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विटामिन बी 12 की कमी को पूरा करने चावल का मीठा ओलिया खाएँ

शाकाहारी मित्रोँ में अमूमन बी12 की कमी पाई जाती हैl बी 12 की गोली व इंजेक्शन के अतिरिक्त दूध ,दही व खमीरी कृत आहार भी हैl इन सब में से चावल का ओलिया अच्छा विकल्प हैl

Rice curd cure Vitamin B 12 deficiency

ओलिया बनाने की विधि:
एक व्यक्ति के लिए निम्न मात्रा ले l
सांय एक मुट्ठी चावल पकाए, उसमे से मांड नहीं निकाले l चावल में थोडा सा पानी ज्यादा डालेl फिर उसे ठंडा कर ले l फिर उसमे एक चुटकी पीसी हुई राइ, एक चुटकी सेंधा नमक ,8 चम्मच दही व 15 किशमिश डाले. रात भर उसे रखे रहे l इसे फ्रीज में नहीं रखेl प्रातः यह विटामिन 12युक्त ओलिया तैयार हैl इसे स्वादानुसार दही व शक्कर डाल कर नाश्ते में या लंच में ले ले l
महीने भर के बाद बी 12 की जाँच पुनः करा ले lउक्तओलिया वातनाशक एवं पाचन में सहयोगी हैl

 

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प्रतिरोध क्षमता बढ़ाने व स्वस्थ रहने हेतु विटामिन डी अति आवश्यक है

मैग्नीशियम की कमी दूर कर अधिकांश रोगों को भगाए

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खोए हुए हम खुद है और खोज रहे है भगवान को,सोए हुए हम खुद है और जगा रहे भगवान को

 हमें  अपना तो कुछ  पता नहीं और परमात्मा का पता करना चाहते है,यही विडम्बना हैl सामने पड़े पत्थर को जानते नहीं और विराट में समाये प्रभु को पाने चले हैl  प्रार्थना की जरूरत हमें है,उससे हमारे भीतर शक्ति जगती हैl परमात्मा को हमारी प्रार्थना की आवश्यकता नहीं है l परमात्मा हमारे भीतर है,किसी मूर्ति में छिपा हुआ नहीं हैl खुद को तराशने की आवश्यकता हैl मूर्ति  पूजा उसमे सहायक हो सकती है यदि पूजा समझ के की जाय l

 

 

 

कर्म कांड में डूबा हुआ व्यक्ति परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकता हैlअपने को स्वीकार कर इस क्षण जीने में ही उपलब्धी हैl वर्तमान में जीना ही परम जीवन को पाना है,परमात्मा को उपलब्ध होना हैl  जीवन अन्यत्र  कहीं नहीं ,जीवन अभी और यही हैl

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स्वस्थ रहने हेतु जम कर ताली बजाए

ताली दुनिया का सर्वोत्तम एवं सरल सहज योग है l यदि प्रतिदिन यदि नियमित रूप से ताली बजाई जाये तो कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं को सुलझाया जा सकता है। ताली बजाने से पहले हमें सरसों या नारियल का तेल अपने हाथों पर लगा लेना चाहिए।

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डॉ. डोगरा के मुताबिक, इस थेरेपी के लिए सुबह का समय सर्वोत्तम है। सुबह-सुबह 20-30 मिनट तक ताली बजाने से आप स्वस्थ और सक्रिय रहेंगे। फिर किसी हठयोग या आसनों की जरूरत नहीं रहेगी। यदि दिन भर  में लगभग 1500 बार ताली बजाये  तो हम बिल्कुल स्वस्थ रहते हैं।

ताली बजाना मात्र एक  व्यायाम नहीं हैl ताली बजाने से हमारे दोनों हाथों के बिंदु दब जाते हैं जिसके कारण हमारे शरीर को बहुत ही लाभ पहुंचता है।एक्युप्रेशर विज्ञान के अनुसार हाथ की हथेलियों में शरीर के समस्त अंगों के संस्थान के बिंदू होते हैं। जब ताली बजाई जाती है तब इन बिन्दुओं पर बार-बार दबाब यानिप्रेशर पड़ता है जिससे शरीर की समस्त आन्तरिक संस्थान में उर्जा जाती है और सभी अंग अपना काम सुचारू रूप में करने लगते हैं।

ताली बजाने से शरीर के विकार खत्म होते हैं और वात, कफ और पित्त का संतुलन ठीक तरह से बना रहता है। मानसिक तनाव, चिंता और कब्ज के रोग भी ताली बजाने से खत्म होते हैं।लगातार ताली बाजाने से आपका शरीर बीमारियों से लड़ने में सक्षम होता है। जिससे कोई भी बीमारी आसानी से शरीर को नहीं लगती है।ताली बजाने से शरीर स्वस्थ और निरोग रहता है।

जब भी हम लगातार ताली बजाते हैं तो हमारे ब्लड में कोलेस्ट्रॉल कम होता है जिससे हमें हार्ट का खतरा कम रहता है। इस प्रकार की ताली बजाने से कब्ज, एसिडिटी, मूत्र, संक्रमण, खून की कमी व श्वांस लेने में तकलीफ जैसे रोगों में लाभ पहुंचता है।

जब हम लगातार ताली बजाते हैं, तो हमारी ऑक्सीजन का फ्लो सही तरीके से काम करता है, हमारे फेफड़ों में ऑक्सीजन सही तरीके से पहुंचती है, जिसके कारण हम हेल्दी रहते हैं। इसके अलावा हृदय रोग, मधुमेह, अस्थमा, गठिया आदि बीमारियों से हमें राहत मिलती हैl शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और बीमारियों से बचने के लिए भी क्लैपिंग करनी चाहिए।कहा तो यहां तक जाता है कि कीर्तन के समय हाथ ऊपर उठा कर ताली बजाने  में काफी शक्ति होती है। इससे हमारे हाथों की रेखाएं तक बदल जाती हैं।

ताली बजाने से बच्चों का दिमाग तेज़ होता है।  जब बच्चे लगातार ताली बजाते हैं तो उनकी लिखावट साफ हो जाती है।

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कैंसररोधी बुडविज आहार के अत्यंत महत्वपूर्ण बिन्दु

ये सब इस आहार विहार का महत्वपूर्ण हिस्सा है-

1. डाॅ. योहना कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी, वनस्पति घी, ट्रांस फेट, मक्खन, घी, चीनी, मिश्री, गुड़, रिफाइन्ड तेल, सोयाबीन व सोयाबीन से निर्मित दूध व टाॅफू आदि, प्रिजर्वेटिव, कीटनाशक, रसायन, सिथेंटिक कपड़ों, मच्छर मारने के स्प्रे, बाजार में उपलब्ध खुले व पेकेट बंद खाद्य पदार्थ, अंडा, मांस, मछली, मुर्गा आदि से पूर्ण परहेज करने की सलाह देती थी।
2. वे कैंसर रोगी को सनस्क्रीन लोशन, धूप के चश्में आदि का प्रयोग करने के लिए भी मना करती थी। रोज सूर्य के प्रकाश का सेवन अनिवार्य है। इससे विटामिन-डी भी प्राप्त होता है। रोजाना दस-दस मिनट के लिए दो बार कपड़े उतार कर धूप में लेटना आवश्यक है। पांच मिनट सीधा लेटे और करवट बदलकर पांच मिनट उल्टे लेट जायें ताकि शरीर के हर हिस्से को सूर्य के प्रकाश का लाभ मिले।
3. रोगी को रोजाना अलसी के तेल की मालिश की भी जानी चाहिए इससे शरीर में रक्त का प्रवाह बढ़ता है।
4. रोगी को हर तरह के प्रदूषण (जैसे मच्छर मारने के स्प्रे आदि) और इलेक्ट्रानिक उपकरणों (जैसे ब्त्ज् वाले टी. वी. आदि) से निकलने वाले विकिरण से जहां तक सम्भव हो बचना चाहिए।
5. रोगी को सिन्थेटिक कपड़ो की जगह ऊनी, लिनन और सूती कपड़े प्रयोग करना चाहिए।
6. गद्दे भी फोम और पोलिस्टर फारबर की जगह रुई से बने है।

7. अलसी को जब आवश्यकता हो तभी पीसें। पीसकर रखने से ये खराब हो जाती है।
8. अलसी का तेल को तापमान 42 डिग्री सेल्सियस पर यह खराब हो जाता है।इसलिए प्रकाश व आॅक्सीजन से बचायें। आप इसे गहरे रंग के पात्र में भरकर डीप फ्रीज में रखें।
9. दिन में कम से कम तीन बार हरी या हर्बल चाय लें।
10. प्राणायाम, ध्यान व जितना संभव हो हल्का फुल्का व्यायाम या योगा करना है।
11. घर का वातावरण तनाव मुक्त, खुशनुमा, प्रेममय, आध्यात्मिक व सकारात्मक रहना चाहिये। आप मधुर संगीतें सुनें, खूब हंसें, खेलें कूदें। क्रोध न करें।
12. सप्ताह में दो-तीन बार वाष्प-स्नान या सोना-बाध लेना चाहिए।
13. पानी स्वच्छ व फिल्टर किया हुआ पियें।
14. अपने दांतो की पूरी देखभाल रखना है। दांतो को इंफेक्शन से बचाना चाहिए।
इस उपचार से धीरे-धीरे लाभ मिलता है और यदि उपचार ठीक प्रकार से लिया जाये तो सामान्यतः एक वर्ष या कम समय में कैंसर पूर्णरूप से ठीक हो जाता है। रोग ठीक होने के पश्चात् भी इस उपचार को 2-3 वर्ष या आजीवन लेते रहना चाहिये।
सबसे महतवपूर्ण बात यह है कि इस उपचार को जैसा ऊपर विस्तार से बताया गया है वैसे ही लेना है अन्यथा फायदा नहीं होता है या धीरे-धीरे होता है। अधिक जानकारी हेतु अंतरजाल पर हमारे इस पृष्ठ ीजजचरूध्ध् सिंगपदकपंण्इसवहेचवजण्बवउ पर चटका मारें। अधिक जानकारी के लिए डाॅ. ओ पी वर्मा कोटा से सम्पर्क कर सकते है। उनका मोबाईल नं. 9460816360 है।

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मन को शांत करने भ्रामरी प्राणायाम कैसे करे

इस प्राणायाम में अभिज्ञा के और अधिक विकास के लिए ध्वनि-तरंगो का उपयोग किया जाता है। संस्कृत मंे भ्रामरी का अर्थ है भ्रमरी की या मधुमक्खी की-आवाज या ध्वनि इसमें अन्र्तनिहित है। अर्थात भ्रमरी की ध्वनि । यह प्राणायाम इस ध्वनि के साथ किया जाता है।
विधि
हठयोगप्रदीपिका में इसका वर्णन इस प्रकार हैः
वेगाद्घोषं पूरकं भृंगनादं भृंगनादं रेचकं मंदमदम्।
योगींद्राणामेवमभ्यासयोगाच्चिते जाता काचिदानंदलीला।।
भ्रमर की ध्वनि के समान घोष करते हुए तेजी से सांस लीजिए और भ्रमरी के समान ध्वनि करते हुए उसे मंद-मंद छोड़िये। भ्रामरी प्राणायाम में नाक से श्वांस भर कर धीरे-धीरे भ्रमर की गुंजन के साथ श्वांस छोड़ते हैं । यह प्राणायाम पूरी तरह शरीर को शिथिल कर आराम के साथ किया जाता है । इसमे ध्वनि निकालते वक्त न पर जोर रखें । इसे सहज होकर करते हैं ।
ध्यान लगाने वाले आसन में बैठ कर करें कमर, पीठ व गर्दन सीधी रखें । ध्वनि तरंग को मस्तिष्क में अनुभव करें व इसी पर चेतना को केन्द्रित करें ।
भ्रामरी प्राणायाम में नाक से श्वांस भर कर धीरे-धीरे गले से भ्रमर की गुंजन के साथ श्वांस छोड़ते हैं । गंुजन करते वक्त जीभ को तालु से लगायें । दांत बन्द व होठ खुले रखें । यह प्राणायाम पूरी तरह शरीर को शिथिल कर आराम के साथ किया जाता है । इसमे ध्वनि निकालते वक्त ‘न’ के उच्चारण पर जोर रखें । ओम उच्चारण में ‘म‘ पर जोर देते है तब होठ खुले रहते है । ’न’ पर जोर देने से होंठ स्वतः बन्द हो जाते हैं । दोनों में शब्दों के जोर को ध्यान में रखें । आवाज इतनी सी करे कि पड़ौसी को सुनाई दे । इसमे श्वांस लेने में 10 सैकण्ड व छोड़ने में 20 से 30 सैकण्ड तक का समय लगाएं । यह एक आवृति हुई । इसी तरह 5-10 मिनट तक भ्रामरी निरन्तर करें । इसे शान्त व शिथिल होकर करें । इसे करते वक्त शरीर को सहज रखें । पीठ, गर्दन व सिर सीधे रखें ताकि रीढ़ की हड्डी सीधी रहे । इसे करते वक्त गुंजार की ध्वनि को सिर व पूरे शरीर में फैलने दे । साथ ही इसकी प्रतिध्वनि सुने । शरीर में इसके फैलते कम्पनों को महसूस करें ।

सावधानी – कान में संक्रमण हो तो इसे न करें । इसे करते वक्त आसन स्थिर रखें । कन्धों को ढीला छोड़े व हिलाएं नहीं । जबरदस्ती गंुजार को न खींचे । जितना आराम से करेगें उतना ही अच्छा ।
सीमा -यह प्राणायाम कभी भी किया जा सकता है । सोते वक्त लेटे लेटे भी कर सकते है । इसे करने से कभी कोई हानि नहीं होती है ।
यहां

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महान् लेखक बनने की कंुजी और मोपासां

प्रसिद्ध फ्रासीसी साहित्यकार मोपासां ;डंनचंेेंदजद्धबचपन से ही लेखक बनने की जिद करने लगा था। तब उसकी समझदार मां अपने परिचित प्रसिद्ध लेखक फ्लोएर्बेट ;थ्संनइमतजद्ध के पास ले गई एवं उनको बताया कि मेरा बेटा लेखक बनना चाहता है। अतः वह आपसे लेखक बनने के सूत्र जानना चाहता है।GDMaupassant
वे उस समय व्यस्त थे। फ्लोएर्बेट ने एक माह बाद बुलाया।
ठीक एक माह बाद बच्चा मोपासां उनके पास पहुँच गया। उन्होने उसे पहचाना नहीं तब उसने अपनी मां का परिचय देकर बताया कि वह लेखक बनने के सूत्र सिखने आया था तब आपने एक माह बाद आने को कहा था।
तब फ्लोएर्बेट ने टेबल पर पड़ी एक किताब उसे दी और कहा कि इसे याद करके आओ।
मोपासां उस किताब को महीने भर में पूरी तरह याद कर फिर उनके पास पहुँच गया। तब गुरु ने फिर पूछा कि क्या पूरी किताब याद कर लीं।
मोपासां ने कहा-हां कहीं से भी पूछ लिजिए। वह किताब एक बड़ी डिक्शनरी थी।
फ्लोर्बेएट आश्चर्य से उस बालक को देखते रहे फिर पूछा कि खिड़की के बाहर से क्या दिखाई देता है?
बालक ने कहा ‘‘पे़ड’’- कौनसा पेड़-‘‘पाईन का पेड़’’
ओह, ठीक से देखो-‘‘ पास के तीसरे मकान की तीसरी मंजिल से एक लड़की झांक रही है।’’
‘‘और अच्छी तरह देखो’’
तब उसने कहां -‘‘आकाश में चिडि़या उड़ रही है।’’
हां, अब ठीक है।
वह पेड़ सिर्फ पेड़ नहीं है। वह तीन मंजिला मकान, खिड़की से झाँकती लड़की,, वह आसमान, वह चिडि़या, वे सभी उस पेड़ से जुड़े हुए है। पेड़ कभी अकेला नहीं हो सकता है। इसी तरह आदमी के मामले में उसके आस-पास का समाज, उसकी वंश-परम्परा, उसके नाते-रिश्ते के लोग, उसके दोस्त-यार, इन सबको मिला कर ही वह आदमी है। इस तरह वातावरण का भी योगदान होता है। इस तरह की विस्तृत दृष्टि चाहिए।तब जाकर ही साहित्य बनता है।
उसी दिन से मोपासां ने उन्हें अपना गुरु बनाकर उनके सूत्रों का अनुसरण कर एक महान् लेखक बने।

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चीनी तम्बाकु से तीन गुना अधिक हानिकारक

शक्कर एक तरह का जहर है जो कि मूख्यतः मोटापे, हृदयरोग व कैंसर का कारण है । भारतीय मनीषा ने भी इसे सफेद जहर बताया है ।tobacco डाॅ0 मेराकोला ने इसके विरूद्ध बहुत कुछ लिखा है । डाॅ0 बिल मिसनर ने इसे प्राणघातक शक्कर-चम्मच से आत्महत्या बताया है । डाॅ0 लस्टींग ने अपनी वेब साईट डाॅक्टर में इसे विष कहा है । रे कुर्जवले इस सदी के एडिसन जो कि 10 वर्ष अतिरिक्त जीने अपने वार्षिक भोजन पर 70 लाख रूपया खर्च करते हैं ने अपने आहार में अतिरिक्त चीनी लेना बन्द कर दी है ।

 
अधिक शक्कर से वजन व फेट दोनों बढ़ते हैं । डाॅ0 एरान कैरोल तो स्वीटनर से भी चीनी को ज्यादा नुकसानदेह बताते हैं । चीनी खाने पर उसकी आदत नशीले पदार्थ की तरह बनती है । प्राकृतिक शर्करा जो फल व अनाज में तो उचित है । sugar is poision
हम जो चीनी बाहर से भोजन बनाने में प्रयोग करते हैं वह विष का कार्य करती है । यह शरीर के लिए घातक है । डिब्बाबन्द व प्रोसेस्ड फूड में चीनी ज्यादा होती है उससे बचे । अर्थात् पेय पदार्थ व मिठाईयांे के सेवन में संयम बरतना ही बेहतर है।

 

 

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