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रोग मुक्त होने व विष मुक्त होने:ऑयल पुलिंग

मुहं में तेल का कुल्ला करने से शरीर के टोक्सिंस बाहर निकल जाते हैंl यह एक आयुर्वेदिक विधि है जिसे विज्ञान भी स्वीकारता हैंl डॉ .कराच जिन्होंने आयल-पुलिंग पर एक विस्तृत शोध किया है उन्होंने पाया है कि आयल-पुलिंग के बाद निकले एक बूंद थूक में जीवाणुओं के लगभग 500 प्रजातियाँ बाहर आ जाती हैं ,अर्थात शरीर से जीवाणुओं को बाहर करने में आयल-पुलिंग थेरेपी बड़ा ही कारगर होती है lब्रुश फाईफ ने “Oil Pulling Therapy: Detoxifying and Healing the body through Oral Cleansing” नाम से एक पुस्तक लिखी है जिसमे इसके लाभ बताएं हैl

एक चम्मच सुरजमुखी /नारियल /तिल्ली का तेल मुहं में भर कर १५ मिनट तक घुमाएँl इस तेल की एक भी बूंद निगलनी नहीं हैlप्रयोग के आधा घंटा पूर्व व आधा घंटा बाद तक कुछ लेना नहीं हैl आमतौर पर फायदे के लिए आॅयल पुलिंग तकनीक को कम से कम लगातार चालीस से पचास दिनों तक प्रयोग में लाये जाने के आवश्यकता होती हैl

आयल-पुलिंग के लाभ :-

*यह तकनीक एलर्जी को दूर करने में कारगर है !
*दमे के रोगीयों में भी इसे लाभकारी पाया गया है !
* उच्चरक्तचाप के रोगियों में भी इसे फायदेमंद देखा गया है !
*कब्ज ,माइग्रेन एवं इन्सोमनीया जैसी अवस्था में भी इस तकनीक का प्रयोग लाभकारी है l
* मसूड़ों और दाँतों से समबन्धित समस्याओं में इस तकनीक के तत्काल फायदे को महसूस किया जा सकता हैl

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बीमारी पहले मन में, मस्तिष्क में, फिर तन में

हमारा स्वास्थ्य पच्चीस प्रतिशत इस बात पर निर्भर करता है कि हम क्या करते हैं किन्तु हम क्या सोचते हैंे इस पर पचहत्तर प्रतिशत निर्भर करता है। मन यदि रुग्ण है तो व्यवहार और विचार भी रुग्ण ही होगें।
सामान्यतः रोग पहले हमारी भावनाओं में आते हंै, उसके बाद विचारो में आते है, फिर स्थूल देह में उनका प्रकटीकरण होता है। जैसा कि किरलियन फोटोग्राफी आज इसे प्रमाणित करती है। हमारे भाव-शरीर यानि आभामडण्ल में रोग के लक्षण छः माह पूर्व दिखने लगते हैं। जब किरलियन फोटोग्राफी हमारे भाव-शरीर का चित्र खींचती है तो भौतिक शरीर में होने वाली गांठ के छः माह पूर्व ही भाव-शरीर के चित्र में गांठ के स्थान पर काला धब्बा देखा जा सकता है। illness into health
मानव देह की सबसे छोटी इकाई कोशिका है। प्रत्येक कोशिका पदार्थ से बनी होती है। पदार्थ का वह सबसे छोटा कण है जिसका कोई आकार व भार होता है, उसे परमाणु कहते है। परमाणु को पुनः तोडने पर तरंग एवं कण बनते हैं जो कभी तरंग होता हंै व कभी कण-जिसे क्वान्टम कहते हैं। क्वान्टम वे ऊर्जा कण हैं जो अदृश्य हंै। प्रत्येक दृष्य पदार्थ के पीछे अदृश्य क्वान्टम का सहयोग होता है।

सूक्ष्म शरीर की विचार तरंगे व संवेदनाएॅ बाधित होती हैं तो शरीर के तल पर अनेक रोग उभर आते हंै।
मानव-मस्तिष्क एक सुपर कम्प्यूटर की तरह है जिसमंे बहुत सी धारणाओं के साफ्टवेअर लगे होते हैं। इम्प्रेशन्स के लेन देन से साफ्टवेअर अपडेट होते रहते हैं। इस की-बोर्ड का बटन दबाने पर मोनीटर पर वैसा ही परिणाम आता है, जैसा सीपीयू में उपलब्ध साफ्टवेअर प्रोसेस करता है। लक्ष्य प्राप्ति हेतु ’की-बोर्ड’ के बटन दबाने से परिणाम तो सी.पी.यू. में उपलब्ध प्रोग्राम होने पर ही आता है। अर्थात मानव देह ब्रह्माण्ड की अभिव्यक्ति है। जिन तत्वो और शक्तियों से ब्रहाण्ड बना है, उन्ही से हमारा शरीर, मस्तिष्क एवं आत्मा बनती है। ‘यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे।’ सूक्ष्म और विराट दोनों एक है। मानव देह और ब्रह्माण्डीय देह एक ही है। यही सनातन घर्म का सार है।
जीवन-शैली बदल कर हम अपने रोग से लड सकते हैं। हम ही जाने-अनजाने अपने को बीमार करते हैं। रोग धीरे-धीरे पहले हमारे जेहन में आता है फिर शरीर में प्रकट होता है।

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स्वास्थ्य सेतु क्या है ?

स्वास्थ्यसेतु एक स्वास्थ्य विमर्श केंद्र  है.  यह एफ-४०,सेक्टर १४, उदयपुर ३१३००२ पर चलता है.यहाँ प्रतिदिन सुबह ६ बजे योग होता है.साथ ही प्रति  शुक्रवार को सायं ५.३० बजे स्वास्थ्य वार्ता होती है या फिर स्वास्थ्य सम्बन्धि डॉक्यूमेंट्री दिखाई जाती है.

मेरा स्वास्थ्य मेरी जीवन शैली का परिणाम है.

बीमार नहीं बीमारी का इलाज होना चाहिए.

एक पद्धति के पास एक रोग का  इलाज  नहीं है इसका अर्थ यह नहीं  है की अन्य पद्धति के पास भी  उसका इलाज नहीं है.

शरीर ने जैसे ही चालीस पार किए बीमार होना शुरू किया तो समझ में आया की जीवन शैली ठीक नहीं चल रही है.इलाज हेतु दवाई लेनी शुरू की तो पार्श्व प्रभाव नजर आने लगे . एलोपैथि के अलावा  कभी आयुर्वेद,योग,एक्यूप्रेशर,होमियोपैथी अपनाई तो  कुछ  क्षेत्र में अधिक सार्थक लगी.इस हेतु योग करते करते कराने लगे .अनुभव में आया की हम  मात्र दिखाई देने वाला शरीर ही नहीं है हमारी अन्य सुक्ष्म परते भी है.इन को ध्यान में रखने पर योग की गहराईया स्पष्ट हुई .इस तरह परम्परागत चिकित्सा पद्धतियों में रूचि हुई .

कई देसी पद्धतियां परस्पर   सहायक भी है.कई बार एक पद्धति की कमी दूसरी पद्धति से पूरी भी होती है. गावं का हड्डी जोड़ने वाला  जडीबुटी भी साथ में देता है.इस हेतु विमर्श करने की जगह है बस स्वास्थ्य सेतु .

देसी चिकित्सा के नाम पर नीमहकीम भी शोषण करते है क्योंकि हमें उनका ज्ञान नहीं होता है अत: देसी इलाज कर्ताओ की एप एवम् वेबसाइट बनाई जा रही है.

 

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रोग दूर करने शरीर की आन्तरिक फार्मेसी को जगाएँ

चारों ओर, यहाँ तक कि हमारे शरीर को देखने पर भी, हमें जो नजर आता है, वह आइसबर्ग का सि़र्फ ऊपरी हिस्सा है। -डाॅ. जाॅन हेजलिन
शरीर का कोई रोग उसके उभार एवं लक्षण तक सीमित नहीं होता है। वह सम्पूर्ण शरीर तन्त्र से सापेक्षित रूप से जुडा होता है। अच्छा चिकित्सा विज्ञान रोग का नहीं रोगी का उपचार करता है।
मानव-देह में कई तरह के रसायन बनाने की क्षमता है। सबसे अधिक तरह की दवाएँ बनाने वाला कारखाना धरती पर कही अन्यत्र नहीं, बल्कि हमारी देह में ही है। यहाॅ सभी प्रकार की दवाएँ समय-समय पर आवश्यकतानुसार बनायी जाती है। हमारी ग्रन्थिया के स्त्रावों से सभी आवश्यक रसायन देह में बनते हंै। दुनिया के अत्यन्त धीमें जहर भी यह देह असन्तुलन की दशा में बनाती है। हमें थकाने वाले, सताने वाले रसायन भी यह देह विकृत अवस्था में या दुरूपयोग करने पर बनाती है। देह दर्द को रोकने वाला पेनकिलर बनाती है तो दर्द पैदा करने वाला रसायन भी इसी देह में बनता है।
इस देह में सभी तरह की दवाएँ पैदा करने की क्षमता है। हम अपनी नकारात्मक सोच, असंतुलन, संदेह, विक्षोभ द्वारा हानिकारक रसायन भी पैदा कर सकते हैं तो सकारात्मक चिन्तन,समता,आस्था को उत्पन्न कर लाभप्रद दवाएँ भी पैदा कर सकते हैं।
जब हमारी प्रतिरोध शक्ति कमजोर पड़ जाती है तब देह बीमार पड़ती है। आन्तरिक असंतुलन से व्यक्ति का स्वास्थ्य नरम पड़ता है। प्राण शक्ति की कमी से मनुष्य बीमार होता है।
मानव देह ऊर्जा और प्रज्ञा का एक नेटवर्क है, न कि केवल हड्डियों का ढांचा। अर्थात हमारी देह की छोटी से छोटी ईकाइ क्वान्टम है जो कि ऊर्जा का एक कण है। इस कण में विकास व वृद्धि स्वचालित है। इस विकास व वृद्धि की सूचना ही प्रज्ञा का नेटवर्क है। रोग शरीर को अक्षुण्ण रखने वाली क्वान्टम तरंगों की संरचना में विकृतियों के फलस्वरूप होते हैं।
वातावरण ही हमारा विस्तृत शरीर है। रोगों का कारण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्ति स्वयं ही है।
शरीर में रोग के अनुकूल दवा बनाने की क्षमता होती है और यदि उन क्षमताओं को बिना किसी बाह्य दवा और बिना आलम्बन के विकसित कर दिया जाता है तो उपचार अधिक प्रभावशाली,स्थायी एवं भविष्य में पड़ने वाले दुष्प्रभावों से रहित होता है।

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मन को शांत करने भ्रामरी प्राणायाम कैसे करे

इस प्राणायाम में अभिज्ञा के और अधिक विकास के लिए ध्वनि-तरंगो का उपयोग किया जाता है। संस्कृत मंे भ्रामरी का अर्थ है भ्रमरी की या मधुमक्खी की-आवाज या ध्वनि इसमें अन्र्तनिहित है। अर्थात भ्रमरी की ध्वनि । यह प्राणायाम इस ध्वनि के साथ किया जाता है।
विधि
हठयोगप्रदीपिका में इसका वर्णन इस प्रकार हैः
वेगाद्घोषं पूरकं भृंगनादं भृंगनादं रेचकं मंदमदम्।
योगींद्राणामेवमभ्यासयोगाच्चिते जाता काचिदानंदलीला।।
भ्रमर की ध्वनि के समान घोष करते हुए तेजी से सांस लीजिए और भ्रमरी के समान ध्वनि करते हुए उसे मंद-मंद छोड़िये। भ्रामरी प्राणायाम में नाक से श्वांस भर कर धीरे-धीरे भ्रमर की गुंजन के साथ श्वांस छोड़ते हैं । यह प्राणायाम पूरी तरह शरीर को शिथिल कर आराम के साथ किया जाता है । इसमे ध्वनि निकालते वक्त न पर जोर रखें । इसे सहज होकर करते हैं ।
ध्यान लगाने वाले आसन में बैठ कर करें कमर, पीठ व गर्दन सीधी रखें । ध्वनि तरंग को मस्तिष्क में अनुभव करें व इसी पर चेतना को केन्द्रित करें ।
भ्रामरी प्राणायाम में नाक से श्वांस भर कर धीरे-धीरे गले से भ्रमर की गुंजन के साथ श्वांस छोड़ते हैं । गंुजन करते वक्त जीभ को तालु से लगायें । दांत बन्द व होठ खुले रखें । यह प्राणायाम पूरी तरह शरीर को शिथिल कर आराम के साथ किया जाता है । इसमे ध्वनि निकालते वक्त ‘न’ के उच्चारण पर जोर रखें । ओम उच्चारण में ‘म‘ पर जोर देते है तब होठ खुले रहते है । ’न’ पर जोर देने से होंठ स्वतः बन्द हो जाते हैं । दोनों में शब्दों के जोर को ध्यान में रखें । आवाज इतनी सी करे कि पड़ौसी को सुनाई दे । इसमे श्वांस लेने में 10 सैकण्ड व छोड़ने में 20 से 30 सैकण्ड तक का समय लगाएं । यह एक आवृति हुई । इसी तरह 5-10 मिनट तक भ्रामरी निरन्तर करें । इसे शान्त व शिथिल होकर करें । इसे करते वक्त शरीर को सहज रखें । पीठ, गर्दन व सिर सीधे रखें ताकि रीढ़ की हड्डी सीधी रहे । इसे करते वक्त गुंजार की ध्वनि को सिर व पूरे शरीर में फैलने दे । साथ ही इसकी प्रतिध्वनि सुने । शरीर में इसके फैलते कम्पनों को महसूस करें ।

सावधानी – कान में संक्रमण हो तो इसे न करें । इसे करते वक्त आसन स्थिर रखें । कन्धों को ढीला छोड़े व हिलाएं नहीं । जबरदस्ती गंुजार को न खींचे । जितना आराम से करेगें उतना ही अच्छा ।
सीमा -यह प्राणायाम कभी भी किया जा सकता है । सोते वक्त लेटे लेटे भी कर सकते है । इसे करने से कभी कोई हानि नहीं होती है ।
यहां

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स्वयं को जगाने हेतु ओम साधना करें

प्राचीन काल से ओम का जाप किया जाता रहा है । सभी सनातन धर्मो में इसको प्रमुखता दी है। ओम का उच्चारण होश के साथ करने से भीतरी यात्रा करने में मदद मिलती है।शरीर में होने वाली हलचलों पर ध्यान जाता है साथ ही होने वाले भाव भी दिखाई देने लगते हैं। इससे अपने को महसूस करना आता है। यह स्वयम् के भीतर उतरना है। यही आन्तरिक सत्संग है। इससे अपनी ज्योत प्रकट होती है। अपने भीतर के पट खुलते है। बाह्य आवरण, सीमाएं एवम् स्थूलता पिघलती है। सजगता पूर्वक ओम का जाप स्वयम् के प्रति सचेत बनाता हैं। इससे अपने को जानने में मदद मिलती है। बिना जागृति के ओम को जपने से शरीर शिथिल हो जाता है। ओम का उच्चारण अन्तर आत्मा को शुद्व करता है। कर्मो की अशुद्वि व अज्ञान के अन्धकार को दूर करता है।

ओम का अर्थ कोई निश्चित् नहीं है। यह निराकार, असीम, अद्धश्य व अनन्त के लिये प्रयुक्त होता है। कई बार इसे ईश्वर के लिये भी प्रयुक्त करते है।यह ध्वनियाात्मक अक्षर हैं।

किसी ध्वनि के लिए हम कंठनली और तालु का ध्वनि के आधाररूप में व्यवहार करते है। क्या ऐसी कोई भौतिक ध्वनि है, जिसकी कि अन्य सब ध्वनियों अभिव्यक्ति है, जो स्वभावतः ही दूसरी सब ध्वनियो को समझा सकती है। हाॅ, ‘ओम’ अ उ म् ही वह ध्वनि है, वही सारी ध्वनियों की भितिस्वरूप है। उसका प्रथम अक्षर ‘अ‘ सभी ध्वनियो का मूल है, वह सारी ध्वनियों की कुन्जी के समान है, वह जिव्हा या तालू के किसी अंश को स्र्पश किय बिना ही उच्चारित होता है ।‘म‘ ध्वनि-श्रंखला की अंतिम ध्वनि है। उसका उच्चारण करने में दोनो ओठो को बन्द करना पडता हैं। और ‘उ‘ ध्वनि जिव्हा के मूल से लेकर मुख की मध्यवर्ती ध्वनि के आधार की अंतिम सीमा तक मानो लुढकता आता है। इस प्रकार अ उ म् शब्द के द्वारा ध्वनि-उत्पादन की संपूर्ण क्रिया प्रकट हो जाती हैं । अतः वही स्वाभाविक वाचक ध्वनि है, वही ंविभिन्न ध्वनियों की जननी स्वरूप है। जितने प्रकार के शब्द उच्चारित हो सकते है-ओम् उन सभी का सूचक हैर्।

मन में उठने वाले प्रत्येक भाव का एक प्रतिरूप शब्द भी रहता है। इस शब्द एवं भाव को अलग नहीं किया जा सकता। एक ही वस्तु के बाहरी भाग को शब्द और अन्तर भाव को विचार या भाव कहते है। वाचक वाच्य का प्रकाशक होता है। अर्थात शब्द भाव का प्रतीक होता है।

महेश योगी के द्वारा प्रणीत भावातीत ध्यान – ट्रान्सिडेन्टल मेडीटेशन में मात्र शब्द विशेष को दोहराया जाता है। इसमें सजगता नहीं रहने से शरीर एवम् मन को विश्राम मिलता है। इससे व्यक्ति की कार्यक्षमता बढ जाती है, इसलिये यह बहुत लोकप्रिय हुआ है।

( To be continued)

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क्षमा कर तनाव मुक्त होएं

मा कीजिए, मेहरबान,

आज क्षमा वाणी का पर्व है। जैन दर्शन का यह एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त हैं। जैन धर्म में क्षमा का बडा महत्व बताया है। पर्युषण पर्व की समाप्ति पर जैनी परस्पर क्षमा मांगते है।लेकिन आज यह एक रस्म अदायगी बन गया है। क्षमा माॅगने के क्रम में भी हम लोग पाखण्ड बढाते जा रहे है।  मैं मन ,वचन, काया से किये गये ंअपनी गलतियों व भूलों के लिए आप सब से क्षमा मागंता हुॅ।यह में एक कर्मकाड की तरह औपचारिकता भर निभा रहा हुॅ।इसी बहाने  क्षमा पर विवेचना भी कर रहा हुॅ । Forgive us
भगवान महावीर ने  क्षमा वीरस्य भूषणम कहा है। जैसा कि क्षमा एक व्यवहार ुशलता ही नहीं बल्कि एक सद्गुण भी है। क्षमा एक धर्म भी है। क्षमा कर आप बड़प्पन दिखाते है एवं स्वयं के लिए शान्ति खरीदते है। क्षमा करने में कोई धन नहीं लगता है। क्षमा भविष्य के संबंधो का द्वार है इसी से संबंध बनते है। क्षमा करने वालो को पछताने की आवश्यकता नहीं पड़ती है।
क्षमा करने की आदत होनी चाहिये। दिल से माफ करना चाहिए व दिल से क्षमा मांगनी चाहिए। जब आप शब्दो से क्षमा मांगते है  वह मात्र 10 प्रतिशत है, आॅखों से क्षमा मांगना 20 प्रतिशत है, दिमाग से मांगना 30 प्रतिशत है एवं 40 प्रतिशत मांगना दिल से होता है। सामने वाला व्यक्ति आपकी देह भाषा को पढ़ लेता है। इसलिए क्षमा मन, वचन एवं कर्म से मांगनी चाहिए। मात्र शब्दों से क्षमा न मांगे। दूसरों को माफ कर आप अपने तनावों का मिटाते हैं। स्वयं पर उपकार करते है।
स्वयं को क्षमा करना सबसे बड़ी व पहली क्षमा है। माफी से माफ करने वाला भी हलका होता है।उसे लगता है जैसे क्षमा करने से उसके सिर से बोझ उतर गया है। क्षमा करनें में दूसरा व्यक्ति इतना महत्वपूर्ण नहीं है। क्षमा आप अपने से प्रारम्भ करें व सबको क्षमा करें। तभी तों किसी नें ठिक ही कहा है कि दुश्मन के लिए भट्टी इतनी गरम न करे कि आप भी उसमें जलने लगे।
कुछ लोग क्षमा को कमजोरों का हथियार मानते है। क्षमा करने से दुर्जनों को बल मिलता है ऐसा कहते है। क्षमा करना दण्ड व्यवस्था के विपरीत है। स्वाभिमान भी जैसे के साथ तैसा व्यवहार करने को कहता है। मेरे मन का एक अंश क्षमा के विरूद्ध है। मुझे भी तो सभी क्षमा नहीं करते फिर मैं क्यों माफ करूं। मुझे माफ करने में मुझे मूर्खता, बेवकूफी, दुश्मनों का प्रोत्साहन देने जैसा लगता है। उपरोक्त तर्क में दम कम है। लेकिन तर्को की अपनी सीमा है। तर्क हमेशा सत्य पर नहीं ले जाते है।
यदि मैं दिल से क्षमा नहीं मांगता हूं तो मुझे भी क्षमा नहीं मिलती है। प्रकृति या आत्मा या मन एक कल्पवृक्ष है। हम सब यहां जैसा जितनी गहराई से मांगते हैं वैसा ही परिणाम पाते है। इसलिए दिल से क्षमा मांगना जरूरी है। मांफी मांगने के पूर्व स्वयं के मन की एकरूपता, सच्चाई व पूर्णतया आवश्यक है।
भगवान बुद्ध अपने पर थूंकने वाले को क्षमा कर देते है। भगवान महावीर चण्डकोशिक को काटने पर क्षमा कर देते है। भगवान ईसा ने तो स्वयं को सूली पर चढ़ाने वालों के लिए कहा था ‘‘हे प्रभु! इन्हें क्षमा करना ये नहीं जानते हैं कि ये क्या कर रहें है।’’ ईसाई धर्म में भी क्षमा हेतु चर्च में एक कक्ष होता है जहां जाकर व्यक्ति अपने कृत्यों पर प्रभु से क्षमा मांगता है।

मैंने  अपनी तरह से सबकों तहे दिल से माफ कर दिया है। मैंने स्वयं को भी बक्श दिया है। क्या आप मुझे माफ करेगें ? क्या आप मुझे माफ कर सकतें है ?

उत्तम क्षमा, सबको क्षमा, सबसे क्षमा