क्षमा कर तनाव मुक्त होएं

मा कीजिए, मेहरबान,

आज क्षमा वाणी का पर्व है। जैन दर्शन का यह एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त हैं। जैन धर्म में क्षमा का बडा महत्व बताया है। पर्युषण पर्व की समाप्ति पर जैनी परस्पर क्षमा मांगते है।लेकिन आज यह एक रस्म अदायगी बन गया है। क्षमा माॅगने के क्रम में भी हम लोग पाखण्ड बढाते जा रहे है।  मैं मन ,वचन, काया से किये गये ंअपनी गलतियों व भूलों के लिए आप सब से क्षमा मागंता हुॅ।यह में एक कर्मकाड की तरह औपचारिकता भर निभा रहा हुॅ।इसी बहाने  क्षमा पर विवेचना भी कर रहा हुॅ । Forgive us
भगवान महावीर ने  क्षमा वीरस्य भूषणम कहा है। जैसा कि क्षमा एक व्यवहार ुशलता ही नहीं बल्कि एक सद्गुण भी है। क्षमा एक धर्म भी है। क्षमा कर आप बड़प्पन दिखाते है एवं स्वयं के लिए शान्ति खरीदते है। क्षमा करने में कोई धन नहीं लगता है। क्षमा भविष्य के संबंधो का द्वार है इसी से संबंध बनते है। क्षमा करने वालो को पछताने की आवश्यकता नहीं पड़ती है।
क्षमा करने की आदत होनी चाहिये। दिल से माफ करना चाहिए व दिल से क्षमा मांगनी चाहिए। जब आप शब्दो से क्षमा मांगते है  वह मात्र 10 प्रतिशत है, आॅखों से क्षमा मांगना 20 प्रतिशत है, दिमाग से मांगना 30 प्रतिशत है एवं 40 प्रतिशत मांगना दिल से होता है। सामने वाला व्यक्ति आपकी देह भाषा को पढ़ लेता है। इसलिए क्षमा मन, वचन एवं कर्म से मांगनी चाहिए। मात्र शब्दों से क्षमा न मांगे। दूसरों को माफ कर आप अपने तनावों का मिटाते हैं। स्वयं पर उपकार करते है।
स्वयं को क्षमा करना सबसे बड़ी व पहली क्षमा है। माफी से माफ करने वाला भी हलका होता है।उसे लगता है जैसे क्षमा करने से उसके सिर से बोझ उतर गया है। क्षमा करनें में दूसरा व्यक्ति इतना महत्वपूर्ण नहीं है। क्षमा आप अपने से प्रारम्भ करें व सबको क्षमा करें। तभी तों किसी नें ठिक ही कहा है कि दुश्मन के लिए भट्टी इतनी गरम न करे कि आप भी उसमें जलने लगे।
कुछ लोग क्षमा को कमजोरों का हथियार मानते है। क्षमा करने से दुर्जनों को बल मिलता है ऐसा कहते है। क्षमा करना दण्ड व्यवस्था के विपरीत है। स्वाभिमान भी जैसे के साथ तैसा व्यवहार करने को कहता है। मेरे मन का एक अंश क्षमा के विरूद्ध है। मुझे भी तो सभी क्षमा नहीं करते फिर मैं क्यों माफ करूं। मुझे माफ करने में मुझे मूर्खता, बेवकूफी, दुश्मनों का प्रोत्साहन देने जैसा लगता है। उपरोक्त तर्क में दम कम है। लेकिन तर्को की अपनी सीमा है। तर्क हमेशा सत्य पर नहीं ले जाते है।
यदि मैं दिल से क्षमा नहीं मांगता हूं तो मुझे भी क्षमा नहीं मिलती है। प्रकृति या आत्मा या मन एक कल्पवृक्ष है। हम सब यहां जैसा जितनी गहराई से मांगते हैं वैसा ही परिणाम पाते है। इसलिए दिल से क्षमा मांगना जरूरी है। मांफी मांगने के पूर्व स्वयं के मन की एकरूपता, सच्चाई व पूर्णतया आवश्यक है।
भगवान बुद्ध अपने पर थूंकने वाले को क्षमा कर देते है। भगवान महावीर चण्डकोशिक को काटने पर क्षमा कर देते है। भगवान ईसा ने तो स्वयं को सूली पर चढ़ाने वालों के लिए कहा था ‘‘हे प्रभु! इन्हें क्षमा करना ये नहीं जानते हैं कि ये क्या कर रहें है।’’ ईसाई धर्म में भी क्षमा हेतु चर्च में एक कक्ष होता है जहां जाकर व्यक्ति अपने कृत्यों पर प्रभु से क्षमा मांगता है।

मैंने  अपनी तरह से सबकों तहे दिल से माफ कर दिया है। मैंने स्वयं को भी बक्श दिया है। क्या आप मुझे माफ करेगें ? क्या आप मुझे माफ कर सकतें है ?

उत्तम क्षमा, सबको क्षमा, सबसे क्षमा

Advertisements

कब तक गलतियों व क्षमा का क्रम चलेगा ?

प्रिय आत्मन,

 

kshama-yachna

मुझसे गलतियां हुई है। मेरी चुकें बढी है, व्यवहार में रूखा हूं, आपके प्रति कुछ अप्रिय कहा है एवं किया है। इसका खेद है। औपचारिक क्षमा नहीं, दिल पर हाथ रख कर क्षमा चाहता हूं।

अपनें अन्तर में झांकनें पर भूले स्पष्ट दिखती है, जिसकी सजा भी आप दे सकतें हो।

एक प्रश्न मन में आता है कब तक यह क्रम गलतिया करना व क्षमा मांगता रहूगा?

क्षमा प्रार्थी

जयन्ती-मीना जैन

Related Posts:

चेतना की यात्रा से संज्ञान हुआः गड़बड़ है मन में अपराधी हूँ अपना व आपका-मिच्छामि दुक्कड़म

‘पद्मपुरा’ में प्रेतादि बाधा-निवारणः वैज्ञानिक रहस्य

तनावमुक्ति का, सफल होने का उपाय : क्षमा करना

 

क्षमा मांगना एक यान्त्रिक कर्म नही बल्कि अपनी गलतियों का अहसास है

क्षमा मांगना एक यान्त्रिक कर्म नहीं है बल्कि अपनी गलतियों को महसूस कर उस पर पश्चाताप करना है । पश्चाताप में स्वयं को भाव होता है । ताकि हम अपनी आध्यात्मिक यात्रा आगे बढ़ा सकें । जैन दर्शन के अनुसार वास्तव में क्षमावाणी के पीछे अपनी कमियां, कमजोरी व मतलब के कारण दूसरों को हानि पंहुचाने की वृति को बदलना है । हम इस तरह की गलतियां बार-बार किन कारणों से करते आये हैं । उनको पहचान कर अपनी आदतों को बदलना है । यह एक तरह से स्वयं का परीक्षण करना है । अर्थात क्षमा मांगने से पूर्व अपने दोषों का ज्ञान होना आवश्यक है । kshama
मुझे गलती का ज्ञान नही है यानि मुझे उसका एहसास नही है तो फिर मैं किस बात की क्षमा मांगता हुं । मात्र शब्दों के सहारे सम्बन्ध बढ़ाना क्षमा मांगने का लक्ष्य नहीं है । अनजानी गलतियों सम्बन्ध माफी की बात बड़पन दर्शाने की चतुराई तो नहीं है ।

यान्त्रिक रूप से क्षमा मांगना सम्पर्क बढ़ाने का साधन है । कार्ड भेजना, एसएमएस करना व ई-मेल भेजना क्षमा मांगना नहीं है । बल्कि एक औपचारिकता पुरी करना है । जैन दर्शन सभी औपचारिकताओं को कर्मकाण्ड मानने से हेय मानता है ।

Related posts:

चेतना की यात्रा से संज्ञान हुआः गड़बड़ है मन में अपराधी हूँ अपना व आपका-मिच्छामि दुक्कड़म

तनावमुक्ति का, सफल होने का उपाय : क्षमा करना

क्षमा कर अवचेतन के तनाव से मुक्त हो

जोर  से हंसीए ,  तनाव स्वत  भाग  जायेंगे

 

चेतना की यात्रा से संज्ञान हुआः गड़बड़ है मन में अपराधी हूँ अपना व आपका-मिच्छामि दुक्कड़म

विगत दस दिनों से मौन था। चेतना की यात्रा के प्रयासरत था। स्वयं के होने का अन्वेशषण कर रहा था। अपने निर्माता से मिलने की जुगाड़ में था। यानि जीवन का रहस्य अनावृत करने का प्रयत्न कर रहा था। साम्प्रादायिक जैन की तरह कर्मकाण्ड छोड़ अपनी खोज पर था। अपनी असलियत,मन की भागमभाग, वासनाओं की दहाड़, अहं का दंश, ईष्या की आग, सारे, प्रपंच मौन काल में साक्षी बनें। मन को देखने, उससे साक्षी होने का उधम किया।

इस उपक्रम में आपकी भी तस्वीर उभरी। आपसे कुछ शिकायतें मिली। अपने भी कुछ कृत्य जो बताते है कि मैंने आपके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया। आपकी अपेक्षा, अनसुनी, मनमाफिक अर्थ निकालने, उपयोग-दुरुपयोग कुछ न कुछ वह किया है जो करने योग्य नहीं था। करके माफी चाहना भी अच्छी बात तो नहीं है, लेकिन दूसरा कोई विकल्प इससे बेहतर नहीं सुझ रहा है। भगवान महावीर के शासन में वर्ष में क्षमावाणी का प्रचलन है।

इस भार को कम करने हेतु स्वयं भी माफ करने का भाव रखता हूँ व आपसे यही अपेक्षा है। वैसे भाव का रेचन मिलने / चर्चा करने पर उत्तम रहता है। लेकिन मजबूरी है सभी से व्यक्तिगत बात नहीं हो सकती है। अतः पाती को ही भाव समझे।
Related posts:

क्षमा कर अवचेतन के तनाव से मुक्त हो

क्षमा कर अवचेतन के तनाव से मुक्त हो

मिच्छामि  दुक्कड़म्–मैं क्षमा करता हूँ आपसे क्षमा की याचना करता हूँ।
मिच्छाम् िदुक्कड़म्
मिच्छाम् दुक्कड़म्

क्षमा माँगना सरलता है, क्षमा करना बड़प्पन है। वैसे ये दोनों जूदा नहीं है। एक दूसरे से जुड़ें है। क्षमा माँगने से प्रकट है कि हम ने भी उनको क्षमा कर दिया है। क्षमा करने से हमारा अवचेतन इसके भार से मुक्त हो जाता है। जो अज्ञात का दबाव हमारे मन पर था वो कम हो जाता है। इससे व्यक्ति हल्का हो जाता है एवं प्रसन्नता बढ़ जाती है।

क्षमा माँगना व्यवहार नहीं, औपचारिकता नहीं, कर्मकाण्ड नहीं, रस्य अदामगी नहीं, इन सबके पार दिल की घटना है। सूक्ष्मता है, ऐहसास है, रूह की बात है। अपनत्व है, शब्दों के पार का संप्रेषण है।
क्षमा माँगना या करना बौद्धिक कृत्य नहीं है। यह एक भाव हैं जो ह्नदय से जुड़ा है। अतः उसका विश्लेषण करना बेकार है। क्या हम क्षमा माँगते या करते वक्त उस भाव दशा में होते है, यही महत्वपूर्ण है। इसके प्रति सजगता ही ध्यान है। अर्थात् पूर्णता में क्षमा करना ध्यान करना है। विराट से जुड़ना है।
Related Posts: