समझ कैसे बढ़ाना व समझदार कैसे होना ?

 

सबकी परस्पर भूमिका जान कर जीने से समझ बढ़ती है । मात्र मानने से नही जानने से समझ बढ़ती है । किसी परम्परा, शास्त्र, व्यक्ति द्वारा मेरी समझ नहीं बढ़ाई जा सकती है ।जांचने  की विधि अपने अनुभव से जानना समझ है । मात्र मुझे ही इन सब सूचनाओं को परे रख कर स्वयं जांचना पड़ेगा कि मान्यताऐं सही है या नहीं । स्वयं अपने तई जानी गई बातें ही जानना है । मेरा जानने में ही समझ है । मानना परतन्त्रता है । मानना संवेदनाओं के अधिन है । यह बेहोशी है । उनसे स्वयं के वैभव को प्राप्त नहीं किया जा सकता । विवेक, ज्ञान, विज्ञान एवं जानना समझ के ही रूप है । यह व्यक्ति, शास्त्र व उपकरण पर आधारित न होकर सहज स्वीकृति से होता है ।
समझदार कैसे होना ?
व्यवस्था, न्याय व मानव को जान कर मानना है । अस्तित्वगत सच्चाई-प्रकृति के सत्य को जानना है । इसके प्रति सचेत होना है कि व्यवस्था चारों अवस्थाओं के अनुरूप जीने में है । इस चक्र में अपनी भूमिका अनुरूप जीना है । इस चक्र में बाधा नहीं बनना है । अपने कृत्य, व्यवहार व सोच व्यवस्था अनुकूल हो । अपने निजी लाभ हेतु व्यवस्था में विघ्न नहीं पैदा करना है ।
विनीशजी को आप समझदार क्यों मानते हंै ? उनके जीवन में वे सार्वभौम-प्राकृतिक व्यवस्था अनुरूप जीते हैं । सभी के साथ सम्बन्ध जानने के कारण न्यायपूर्ण आचरण करते हैं । धन इकट्ठा कर समृद्ध नहीं होना चाहते चूंकि स्वयं को पूर्ण मानते हैं । धन से अधिक सुविधाएं खरीद कर स्वयं को सुरक्षित रखना नहीं चाहते हैं । अपने प्रति आश्वस्त है । भय-प्रलोभन से कार्य नहीं करते हैं ।

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जानना, मानना, पहचानना, निर्वाह करना

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क्या मुझे प्रकृति चक्र को तोड़ने मंे शरीक होना चाहिए ?

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मानना घातक है, जानना समझदारी है

                                                                                                           jeevan vidhya  मान्यता अर्थात बिना जाने सुख का स्त्रोत मानना है । मानना अर्थात किसी आश्वस्ति पर स्वीकारना है । यह संवेदना पर आधारित होता है । मानने में क्या नकारात्मकता है ? मानना कैसे विनाशक है ? मानना सदैव गलत भी नही होता है । मानना छोड़, उसको जांचने की जरूरत बता रहे हैं ।

                                                                    मान्यता का परीक्षण करता चल, पंहुच जायेगा अपनी मंजिल । हम मानने के आधार पर जीते हैं । इसे देख नहीं पाते हैं व इसे ही स्वतः सच मान लेते हैं । मान्यताएं जिनसे हम संचालित है उनका परीक्षण करने की आवश्यकता है । मान्यताएं पराधीनता की सूचक है क्योंकि उनका आधार दूसरे हैं । उनके आधार पर हम प्रामाणिक जीवन नहीं जी सकते हैं ।

                                                                         ‘एक रूका हुआ फैसला’ नामक हिन्दी फिल्म दिखाई जिससे निर्णय प्रवृति जांचने मिली कि कैसे हम अपने स्वार्थवश या अज्ञानवश जल्दबाजी में निर्णय करते हंै । अपनी-2 मान्यता के आधार पर सोचते हैं। यह नहीं करना है । फिर धिरे-धिेरे संवाद से मान्यताएं बदलती है । प्रारम्भ में जूरी के ग्यारह सदस्य आरोपी को कसुरवार मानते हैं । यह सब धिरे-धिरे बदल कर उसे बेकसुर मानने लगते हैं । तर्क द्वारा शान्ति से अपनी बात खुले मन से करने पर सच्चाई की दिशा में प्रयत्न किए जा सकते हंै । किसी के साथ अपने पूर्वाग्रहों व अनुकरण के कारण अन्याय न करें । मनुष्य मनुष्य बीच सम्बन्ध न्याय पर ही टिके हुए हैं । अतः व्यवहार बढ़ाना है तो न्याय पर ध्यान देना चाहिए ।

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बातचीत में निर्णय नहीं सुनाए, प्रस्ताव रखें:जीवन विद्या

जीवन विद्या के इस सूत्र ने मुझे बहुत प्रभावित किया है । जीवन में फैसले न सुनाएं । अपना मत प्रस्तुत न कर अपनी बात प्रस्ताव के रूप में रखें । हमें आदेश नहीं पारित करने है । आपसी बातचीत में निर्णय न सुनाएं । निर्णय सुनाने से अहं बढ़ता है । हर वस्तु के बहुत आयाम होते हैं । सामान्यतः सभी आयामों को ध्यान में रख कर बात नहीं करते हैं । इसलिए फैसले न करें । अपनी बात को प्रस्ताव के रूप में पेश करें व मापने के लिए दूसरों को स्वतन्त्र करें । उनकी समझ पर भरोसा करें व उन्हंे अपने निर्णय करने दे ।
सदैव निर्णयात्मक होने की आवश्यकता नहीं है । हमारी जानकारी ही सीमित नहीं है बल्कि जानने का साधन मस्तिष्क की भी एक सीमा है । अतः किसी व्यक्ति, घटना, तथ्य, शास्त्र, धर्म, परम्परा, सम्प्रदाय, समुदाय के बारे में निर्णयक बात न करें ।
उद्देश्य के विचारार्थ अपनी बात तर्कपूर्ण ढंग से रखें । अपने विचार थोपने का प्रयत्न न करें । दूसरों की अपनी आजादी है । उसका सम्मान करें । सत्य अन्यथा भी हो सकता है । अपनी बात ही सही हो इसकी कोई गारन्टी नहीं है।
बात को प्रस्ताव के रूप में रखने से संवाद करने में सुविधा हो जाती है । सुनने वाले को पूरा महत्व मिलता है । इससे संवाद एक तरफ नहीं रहता है। इससे संवाद कौशल बढ़ता है । आलोचना करने से भी बच जाते हैं । संवाद नकारात्मक नही रहता है ।

क्या मुझे प्रकृति चक्र को तोड़ने मंे शरीक होना चाहिए ?

प्रकृति में सुन्दर व्यवस्था है । मनुष्य को छोड़ सर्वत्र उसका पालन स्वतः होता है । अपना अपना कार्य स्वतः करते हैं जिससे यह चक्र बना हुआ है । मनुष्य भी पिछले 50 वर्षों से अपनी भूमिका भूल गया है।प्रकृति चक्र
पदार्थ अवस्था, प्राण अवस्था, जीव अवस्था एवं ज्ञान अवस्था परस्पर पूरक है । अन्योन्याश्रित ही नहीं बल्कि एक दूसरे को संवर्धित करते है । चारों साथ रहते हैं, अपनी-अपनी जगह स्वतन्त्र भी है एवं निर्भर भी है । सभी इकाईयां अपनी मौज में दूसरे के साथ रहती है । सिर्फ मनुष्य ने अपनी भूमिका भय एवं प्रलोभन के कारण बदल दी है । इससे पूरा अस्तित्व खतरे में है । इसलिए यह हमारी जिम्मेदारी है कि अपनी भूमिका चक्र अनुसार रखें। अपने ज्ञान का दुरूपयोग चक्र तोड़ने में न करंे । इसी से पर्यावरण संतुलन बिगड़ रहा है । अपना ध्यान इधर से हटाकर संतुलन पर करना है । फिर कोई बाधा नहीं है । हम समर्थ है समाधान करने मे समस्या भी असंभव नहीं है ।
मोबाईल निर्माण हेतु कुछ धातु व प्लास्टिक प्रयोग हुआ है । प्लास्टिक पेट्रोलियम के कुछ पदार्थों से बना है । सब कुछ पृथ्वी से ही लिया है । इस अर्थ में मिट्टी से मोबाईल बना है । मिट्टी से मोबाईल बनाने वाला दिमाग सम्बन्धो व पर्यावरण संतुलन रखने के उपाय क्यांे नहीं खोज सकता है ?
चूंकि हमारा ध्यान उधर गया नहीं है । इधर गया तो बहुत सृजनशीलता दिखाई है । हम सुविधाआंे के विस्तार में लगे रहे । अब सम्बन्ध की कला भी सीखे व इस क्षैत्र मंे बुद्धि सृजन लगाएं ।
मैं इस सहज व्यवस्था में विघ्न पैदा करूं ? क्या मुझे संतुलन बनाए रखने में अपनी भूमिका ईमानदारी से नहीं निभानी चाहिए ।

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पूर्वाग्रह व निष्पक्ष तार्किकता को दर्शाती फिल्म ‘एक रूका हुआ फैसला’

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पूर्वाग्रह व निष्पक्ष तार्किकता को दर्शाती फिल्म ‘एक रूका हुआ फैसला’

अपने परिवार में निर्णय कैसे करने चाहिए । आपसी सदस्यों को कैसे समझाना । सामुहिक संवाद से निर्णय करने की कला इससे सीख सकते हैं ।यह दर्शाती है कि हम कैसे फैसले लेते हंै ? यह मानना छोड़ जांचना सिखाती है । फैसला करने के दौरान व्यक्तिगत मान्यता कैसे प्रभावित करती है ऐसा दिखाया गया है । Ek_Ruka_Hua_Faisla
‘एक रूका हुआ फैसला’ नामक हिन्दी फिल्म देखी जिससे निर्णय प्रवृति जांचने मिली कि कैसे हम अपने स्वार्थवश या अज्ञानवश जल्दबाजी में निर्णय करते हंै । अपनी-2 मान्यता के आधार पर सोचते हैं। यह बड़ा घातक है । इसमे दिखाया गया है कि धिरे-धिेरे संवाद से कैसे मान्यताएं बदलती है जिससे निर्णय बदलता जाता है ।
फिल्म में एक व्यक्ति पर आरोप है कि उसने अपने पिताजी का खुन कर दिया है। कोर्ट में गवाही हो चुकी है अब जुरी को यह निर्णय करना है कि वह कसुरवार है कि नहीं । फिल्म के प्रारम्भ में जूरी के ग्यारह सदस्य आरोपी को कसुरवार मानते हैं । मात्र एक सदस्य आरोपी पर संदेह कर अपनी बात रखता है। लेकिन फिल्म का नायक रैना अपना संतुलन नहीं खोते हुए विनम्रतापूर्वक दृढ़ता से अपनी बात रखता है कि शायद वह बेकसुर है । इस जब यह स्पष्ट होने लगता है कि यह एक जिन्दगी का सवाल है। इससे फिल्म आगे बढ़ती है। गवाही का सूक्ष्म परीक्षण होने लगता है। दूसरे जुरी के सदस्य भी अपने निर्णय पर पुर्नविचार करने लगते है। अपने पुर्वाग्रहांे को पहचानते हुए अपना निर्णय बदलने लगते हैं। अपने निर्णय के आधारों पर उन्हे शक होने लगता है। जल्दबाजी व अपनी लापरवाही दिखने लगती है। जो पहले वैसे ही मान लेते हैं वे अब अपने निर्णय को जांचने लगते है कि उन्होने मात्र किसी आवेश या मान्यतावश तो निर्णय नहीं कर लिया । इस क्रम मे जुरी के सभी सदस्य आपस में टकराते है एवं व्यक्तिगत आरोप भी लगाते हैं।सभी सदस्य धिरे-धिरे बदल कर उसे बेकसुर मानने लगते हैं । अन्त में सभी सदस्य आरोपी को बेगुनाह मानते हैं।
तर्क द्वारा शान्ति से अपनी बात खुले मन से करने पर सच्चाई की दिशा में प्रयत्न किए जा सकते हंै । किसी के साथ अपने पूर्वाग्रहों व अनुकरण के कारण अन्याय न करें । मनुष्य एवं मनुष्य के बीच सम्बन्ध न्याय पर ही टिके हुए हैं । अतः व्यवहार बढ़ाना है तो न्याय पर ध्यान देना चाहिए । निर्णय मान्यता के आधार पर नहीं लेकर जानकर लेने चाहिए ।

अंग्रेजी फिल्म ‘‘टवेल्व एन्ग्री मेन’’ से प्रेरित है । यह नाम ज्यादा सार्थक है । जुरी के सभी सदस्य क्षुब्ध व खफा है, गुस्से में है । उसका असर उनके निर्णयों पर आता है । जल्दबाजी के कारण व गम्भीरता से न तो सुनते हैं न ही तय करते है । किसी न किसी आवेश में बस तय कर लेते हैं । जबकि तय करने का कोई स्पष्ट ठोस तार्किक कारण उनके पास नहीं होता है। एक सदस्य को वहां से जरूरी जाना है इसलिए उसे कसूरवार मान कर भागना चाहता है । एक सदस्य सोचता है कि पुलिस ने पकड़ा है, चश्मदीद गवाह है । बस कसूरवार है । एक मानता है कि अधिकांश कसूरवार मान रहे हैं तो ठीक ही मानते होगें तो वह कसूरवार कह देता है । एक नया सदस्य है अधिक विचार न कर बहुमत का साथ देता है । बूढ़े सदस्य पूरा विश्लेषण न कर हां कर देते हैं । तार्किक सदस्य चश्मदीद गवाही व आरोपी की अपराधिक प्रवृति के कारण सजा देना चाहता है ।एक सदस्य निम्न जाति का होने से उसे अपराधी मान लेते हैं । सभी अलग-अलग अपने-अपने कारणों के आधार पर गुनहगार मानते हैं । फिल्म में पंकजकपूर व रैना की एक्टिंग बहुत ही सटीक है । पंकजकपूर का बेटा झगड़ा कर घर छोड़कर चला गया है इसलिए वह सभी बेटों को अपराधी मान लेता है कि बेटे दुष्ट ही होते हैं । वह अपने पुर्वाग्रह के कारण उसे कसुरवार मानते हैं। भावुक पंकज कपूर सारे बेेटों को गुनहगार मानने के कारण सजा देना चाहता है।
संतुलित सदस्य नायक शान्ति से विचार कर निर्णय चाहता है चूंकि उसे गुनहगार होने में संदेह है । माकूल शक का वह निराकरण चाहता है । नायक का कहना है कि चर्चा जारी रहनी चाहिए ताकि निर्णय लेने मे सुविधा हो ।
निर्णय के क्रम में व्यक्तिगत आरोप लगाते हैं एवं परस्पर झगड़ने लगते हैं । अपने-अपने भीतर की कूंठाए व पूर्वाग्रह को अच्छी तरह से दिखाया गया है । क्षेत्र, ऊंच-नीच, तेरा-मेरा बीच में आते है । जबकि उपराध स्वतन्त्र कर्म है, कोई भी भ्रष्ट नहीं है व ईमान से निर्णय करने आए हैं । किसी का निजी हित आरोपी से नहीं है । लेकिन स्वयं के आग्रह हावी है । दर्शक स्वयं अपना निर्णय बदलते जाते हैं व पूरी प्रक्रिया स्पष्टता से जांचने का महत्व समझने लगता है । बिना आधार व कारण के भी गलत निर्णय होता है । हम निरपेक्ष नहीं देखते हैं । देखने में आन्तरिक कारण होते हैं ।

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