्यक्तिगत कुछ नहीं है। तभी तो जगत को  हिन्दु धार्मिक शब्दावली में माया कहते है। हम व्यक्त एवं शान्त ऊर्जा से ही होते है।
हमें यहाँ सर्वत्र सदैव ऊर्जाएं नचाती है। बिना ऊर्जा के जीवन मृत है। जितनी ज्यादा ऊर्जा वह उतना ही जीवन्त है।
जब ऊर्जाओं को हम दबाते है तो वह अपना पथ बदल देती है। एक सामान्य पथ विकृत हो जाता है। सामान्य ऊर्जाएं विकृत होकर शरीर व मन को बीमार करती है। आवेग, आवेश एवं उन्माद आते है एवं चले जाते है। जैसे तूफान आते है वैसे ही आते है, अपना कार्य कर मिट जाते है। जब व्यक्ति पर नींद का आवेग आता है वह कुछ नहीं देखता सो जाता है। वैसे ही जब काम का आवेग आता है तो शरीर कंपता है, ऊर्जा बहती है तभी तसल्ली मिलती है। आवेग को दबाने पर वह मिटता नहीं, उसकी दिशा बदलती है।
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