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हमारा जीवन कहाँ व कैसे बीतता है:गधे,कुत्ते, उल्लू की तरह तो नहीं?

हमें अव्यवस्थित, असंतुष्ट किसने बना रखा है ? हमारा अपने जीवन में अपना क्या है? हम पूरे जीवन में प्यार मांगते ही रहते हैं; न प्यार किसी को देते हैं न ही प्यार पाते हैं। हमारी चाहतें, हमारे सपनें, हमारे मूल्य, हमारे संघर्ष-ये सब स्व प्रंबधन के बिना अर्थहीन हो रहे हैं और समस्या पैदा कर रहे है। स्व-प्रबन्धन इन्हें वरदान बना देता है। इमर्सन ने लिखा है कि प्रत्येक मनुष्य एक बरबाद परमात्मा है। प्रत्येक मनुष्य वास्तव में ईश्वर है, परन्तु मूर्खों जैसा अभिनय कर रहा है। तभी तो वाल्टर टैम्पिल ने कहा है कि केवल मनुष्य ही रोता हुआ पैदा होता है और निराशा में मरता है।

मैंने एक कहानी सुनी है। प्रारम्भ में प्राणियों को ईश्वर ने चालीस-चालीस वर्ष की उम्र दी थी। लोभवश वह और उम्र चाहता था। मनुष्य को अपनी उम्र कम नजर आ रही थी।गधे को भी उम्र चालीस वर्ष मिली थी। वह दूसरों का बोझ ढोने को व्यर्थ मानते हुए उम्र घटाने का निवेदन लेकर हाजिर था। ईश्वर ने गधे की बीस वर्ष की उम्र मानव को देना स्वीकार कर लिया। तब से हम चालीस वर्ष के बाद गधे की तरह जिम्मेदारियों का वहन करते हंै। बच्चों की शादी, घर का निर्माण, धन जोड़ने में डू़बे रहते हैं।
इधर कुत्ते को भी अपनी उम्र चालीस वर्ष व्यर्थ ही नजर आती थी। सारे समय भौंकना ही भौंकना। अतः वह भी प्रभु के दरबार में उम्र आधी कराने जा पहुँचा। आदमी फिर उम्र लेने को तैयार था जो बीस वर्ष कुत्ते की उम्र ले बैठा। तभी तो साठ वर्ष के बाद बूढ़े नसीहत देते रहते हैं और अपने परिजन उन्हें भौंकने वाला कुत्ता मानते रहते हैं।
इधर उल्लू भी अपनी उम्र आधी कराने पहुँच गया। ईश्वर ने आदमी से फिर पूछा। वह फिर उसकी उम्र लेने को तैयार था। इस तरह अस्सी वर्ष के बाद की उम्र उल्लू की उम्र ले बैठा। तभी तो अस्सी वर्ष के बाद बुढ़ापे में न सुनाई देता है न अधिक बोल सकता है न नीदं आती है न विश्राम कर पाता है। बस खाट पर

बैठे-बैैठे उल्लू की तरह देखता रहता है।

( मेरी पुस्तक जियो तो ऐसे  जियो  से )

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“जियो तो ऐसे जियो” यह पुस्तक आपके लिए क्यों उपयोगी है?

जीवन-मुर्गों की रूसी-कथा

एक प्राचीन रूसी कथा है

एक बड़े टोकरे में बहुत से मुर्गे आपस में लड़ रहे थे। नीचे वाला मुर्गा खुली हवा में सांस लेने के लिए अपने ऊपर वाले को गिराकर ऊपर आने के लिए फड़फड़ाता है। सब भूख-प्यास से व्याकुल हैं। इतने में कसाई छुरी लेकर आ जाता है। एक एक मुर्गे की गर्दन पकड़कर टोकरे से बाहर खींचकर काटकर वापस फेंकता जाता है। सफाई कर पंख आदि बाहर फेंकता जाता है।कटे हुए मुर्गों के शरीर से गर्म लहू की धार फूटती है। भीतर के अन्य जिंदा मुर्गे अपने पेट की आग बुझाने के लिए उस पर टूट पड़ते है। इनकी जिंदा चोंचों की छीना-झपटी में मरा कटा मुर्गे का सिर गेंद की तरह उछलता लुढ़कता है। कसाई लगातार टोकरे के मुर्गे काटता जाता है। टोकरे के भीतर की खाद्य सामग्री में हिस्सा बांटने वालों की संख्या भी घटती है। इस खुशी में बाकी बचे मुर्गो के बीच से एकाध की बांग भी सुनायी पड़ती है। अंत में टोकरा सारे कटे मुर्गो सेे भर जाता है। चारों ओर खामोशी है, कोई झगड़ा या शोर नहीं है।
इस रूसी कथा का नाम है-जीवन।
ऐसा जीवन है। सब यहां मृत्यु की प्रतीक्षा में है। प्रतिपल किसी की गर्दन कट जाती है। लेकिन जिनकी गर्दन अभी तक नहीं कटी है, वे संघर्षरत हैं, वे प्रतिस्पर्धा में जुटे हैं। जितने दिन, जितने क्षण उनके हाथ में है, उनका उन्हें उपयोग कर लेना है। इस उपयोग का एक ही अर्थ है-किसी तरह अपने जीवन को सुरक्षित कर लेना है, जो कि सुरक्षित हो ही नहीं सकता।

सफलता सदैव खुशी, शांति व तृप्ति नहीं लाती है। सफलता हमारी प्रतिष्ठा जरुर बढ़ा देती है। सफलता के

साथ शान्ति के आने का कोई नियम नहीं है।

( मेरी पुस्तक जियो तो ऐसे  जियो की प्रस्तावना से )

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सुखी होने अन्तर्यात्रा करें व अन्तर्मन की सुने

ज्यादातर लोग कभी अपनी अन्तरात्मा की आवाज नहीं सुनते है।
                                                                                                                    – स्टीफन आर. कवि

हम अपने सूक्ष्म शरीर एवं भाव जगत् को व्यवस्थित करने के लिए आन्तरिक अवलोकन करते हंै।
शरीर एवं उपनिषद् सिखाते हैं,-‘यत् पिण्डे,तत् ब्रह्मांडे’। दीपक चोपड़ा ने लिखा है-मानव देह ब्र्रह्मांड की अभिव्यक्ति है। जिन तत्त्वों और शक्तियों से ब्र्रह्मांड बना है, उन्हीं से हमारा शरीर,मस्तिष्क एवं आत्मा भी बने हैं। सूक्ष्म और विराट दोनों एक ही है। मानव-देह और ब्रह्मांडीय-देह एक ही है। मानवीय-मस्तिष्क और ब्रह्मांडीय-मस्तिष्क एक ही हैं। यही वेदों का मूलभूत संदेश और सिद्धांत है।हम किस प्रकार सोचते हैं, महसूस करते है, स्मरण करते हैं, और कल्पना करते हैं, ये सारी बातें हमारी देह को प्रभावित करती है। लेकिन स्व-संवाद की कमी के कारण हम अपने से दूर चले गये है। स्व संवाद का अर्थ है-आपके मन में चलने वाला वार्तालाप। लोग बाहर से तो अपने आपको बदल लेते हैं परंतु अंदर से वैसे ही रहते हैं। जब तक आप अपने बारे में जो खयालात रखते हैं, उन्हें नहीें बदलते, तब तक आप अंदर से स्वयं को नहीं बदल सकते। आपके विचार आपको जो खबर देते हैं, आप अपने आपको वही मान लेते हैं। इसलिये पहले आपको अपने अंदर चलने वाले विचारों को बदलना हेगा। स्व संवाद बदलने से आप अंदर से बदल जाते हैं, यही स्व संवाद का जादू है।

अपने शरीर के संकेतों को सुनें। हमारा शरीर अपने ऊपर होने वाली ज्यादतियों का विरोध प्रकट करता है। शरीर की थकान,सोने की इच्छा,काम न करने का मन, सरदर्द आदि ऐसे संकेत हैं। जब कभी पानी पीने का भाव जगे, शौच एवं पेशाब करने की इच्छा हो तो उसे तत्काल पूरा करें, संकोच की जरूरत नहीं है।
अन्र्तप्रेरणा सुनंे और जीना सीखें। हम अपनी व्यस्तता के कारण अपने से ही बहुत दूर चले गयें हैं । इस संसार में हमारा दूसरों से बहुत कम संवाद हैं एवं स्वयं से भी संवाद नहीं के बराबर हैं । हम अपने अन्र्तमन के संकेतों व संदेशों को ग्रहण नहीं करते है। जब आप अपनी बात नहीं सुनते है तो दुनिया में किसी ओर की बात कैसे सुन सकते हैं । हम अपनी सबसे ज्यादा अनदेखी करते हैं। कई बार मनुष्य का अचेतन घटनाओं का विश्लेषण कर कुछ सूचनाएं व संकेत देता है लेकिन तब हम उस पर ध्यान नहीं देते हैं । आपका शरीर, मस्तिष्क, मन और आत्मा निरन्तर कुछ न कुछ किसी न किसी रूप में आपसे कहते रहते हैं। अपनी अन्र्तप्रेरणा ही आपकी सर्वश्रेष्ठ मार्गदर्शक है । इस स्त्रोत का लाभ उठाकर व्यक्ति चाहै हेे जितनी उन्नति कर सकता हैं । पाओलो कोएलो ने एल्केमिस्ट को साफ तौर पर ऐसे संकेत ग्रहण करते हुए दिखाया है । वह प्रकृति द्वारा दिए जाने वाले संकेतों एवं लक्षणों को महत्व देने के कारण ही सफल होता हैं।

शरीर की भाषा समझें। जब हल्का सर दर्द हो तो उसे दो रुपये की गोली या पेनकिलर लेकर दबाने की कोशिश न करें। अच्छा हो कि विश्राम करें। कैसी विड़म्बना है कि आप अपने शरीर को रोगी बनाएँ व डाक्टर उसे ठीक करे। दवाइयाँ आपात काल के लिए है। सामान्य परिस्थिति में उनका सेवन ठीक नहीं है। डाॅक्टर व दवाइयाँ आपके लिए ही नहीं है; उनमें डाक्टर व दवा बाजार की ताकतेें शामिल हंै जो आपके पक्ष में नहीं है।
मानव-देह जीवित मन्दिर है। इसके होने से आप हैं। अस्तित्व इसके द्वारा आप को अभिव्यक्त करता है। अतः इसका ध्यान रखंे। शरीर के सकेतों को अनसुना न करें। यह गूंगा जरूर है, लेकिन प्राणवान है। अतः इसे मित्र बनाएँ।
अपने शरीर से संवाद नहीं होने से हमारा उस पर नियन्त्रण नहीं रहताहै। ऐसे में शरीर स्वंय मालिक हो जाता है। वह एक सीमा के बाद अपनी रिपेयरिंग नहीं कर सकता है। ऐसे में हमारी उम्र घटती है।इससे बुढ़ापा शीघ्र आ जाता है।
प्रतिदिन हम भोजन करते हैं। लेकिन क्या खाना चाहिए एंव कितना खाना चाहिए यह बहुत कम लोग जानते हैं। स्वाद के कारण हम इस शरीर पर कई बार अनावश्यक बोझ डाल देते हंैै। फिर कहते हंै कि मुझे अपच है, गैस रहती है। नोबेल पुरस्कार विजेता डा.लिनस पोलिंग ने कहा था कि आप लोग जो भोजन करते हैं वह पच्चीस प्रतिशत आप के लिए है, शेष पिचहतर प्रतिशत भोजन आप डाक्टरों के पेट के लिए करते हैं।
जब कभी हम नकारात्मक होते हैं तो तत्क्षण शरीर में अनेक तरह के हानिप्रद रसायन बनने लगते हैं। हमारा शरीर दुनिया की सबसे बड़ी फार्मास्युटिकल फैक्ट्री है। यह अपने मस्तिष्क के कमाण्ड पर अनेक तरह के रसायन बनाता है।
ईश्वर की सबसे बड़ी कृति इंसान है। हमारे पास सर्वश्रेष्ठ साधन है। प्रकृति की सारी व्यवस्था है। इसके उपरान्त भी हम अपने अहं व लोभवृत्ति के वश में होकर इस शरीर पर अनेक तरह के अनावश्यक बोझ  लादे हुए हैं।

( मेरी पुस्तक जियो तो ऐसे  जियो से)

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