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रिफाइंड तेल से कैंसर हो सकता है?

अमरीका में प्रकाशित “द हैन्ड बुक ऑफ नेचुरल हैल्थ” में डॉ. बुडविज ने लिखा है कि कृत्रिम हाइड्रोजिनेटेज फैट स्वास्थ्य के लिए एक विष के सिवा कुछ नहीं है तथा स्वस्थ और निरोग शरीर के लिए आवश्यक वसा अम्ल बहुत जरूरी है प्रसिद्ध डाॅ0 योहाना बुडविज मूलतः वसा विशेषज्ञ थी जिन्होंने पेपर क्रोमेटिक तकनीक विकसित की है। डाॅ0 बुडविज के अनुसार रिफाईन्ड तेल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। वैज्ञानिक यूडो इरेसमस की पुस्तक ‘‘फेट्स देट हील फेट्स देट कील’’ बताती है कि परिष्कृत तेल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। रिफाइंड तेल में कैंसर पैदा करने वाले घातक तत्व होते है।cancer
गृहणियों को खाना बनाने के लिए रिफाइंड तेल का प्रयोग नहीं करना चाहिए। बल्कि फील्टर्ड तेल का प्रयोग करना चाहिए। इससे भी अच्छा कच्ची घाणी से निकला तेल होता है। हमें कच्ची घाणी से निकला नारियल तेल ,सरसों का तेल या तील का तेल काम में लेना चाहिए। क्योंकि ये तेल हानिकारक नहीं होते है।
तेलों का परिष्करण एक आधुनिक तकनीक है। जिसमें बीजों को 200-500 डिग्री सेल्सेयस के बीच कई बार गरम किया जाता है। घातक पैट्रोलियम उत्पाद हेग्जेन का प्रयोग तेल को रंगहीन और गन्धहीन बनाने के लिए किया जाता है। कई घातक रसायन कास्टिक सोड़ा, फोसफेरिक एसीड, ब्लीचिंग क्लेज आदि मिलाए जाते है ताकि निर्माता हानिकारक व खराब बीजों से भी तेल निकाले तो उपभोक्ता को उसको पता न चले। इसलिए इन तेलों को गन्ध रहित, स्वाद रहित व पारदर्शी बनाया जाता है। रिफाइंड, ब्लीच्ड एवं डिओडोराइन्ड की प्रक्रिया में तेल के अच्छे तत्व समाप्त हो जाते है व घातक जहर घुल जाते है।
तेलों की सेल्फ लाईफ बढ़ाने के लिए तेलों का निकल तथा हाइडाªेजन की मदद से हाइड्रोजिनेशन किया जाता है। यह तेल सफेद ठोस कड़ा और देखने में घी जैसा लगता है। यह तेल जो कभी खराब नहीं होता इसमें होते है। केमिकल्स द्वारा परिवर्तित फैटी एसीड, ट्रांसफेट और निकिल के अवशेष होते है जो शरीर के लिए चयापचित करना कठिन है। इस पूरी प्रक्रिया में बीजों में विद्यमान वनस्पतिक तत्व , विटामिन आदि पूरी तरह नष्ट हो जाते है।
सबसे बढि़या तेल जैतून का तेल होता है जो हमारे यहाँ बहुत मंहगा मिलता है। इसके बाद तिल का तेल (शीसेम आॅयल) एवं सरसों का तेल खाना चाहिए। मूंगफली के तेल में कोलोस्ट्राल की मात्रा ज्यादा होती है अतः वह भी कम खाना चाहिए। तलने के प्रक्रिया में तेल में मौजूद फैटी एसीड ट्रांस फैटी एसीड में बदल जाते है और उसमें उपस्थित सारे एन्टी आॅक्सीडेन्ट नष्ट हो जाते है। इसलिए तलना भी हानिकारक है। इसलिए तली-गली चीजें नहीं खानी चाहिए।

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वनस्पति घी भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है

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वनस्पति घी भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है

तेलों की सेल्फ लाईफ बढ़ाने के लिए तेलों का निकल तथा हाइडाªेजन की मदद से हाइड्रोजिनेशन कर वनस्पति घी तैयार होता है। यह तेल सफेद ठोस कड़ा और देखने में घी जैसा लगता है। यह तेल अब आसानी से खराब नहीं होता इसमें होते है। केमिकल्स द्वारा परिवर्तित फैटी एसीड, ट्रांसफेट और निकिल के अवशेष होते है जो शरीर के लिए चयापचित करना कठिन है। इस पूरी प्रक्रिया में बीजों में विद्यमान वनस्पतिक तत्व , विटामिन आदि पूरी तरह नष्ट हो जाते है।

इस हेतु हाइड्रोजनीकरण को समझना जरूरी है। इसमें तेलों की सेल्फ लाइफ बढ़ाने के लिए तेलों को निकल तथा हाइड्रोजन की मदद से जमाया जाता है। इस प्रक्रिया में तेलों में से निकिल धातु की उपस्थिति में 4000 ड्रीग्री पर भारी दबाव से 8 घंटे तक हाइड्रोजन प्रवाहित की जाती है। इससे तैयार होता है निष्क्रिय एवं मृत तेल जो खराब नहीं होता है। स्वाभाविक है खराब का क्या खराब होगा। इसमें होते है केमीकल द्वारा परिवर्तित फैटी एसिड जो शरीर के लिए बिल्कुल निरर्थक है। यह तेल जिसे चयापचित करना शरीर के बस की बात नहीं है। इसमें बचता है ट्रांस फैट और निकिल के अवशेष। पूर्ण हाइड्रोजनीकरण से तेल सफेद, ठोस,कड़ा और देखने में घी जैसा लगता है। मार्जरीन और शोर्टनिंग पूर्ण हाइड्रोजनीकृत होते हैं। आंशिक हाइड्रोजनीकरण पूर्ण हाइड्रोजनीकरण से भी ज्यादा खराब होते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में बीजों में विद्यमान कई महत्वपूर्ण और लाभददायक वनस्पतिक तत्व, विटामिन आदि पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं।

बहुराष्ट्रीय संस्थान सभी खाद्य पदार्थों जैसे ब्रेड केक, मैगी, पास्ता, नूडल्स, बिस्कुट, चिप्स, कुरकुरे, पिज्जा, बर्गर, आइस्क्रीम, चाॅकलेट आदि में ट्रांसफैट युक्त घातक हाइड्रोजनीकृत वसा का भरपूर प्रयोग करते है। ट्रांसफैट हमारे शरीर के लिए विष है जो कई बीमारियां जैसे डायबिटीज, मोटापा, आथ्र्राइटिस, उच्च रक्तचाप , ह्नदयघात, ड्प्रेशन आदि पैदा करते हैं।

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रिफाइंड तेल से ह्नदय रोग, मधुमेह व कैंसर हो सकता है? अन्तिम भाग

रिफाइंनिंग हेतु तिलहन को 200-500 डिग्री सेल्सेयस के बीच कई बार गरम किया जाता है। घातक पैट्रोलियम उत्पाद हेग्जेन का प्रयोग बीजों से 100% तेल निकालने के लिए किया जाता है। कई घातक रसायन कास्टिक सोड़ा, फोसफेरिक एसीड, ब्लीचिंग क्लेंज आदि मिलाए जाते है ताकि निर्माता हानिकारक व खराब बीजों से भी तेल निकाले तो उपभोक्ता को उसको पता न चले। इसलिए इन तेलों को गन्ध-रहित, स्वाद-रहित व पारदर्शी बनाया जाता है। रिफाइंड, ब्लीच्ड एवं डिओडोराइन्ड की प्रक्रिया में तेल के अच्छे तत्व समाप्त हो जाते है व घातक जहर घुल जाते है। तभी तो ऐसे तेल को तकनीकी भाषा में चीप कर्मशीयल आर बी डी ऑॅयल कहते हैं।

मिनेसोटा विश्वविद्यालय के भोजन और पोषण रसायन विभाग की प्राचार्य डॉ. सेलेनी की शोध के अनुसार तेल को 200 डिग्री से 225 डिग्री पर आधे घंटे तक गर्म करने से उसमें एचएनई नामक बहुत ही टोक्सिक पदार्थ बनता है। यह लिनोलिक एसिड के ऑक्सीकरण से बनता है और उत्तकों में प्रोटीन और अन्य आवश्यक तत्वों को क्षति पहुँचाता है। यह ऐथेरास्क्लिरोसिस, स्ट्रोक, पार्किसन, एल्जाइमर रोग, यकृत रोग आदि का जनक माना जाता है।

डॉक्टर बुडविग तलने के लिए बहुअसंत्रप्त तेल प्रयोग करने के विरुद्ध थी। संतृप्त वसा को गर्म करने पर ऑक्सीकृत नहीं होते हैं और इसलिए गर्म करने पर उनमें एचएनई भी नहीं बनते हैं। इसलिए घी, मक्खन और नारियल का तेल कई दशकों से मानव स्वास्थ्य को रोगग्रस्त करने की बदनामी झेलने के बाद आज कल पुनः आहार शास्त्रियों के चेहते बने हुए हैं। अब तो मुख्य धारा के बड़े-बड़े चिकित्सक भी स्वीकार कर चुकें हैं कि  शरीर में ओमेगा 3 और ओमेगा 6 का अनुपात सामान्य (1:1 या 1:2) रखना आवश्यक है।
गृहणियों को खाना बनाने के लिए रिफाइंड तेल का प्रयोग नहीं करना चाहिए। कच्ची घाणी से निकला तेल ही अच्छा माना जाता है। हमें कच्ची घाणी से निकला नारियल तेल, सरसों या तिल का तेल काम में लेना चाहिए। ये तेल हानिकारक नहीं होते है।

जैतून का तेल भी बढि़या होता है जो हमारे यहाँ बहुत मंहगा मिलता है। मूंगफली का तेल अच्छा माना जाता है।  मित्रों, इस सम्बन्ध में आपको विशेष जानकारी हो तो आप इसमें जोड़ कर स्वास्थ्य संरक्षण के यज्ञ में आहुति दें।

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अलसी का सेवन किस रोग में व कैसे करें?

सुपर फुड अलसी में ओमेगा थ्री व सबसे अधिक फाइबर होता है। यह डब्लयू एच ओ ने इसे सुपर फुड माना है। यह रोगों के उपचार में लाभप्रद है। लेकिन इसका सेवन अलग-अलग बीमारी में अलग-अलग तरह से किया जाता है।

 

  • स्वस्थ व्यक्ति को रोज सुबह-शाम एक-एक चम्मच अलसी का पाउडर पानी के साथ ,सब्जी, दाल या सलाद मंे मिलाकर लेना चाहिए । अलसी के पाउडर को ज्यूस, दूध या दही में मिलाकर भी लिया जा सकता है। इसकी मात्रा 30 से 60 ग्राम प्रतिदिन तक ली जा सकती है। 100-500 ग्राम अलसी को मिक्सर में दरदरा पीस कर किसी एयर टाइट डिब्बे में भर कर रख लें। अलसी को अधिक मात्रा मंे पीस कर न रखें, यह पाउडर के रूप में खराब होने लगती है। सात दिन से ज्यादा पुराना पीसा हुआ पाउडर प्रयोग न करें। इसको एक साथ पीसने से तिलहन होने के कारण खराब हो जाता है।
  • खाँसी होेने पर अलसी की चाय पीएं। पानी को  उबालकर उसमें अलसी पाउडर मिलाकर चाय तैयार करें।एक चम्मच अलसी पावडर को दो कप (360 मिलीलीटर) पानी में तब तक धीमी आँच पर पकाएँ जब तक यह पानी एक कप न रह जाए। थोड़ा ठंडा होने पर शहद, गुड़ या शकर मिलाकर पीएँ। सर्दी, खाँसी, जुकाम, दमा आदि में यह चाय दिन में दो-तीन बार सेवन की जा सकती है। दमा रोगी एक चम्मच अलसी का पाउडर केा आधा गिलास पानी में 12 घंटे तक भिगो दे और उसका सुबह-शाम छानकर सेवन करे तो काफी लाभ होता है। गिलास काँच या चाँदी को होना चाहिए।
  • समान मात्रा में अलसी पाउडर, शहद, खोपराचूरा, मिल्क पाउडर व सूखे मेवे मिलाकर नील मधु तैयार करें।  कमजोरी में व बच्चों के स्वास्थ्य के लिए नील मधु उपयोगी है।
  • डायबीटिज के मरीज को आटा गुन्धते वक्त प्रति व्यक्ति 25 ग्राम अलसी काॅफी ग्राईन्डर में ताजा पीसकर आटे में मिलाकर इसका सेवन करना चाहिए। अलसी मिलाकर रोटियाँ बनाकर खाई जा सकती हैं। अलसी एक जीरो-कार फूड है अर्थात् इसमें कार्बोहाइट्रेट अधिक होता है।शक्कर की मात्रा न्यूनतम है।
  • कैंसर रोगियों को ठंडी विधि से निकला तीन चम्मच तेल, छः चम्मच पनीर में मिलाकर उसमें सूखे मेवे मिलाकर देने चाहिए। कैंसर की स्थिति मेें डाॅक्टर बुजविड के आहार-विहार की पालना श्रद्धा भाव से व पूर्णता से करनी  चाहिए। कैंसर रोगियों को ठंडी विधि से  निकले तेल की मालिश भी करनी चाहिए।
  • साफ बीनी हुई और पोंछी हुई अलसी  को धीमी आंच पर तिल की तरह भून लें।मुखवास की तरह इसका सेवन करें। इसमें संेधा नमक भी मिलाया जा सकता है। ज्यादा पुरानी भुनी हुई अलसी प्रयोग में न लें।
  • बेसन में 25 प्रतिशत मिलाकर अलसी मिलाकर व्यंजन बनाएं। बाटी बनाते वक्त भी उसमें भी अलसी पाउडर मिलाया जा सकता है। सब्जी की ग्रेवी में भी अलसी पाउडर का प्रयोग करें।
  • अलसी सेवन के दौरान खूब पानी पीना चाहिए। इसमें अधिक फाइबर होता है, जो खूब पानी माँगता है।

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डाॅक्टर ओ0 पी0 वर्मा रचित ‘‘अलसी महिमा’’नामक पुस्तिका प्रकाशित हुई है। उक्त पुस्तिका को आप Free Download My Booklets के टेग के नीचे अंकित नाम पर क्लिक कर उसे डाउनलोड करें। छपी हुई पुस्तक आप मुझसे मंगवा भी सकते हंै।

अलसी महिमा : डॉ ओ पी वर्मा

पुस्तिका की विषय वस्तुअलसी एक चमत्कारी आयुवर्धक, आरोग्यवर्धक दैविक भोजन है। अलसी एक प्राणदायी औषधि है।  कैंसर , ब्लड प्रेशर, अर्थाराइटीस, डाइबीटिज , अपच आदि का इलाज अलसी के सेवन से होता है। जिसका विस्तृत वर्णन पुस्तक में है।अलसी  एक सम्पूर्ण आहार है, इसमें 18 प्रतिशत प्रोटीन 27 प्रतिशत फाइबर, 18 प्रतिशत ओमेगा-3 फैटी एसिड, लिगनेन व सभी विटामिन और खनिज लवणों का भण्डार है। अलसी रक्त को पतला बनाये रखती है। रक्त वाहिकाओं को स्वीपर की तरह साफ करती है। काॅलेस्ट्राल और ब्लड प्रेशर को सही रखती है। अलसी में फाइबर की मात्रा सबसे अधिक है। इसलिए यह ईसबगोल से भी ज्यादा लाभदायक है। तभी अलसी के लिए कहा जाता है कि यह कब्जासुर का वध करती है। अलसी शक्तिवर्धक एंव बाॅडी बिल्ंिडग में सहायक है। तभी डबल्यू एच ओ ने इसे सुपर फूड की संज्ञा दी है। इसके अतिरिक्त पुस्तक मंे डाॅ0 योहाना बुडवीज का कैंसर रोधी आहार-विहार,अलसी के व्यंजन, वसा जो कारक है वसा जो मारक है, अलसी चालीसा, अलसी सेवन से लाभार्थिंयों के अनुभव संग्रहीत है।  ढ़ेर सारी अनेक बातें अलसी के आहार से चिकित्सा से सम्बन्धी मौजूद है।

लेखक के बारे में एलोपैथिक डाॅक्टर ओ0 पी0 वर्मा फ्लेक्स अवेयेरनेस सोसायटी के अध्यक्ष है। देश के अनेक पत्र-पत्रिकाओं में ंअलसी पर आपके आलेख छपे है। दूरदर्शन पर वार्ताएं प्रसारित हुई है।  इन्होंने नाॅबेल पुरस्कार के लिए नामांकित जर्मन डाॅ0 बुडवीज के आधार पर अलसी से चिकित्सा पर बहुत कार्य किया है। कैंसर जैसे घातक रोगों का इलाज अलसी के द्वारा डाॅ0 बुडवीज ने किया है,जिसे बुडवीज प्रोटोकोल के नामा से जाना जाता है।

                                                                                                                     (साभार- डॉ  ओ  पी वर्मा )

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