स्थाई रूप से पाचन ठीक करने व ऊर्जावान बनने त्रिफला रसायन ले

त्रिफला तीन श्रेष्ठ औषधियों हरड, बहेडा व आंवला के पिसे मिश्रण से बने चूर्ण को कहते है।जो की मानव-जाति को हमारी प्रकृति का एक अनमोल उपहार हैl त्रिफला सर्व रोगनाशक रोग प्रतिरोधक और आरोग्य प्रदान करने वाली  महा औषधि है। त्रिफला से कायाकल्प होता है, त्रिफला एक श्रेष्ठ रसायन, एन्टिबायोटिक व ऐन्टिसेप्टिक है इसे आयुर्वेद का पेन्सिलिन भी कहा जाता है।सुबह के वक्त त्रिफला लेना पोषक होता है जबकि शाम को यह रेचक (पेट साफ़ करने वाला) होता है। त्रिफला का प्रयोग शरीर में वात पित्त और कफ़ का संतुलन बनाए रखता है।

इस त्रिफला में एक भाग हरड,दो भाग बहेडा व तिन भाग आवला लेते है l  प्रातः खाली पेट एक चम्मच उक्त चूर्ण   निम्नानुसार समय  पर ले व उसके बाद एक घंटे तक कुछ और न ले l

1.शिशिर ऋतू में ( 14 जनवरी से 13 मार्च) 5 ग्राम त्रिफला को आठवां भाग छोटी पीपल का चूर्ण मिलाकर सेवन करें।
2.बसंत ऋतू में (14 मार्च से 13 मई) 5 ग्राम त्रिफला को बराबर का शहद मिलाकर सेवन करें।
3.ग्रीष्म ऋतू में (14 मई से 13 जुलाई ) 5 ग्राम त्रिफला को चोथा भाग गुड़ मिलाकर सेवन करें।
4.वर्षा ऋतू में (14 जुलाई से 13 सितम्बर) 5 ग्राम त्रिफला को छठा भाग सैंधा नमक मिलाकर सेवन करें।
5.शरद ऋतू में(14 सितम्बर से 13 नवम्बर) 5 ग्राम त्रिफला को चोथा भाग देशी खांड/शक्कर मिलाकर सेवन करें।
6.हेमंत ऋतू में (14 नवम्बर से 13 जनवरी) 5 ग्राम त्रिफला को छठा भाग सौंठ का चूर्ण मिलाकर सेवन करें।

आयुर्वेद में  बारह वर्ष तक लेने का विधान है इससे पूरा  शरीर नया बन जाता है l लेकिन   वर्ष भर तक लेने से पाचन  सम्बन्धी सारी तकलीफे दूर होती है l

इस सम्बन्धी कोई प्रश्न होतो यहाँ पूछ सकते है l

Related Posts:

त्रिफला एक अमृत रसायन : कायाकल्प करें व गम्भीर रोग दूर करें

कैंसर का उपचार नहीं है लेकिन इसे होने से निश्चित रोक सकते है

तम्बाकू,रिफाइंड तेल व गहन अवसाद न हो तो भी कैंसर न हो इस हेतु निम्न कार्य करें :-

1 नियमित विटामिन डी ५००० IU विटामिन K2 के साथ ले– यह आपकी प्रतिरोध क्षमता बढ़ाएगाl

विटामिन डी  की कमी होने पर शरीर में निम्न रोग हो सकते है-उच्च रक्तचाप एवं ह्रदय सम्बन्धित सभी रोग ,अवसाद ,हड्डियों का निर्माण  सही तरीके से नहीं होना ,प्रतिरोध क्षमता का घटना  आदि.

गोली न लेना चाहे तो प्रतिदिन आधा घंटा धुप में बैठेl

2 मेग्निसियम ४०० mg प्रतिदिन ले-एक शोध में जिन चूहों में मैग्नीशियम की कमी थी उन्हें कैन्सर अधिक हुआ l इससे स्पस्ट होता है की मेग्नीसियम कैंसर रोधी तत्व है l घुटनों में दर्द,   उच्च रक्तचाप , मधुमेह ,शरीर में दर्द ,  मांसपेशियों में खिचाव,ऐठन,शुन्यता, झनझनाहट का कारण मैग्नीशियम की कमी हैl रक्त नलिकाओं एवं स्न्नायुओं में दर्द  एवं असुविधा का कारण भी इसकी कमी हैl

ज्यादातर सभी खाद्य पदार्थों में मैग्नीशियम आसानी से उपलब्ध  होता हैl  साबुत अनाज, फल,गहन हरी पत्तेदार सब्जियां,नट्स,फलियां सेम जैसे शाकाहारी स्रोतों में  खूब होता  हैं l मटर,  टोफू, सोयाबीन का आटा, बादाम, काजू, केला ,कद्दू, अखरोट और पूरे अपरिष्कृत अनाज भी मैग्नीशियम के अच्छे स्रोत हैं।लेकिन यह बहुत कम मात्रा में मिलता हैl इसलिए इसे अलग से लेने की जरूरत हैl

 

3 ओमेगा 3 प्रतिदिन ५०० mg ले या ३० -५० ग्राम अलसी खाएंl या कोल्ड प्रेस्सेड अलसी का आयल 2 चम्मच रोज ले  तो कैंसर  होने की सम्भावना कम है l

साथ ही नाडी शोधन प्राणायाम करने से कैंसर होने की सम्भावना नहीं के बराबर हैl

 

योग का पूरा लाभ उठाने षट्कर्म अति आवश्यक

हठयोग के अनुसार योग का प्रथम चरण षट्कर्म – नेति ,धौति,बस्ति,नौली,कपाल भाति एवं त्राटक हैlआसन प्राणायाम करने का पूरा लाभ शारीरिक व मानसिक शुद्धी पर ही मिलता हैl
नेति द्वारा नासिका को,धौति द्वारा पाचन तंत्र को ,बस्ति द्वारा उत्सर्जन तंत्र को ,कपाल भाति द्वारा मस्तिष्क को शुद्ध एवं त्राटक द्वारा मन की चंचलता को कम किया जाता हैl

काम, क्रोध, लोभ, द्वेष इत्यादि मानसिक मलिनताएँ शरीर के अंदर विषैले पदार्थ उत्पन्न करते हैं। अशुद्ध भावनाओं के कारण प्राणों में असंतुलन हो जाता है। शरीर के विभिन्न अवयव इससे प्रभावित हो जाते हैं। तंत्रिकातंत्र दुर्बल हो जाता है। इसलिए शरीर को स्वस्थर और शक्तिशाली बनाने के लिए मानसिक मलिनताओं को दूर करना आवश्यक है।

भय से हृदय रोग होता है। दु:ख से तंत्रिकातंत्र असंतुलित हो जाता है। निराशा से दुर्बलता होती है। लोभ प्राणों को असंतुलित करता है जिससे अनेक प्रकार के शारीरिक रोग उत्पन्न होते हैं। अहंकार जीवन की पूर्णता का आनंद नहीं लेने देता। इससे पाचनतंत्र तथा किडनी संबंधी रोग होते हैं। अधिकांश बीमारियाँ रोगी की मानसिक विकृतियों के ही कारण हुआ करती हैं।

इसी प्रकार ध्यान से संपूर्ण शरीर में प्राणों का प्रवाह निर्बाध गति से संचारित होता है।
शारीरिक ,मानसिक व भावनात्मक शुद्धी षट्कर्म से होती है जो की आसन प्राणायाम का पूरा लाभ लेने के लिए जरूरी हैl तभी कहा जाता है की हठयोग के बिना राजयोग को प्राप्त नहीं किया जा सकता हैl

साधना में बाधा : पिंड में असंतुलन (Planetary Imbalances)

स्वस्थ शरीर साधना हेतु जरूरी हैlइसके अभाव में अंतर्यात्रा नहीं की जा सकती हैl  शरीर को स्वस्थ रखने हेतु सही विचारों का होना जरूरी हैl इस हेतु व्यक्तिमें नो दोषों का समाधान करना चाहिए l
1 वात दोष
2 पित्त दोष
3 कफ दोष
4 जोडों में दर्द
५ सरदर्द
6 दस्त
7 कब्ज
8 मूत्र  आने की आवृति में गडबड

9 स्नायविक असंतुलन

एक साधक को अपनी विचार प्रक्रीया को बदलते हुए उपरोक्त दोषों का समाधान आयुर्वेद, आहार  व योगिक  प्रक्रियाओ को अपना कर साधना करनी चाहिए l दोष अनुरूप समाधान  आगे  कभी बताया जायेगा l

शवासन सबसे कठिन व सबसे महत्वपूर्ण आसन क्यों व कैसे है?

 

हमारा जीवन तनावग्रस्त होने  से हमारे शरीर व मन खीचें हुए रहते हैl  शवासन में इन दोनों को शिथिल कर विश्राम करते हैl  मन व तन को शिथिल करना बड़ा कठिन है इसलिए शवासन कठिन आसन हैl यह महत्वपूर्ण भी इसीलिए है चुकि इस आसन से जीवन के तनाव कम होते हैl  श्वसन को मंद करने से शांति प्राप्त होती हैl शरीरके एक एक अंग पर ध्यान ले जा कर उसे  शिथिल करना सम्भव है क्योंकि इस निर्देश में  आवेश यानि कोई पूर्वाग्रह नही होता हैl   इससे मांसपेशीया  व आन्तरिक अंग शिथल होते  हैl इसमें जितनी सजगता बढ़ाते है उतनी ही विश्राम की गहराई बढती  जाती हैl शवासन एक कला ही नही एक विज्ञानं भी हैl