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बीमारी पहले मन में, मस्तिष्क में, फिर तन में

हमारा स्वास्थ्य पच्चीस प्रतिशत इस बात पर निर्भर करता है कि हम क्या करते हैं किन्तु हम क्या सोचते हैंे इस पर पचहत्तर प्रतिशत निर्भर करता है। मन यदि रुग्ण है तो व्यवहार और विचार भी रुग्ण ही होगें।
सामान्यतः रोग पहले हमारी भावनाओं में आते हंै, उसके बाद विचारो में आते है, फिर स्थूल देह में उनका प्रकटीकरण होता है। जैसा कि किरलियन फोटोग्राफी आज इसे प्रमाणित करती है। हमारे भाव-शरीर यानि आभामडण्ल में रोग के लक्षण छः माह पूर्व दिखने लगते हैं। जब किरलियन फोटोग्राफी हमारे भाव-शरीर का चित्र खींचती है तो भौतिक शरीर में होने वाली गांठ के छः माह पूर्व ही भाव-शरीर के चित्र में गांठ के स्थान पर काला धब्बा देखा जा सकता है। illness into health
मानव देह की सबसे छोटी इकाई कोशिका है। प्रत्येक कोशिका पदार्थ से बनी होती है। पदार्थ का वह सबसे छोटा कण है जिसका कोई आकार व भार होता है, उसे परमाणु कहते है। परमाणु को पुनः तोडने पर तरंग एवं कण बनते हैं जो कभी तरंग होता हंै व कभी कण-जिसे क्वान्टम कहते हैं। क्वान्टम वे ऊर्जा कण हैं जो अदृश्य हंै। प्रत्येक दृष्य पदार्थ के पीछे अदृश्य क्वान्टम का सहयोग होता है।

सूक्ष्म शरीर की विचार तरंगे व संवेदनाएॅ बाधित होती हैं तो शरीर के तल पर अनेक रोग उभर आते हंै।
मानव-मस्तिष्क एक सुपर कम्प्यूटर की तरह है जिसमंे बहुत सी धारणाओं के साफ्टवेअर लगे होते हैं। इम्प्रेशन्स के लेन देन से साफ्टवेअर अपडेट होते रहते हैं। इस की-बोर्ड का बटन दबाने पर मोनीटर पर वैसा ही परिणाम आता है, जैसा सीपीयू में उपलब्ध साफ्टवेअर प्रोसेस करता है। लक्ष्य प्राप्ति हेतु ’की-बोर्ड’ के बटन दबाने से परिणाम तो सी.पी.यू. में उपलब्ध प्रोग्राम होने पर ही आता है। अर्थात मानव देह ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति है। जिन तत्वो और शक्तियों से ब्रहाण्ड बना है, उन्ही से हमारा शरीर, मस्तिष्क एवं आत्मा बनती है। ‘यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे।’ सूक्ष्म और विराट दोनों एक है। मानव देह और ब्रह्माण्डीय देह एक ही है। यही सनातन घर्म का सार है।
जीवन-शैली बदल कर हम अपने रोग से लड सकते हैं। हम ही जाने-अनजाने अपने को बीमार करते हैं। रोग धीरे-धीरे पहले हमारे जेहन में आता है फिर शरीर में प्रकट होता है।

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शौच करने का सही तरीका ताकि बवासीर,लकवा व दांतों के रोग ना हो

विधिपूर्वक शौच करने से दातों के रोग नहीं होते हैl  उषःपान(प्रातः जल सेवन) के बाद कुछ देर घुमने से मलत्याग सरलता से होता हैl

विधि:

भारतीयशैली के टॉयलेट का उपयोग करें l  शौच  हेतु  उकड़ू आसन में बैठेl  पश्चिमी शैली की टॉयलेट के प्रयोग में मलद्वार पूरा नहीं खुलता है नहीं पेट पर दबाव पड़ता हैlशौच करने का सही तरीका

दोनों हाथ ठुड्डी को पकडे रहे व दांत भींच कर रखे l  शौच या पेशाब के समय दांतों के जबड़ों को आपस में दबाकर रखने से दांत मजबूत रहते हैं।

मल छोड़ते वक्त दांतों को और भींचे और श्वास फेकेंl

शौच करते वक्त मुहं बंद रखे l  तत्समय पढ़ना – बोलना उचित नहीं हैl

सहजता से मलत्याग न होने पर कुछ लोग जोर लगाकर शौच करते हैं किंतु ऐसा करना ठीक नहीं हैl

मल आपके स्वास्थ्य को दर्शाता है, बहुत सूखा या पतला, दुर्गन्धयुक्त, चिपचिपा, रक्त या  सफ़ेद झाग युक्त मल रोग को दर्शाता हैl

 

इजरायली शोधकर्ता डॉ. बेरको सिकिरोव ने अपने शोध के निष्कर्ष में पाया कि सिटिंग मेथड कब्जियत का करण बनती है, जिसके कारण व्यक्ति को मल त्यागने के लिए लगभग तीन गुना अधिक जोर लगाना पड़ता है, जिसके कारण चक्कर और हृदयतंत्र की गड़बड़ियों के कारण लोग मर जाते हैं।

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स्वास्थ्य सेतु क्या है ?

स्वास्थ्यसेतु एक स्वास्थ्य विमर्श केंद्र  है.  यह एफ-४०,सेक्टर १४, उदयपुर ३१३००२ पर चलता है.यहाँ प्रतिदिन सुबह ६ बजे योग होता है.साथ ही प्रति  शुक्रवार को सायं ५.३० बजे स्वास्थ्य वार्ता होती है या फिर स्वास्थ्य सम्बन्धि डॉक्यूमेंट्री दिखाई जाती है.

मेरा स्वास्थ्य मेरी जीवन शैली का परिणाम है.

बीमार नहीं बीमारी का इलाज होना चाहिए.

एक पद्धति के पास एक रोग का  इलाज  नहीं है इसका अर्थ यह नहीं  है की अन्य पद्धति के पास भी  उसका इलाज नहीं है.

शरीर ने जैसे ही चालीस पार किए बीमार होना शुरू किया तो समझ में आया की जीवन शैली ठीक नहीं चल रही है.इलाज हेतु दवाई लेनी शुरू की तो पार्श्व प्रभाव नजर आने लगे . एलोपैथि के अलावा  कभी आयुर्वेद,योग,एक्यूप्रेशर,होमियोपैथी अपनाई तो  कुछ  क्षेत्र में अधिक सार्थक लगी.इस हेतु योग करते करते कराने लगे .अनुभव में आया की हम  मात्र दिखाई देने वाला शरीर ही नहीं है हमारी अन्य सुक्ष्म परते भी है.इन को ध्यान में रखने पर योग की गहराईया स्पष्ट हुई .इस तरह परम्परागत चिकित्सा पद्धतियों में रूचि हुई .

कई देसी पद्धतियां परस्पर   सहायक भी है.कई बार एक पद्धति की कमी दूसरी पद्धति से पूरी भी होती है. गावं का हड्डी जोड़ने वाला  जडीबुटी भी साथ में देता है.इस हेतु विमर्श करने की जगह है बस स्वास्थ्य सेतु .

देसी चिकित्सा के नाम पर नीमहकीम भी शोषण करते है क्योंकि हमें उनका ज्ञान नहीं होता है अत: देसी इलाज कर्ताओ की एप एवम् वेबसाइट बनाई जा रही है.

 

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उच्च रक्तचाप भगाए, नाड़ी शोधन व भ्रामरी प्राणायाम करे

स्वास्थ्य रक्षक भोजन

हमारी जीवन शैली रोगों की जनक हैं –स्वास्थ्य-सेतु

 

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मन को शांत करने भ्रामरी प्राणायाम कैसे करे

इस प्राणायाम में अभिज्ञा के और अधिक विकास के लिए ध्वनि-तरंगो का उपयोग किया जाता है। संस्कृत मंे भ्रामरी का अर्थ है भ्रमरी की या मधुमक्खी की-आवाज या ध्वनि इसमें अन्र्तनिहित है। अर्थात भ्रमरी की ध्वनि । यह प्राणायाम इस ध्वनि के साथ किया जाता है।
विधि
हठयोगप्रदीपिका में इसका वर्णन इस प्रकार हैः
वेगाद्घोषं पूरकं भृंगनादं भृंगनादं रेचकं मंदमदम्।
योगींद्राणामेवमभ्यासयोगाच्चिते जाता काचिदानंदलीला।।
भ्रमर की ध्वनि के समान घोष करते हुए तेजी से सांस लीजिए और भ्रमरी के समान ध्वनि करते हुए उसे मंद-मंद छोड़िये। भ्रामरी प्राणायाम में नाक से श्वांस भर कर धीरे-धीरे भ्रमर की गुंजन के साथ श्वांस छोड़ते हैं । यह प्राणायाम पूरी तरह शरीर को शिथिल कर आराम के साथ किया जाता है । इसमे ध्वनि निकालते वक्त न पर जोर रखें । इसे सहज होकर करते हैं ।
ध्यान लगाने वाले आसन में बैठ कर करें कमर, पीठ व गर्दन सीधी रखें । ध्वनि तरंग को मस्तिष्क में अनुभव करें व इसी पर चेतना को केन्द्रित करें ।
भ्रामरी प्राणायाम में नाक से श्वांस भर कर धीरे-धीरे गले से भ्रमर की गुंजन के साथ श्वांस छोड़ते हैं । गंुजन करते वक्त जीभ को तालु से लगायें । दांत बन्द व होठ खुले रखें । यह प्राणायाम पूरी तरह शरीर को शिथिल कर आराम के साथ किया जाता है । इसमे ध्वनि निकालते वक्त ‘न’ के उच्चारण पर जोर रखें । ओम उच्चारण में ‘म‘ पर जोर देते है तब होठ खुले रहते है । ’न’ पर जोर देने से होंठ स्वतः बन्द हो जाते हैं । दोनों में शब्दों के जोर को ध्यान में रखें । आवाज इतनी सी करे कि पड़ौसी को सुनाई दे । इसमे श्वांस लेने में 10 सैकण्ड व छोड़ने में 20 से 30 सैकण्ड तक का समय लगाएं । यह एक आवृति हुई । इसी तरह 5-10 मिनट तक भ्रामरी निरन्तर करें । इसे शान्त व शिथिल होकर करें । इसे करते वक्त शरीर को सहज रखें । पीठ, गर्दन व सिर सीधे रखें ताकि रीढ़ की हड्डी सीधी रहे । इसे करते वक्त गुंजार की ध्वनि को सिर व पूरे शरीर में फैलने दे । साथ ही इसकी प्रतिध्वनि सुने । शरीर में इसके फैलते कम्पनों को महसूस करें ।

सावधानी – कान में संक्रमण हो तो इसे न करें । इसे करते वक्त आसन स्थिर रखें । कन्धों को ढीला छोड़े व हिलाएं नहीं । जबरदस्ती गंुजार को न खींचे । जितना आराम से करेगें उतना ही अच्छा ।
सीमा -यह प्राणायाम कभी भी किया जा सकता है । सोते वक्त लेटे लेटे भी कर सकते है । इसे करने से कभी कोई हानि नहीं होती है ।
यहां

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स्वयं को जगाने हेतु ओम साधना करें

प्राचीन काल से ओम का जाप किया जाता रहा है । सभी सनातन धर्मो में इसको प्रमुखता दी है। ओम का उच्चारण होश के साथ करने से भीतरी यात्रा करने में मदद मिलती है।शरीर में होने वाली हलचलों पर ध्यान जाता है साथ ही होने वाले भाव भी दिखाई देने लगते हैं। इससे अपने को महसूस करना आता है। यह स्वयम् के भीतर उतरना है। यही आन्तरिक सत्संग है। इससे अपनी ज्योत प्रकट होती है। अपने भीतर के पट खुलते है। बाह्य आवरण, सीमाएं एवम् स्थूलता पिघलती है। सजगता पूर्वक ओम का जाप स्वयम् के प्रति सचेत बनाता हैं। इससे अपने को जानने में मदद मिलती है। बिना जागृति के ओम को जपने से शरीर शिथिल हो जाता है। ओम का उच्चारण अन्तर आत्मा को शुद्व करता है। कर्मो की अशुद्वि व अज्ञान के अन्धकार को दूर करता है।

ओम का अर्थ कोई निश्चित् नहीं है। यह निराकार, असीम, अद्धश्य व अनन्त के लिये प्रयुक्त होता है। कई बार इसे ईश्वर के लिये भी प्रयुक्त करते है।यह ध्वनियाात्मक अक्षर हैं।

किसी ध्वनि के लिए हम कंठनली और तालु का ध्वनि के आधाररूप में व्यवहार करते है। क्या ऐसी कोई भौतिक ध्वनि है, जिसकी कि अन्य सब ध्वनियों अभिव्यक्ति है, जो स्वभावतः ही दूसरी सब ध्वनियो को समझा सकती है। हाॅ, ‘ओम’ अ उ म् ही वह ध्वनि है, वही सारी ध्वनियों की भितिस्वरूप है। उसका प्रथम अक्षर ‘अ‘ सभी ध्वनियो का मूल है, वह सारी ध्वनियों की कुन्जी के समान है, वह जिव्हा या तालू के किसी अंश को स्र्पश किय बिना ही उच्चारित होता है ।‘म‘ ध्वनि-श्रंखला की अंतिम ध्वनि है। उसका उच्चारण करने में दोनो ओठो को बन्द करना पडता हैं। और ‘उ‘ ध्वनि जिव्हा के मूल से लेकर मुख की मध्यवर्ती ध्वनि के आधार की अंतिम सीमा तक मानो लुढकता आता है। इस प्रकार अ उ म् शब्द के द्वारा ध्वनि-उत्पादन की संपूर्ण क्रिया प्रकट हो जाती हैं । अतः वही स्वाभाविक वाचक ध्वनि है, वही ंविभिन्न ध्वनियों की जननी स्वरूप है। जितने प्रकार के शब्द उच्चारित हो सकते है-ओम् उन सभी का सूचक हैर्।

मन में उठने वाले प्रत्येक भाव का एक प्रतिरूप शब्द भी रहता है। इस शब्द एवं भाव को अलग नहीं किया जा सकता। एक ही वस्तु के बाहरी भाग को शब्द और अन्तर भाव को विचार या भाव कहते है। वाचक वाच्य का प्रकाशक होता है। अर्थात शब्द भाव का प्रतीक होता है।

महेश योगी के द्वारा प्रणीत भावातीत ध्यान – ट्रान्सिडेन्टल मेडीटेशन में मात्र शब्द विशेष को दोहराया जाता है। इसमें सजगता नहीं रहने से शरीर एवम् मन को विश्राम मिलता है। इससे व्यक्ति की कार्यक्षमता बढ जाती है, इसलिये यह बहुत लोकप्रिय हुआ है।

( To be continued)

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मेरी पुस्तक ‘तनाव छोड़ो ,सफलता पाओ’ से तनावरोधी कैप्सूल

हम समस्याओं के कारण तनावग्रस्त नहीं हैं, बल्कि हमारे तनावग्रस्त होने से समस्याएँ हंै।

तनाव छोड़ो ,सफलता पाओ
तनाव छोड़ो ,सफलता पाओ

 हम समस्याओं के कारण तनावग्रस्त नहीं है बल्कि हमारे तनावग्रस्त होने से समस्याएँ है।

 हमारा मस्तिष्क बहुत बड़ी कृशि भूमि के समान है। यहाॅ हम खुशी या तनाव उगा सकते है। अगर खुशी के बीज नहीं बोएंगें तो तनाव स्वतः ही खरपतवार की तरह उग आयेगा।

 तनाव मुक्त होकर नाभि पर समश्वास के साथ जीना यानि विश्राम के साथ जीना बील गेट्स, विश्व के सबसे धनाढ्य व्यक्ति होने से बड़ी उपलब्धि है। चन्द्रमा पर जाने से भी बड़ी उपलब्धि तनाव मुक्त होना है।

 यह सच है कि स्वयं आपके सिवा और कोई भी आपको तनाव नहीं दे सकता।

 मानव के सोचने की योग्यता ही जानवर और मानव के बीच का अन्तर है। इसलिए जीवन की साधारण खुशियों का आनन्द लेने के लिए ’’सोचिए’’।

 तनाव और चिंताये ऐसे तथ्य हैं जिनका जोड़ आपको ’हार्ट अटैक’ कर सकता है।

 विश्व में कोई भी शक्ति हमें नुकसान नहीं पहॅुचा सकती,जब तक कि हम पहले,अपने आप को नुकसान,नहीं पहॅुचाते।

 आपको हरएक के साथ अच्छा बनने की जरूरत नहीं है। मिलकर कार्य करना सीखिए और यह सिद्ध मत कीजिए कि आप ज्यादा समझदार है।तनावपूर्ण रहने से बेवकूफ बनना अधिक अच्छा है।

 कई बार, एक स्पष्ट और निर्भीक ’’नहीं ’’कहने से 100 सिरदर्दियों से बचा जा सकता है।

 तीर्थंकर महावीर के साधनाकाल में एक ग्वाले ने उनके कानों में कीले ठोकी तो भी वे विचलित न हुये। दूसरी तरफ हम स्वयं के माता पिता की डॅाट फटकार तक से घायल हो जाते है। महावीर के पैरो में सांप ने काटा तो भी वे तनावग्रस्त नहीं हुये और हम उसे देख कर ही डर जाते है। क्या कारण है?
 हम अपने सिवाय दूसरा कुछ नहीं बन सकते है। इसलिए कुछ बनने का प्रयास नहीं करना चाहिये। क्या गुलाब कभी चमेली बनने का प्रयास करता है ?

 दृश्य को अदृश्य धारण किए हुए है। साकार, निराकार के अधीन है। जो भी साकार एवं स्थूल है उसके लिए कहीं न कहीं निराकार एवं सूक्ष्म सहयोगी है। जब तक यह अनुभव न हो तब तक जीवित होते हुये भी हमारा जीवन से संबंध नहीं होता है। पदार्थ की सत्ता से ही हम अवगत है, चेतना की सत्ता को नहीं जानने हम उसे नकारते है। यही हमारी सबसे बड़ी भूल है।

 साक्षी रहो व स्वयं को ’फील’ करो।

 हम चेतना के जिस तल पर खड़े है,वहाँ संकट,विपरीत स्थितियां एवं कठिनाईयाॅ उसे बढ़ाने आती है।

 

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मेरी आने वाली पुस्तक ‘तनाव छोड़ो ,सफलता पाओ’ के बारे में

 तनाव छोड़ो ,सफलता पाओ                              तनाव कम करने पर यह सम्पूर्ण पुस्तक है जिसमें 16 उपाय तनाव कम करने पर दर्षाऐ हैं । लेखक स्वयं ने अपने जीवन में अनेक तरह के तनाव भोगे हैं एवं उनका सामना सफलता पूर्वक किआ हैं। तनाव आधुनिक जीवनशैली एवं आधुनिक विज्ञान की देन है। बीमारियों का सबसे बड़ा कारण तनाव है। तनाव हमारी आदत में आ गया है, जीवन में घुस गया है। इसे जीतना अब सरल नहीं रहा है। यह दिखाई भी नहीं पड़ता है। मोटे तौर पर तनाव एक   मानसिक स्थिति है। यह हमारे दिमाग में रहता है। तनाव हमेशा सिर से शुरू होता है। घटनाएँ सदैव तनाव का कारण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि आप घटनाओं को किस रूप में लेते और उनसे प्रभावित होते हैं। घटना की व्याख्या एवं विश्लेषण से हमारा रवैया तय होता है। हमारा रवैया ही तनाव होने और नहीं होने का कारण है।
हम तनावग्रस्त होने के कारण एवं अपनी अनेक तरह की कमजोरियों के कारण अपने विपुल ऊर्जा भण्डार का पूरा उपयोग नहीं कर पाते हैं। अदृश्य तनाव भी बन्धन है। मनोवैज्ञानिक विकलागंता शारीरिक विकलागंता की अपेक्षा बहुत हानिप्रद होती है। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद आप परिस्थितियों एवं व्यक्तियों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया और अनुभवों की व्याख्या को तनाव के सम्बन्ध में पहचान सकेंगे और आप तनाव के प्रभावों को कम करने में पुस्तक में वर्णित उपायों का प्रयोग कर सकेंगे।
यह सात भागों में विभाजित हैं। पुस्तक के अन्त में 22 ऐसे लोगो के अनुभव हैं जिन्होने अपने तनाव कैसे दुर किए हैं। ये भी तनाव छोडने के अनुभूत उपाय हैं । इस तरह यह पुस्तक लेखक की अकेली न होकर 22 व्यक्यिों की भी हैं।

                                                                                                                                                                                                                        

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