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क्षमा प्रार्थी हूँ!

 

मान्यवर,

हमारे अपने कुछ कृत्य बताते है कि मैंने आपके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया।kshama-yachna आपकी उपेक्षा, अनसुनी, मनमाफिक अर्थ निकालने, उपयोग-दुरुपयोग कुछ न कुछ वह किया है जो करने योग्य नहीं था। करके माफी चाहना भी अच्छी बात तो नहीं है, लेकिन दूसरा कोई विकल्प इससे बेहतर नहीं सुझ रहा है। इस भार को कम करने हेतु स्वयं भी माफ करने का भाव रखता हूँ व आपसे यही अपेक्षा है। वैसे भाव का प्रस्फुटन मिलने / चर्चा करने पर उत्तम रहता है। लेकिन मजबूरी है सभी से व्यक्तिगत बात नहीं हो सकती है। अतः पाती को ही भाव समझे।
जयन्ती जैन
मीना जैन
स्वास्थ्य सेतुए ( holistic health forum)उदयपुर

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रोग दूर करने शरीर की आन्तरिक फार्मेसी को जगाएँ

चारों ओर, यहाँ तक कि हमारे शरीर को देखने पर भी, हमें जो नजर आता है, वह आइसबर्ग का सि़र्फ ऊपरी हिस्सा है। -डाॅ. जाॅन हेजलिन
शरीर का कोई रोग उसके उभार एवं लक्षण तक सीमित नहीं होता है। वह सम्पूर्ण शरीर तन्त्र से सापेक्षित रूप से जुडा होता है। अच्छा चिकित्सा विज्ञान रोग का नहीं रोगी का उपचार करता है।
मानव-देह में कई तरह के रसायन बनाने की क्षमता है। सबसे अधिक तरह की दवाएँ बनाने वाला कारखाना धरती पर कही अन्यत्र नहीं, बल्कि हमारी देह में ही है। यहाॅ सभी प्रकार की दवाएँ समय-समय पर आवश्यकतानुसार बनायी जाती है। हमारी ग्रन्थिया के स्त्रावों से सभी आवश्यक रसायन देह में बनते हंै। दुनिया के अत्यन्त धीमें जहर भी यह देह असन्तुलन की दशा में बनाती है। हमें थकाने वाले, सताने वाले रसायन भी यह देह विकृत अवस्था में या दुरूपयोग करने पर बनाती है। देह दर्द को रोकने वाला पेनकिलर बनाती है तो दर्द पैदा करने वाला रसायन भी इसी देह में बनता है।
इस देह में सभी तरह की दवाएँ पैदा करने की क्षमता है। हम अपनी नकारात्मक सोच, असंतुलन, संदेह, विक्षोभ द्वारा हानिकारक रसायन भी पैदा कर सकते हैं तो सकारात्मक चिन्तन,समता,आस्था को उत्पन्न कर लाभप्रद दवाएँ भी पैदा कर सकते हैं।
जब हमारी प्रतिरोध शक्ति कमजोर पड़ जाती है तब देह बीमार पड़ती है। आन्तरिक असंतुलन से व्यक्ति का स्वास्थ्य नरम पड़ता है। प्राण शक्ति की कमी से मनुष्य बीमार होता है।
मानव देह ऊर्जा और प्रज्ञा का एक नेटवर्क है, न कि केवल हड्डियों का ढांचा। अर्थात हमारी देह की छोटी से छोटी ईकाइ क्वान्टम है जो कि ऊर्जा का एक कण है। इस कण में विकास व वृद्धि स्वचालित है। इस विकास व वृद्धि की सूचना ही प्रज्ञा का नेटवर्क है। रोग शरीर को अक्षुण्ण रखने वाली क्वान्टम तरंगों की संरचना में विकृतियों के फलस्वरूप होते हैं।
वातावरण ही हमारा विस्तृत शरीर है। रोगों का कारण प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से व्यक्ति स्वयं ही है।
शरीर में रोग के अनुकूल दवा बनाने की क्षमता होती है और यदि उन क्षमताओं को बिना किसी बाह्य दवा और बिना आलम्बन के विकसित कर दिया जाता है तो उपचार अधिक प्रभावशाली,स्थायी एवं भविष्य में पड़ने वाले दुष्प्रभावों से रहित होता है।

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हमारी जीवन शैली रोगों की जनक हैं –स्वास्थ्य-सेतु

आज हमारी जीवन शैली बाजारवाद, उपभोक्तावाद एवम् जल्दबाजी से विक्रत हो गई है । हमारा भोजन स्वाद के अधीन हो गया, पोषकता को भूल गये । श्वास की लय टूट गयी है ,उतावल ने उसे असहज बना दिया । हमको व्यस्तता ने स्वंय के प्रति अंधा बना दिया है। हम आदतों के पुतले हो गये । अतः जीवन शैली रोगों की जनक है ।प्रतिक्रियात्मक शैली ने सहजता हमसे छीन ली है । हमारी सोच एवं आपाधापी हमें स्वस्थ नहीं रहने देती है ।सोच सम्यक् नही होने से जीवन भी सम्यक नहीं रहता है । सोच विरोधाभाषी होने से शरीर के स्त्राव भी संतुलित नहीं रहते है । शरीर की प्रज्ञा भी सही दिशा में कार्य नहीं कर पाती है । जीवन में खुशी की लहर रह नहीं पाती है । शरीर में खिंचाव बढते है जिससे रोग बढते है।  I am resposible for my illness
जो अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रह कर निरन्तर निरोगी रहना चाहते है, अपने परिवार एवं इष्ट मित्रांे को आर्दश रूप में स्वस्थ रखना चाहते है। यह ग्रुप उनके लिये है। समग्र चिकित्सा में विश्वास करते है। वैकल्पिक चिकित्सा भी लेने को तत्पर है। चिकित्सा के बाजारीकरण को समझते है। दवा माफिया के प्रपंच से अवगत है। यह उन मित्रो के लिये जो नई संभावना खोजना चाहते है।

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हर रोज सर्वश्रेष्ठ कार्य कैसे करें

हम जैसा जीना चाहते हैं वैसा जी सकते हैं । प्रतिदिन स्वयं को भेजने वाली सूचनाएं बदल कर हम अपना जीवन बदल सकते हैं । हम हर रोज ठप्पे से नहीं जी पाते हैं । हम जो भी जैसा भी जीते हैं, परिणाम पाते हैं उसके पीछे उस क्षण का हमारा व्यवहार होता है । व्यवहार परिणाम लाता है । हमारा व्यवहार जीवन को प्रतिभाशाली बनाता है । अतः उसे प्रभावित करने वाले कारक क्या है ? हम जो सोचते है, तदनुरूप व्यवहार बनाता है । इस सोच का भी कारण हमारा महसूस करना है ।
व्यवहार सोच व महसूस करने से तय होता है । जैसा हम महसूस करते है उसी अनुरूप विचार आते हैं । ये दोनो परस्पर जुड़े हुए हैं । हम अपनी भावनाओं के आधार पर महसूस करते हैं । भावनाएं ऊर्जा से बनती है । भावनाओं को बदलना चेतन रूप से कठिन है । हम इसके बहाव में होते हैं । अतः इसको बदलने हमारा आगत तन्त्र बदलना होगा । अतः इनका निर्धारण हमारा शरीर रचना विज्ञान तय करता है ।Networking
हमारे शरीर में सीग्नलों का प्रवाह चलता है । निरन्तर हमारे शरीर में संदेशों का प्रवाह चलता है । हम इन सूचनाओं को पकड़ नहीं पाते हैं । जब हम कहते हैं कि मेरा मूड़ खराब है । यह हम तब कहते हैं कि मन मे निराशा के भाव है, नकारात्मक विचार चल रहे हैं व थकान लग रही है । आगे कुछ अच्छा होने की आशा नहीं है । अर्थात जब हम इन सब के संदेश-संकेत पढ़ पाते है । अर्थात जब संकेतो को ग्रहण नहीं कर हम अपना कार्य करते जाते है तो हमारे कार्यों का सही परिणाम नहीं आता है । ऐसे मे हम अपना सर्वश्रेेष्ठ नहीं दे पाते है । अर्थात हम सक्षम होते हुए भी परिणाम नहीं ला पाते है । इसलिए सचेत होकर शरीर में होने वाले परिवर्तनों को पकड़ना दिन को शानदार बना सकते हैं । तभी तो शानदार क्रिकेट खेलने वाला सचिन तेंदूलकर भी हमेशा बढि़या नहीं खेल पाता है । किसी दिन उसका प्रदर्शन ठीक नहीं रहता है । यह सब उसके शरीर मे चल रहे संदेशो को नहीं समझ कर उनका शिकार होने से होता है । जब वह अपनी भाव व मनस्थिति को समझ पाता है तो उसेे बेहतर भी बना सकता है ।
हम अपने शरीर में चलने वाले संदेशों व संकेतों के प्रति सचेत होकर उनको अपने पक्ष में कर सके तो हमारा प्रत्येक दिन सर्वश्रेष्ठ परिणाम दे सकता है । अन्यथा हम परिस्थितियों के शिकार भी हो जाते हैं व पता बाद में पड़ता है । ये सीग्नल, वैद्युतिक, चुम्बकीय, रसायनिक व अनेक प्रकार के होते हैं । इन कम्पनों से ही भावनाएं बनती/बिगड़ती है । हम आखिर स्वयं को किस तरह की सूचनाएं या संकेत (सिग्नल) फिड कर रहे हैं। इनकी भूमिका पहचानना इसलिए महत्वपूर्ण है । ताकि हम अपनी ‘इनपुट’ बदल कर दिन को शानदार बना सकते हैं ।
हम अपनी सूचनाओं से स्वयं कैसे प्रभावित होते हैं इसे देखने के लिए हार्ट रेट वेरिएबलिटी ;भ्त्टद्ध रिपोर्ट देख सकते है। इसे देखने हार्टरेट जांचने की मशीन अपने कान पर लगाएं । तब आप अपने हार्ट पर उसके प्रभाव के सिग्नल्स को तरंग की तरह देख सकते हैं ।
इस तरह की ई.एम. वेव ;म्डण्ॅंअमद्ध नामक एक हार्टमेथ कम्पनी ने मशीन बनाई है जो हमारी पल्स रेट व भ्त्ट को बताती है । इसे हम अपने कान से लगा कर अपने कम्प्यूटर पर तरंग के रूप में देख नाप सकते हैं । यह हमारे हृदय में लयबद्धता को भी बताती है । जब यह लयबद्धता (ब्वीमतमदबल) 100 प्रतिशत बताती है इसका मतलब यह है कि हृदय हमारा लयबद्ध चल रहा है । उस पर कोई अतिरिक्त भार नहीं पड़ रहा है ।
इस मशीन की सहायता से हम अपनी श्वांस को लयबद्ध भी कर विश्राम पा सकते हैं । इसमें उपर जाते ग्राफ के समय श्वास लेनी है व नीचे आते ग्राफ के समय श्वांस छोड़नी है । इस तरह श्वांस को लयबद्ध करना हृदय की शक्ति को बढ़ाता है एवं उसे स्वस्थ बनाता है ।

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देह गगन के सात समंदर : सैन्नी एवं स्नोवा का आत्म खोजी उपन्यास:

देह गगन के सात समंदर वैसे एक कथ्य व शैली के हिसाब से उपन्यास है लेकिन वास्तव में यह एक आधुनिक उपनिषद की तरह है ।यह उपन्यास नहीं बल्कि जीवन शास्त्र है । इसमें स्वयं की खोज एवं स्वयं को पाने का वृतान्त है ।

सैन्नी एवं स्नोवा
सैन्नी एवं स्नोवा

यह एक रहस्यदर्शी, दार्शनिक एवं अन्र्तयात्रा वृतान्त है जो स्वयं की खोज में लगे हुए है । नायक एवं उसकी टोली देह के पार की अन्वेशक है । यह आत्मखोज परक उपन्यास है ।
प्रेम एवं मैत्री, अस्तित्व एवं सौन्दर्य, पुरूष और स्त्री एवं धर्म एवं अध्यात्म पर इसमे गहन चर्चा की हुई है । शब्द के पार जाने की कला इसमे बतायी हुई है । कला एवं कलाकार, कविता एवं साहित्य, मन एवं उसके पार पर बहुत विस्तृत चर्चा है ।

स्त्री व पुरूष सम्बन्धों में गहराई व आत्मीयता बढ़ने से जीवन का रहस्य समझा जा सकता है । पारम्परिक ढर्रे पर जीने से बेहोशी बढ़ती है । स्त्री-पुरूष सम्बन्धों में अपूर्णता जीवन में अपूर्णता का कारण है । स्वयं को जानने की दिशा में यह एक मार्ग है । अपने भीतर के विपरित लिंग से मिलने में बाहर का साथी मात्र सहायक है । असल तो अपनी ही देह के विपरित लिंग से मिलना है। दूसरों के बहाने हम अपने ही ठिकाने तलाश रहे हैं । सजगता व्यक्ति को नये आयाम देती है ।

नर-नारी के स्वाभाविक देहयोग और देहभोग तक से डरते रहेगें, जिसके बिना हम न स्वयं को जान सकते है, न ही दूसरे को । दमन व भय ने नारी को अधुरा बना दिया है । वह समर्पण व प्रेम से वंचित होने से खण्डित है ।
आज देह लोलुपता के विकास की जगह सहभागी चेतना का विकास आवश्यक है।आत्मा स्थिर या तैयार नहीं होती है । यह एक घटना है, संज्ञा नही है । इसे रचना पड़ता है । इसका निर्माण दृष्टा होने पर होता है ।

इसके लेखक मनाली के रहने वाले सैन्नी एक यायावर है जो हिमालय में घुमते हुए अपनी खोज में व्यस्त है। परम्परागत व संगठित धर्मों के विरूद्ध है। सच्चे अध्यात्म के राही है।

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रोग एवं उपचार का विज्ञान(अंतिम भाग)

द हीलिंग कोड़ नामक चर्चित पुस्तक एलेक्जेण्डर लाॅयड एवं बेन जाॅनसन द्वारा लिखी गयी । इसमें उपचार संहिता का विस्तृत वर्णन किया हुआ है । लेखक एलेक्जेण्डर लाॅयड अपनी पत्नि होप का ईलाज 12 वर्ष की खोज के बाद इस विधि से करने में करने में सफल रहे।साथ ही अन्य विधि भी है ।

कारण – अच्छी स्मृति अच्छे भाव पैदा करती है । तनाव जनक स्मृति तनाव पैदा करती है । स्मृति ऊर्जा सूचना तन्त्र को बनाती है । अच्छी स्मृति से बुरे भाव पिघल जाते है । अच्छी स्मृति की तस्वीरें बुरे भाव व बुरी तरंगो को समाप्त करती है । कोशिकिय स्मृति को बदल देती है । उपचार होने लगता है । जिससे डीएनए बदल जाता है । यह अचेतन स्तर पर जाकर तस्वीरें बनाती है । स्वस्थ तस्वीर विकृत तस्वीर को बदल देती है । हमारा हृदय तस्वीरों को ही देखता है । वह तस्वीरों से ही संचालित है ।
अचेतन से विनाशकारी तस्वीरें छुते हुए शरीर को चेतन मन की हानिकारक बातों की तरह नुकसान पंहुचाती है । कई लोग इस तरह स्वयं की बीमार बनाते रहते हंे ।
जब दुसरे के लिए प्रार्थना करनी हो:-
मैं प्रार्थना करता हूं कि प्रभु कृपा, विश्व पे्रम, जीवन-शक्ति एवं दिव्य प्रकाश —– मीना में —भर रहा है । उसके —-उच्च रक्तचाप—-(बीमारी) सम्बन्धी ज्ञात एवं अज्ञात नकारात्मक सोच, सम्बन्धित तस्वीरें, अस्वास्थकर विश्वास, विनाशकारी कोशिकिय स्मृतियां एवं उससे जुड़ी सभी शारीरिक समस्याओं का कारण प्रकट होता है एवं उससे उनका उपचार हो रहा है । मैं प्रार्थना करता हूं कि यह इलाज 100 गुणा से भी अधिक हो ! इस प्रार्थना का प्रभाव मीना को उपलब्ध हो !
तत्काल प्रभाव  ( Instant Impact) तकनीक:-
परिस्थितिजन्य तनाव को भगाने तत्काल प्रभाव (Instant Impact) तकनीक श्रेष्ठ है ।
1-तनाव को मापे,
2-दोनों हथेलियों को मिलाये
3-तनाव को शरीर पर देखें – शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक
4-पावर श्वसन लें – मुंह से श्वांस ले व नाक से छोड़े । समस्त श्वांस गहरी हो व नाभि तक जाएं । इस तरह का श्वसन 10 सैकण्ड में परिस्थितिजन्य तनाव घटा देता है । इसे पावर श्वसन कहते हंे ।
हृदय के भावों को खोजें:-
हृदय के भावों को पहचाने व मिटाएं-अपने दिल में छुपे भावों को पहचाने फिर उनका समाधान करें । भावों को बदलो सब बदल जाऐगा । दिल की शक्ति मस्तिष्क की शक्ति से कई गुना ज्यादा है । मुख्यतः हमारे भावों को 12 भागों में बांटा जाता है ।
1-क्षमा नहीं करना
2-हानिकारक कर्म
3-गलत धारणाएं
4-प्रेम बनाम स्वार्थ
5-खुशी बनाम अवसाद
6-शान्ति बनाम चिन्ता
7-धैर्य बनाम निराशा
8-दया बनाम कठोरता
9-अच्छाई बनाम अच्छा होना
10-विश्वास बनाम नियन्त्रण
11-विनम्रता बनाम घमण्ड
12-आत्म नियन्त्रण बनाम नियन्त्रण न होना

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रोग एवं उपचार का विज्ञान:द हीलिंग कोड़ नामक चर्चित पुस्तक से

द हीलिंग कोड़ नामक चर्चित पुस्तक एलेक्जेण्डर लाॅयड एवं बेन जाॅनसन द्वारा लिखी गयी । इसमें उपचार संहिता का विस्तृत वर्णन किया हुआ है । Healingcodeलेखक एलेक्जेण्डर लाॅयड अपनी पत्नि होप का ईलाज 12 वर्ष की खोज के बाद इस विधि से करने में करने में सफल रहे।साथ ही सात आधारभूत रहस्य बताए  है ।
रहस्य नम्बर 1- सभी रोगों का एक ही कारण होता है वह तनाव है ।
रहस्य नम्बर 2- हमारे सभी रोगों का कारण ऊर्जा समस्या है ।
रहस्य नम्बर 3- हृदय हमारे स्वस्थ होने के तन्त्र का अधिपति है ।
रहस्य नम्बर 4- मानव की हार्ड ड्राईव कोशिकीय स्मृतियां है जिसमे तस्वीरें ऊर्जा के रूप में होती है । 90 प्रतिशत तस्वीरें अचेतन में अवस्थित होती है ।
रहस्य नम्बर 5- आपका एन्टी वायरस प्रोग्राम आपको बीमार बनाता है ।
रहस्य नम्बर 6- मेरी धारणाएं ही मेरी कोशिकीय स्मृतियों को प्रभावित करती है। अवचेतन में छुपी धारणाएं स्वतः काम करती है । बीमारी की जड़ काटने तनाव गिराएं, उसे मिटाने स्मृति बदलें । रहस्य नम्बर 7- हृदय एवं मस्तिष्क में द्वन्द्व होने पर हृदय सदैव जीतता है ।
मुख्य विधि (उपचार संहिता)के चरण:-
1. तनाव को मापे – 1 से 10 के अनुपात में (10 सबसे बड़ा दर्द)
2. तनाव से जुड़ी भावनाएं व विश्वास को पहचानें
3. स्मृति में खोजें – जड़ तक जाएं – समान भाव स्थिति में कब थे
4. पूरानी स्मृति को मापे – उसका उपचार करें
5. प्रार्थना करें – उसके उपचार हेतू
मैं प्रार्थना करता हूं कि प्रभु कृपा, विश्व पे्रम, जीवन-शक्ति एवं दिव्य प्रकाश मुझमे भर रहा है । मेरे —-उच्च रक्तचाप—-(बीमारी) सम्बन्धी ज्ञात एवं अज्ञात नकारात्मक सोच, सम्बन्धित तस्वीरें, अस्वास्थकर विश्वास, विनाशकारी कोशिकिय स्मृतियां एवं उससे जुड़ी सभी शारीरिक समस्याओं का कारण प्रकट होता है एवं जिससे उनका उपचार हो रहा है । मैं प्रार्थना करता हूं कि यह इलाज 100 गुणा से भी अधिक हो !
6. चारों स्थिति में उक्त प्रार्थना – बासां पर, कनपटी पर, जबड़ों पर और कंठ के पास दोनो हाथ रख कर 30 सैंकण्ड तक दुहराएं । इससे आपके दिल के घाव भर जाते हंै । उससे बीमारी ठीक होती है ।

( to be continued…..)