कलौंजी-एक रामबांण दवा, उसका सेवन किस रोग में व कैसे करें?

खुदा ने क्या खूब ये कलौंजी बनाई है।
जो मौत के सिवा हर मर्ज की दवाई है।

कलौंजी को विभिन्न बीमारियों में इस प्रकार प्रयोग किया जाता है।

1-कैंसरः- कैंसर के उपचार में कलौजी के तेल की आधी बड़ी चम्मच को एक ग्लास अंगूर के रस में मिलाकर दिन में तीन बार लें। लहसुन भी खुब खाएं। 2 किलो गैंहू और 1 किलो जौ के मिश्रित आटे की रोटी 40 दिन तक खिलाएं। आलू, अरबी और बैंगन से परहेज़ करें।

2-खांसी व दमाः- छाती और पीठ पर कलौंजी के तेल की मालिश करें, तीन बड़ी चम्मच तेल रोज पीयें और पानी में तेल डाल कर उसकी भाप लें।

3-डायबिटीजः- एक कप कलौंजी के बीज, एक कप राई, आधा कप अनार के छिलके और आधा कप पितपाप्र को पीस कर चूर्ण बना लें। आधी छोटी चम्मच कलौंजी के तेल के साथ रोज नाश्ते के पहले एक महीने तक लें।

4-हृदय रोग, ब्लड प्रेशर और हृदय की धमनियों का अवरोधः- जब भी कोई गर्म पेय लें, उसमें एक छोटी चम्मच तेल मिला कर लें, रोज सुबह लहसुन की दो कलियां नाश्ते के पहले लें और तीन दिन में एक बार पूरे शरीर पर तेल की मालिश करके आधा घंटा धूप का सेवन करें। यह उपचार एक महीनें तक लें।

5-कमर दर्द और आर्थाइटिसः- हल्का गर्म करके जहां दर्द हो वहां मालिश करें और एक बड़ी चम्मच तेल दिन में तीन बार लें। 15 दिन में बहुत आराम मिलेगा।

6-अम्लता और आमाशय शोथः- एक बड़ी चम्मच कलौंजी का तेल एक कप दूध में मिलाकर रोज पांच दिन तक सेवन करने से आमाशय की सब तकलीफें दूर हो जाती है।

7-बाल झड़नाः- बालों में नीबू का रस अच्छी तरह लगाये, 15 मिनट बाद बालों को शेम्पू कर लें व अच्छी तरह धोकर सुखा लें, सूखे बालों में कलौंजी का तेल लगायें एक सप्ताह के उपचार के बाद बालों का झड़ना बन्द हो जायेगा।

8-दस्त या पैचिशः-एक बड़ी चम्मच कलौंजी के तेल को एक चम्मच दही के साथ दिन में तीन बार लें दस्त ठीक हो जायेगा।

9रूसीः- 10 ग्राम कलौंजी का तेल, 30 ग्राम जैतून का तेल और 30 ग्राम पिसी मेंहन्दी को मिला कर गर्म करें। ठंडा होने पर बालों में लगाएं और एक घंटे बाद बालों को धो कर शैम्पू कर लें।

10-मानसिक तनावः- एक चाय की प्याली में एक बड़ी चम्मच कलौंजी का तेल डाल कर लेने से मन शांत हो जाता है और तनाव के सारे लक्षण ठीक हो जाते हैं।

11-स्त्री गुप्त रोगः- स्त्रियों के रोगों जैसे श्वेत प्रदर, रक्त प्रदर, प्रसवोपरांत दुर्बलता व रक्त स्त्राव आदि के लिए कलौंजी गुणकारी है। थोड़े से पुदीने की पत्तियों को दो ग्लास पानी में डाल कर उबालें, आधा चम्मच कलौंजी का तेल डाल कर दिन में दो बार पियें। बैंगन, आचार, अंडा और मछली से परहेज रखें।

12-पुरूष गुप्त रोगः- स्वप्नदोष, स्थंभन दोष, पुरुषहीनता आदि रोगों में एक कप सेब के रस में आधी छोटी चम्मच तेल मिला कर दिन में दो बार 21 दिन तक पियें। थोड़ा सा तेल गुप्तांग पर रोज मलें। तेज मसालेदार चीजों से परहेज करें।

Advertisements

रिफाइंड तेल से कैंसर हो सकता है?

अमरीका में प्रकाशित “द हैन्ड बुक ऑफ नेचुरल हैल्थ” में डॉ. बुडविज ने लिखा है कि कृत्रिम हाइड्रोजिनेटेज फैट स्वास्थ्य के लिए एक विष के सिवा कुछ नहीं है तथा स्वस्थ और निरोग शरीर के लिए आवश्यक वसा अम्ल बहुत जरूरी है प्रसिद्ध डाॅ0 योहाना बुडविज मूलतः वसा विशेषज्ञ थी जिन्होंने पेपर क्रोमेटिक तकनीक विकसित की है। डाॅ0 बुडविज के अनुसार रिफाईन्ड तेल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। वैज्ञानिक यूडो इरेसमस की पुस्तक ‘‘फेट्स देट हील फेट्स देट कील’’ बताती है कि परिष्कृत तेल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। रिफाइंड तेल में कैंसर पैदा करने वाले घातक तत्व होते है।cancer
गृहणियों को खाना बनाने के लिए रिफाइंड तेल का प्रयोग नहीं करना चाहिए। बल्कि फील्टर्ड तेल का प्रयोग करना चाहिए। इससे भी अच्छा कच्ची घाणी से निकला तेल होता है। हमें कच्ची घाणी से निकला नारियल तेल ,सरसों का तेल या तील का तेल काम में लेना चाहिए। क्योंकि ये तेल हानिकारक नहीं होते है।
तेलों का परिष्करण एक आधुनिक तकनीक है। जिसमें बीजों को 200-500 डिग्री सेल्सेयस के बीच कई बार गरम किया जाता है। घातक पैट्रोलियम उत्पाद हेग्जेन का प्रयोग तेल को रंगहीन और गन्धहीन बनाने के लिए किया जाता है। कई घातक रसायन कास्टिक सोड़ा, फोसफेरिक एसीड, ब्लीचिंग क्लेज आदि मिलाए जाते है ताकि निर्माता हानिकारक व खराब बीजों से भी तेल निकाले तो उपभोक्ता को उसको पता न चले। इसलिए इन तेलों को गन्ध रहित, स्वाद रहित व पारदर्शी बनाया जाता है। रिफाइंड, ब्लीच्ड एवं डिओडोराइन्ड की प्रक्रिया में तेल के अच्छे तत्व समाप्त हो जाते है व घातक जहर घुल जाते है।
तेलों की सेल्फ लाईफ बढ़ाने के लिए तेलों का निकल तथा हाइडाªेजन की मदद से हाइड्रोजिनेशन किया जाता है। यह तेल सफेद ठोस कड़ा और देखने में घी जैसा लगता है। यह तेल जो कभी खराब नहीं होता इसमें होते है। केमिकल्स द्वारा परिवर्तित फैटी एसीड, ट्रांसफेट और निकिल के अवशेष होते है जो शरीर के लिए चयापचित करना कठिन है। इस पूरी प्रक्रिया में बीजों में विद्यमान वनस्पतिक तत्व , विटामिन आदि पूरी तरह नष्ट हो जाते है।
सबसे बढि़या तेल जैतून का तेल होता है जो हमारे यहाँ बहुत मंहगा मिलता है। इसके बाद तिल का तेल (शीसेम आॅयल) एवं सरसों का तेल खाना चाहिए। मूंगफली के तेल में कोलोस्ट्राल की मात्रा ज्यादा होती है अतः वह भी कम खाना चाहिए। तलने के प्रक्रिया में तेल में मौजूद फैटी एसीड ट्रांस फैटी एसीड में बदल जाते है और उसमें उपस्थित सारे एन्टी आॅक्सीडेन्ट नष्ट हो जाते है। इसलिए तलना भी हानिकारक है। इसलिए तली-गली चीजें नहीं खानी चाहिए।

Related Posts:

रिफाइंड तेल से ह्नदय रोग, मधुमेह व कैंसर हो सकता है? अन्तिम भाग

आयुवर्धक, आरोग्यवर्धक अलसी से आहार चिकित्सा: उक्त पुस्तिका डाउनलोड करें

वनस्पति घी भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है

एलोपैथिक दवाएँः मित्र या शत्रु

औषधियां,इन्जेेक्शन इत्यादि हमारे सुखी जीवन के लिए अभिशाप है।

                                                                                                 -एन्साइक्लोपिडिया आॅफ अमेरिका
सभी विज्ञानो में औषधि विज्ञान सबसे ज्यादा अनिश्चित है।जिस प्रकार दीमक लगी लकड़ी पर रंग-रोगन करने से मजबूती नहीं आ सकती,थोड़ा-सा स्पर्श होते ही टूट जाती है। कचरे को इकट्ठा रखने से उसमें उफान,सडान, बदबू एवं रूकावट आने की समस्या खडी हो जाती है, ठीक इसी प्रकार दवाए शरीर की प्रतिरोधक क्षमता क्षीण करके कचरे को तो साफ नहीं करती, दीमक को तो नहीं हटाती पर रोगों के कारणों को मिटाने की जगह उसको दबाने अथवा रोग को अन्य रूप में प्रगट करने का मार्ग खोल देती है।
आज हमारे जीवन में दवाओं का इतना महत्वपूर्ण स्थान बन गया है कि थोड़ा सा सिर दर्द अथवा शरीर में थोडी-सी अस्वस्थता आई नहीं कि तत्क्षण हम गोली ले लेते हैं । दर्दशामक ओैषधि दर्द को दूर करने के लिए ली जाती है पर याद रखें कि इन दमनकारी औषधियों का प्रभाव विनाशकारी है। तत्काल तो इनसे लाभ होता है पर दीर्घकाल में इनसे हानि अधिक होती हैै। ये औषधियां हमारे शरीर के स्नायुओं को कमजोर करती हैं परिणाम स्वरूप हमारी संवेदन शक्ति कम होती है। तब हमारी ऐसी असहाय स्थिति हो जाती है जैसे कि किसी कारखाने में आग लगे और उसकी चेतावनी के रूप में घंटी के जरिए उसके मालिक को सूचित किया जाए, पर मालिक को जरा भी असुविधा पसन्द नहीं इसलिए वो घंटी का तार ही काट डाले। जिस से घंटी बजना तो बंद हो जाता है, पर आग रुकती नहीं और कारखाना भस्मीभूत हो जाता है। इस तरह दवाओं के प्रभाव से हमारी जीवन शक्ति को नुकसान पहुंचता है और शरीर अंदर ही अंदर विषाक्त होकर खत्म हो जाता है।
वास्तव में दवाओं का विचार ही भ्रामक और अस्थाई पाये पर आधारित है। सर कपूर कहते है-औषधि-विज्ञान की उत्पति मिथ्या,कल्पना और दिन प्रतिदिन बढती मृत्यु पर हुई है। दवा का विरोध करना इसलिए आवश्यक है कि जैसे ही एक रोग की दवा लेने से उसके लक्षण दबते हैं तो दूसरे जटिल रोग उसके विकल्प में तैयार हो जाते है। दवा अपने जहरीले प्रभाव के द्वारा सिर्फ रोगो के लक्षणों का दमन करती है ,परन्तु बुनियादी रूप से जड़ को प्रभावित नहीं करती है।
दवाओं की शक्ति प्रकृति की शक्तियों से अधिक नहीं होती है। हम अस्वस्थ होते हंै डाक्टरों की शरण मे जाते हंै व दवाये लेते हैं। इसके बजाय हमें प्राकृतिक शक्तियों पर भरोसा कर सावधानी बरतनी चाहिए। औषधि मार्ग जो हमें रोगों के चुगंल में फंसाता रहता है और जीवन को तकलीफ देह बनाता है, उसे न अपनाएँ।

                                                                          ( मेरी आने वाली पुस्तक “जियो तो ऐसे जियो ‘ से )

जवारे का रसः बीमारी में अमृत एवं प्राकृतिक प्रतिरोधक शक्ति जगाने हेतु

गेंहूं के पौधे में ईश्वरप्रदत्त अपूर्व गुण है। हम लोग बारहों मास भोजन गेहूँ का प्रयोग करते हैं, पर उसमें क्या गुण हैं, यह हम नहीं जानते रोगनाशक हैं।
पिछली सदी में अमरीका की एक महिला डाक्टर एन. विगमोर ने गेहूं की शक्ति के सम्बन्ध में बहुत अनुसन्धान तथा अनेकानेक प्रयोग करके एक बड़ी पुस्तक लिखी है, जिनका नाम है Why Suffe? Answer…Wheat Grass Manna उन्होंने अनेकानेक असाध्य रोगियों को गेहूं के जवारे का रस देकर उनके कठिन से कठिन रोग अच्छे किये हंै। वे कहती है कि संसार में ऐसा कोई रोग नहीं है जो इस रस के सेवन से अच्छा न हो सके। कैंसर के ऐसे बड़े-बड़े रोगी उन्होेंने अच्छे किये हैं, जिन्हें डाक्टरों ने असाध्य समझकर जवाब दे दिया था और जो मरणप्रायः अवस्था में अस्पताल से निकाल दिए गए थे। यह ऐसी अदभुत हितकर चीज है। उन्होंने इस साधारण से रस से अनेकानेक भगंदर, बवासीर, मधुमेह, गठियाबाय, पीलियाज्वर, दमा, खांसी वगैरह के पुराने से पुराने असाध्य रोगी अच्छे किये हैं। बुढ़ापे की कमजोरी दूर करने में तो यह रामबाण है। भयंकर फोड़ों और घावों पर इसकी लुगदी बाँधने से जल्दी लाभ होता है। अमेरिका के अनेकानेक बड़े-बड़े डाक्टरों ने इस बात का समर्थन किया है। अनेक लोग इसका प्रयोग करके लाभ उठा रहे हैं।

जवारे का रस के बनाने की विधि
आप सात बांस की टोकरी मंे अथवा गमलों मंे अच्छी मिट्टी भरकर उन मंे प्रति दिन बारी-बारी से कुछ उत्तम गेहूँ के दाने बो दीजिए और छाया मंे अथवा कमरे या बरामदे मंे रखकर यदाकदा थोड़ा-थोड़ा पानी डालते जाइये, धूप न लगे तो अच्छा है। तीन-चार दिन बाद गेहूँ उग आयेंगे और आठ-दस दिन के बाद 6-8 इंच के हो जायेंगे। तब आप उसमें से पहले दिन के बोए हुए 30-40 पेड़ जड़ सहित उखाड़कर जड़ को काटकर फेंक दीजिए और बचे हुए डंठल और पत्तियों को धोकर साफ सिल पर थोड़े पानी के साथ पीसकर छानकर आधे गिलास के लगभग रस तैयार कीजिए ।
वह ताजा रस रोगी को रोज सवेरे पिला दीजिये। इसी प्रकार शाम को भी ताजा रस तैयार करके पिलाइये आप देखेंगे कि भयंकर रोग दस बीस दिन के बाद भागने लगेगे और दो-तीन महीने मंे वह मरणप्रायः प्राणी एकदम रोग मुक्त होकर पहले के समान हट्टा-कट्ठा स्वस्थ मनुष्य हो जायेगा। रस छानने में जो फूजला निकले उसे भी नमक वगैरह डालकर भोजन के साथ रोगी को खिलाएं तो बहुत अच्छा है। रस निकालने के झंझट से बचना चाहें तो आप उन पौधों को चाकू से महीन-महीन काटकर भोजन के साथ सलाद की तरह भी सेवन कर सकते हैं परन्तु उसके साथ कोई फल न खाइये। आप देखेंगे कि इस ईश्वरप्रदत्त अमृत के सामने सब दवाइयां बेकार हो जायेगी।

गेहूँ के पौधे 6-8 इंच से ज्यादा बड़े न होने पायें, तभी उन्हें काम मंे लिया जाय। इसी कारण गमले में या चीड़ के बक्स रखकर बारी-बारी आपको गेहूँ के दाने बोने पड़ेंगे। जैसे-जैसे गमले खाली होते जाएं वैसे-वैसे उनमें गेहूँ बोते चले जाइये। इस प्रकार यह जवारा घर में प्रायः बारहों मास उगाया जा सकता है।

सावधानियाँ

  • ऽ रस निकाल कर ज्यादा देर नहीं रखना चाहिए।
  •  रस ताजा ही सेवन कर लेना चाहिए। घण्टा दो घण्टा रख छोड़ने से उसकी शक्ति घट जाती है और तीन-चार घण्टे बाद तो वह बिल्कुल व्यर्थ हो जाता है।
  •  ग्रीन ग्रास एक-दो दिन हिफाजत से रक्खी जाएं तो विशेष हानि नहीं पहुँचती है।
  •  रस लेने के पूर्व व बाद मंे एक घण्टे तक कोई अन्य आहार न लें
  •  गमलों में रासायनिक खाद नहीं डाले।
  •  रस में अदरक अथवा खाने के पान मिला सकते हैं इससे उसके स्वाद तथा गुण में वृद्धि हो जाती है।
  •  रस में नींबू अथवा नमक नहीं मिलाना चाहिए।
  •  रस धीरे-धीरे पीना चाहिए।
  •  इसका सेवन करते समय सादा भोजन ही लेना चाहिए। तली हुई वस्तुएं नहीं खानी चाहिए।

तीन घण्टे मंे जवारे के रस के पोषक गुण समाप्त हो जाते हैं। शुरु मंे कइयों को उल्टी होंगी और दस्त लगेंगे तथा सर्दी मालूम पड़ेगी। यह सब रोग होने की निशानी है। सर्दीं, उल्टी या दस्त होने से शरीर में एकत्रित मल बाहर निकल जायेगा, इससे घबराने की जरुरत नहीं है।
स्वामी रामदेव ने इस रस के साथ नीम गिलोय व तुलसी के 20 पत्तों का रस मिलाने की बात कहीं है।
कैलिफोर्निंया विश्वविद्यालय की शोध से प्रकट हुआ कि जवारे के रस में पी फोर डी वन नामक ऐसा ऐन्जाइम है जो दोषी डी एन ए की मरम्मत करता है। रक्त शोधन, यकृत से विषैले रयासनों को निकालने व मलशोधन मंे इसका बहुत योगदान है।डाॅ. हेन्स मिलर क्लोराॅिफल को रक्त बनाने वाले प्राकृतिक परमाणु कहते है। लिट्राइल से कैंसर तक को ठीक करने वाले तत्वों का पता लगा है। कोशिकाओं के म्यूटेशन को रोकता है। अर्थात् कार्सिनोजेनिक रसायनों जैसे बेन्जोंपायरीन को कम करता है। इससे कैंसर वृद्धि रूकती है। चीन में लीवर कैंसर इससे ठीक हुए है।

लगभग एक किलो ताजा जवारा के रस से चैबीस किलो अन्य साग सब्जियों के समान पोषक तत्व पाये जाते है।
डाक्टर विगमोर ने अपनी प्रयोगशाला मंे हजारों असाध्य रोगियों पर इस जवारे के रस का प्रयोग किया है और वे कहती हैं कि उनमें से किसी एक मामले मंे भी उन्हें असफलता नहीं मिली है।

 Related Posts:

अलसीः चमत्कारी रामबाण औषधि क्यों व कैसे है ?

असाध्य रोगों का सामना कैसे करेंः उक्त पुस्तिका डाउनलोड करें

कलौंजी – एक रामबांण बीज

 

अलसीः चमत्कारी रामबाण औषधि क्यों व कैसे है ?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लयू एच ओ)े ने अलसी को सुपर फुड माना है। अलसी में ओमेगा थ्री व सबसे अधिक फाइबर होता है। अतः यह स्वास्थ्यप्रद होने के साथ-साथ रोगों के उपचार में लाभप्रद है। इसमें सभी वनस्पितियों की तुलना में अधिक ओगेमा-3 होता है तभी इसे चिकित्सा विज्ञान में ‘‘वेज ओगेमा’’ कहते है । आयुर्वेद में अलसी को दैविक भोजन माना गया। महात्मा गांधीजी ने स्वास्थ्य पर भी शोध की व बहुत सी पुस्तकें भी लिखीं। उन्होंने अलसी पर भी शोध किया, इसके चमत्कारी गुणों को पहचाना और अपनी एक पुस्तक में लिखा है, “जहां अलसी का सेवन किया जायेगा, वह समाज स्वस्थ व समृद्ध रहेगा।”

अलसी का बोटेनिकल नाम लिनम यूजीटेटीसिमम् यानी अति उपयोगी बीज है। इसे अंग्रेजी में लिनसीड या फ्लेक्ससीड कहते हैं।

ओमेगा 3 की शरीर में महत्वपूर्ण भूमिका-

  •  यह उत्कृष्ट प्रति-आक्सीकरक है और शरीर की रक्षा प्रणाली सुदृढ़ रखता है।ऽप्रदाह या इन्फ्लेमेशन को शांत करता है।
  •  ऑखों, मस्तिष्क ओर नाड़ी-तन्त्र का विकास व इनकी हर कार्य प्रणाली में सहायक, अवसाद और व अन्य मानसिक रोगों के उपचार में सहायक, स्मरण शक्ति और शैक्षणिक क्षमता को बढ़ाता है।
  •  ई.पी.ए. और डी.एच.ए. का निर्माण।
  •  रक्त चाप व रक्त शर्करा-नियन्त्रण, कॉलेस्ट्रोल-नियोजन, जोड़ों को स्वस्थ रखता है।
  •  यह भार कम करता है, क्योंकि यह बुनियादी चयापचय दर (ठडत्द्ध बढ़ाता है, वसा कम करता है, खाने की ललक कम करता है।
  •  यकृत, वृक्क और अन्य सभी ग्रंथियों की कार्य-क्षमता बढ़ाता है।
  •  शुक्राणुओं के निर्माण में सहायता करता है।

आधुनिक जीवन शैली के कारण शरीर में ओमेगा-3 व ओमेगा-6 का अनुपात बिगड़ गया है। शरीर में ओमेगा-3 की कमी व इन्फ्लेमेशन पैदा करने वाले ओमेगा-6 के ज्यादा हो जाने केे कारण ही हम उच्च रक्तचाप, हृदयाघात, स्ट्रोक, डायबिटीज, मोटापा, गठिया, अवसाद, दमा, कैंसर आदि रोगों का शिकार हो रहे हैं। ओमेगा-3 की यह कमी 30-60 ग्राम अलसी से पूरी कर सकते हैं। ये ओमेगा-3 ही अलसी को सुपर स्टार फूड का दर्जा दिलाता हैं।

अलसी के सेवन से उच्च रक्तचाप, हृदयाघात, स्ट्रोक, डायबिटीज, मोटापा, गठिया, अवसाद, दमा, कैंसर आदि रोगों में लाभ होता है। डाॅ. बुझवीड ने तो अन्तिम स्थिति के कैंसर तक का इलाज अलसी के तेल से किया है।

Related Posts:

अलसी का सेवन किस रोग में व कैसे करें?

कार्य क्षमता बढ़ाने व कोलॅस्ट्रोल घटाने का अचूक आयुर्वेदिक नुस्खा

अलसी एक चमत्कारी आयुवर्धक, आरोग्यवर्धक दैविक भोजन

healingcancernaturally.com/

डाॅक्टर बुडविज का कैंसररोधी अलसी प्रधान आहार-विहार (Protocol)