क्या आप कृष्ण से कम भाग्यशाली है!

योगेश्वर कृष्ण

आपकी स्थिति कृष्ण से बेहतर है! इसमें हॅसने की जरुरत नहीं है।

इसके लिए श्री कृष्ण के जीवन से अपने जीवन की परिस्थिति की तुलना करने की जरुरत है।

हमारे में से किसे का जन्म जेल में नहीे हुआ। जबकि योगेश्वर कृष्ण का जन्म जेल में हुआ था। उनके मां बाप दोनों राजा होकर कंस के वहाँ बन्दी थे। आपके मां बाप आपके जन्म के समय बन्दी तो न थे।

किसी ने तुम्हें स्तनों पर जहर लगाकर दूध तो न पिलाया ? जबकि पूतना ने कृष्ण को मारने के लिए यह किया था। मां बाप के होते हुए कृष्ण यशोदा केे पास पले।हमारे मे से अधिकतर लोगों का पालन पोषण तो हमारी मां ने ही किया है।

बचपन में उन्हें गाय चराने भेजा गया। मुख्यतः हममे से किसी को भी जानवरों को चराने के लिए तो नहीं भेजा गया।

कम से कम आपके मामा आपको मारना तो नहीं चाहते थे ?

कृष्ण को उनकी प्रेमिका राधा बिछुड़ने के बाद शेष जीवन में फिर कभी ना मिली।

राजा होकर महाभारत के युद्ध में अर्जुन का रथ संचालन करना पड़ा। आज की भाषा में कहे तो वाहन चालक की भूमिका निभानी पड़ी। फिर चिन्ता की क्या बात है।

हुई न आपकी स्थिति कृष्ण से बेहतर ।इसे सदैव यद् रखे l

विपरीत परिस्थितियों के होते हुए महान् कार्य किये। यदि अपनी आत्म छवि एवं आत्म विश्वास है तो आप भी अपना सोचा प्राप्त कर सकते है। आपकी आत्म छवि ही आपको सफलता व सुख दिला सकती है।

Advertisements

आज के जीवन में कृष्ण की प्रांसगिकता

कृष्ण सबसे बड़े प्रेरणा के स्रोत्र है। कृष्ण जीवन गुरु है। वे जीवन प्रबन्धन की ही नहीं जगत प्रबन्धन की विद्या बताते है। कृष्ण महाभारत के नायक, सूत्रधार, कर्मयोगी है। हमें जगाने मे ंसमर्थ है। आज को भाषा में कहे तो प्रबन्ध गुरु, कुटनीतिज्ञ व महामानव है। वे हर स्थिति में जीने की कला सीखाने वाले जगद्गुरु है। भारतीय संस्कृति में गूढ़ अर्थ भरा है जिनको कृष्ण के जीवन में देखा जा सकता है। वे हम सभी को अपनी भूमिकानुसार कत्र्तव्य बताते है। जीवन रक्षा के उपाय व जीने की कला बताते है। वे सार्थक है, उपयोगी है। उनका वन्दन कभी खाली नहीं जाता है क्योंकि वे जीवन के सभी क्षेत्रों के महारथी है। वे जीवन की हर स्थिति में राह बताते है इसीलिए उन्हें पूर्ण अवतार माना जाता है। तभी तो कृष्ण हमारे देश में सबसे लोकप्रिय भगवान है। हमारे देश में के प्रत्येक गाँव मे उनकी चर्चा है। इस देश ने उनको भगवान बनाया है। द्रोपदी की तब रक्षा की थी, मीरा को मध्यकाल में बचाया, हमें आज भी प्रेरणा देते है। वे बचपन से लेकर बुढ़ों तक के मार्गदर्शक है। वे शान्तिकाल में ही नहीं, उपद्रवग्रस्त मन को भी शान्त रखने की कला बताते है।
कृष्ण गीता का संदेश देने वाले, रसीया, ग्वाला, रणछोड़, चमत्कारी पुरुष ही नहीं, वे तो मानवता का पग-पग पर संदेश देने वाले महापुरुष है। कृष्ण व्यक्ति है या अवतार, तत्व है या दर्शन, प्रेमी है या दोस्त, ऐताहासिक है या पौराणिक, ग्वाले है या भगोड़ें, ज्ञानी है या कुटनीतिज्ञ, शासक है या नियन्ता, इस विवाद में उलझना व्यर्थ है । कृष्ण को समझना सीमित बुद्धि के वश में नहीं है। असीम कृष्ण इस तरह कैसे व्यक्त हुए? उन्होंने यह सीमा क्यों मानी? इन सब को गहराई में जानना बाकी है। करोड़ों के पूजनीय आज भी कृष्ण कैसे है? सदियों से वे जीवित कैसे है? रासलीला करने वाला गीता का उपदेश कैसे देता है? नीति शास्त्र का पिता महाभारत में कभी-कभी अनीति का समर्थन कैसे करता है?
कृष्ण एक पहेली है। इतने मन्दिर उनके, इतने मित्र, इतने गीत, इतनी पुस्तकें उन पर क्यों लिखी गई है? किसने लिखी है? कृष्ण की हर लीला में कोई मकसद छीपा हुआ है। कृष्ण कथा में प्रतीक व उपमाएँ बहुत है। उनको समझने हेतु खुला मन चाहिए। कृष्ण का जीवन सीधा सपाट नहीं है। प्रत्येक घटना के पीछे गहरे अर्थ है। यह अवतारी पुरुष की लीला है। इनको समझना कठिन है।
कृष्ण का व्यक्तित्व अनूठा है। अभी तक हम उन्हें टुकड़ों में देखते आए है। कोई योगेश्वर कृष्ण कहता है, कोई भगवान तो कोई राधा का प्रेमी, द्रोपदी सखा मानती है तो अर्जुन उन्हें गुरु, मीरा भक्त, रुकमणी प्रेमी मानती है। सुरदास के कृष्ण बालक है, गीता के कृष्ण गुरु है, भागवत के कृष्ण भिन्न है। गीता मानने वाले भागवत के रास रंग को पचा नहीं पाते है। सब उन्हें अपने-अपने नजरिए से देखते है। मीरा इन्हें प्रियतम मानती है, नरसिंह मेहता भगवान मानते है। कृष्ण के अनेक रूप है। भिन्न-भिन्न लोग भिन्न-भिन्न रूप मान कर उनको पूजते है। कोई उन्हें ब्रह्य का अवतार, कोई महाज्ञानी तो कोई महा भक्त के रूप में देखता है।
अलबर्ट श्वात्जर ने भारतीय धर्मों को जीवन-निषेधक कहाँ है। लेकिन कृष्ण जीवन के पूर्व समर्थक है। वे पल-पल आनन्द से जीने की प्रेरणा देते है। महर्षि अरविन्द को जो जेल में दर्शन दे सकते है, तिलक का मार्गदर्शन कर सकते है, विनोबा को प्रेरित कर सकते है तो हमें क्यों नहीं पथ बता सकते है।
कृष्ण हँसते हुए धर्म के प्रतीक है। वे जीवन धर्म के प्रतीक है। कृष्ण उदास व नकारात्मकता के विरोधी है। वे जीवन में पूर्व स्वीकार के समर्थक है। वे शरीर वे चेतना दो में जीवन को विभाजित नहीं करते है। वे दोनों ही साथ स्वीकारते है। वे एकाकी, आदर्शवादी, कृष्ण को अभी समझा नहीं गया है। हम अपने तल से ही उनको देखते है। अन्यथा वे भविष्य के भगवान है। वे दमन के खिलाफ है,मन की पूर्णता के समर्थक है। जीवन का आनन्द उठाने का उपदेश देते है। तभी तो पुराण उन्हें पूर्व अवतार मानते है। कृष्ण सदैव प्रांसगिक है। उनका महत्व जीवन में हमेशा है। गीता से शकंराचार्य ज्ञान योग पाते है, तिलक कर्मयोग पाते है।

Related Posts:

आप कृष्ण से बेहतर है!

पूर्ण एकाग्रता सफलता हेतु अनिवार्य हैः कृष्ण का निष्काम कर्म सिद्धान्त

जिसने मरना सीख लिया जीने का अधिकार उसी को

“भूख रखिए, नासमझ बने रहिए”स्टीव जाॅब्स

लक्ष्य प्राप्ति में बाधा आसक्ति की हैः आसक्ति ने अवचेतन की दिशा बदल दी जिसने मुझे आई ए एस नहीं बनने दिया

पूर्ण एकाग्रता सफलता हेतु अनिवार्य हैः कृष्ण का निष्काम कर्म सिद्धान्त

हर कार्य में सफलता प्राप्त करने हेतु अपना सो प्रतिशत लगाना जरूरी है। पूर्ण एकाग्रता से कार्य करने पर सफलता मिलती है। कार्य को पूरी तन्मयता से करना चाहिए। हमें पूरी तरह तन, मन व भाव से कार्य करना चाहिए तभी हम सम्पूर्ण हो पाते है। अन्यथा हम बिखरे-बिखरे से रहते है। कार्य को समग्रता से करने पर ही आनन्द मिलता है। यह एक आध्यात्मिक सत्य भी है। गीता में कृष्ण का निष्काम कर्म सिद्धान्त यही है कि कार्य करते वक्त लक्ष्य को भी भूलाकर पूर्णता से कार्य करें। कार्य करने वाले को अपनी ऊर्जा को अन्यत्र नहीं जाने देना चाहिए। जब हम कार्य को बेमन से करते है तो स्वयं की निगाह में गिर जाते है। व खुद को ही अच्छा नहीं लगता है। कार्य को पूर्णता से करने पर मिली असफलता भी दुःख नहीं देती है। कार्य को करने की खुशी तत्क्षण मिल जाती है वही उसका ईनाम है। जीवन में सफल होने के लिए हमें सब कुछ दांव पर लगाना होता है। हम आधें-अधुरे जीते है। हम अपने आपको बाजी पर नहीं लगातें हेै। सफलता के लिए बाजी लगाना अनिवार्य है।

असंतुलित व्यक्ति अपने को एकाग्र नहीं कर सकता है। विचारों में उलझा हुए सौ प्रतिशत कैसे लगाएं। इसकी कोई प्रत्यक्ष विधि नहीं है। इस हेतु व्यक्ति को अपने मन को नियन्त्रण करना पड़ता है। इसमें योग प्राणायाम व त्राटक सहायक है। कोई भी व्यक्ति कहने से अपना सौ प्रतिशत नहीं लगा सकता है क्योंकि हम सभी बंटे हुए है। विभाजित मन के होते हुए एकाग्र होना बहुत कठिन है। मन के विभाजन को समाप्त करने पर स्वतः ही व्यक्ति एकाग्र हो जाता है। ऐसे मंे व्यक्ति दृष्टा भाव रखते हुए कर्म कर सकता है।

मन की शक्ति उस जल-प्रताप की तरह है जोे साधारणतः यों ही मुद्दतों से गिरता और बहता रहता है, पर यदि उसी से पनचक्की या बिजली बनाने का कार्य किया जाय तो आश्चर्यजनक लाभ प्राप्त होता है।  वह निरर्थक दीखने वाला झरना बहुत लाभदायक एवं उपयोगी सिद्ध होता है। मन में जो प्रचण्ड शक्ति भरी है उसका महत्त्व जिन्होेेंने जान लिया वे अपना सारा ध्यान मन को नियन्त्रित कर सफलता प्राप्ति  में लगाते हैं।

Related Posts:

एकाग्रता बढ़ाने की पतंजलि की विधि

सफलता पर एन्थनी राॅबिन्स की विश्व प्रसिद्ध कृति अवेकन द जाइन्ट विदिन

लक्ष्य प्राप्ति में बाधा आसक्ति की हैः आसक्ति ने अवचेतन की दिशा बदल दी जिसने मुझे आई ए एस नहीं बनने दिया

Patanjali’s Technique to Increase your Concentration to Get Success

सफलता प्राप्ति में एकाग्रता की भूमिका:द्रोणाचार्य की परीक्षा में केवल अर्जुन ही क्यों उत्तीर्ण हुआ


आप कृष्ण से बेहतर है!

आपकी स्थिति कृष्ण से बेहतर है!अरे! हॅसने की जरुरत नहीं है।

इसके लिए श्री कृष्ण के जीवन से अपने जीवन की परिस्थिति की तुलना करने की जरुरत है।

हमारे में से किसे का जन्म जेल में नहीे हुआ। जबकि योगेश्वर कृष्ण का जन्म जेल में हुआ था। उनके मां बाप दोनों राजा होकर कंस के वहाँ बन्दी थे। आपके मां बाप आपके जन्म के समय बन्दी तो न थे।

किसी ने तुम्हें स्तनों पर जहर लगाकर दूध तो न पिलाया ? जबकि पूतना ने कृष्ण को मारने के लिए यह किया था। मां बाप के होते हुए कृष्ण यशोदा  केे पास पले।हमारे मे से अधिकतर लोगों का पालन पोषण तो हमारी मां ने ही किया है।

बचपन में उन्हें गाय चराने भेजा गया। मुख्यतः हममे से किसी को भी जानवरों को चराने के लिए तो नहीं भेजा गया।

कम से कम आपके मामा आपको मारना तो नहीं चाहते थे ?

कृष्ण को उनकी प्रेमिका राधा बिछुड़ने के बाद शेष जीवन में फिर कभी ना मिली।

राजा होकर महाभारत के युद्ध में अर्जुन का रथ संचालन करना पड़ा। आज की भाषा में कहे तो वाहन चालक की भूमिका निभानी पड़ी। फिर चिन्ता की क्या बात है।

हुई न आपकी स्थिति कृष्ण से बेहतर

विपरीत परिस्थितियों के होते हुए महान् कार्य किये। यदि अपनी आत्म छवि एवं आत्म विश्वास है तो आप भी अपना सोचा प्राप्त कर सकते है। आपकी आत्म छवि ही आपको सफलता व सुख दिला सकती है।