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स्वस्थ रहने के 12 सूत्र: जीवन शैली बदल कर रोग मुक्त रहें

हम सपरिवार रोग मुक्त रहें इस हेतु कार्य योजना

 

हमें अपनी जीवन शैली इस तरह की बनानी हैं क़ि हम बीमार ही न हो

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खोए हुए हम खुद है और खोज रहे है भगवान को,सोए हुए हम खुद है और जगा रहे भगवान को

 हमें  अपना तो कुछ  पता नहीं और परमात्मा का पता करना चाहते है,यही विडम्बना हैl सामने पड़े पत्थर को जानते नहीं और विराट में समाये प्रभु को पाने चले हैl  प्रार्थना की जरूरत हमें है,उससे हमारे भीतर शक्ति जगती हैl परमात्मा को हमारी प्रार्थना की आवश्यकता नहीं है l परमात्मा हमारे भीतर है,किसी मूर्ति में छिपा हुआ नहीं हैl खुद को तराशने की आवश्यकता हैl मूर्ति  पूजा उसमे सहायक हो सकती है यदि पूजा समझ के की जाय l

 

 

 

कर्म कांड में डूबा हुआ व्यक्ति परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकता हैlअपने को स्वीकार कर इस क्षण जीने में ही उपलब्धी हैl वर्तमान में जीना ही परम जीवन को पाना है,परमात्मा को उपलब्ध होना हैl  जीवन अन्यत्र  कहीं नहीं ,जीवन अभी और यही हैl

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योग-प्राणायाम के अभ्यास में आड़े आने वाली आंतरिक बाधाएं

योग चिकित्सा हम जारी क्यों नहीं रख पाते हैं ? हम गोलियां खाकर क्यों ठीक होना चाहते हैं ? रोग तो हम पैदा करते है लेकिन चाहते हैं कि डाॅक्टर ठीक कर दे । मनुष्य सरल रास्ता पसंद करता है । हम कठोर कदम पसंद नही करते हैं । सुविधा पसंद क्यों हो गए हैं ? ठीक होना सब चाहते हैं लेकिन सरल रास्ते से व अपनी शर्तों पर इसलिए ठीक नहीं हो पाते है ।
योगासन व प्राणायाम करते वक्त बहुत से विघ्न आते हैं । मन कहता है कि अरे इन आसनों से क्या हो जाएगा । ज्यादा योग मत करो । कभी मन नहीं लगता है । कभी ब्रेक लेने का मन करता है। कभी शरीर जंभाई लेने लगता है । कभी थकान का भाव मन में आता है । कभी कमजोरी लगती है । कभी कहीं दर्द उठता है ।

young woman training in yoga pose on rubber mat isolated
हम योग क्यों नहीं करते है ? अधिकांश लोगों को योग करना सुहाता नहीं है । योग करने में समस्याएं क्या है ? इसका महत्व नहीं जानने वाले योग नहीं करते हैं । योगाभ्यास जारी रखने में प्रमुख बहाने वाली बाधाएं निम्न प्रकार से हैः-
1. आत्मछवि – हम अपने मन में अपनी छवि रखते हैं । यह जब खराब होती है तो व्यक्ति यथा स्थिति वादी रहता है । ऐसे मे वह परिवर्तन का विरोध करता है । वह अपनी आदतों को बदलना नहीं चाहता है व उसमे स्वयं को सुरक्षित समझता है । ऐसे लोग हताश हो जाते हैं ।
2. नजरिया – स्वस्थ दृष्टिकोण के अभाव में व्यक्ति अच्छी तरह सोच नहीं सकता है । उसे योग प्राणायाम बोरियत लगते हैं । वह अपने पूर्वाग्रहों के कारण उसका महत्व समझ नहीं पाता है ।
3. लगाव – कुछ व्यक्यिों का लक्ष्य स्पष्ट नहीं होता है । अतः स्वास्थ्य को महत्व नहीं देते हैं । धन व शोहरत कमाने में डुबे रहते हैं । योग से स्वयं अपना लगाव नहीं स्थापित कर पाते हैं । कामुक व पेटु व्यक्ति योग पसंद नहीं करता है । इनके पास योग नहीं करने के अनेक बहाने होते हैं ।
4. योग की शक्ति पर अविश्वास – हमें योग की शक्ति पर भरोसा नहीं होता है । ‘‘योग से क्या हो जाएगा’’ की तरह की बात करते हैं । उन्हे सदैव संशय रहता है । ऐसे व्यक्ति योग नहीं करते हैं ।
5. गलतफहमियां – कुछ व्यक्ति गलतफहमियों के कारण योगाभ्यास नहीं करते हैं । वे अपनी सुविधा अनुसार बातों की व्याख्या कर लेते हैं । ऐसे व्यक्तियो के मन में योग के प्रति कोई दुर्भावना होती है । वे योग का सही मूल्य नहीं जानते हैं।
6. बीमारी – शरीर बीमारी के कारण योग करने में असमर्थ होता है इसलिए बीमार लोग नियमित योग कर नही पाते । रोगी के कुछ अंग जकड़ जाते हैं या कड़क हो जाते हैं । शारीरिक कमजोरी के कारण कुछ लोग योग कर नहीं पाते हैं ।
7. आलस्य – कुछ व्यक्ति सुस्ती के कारण योग नहीं कर पाते हैं । योग करते वक्त उन्हे जंभाई आती है । प्रतिदिन चाहकर भी ऐसे व्यक्ति योग निरन्तर कर नहीं पाते हैं । समय नही का रोना सदैव रोते रहते हैं ।
8. लापरवाही – कुछ साथी ‘सब चलेगा’ के भाव में जीते हैं । अतः योग करना उन्हे कठिन लगता है । अतः स्वयं के प्रति भी जिम्मेदारी नहीं लेते हैं । ऐसे लोग कार्याें की प्राथमिकता तय नहीं करते हैं । जो प्रत्यक्ष होता है वही करते है । वे सबके लिए दूसरों को दोष देते हैं । ऐसे लोग खुद सकारात्मक नहीं होते हैं ।
9. थकान – सदा थकान अनुभव करने वाले भी योगासन अच्छी तरह कर नहीं पाते हैं । कुछ लोग थकान के कारण योग करने से डरते हैं ।
10. अज्ञान-अशिक्षा

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कैसे पढ़े प्राचीन जैन शास्त्र ?

आज अधिकांश साधु भी परम्परावादी, स्थितिपालक और साम्प्रदायिक दृष्टि रखने वाले हेैं। स्वतन्त्र चिन्तन के अभाव में वे नवीन तथ्य ग्रहण नहीं कर सकते। अपरिग्रह के अग्रदूत कहला कर जो गाड़ी-समेत संघ चलाते हों, जो तन्त्र-मन्त्र करते हों, वे ‘गोम्मटसार’ को नहीं समझ सकते। जहाँ साधु का अधिकांश वक्त अपने अनुयायियों से घिरे रहने में व्यतीत होता हो, जो चेले ढँढ़ने में /नयी कर्मकाण्डी व्यवस्थाओं में ही दिन-रात रहते हों, वे ‘समयसार’ की मर्म-महिमा को कैसे जान सकते हैं? परिशोधित कषायों में डूबे साधु ‘कषायपाहुड’ के रहस्य को भला कैसे पकड़ पायेंगे?jain mantra

भौतिकवादी युग में स्वस्थ ज्ञानवर्द्धन का एकमात्र श्रेष्ठ साधन स्वाध्याय है। शेष सभी रुढि़यों की भेंट चढ़ कर अपना महत्व खो चुके हेैं। ऐसे में शास्त्र के मर्म को समझना बहुत जरुरी है। अनेक कारणों से मूल शास्त्रकारों के प्रयोजन एवं मन्तव्य को आज पकड़ना कठिन हो गया है। इनमें मुख्य हैं आज के श्रावक का मानसिक स्तर, जीवन-मूल्यों एवं उसके आधारों में परिवर्तन।इतिहास एवं परिस्थितियों की भिन्नता भी एक सबल कारण है। भाषायी भिन्नता ने इस खाई को और चैड़ा कर दिया है। इधर मध्यकालीन टीकाकारों ने तत्कालीन आवश्यकता का ध्यान रख कर धर्म की सुरक्षा एवं प्रचार के लोभ में शास्त्रों में मनमाने परिवर्तन किये। इसके साथ ही आज का यश-लोभी आगम-संपादक उसे और कठिन बनाता जा रहा है; अतः आज शास्त्र को पचाना काफी मुश्किल हो गया है।

स्वाध्याय एक कला है। शास्त्रगत सत्य एवं परिणामों के आधार पर जैन शास्त्र मूलतः अनुयोग-पद्धति के आधार पर लिखे गये हैं। संसार के अन्य किसी भी धर्म के पास यह सुविधा नहीं हैं। जिनमत में मोटे रुप से शास्त्रों को चार अनुयोगों में बाँटा गया है। प्राथमिक भूमिका वाले अध्येता के लिए प्रथमानुयोग है। कर्मफल और लोकालोक(यूनिवर्स) की संरचना के जिज्ञासु के लिए करणानुयोग है। व्यवहारी श्रद्धालुओं के लिए चरणानुयोग है, जिसमें आचरण-संहिता निबद्ध है। तार्किक एवं अनुभवी के लिए द्रव्यानुयोग है।

धर्म में जिनकी रुचि और तत्परता नहीं है ऐसे लोगों को आकर्षित करने के लिए प्रथमानुयोग है। यह कथानुयोग है, जिसमें अतिशयोकितपूर्ण भाषा एवं आलंकारिक शैली में पुराण आदि लिखे गये हैं। यही कारण है कि अनेक स्थलों पर प्रथमानुयोग कपोल-कल्पित प्रतीत होता है। अरे भाई, तीव्र कषाय-ग्रस्त जीवों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने, उन्हें धर्म से परिचित कराने आदि के लिए चमत्कारिक कथन किये जाते हैं। अद्भुत रस से पाठक तत्काल प्रभावित होते हैं। पाप-पुण्य से जुड़ी कथाएँ धर्म-भीरुओं को नैतिकता सिखाती है; अतः ऐसी कथाओं में तथ्यों की सत्यता नहीं, बल्कि उनका प्रयोजन उपादेय होता है। प्रयोजन सत्य है, इसलिए घटनाओं की छानबीन व्यावहारिक नहीं है। शलाका पुरुषों के जीवन’वृत्तों में इतिहास न ढँढ़ कर, हमें उनके लक्ष्य पर ध्यान देना चाहिये। कवि एवं कथाकार को इतिहास की कुर्सी पर बैठा कर उनमें दोष ढँढ़ना बुद्धिमता नहीं है; इसलिए कथानुयोग का अध्ययन साहित्यिक विवेक के साथ करना चाहिये अन्यथा हमारी पुराण-सम्पदा भी आपको गप्पाष्टक लगेगी।

करणानुयोग का संबध कर्म-सिद्धान्त एवं भूगोल से है। वैसे यह तकनीकी अनुयोग अति जिज्ञासुओं के लिए है। यह पूर्णतः केवलज्ञान पर आधारित है; इसलिए छद्मस्यों (सांसारिक) के अनुभव इसे समझने में बाधा डालते हैं। इसमें तर्क-वितर्क से कोई निर्णय नहीं लिया जा सकता है। गुणस्थान, मार्गणा-स्थान आदि के अध्ययन परिणामों को स्थिर करते हैं। इनके अभ्यास से मोह-क्षय होता है। मोटे रुप में कहें तो यह बुद्धिजीवियों-का-अनुयोग है। द्रव्यानुयोग में प्रत्येक तथ्य के पीछे कोई-न-कोई कारण है; अतः इसकी गहरी खोज-बीन आज बहुत आवश्यक है।

चरित्र की पवित्रता बनाये रखने के लिए बाह्य साधनों का निरुपण चरणानुयोग में किया जाता है। इसमें श्रावक एवं साधुओं की आचरण-संहिता का विस्तृत विवेचन हुआ है। व्रतों का स्वरुप एवं वर्णन, भक्ष्य-अभक्ष्य खाद्याओं की सूची, अतिचारों के वर्णन, एवं संयम को प्राप्त करने की प्रविधि इस अनुयोग की मुख्य विषय-वस्तु है। स्वेच्छारिता को नियन्त्रित करने के लिए निरुपित अनेक बातें आज के वैज्ञानिक संदर्भो में ठीक न भी बैठती हों तो भी इन्हें ग्रहण करना चाहिये। भला जैन आचरण-संहिता संसार-वर्धक कैसे हो सकती है? स्वास्थ्य-विज्ञान के विरुद्ध हुए एकाध कथन के कारण संपूर्ण शास्त्र को झूठा नहीं माना जाना चाहिए। कषायें छुड़ाना बहुत कठिन हैं; अतः अनेक तरह की बातें यहाँ मात्र शरीर-मोह को कम करने के लिए लिखी होती हैं; जिन्हें सही संदर्भ में लेना चाहिये।

द्रव्यानुयोग सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। इसे ‘न्याय-शास्त्र-का अनुयोग’ कहना अनुचित नहीं होगा। इसमें द्रव्य, गुण, पर्याय अर्थात् ‘वस्तु-स्वभाव’ का निरुपण हुआ है। संपूर्ण जगत् के स्वभाव का इसमें लेखा-जोखा हैं। न्याय की कसौटी पर सप्त तत्त्वों एवं आत्मा-का-निर्णय यहीं प्रमाणित हुआ है। प्रमाण, नय एवं भेद-विज्ञान द्वारा इस अनुयोग में ‘वस्तु-स्वरुप’ का तर्कसंगत निरुपण किया गया है।

वैसे शास्त्रों में अनुयोगों का मिला-जुला रुप ही उपलब्ध हैं; अतः पाठक को प्रासंगिकता का ध्यान रख कर ही अनुयोग-स्वाध्याय करना चाहिये। किसी भी एक अनुयोग का अध्ययन करने से एकाकी दृष्टिकोण बनता है; अतः अनुयोगों का तुलनात्मक स्वाध्याय करना ही उचित है।

स्वाध्यायर्थी को अनुयोग-पद्धति के अतिरिक्त भी अनेक अन्य बातों का ध्यान रखना चाहिये। सबसे पहले तो यह कि किसी भी शास्त्र के कथन को निरपेक्ष न समझें। कोई भी वाक्य शब्दों-की-सीमा में निषद्ध होता है; अतः वह एक समय में एक ही अर्थ प्रकट कर सकता है; अर्थात् वाक्य सदैव सापेक्ष होते हैं, इसलिये अपेक्षा को दिन की रोशनी की तरह ज्ञात करके पढ़ना चाहिये। ऐकान्तिक दृष्टि की अपेक्षा अनेकान्त और स्याद्वाद के प्रकाश में शासत्रों को पढ़ना चाहिये।इसी तरह शास्त्र के प्रणेता के जीवन-वृत्त एवं उसके काल को जानना भी शास्त्र-की-गहराइयों तक पहुँचने के लिए आवश्यक है; अर्थात् शास्त्र का अर्थ क्षेत्र, काल, भाव, और प्रसंग के अनुसार ही समझना चाहिये। इसके अतिरिक्त प्रत्येक शब्द को समझने से पूर्व उसका भावार्थ मतार्थ, आगमार्थ, शब्दार्थ और नयार्थ भी खोजना-जानना चाहिये।

समन्वयवादी दृष्टि विकास समग्र ज्ञान के परिवेश में ही होता है। मनोविज्ञान, दर्शनशास्त्र, व्याकरण, और साहित्य का अभ्यास शास्त्र-की-गहराई में उतरने के लिए आवश्यक है। प्रत्येक वाक्य का अर्थ निचोड़ते वक्त शब्द-शक्तियाँ (लक्षण, अभिदा, व्यन्जना) पर ध्यान देना भी आवश्यक है। साहित्य की सभी विधाओं का ज्ञानी और प्रत्येक विधा की विशेषताओं एवं कमियों का जानकार ही शास्त्र के मर्म को जान सकता है।

सब जानते हैं कि शास्त्र पूर्ण वितरागी द्वारा नहीं लिखे गये हैं। श्रतु केवली एवं अन्य सभी रचनाकारों को श्रतु का राग रहता है, तभी वे उसे लिपिबद्ध कर पाते हैं। इसके अलावा आज श्रतु-संपदा शुद्ध एवं पूर्ण रुप से उपलब्ध भी नहीं है। इसमें प्रयोजनानुसार बहुत सारे अनावश्यक वक्तव्य भी संक्षिप्त हुए हैं, जो जैन सिद्धान्त-के-अनुरुप नहीं हैं। जिस तरह हम पानी को छान कर और गैहूँ आदि को बीन कर काम में लेते हैं, वैसे ही शास्त्र को भी विवेक के छन्ने में छानना और तर्क की रोशनी में बीनना चाहिये। फल में गुटली, छिलके आदि बेकार होते हैं; किन्तु उनका फल की सुरक्षा एवं संरचना के लिए होना आवश्यक है। इसी प्रकार शास्त्र में भी कई-कई बातें होती है; जो अस्तित्व के लिए जरुरी भले ही हों, किन्तु अर्थ-बोध से जिनका संबन्ध अक्सर नहीं होता है; अतः शास्त्र को एक तटस्थ समीक्षक की दृष्टि से पढ़ना चाहिये।

आचार्य समन्तभद्र ने शास्त्र की परीक्षा को अनिवार्य मानते हुए छह मानदण्ड निर्धारित किये हैं। उनके अनुसार वही आप्त वाक्य है, जो तर्क द्वारा अकाट्य हो; जो प्रत्यक्ष और अनुमान के विरुद्ध हो। इसी तरह पूर्वापर विरुद्ध होने पर भी कोई कथन जिनवाणी के ढाँचे में नहीं माना जा सकता। जैनागम का प्रत्येक अंश तत्त्वों-पदेशक एवं सर्वकल्याणकारक होता है। अन्तिम कसौटी है; प्रत्येक वाक्य संसार मार्ग का भंजक होता है। उक्त कसौटियों पर प्रत्येक कथन की परीक्षा करके ही शास्त्र का ग्रहण किया जाना चाहिये। कोई भी कथन जितने-जितने अंशों में उक्त कसौटियों के विरुद्ध है, उतने-उतने अंशों में वह जैनत्व के भी विरुद्ध है; शास्त्र-समस्त नहीं है।

जिनमत का अनुयायी आज जाति, पंथ ओैर सम्प्रदाय के मोह-जाल में जकड़ा हुआ है। सब जानते हैं कि शुद्ध एवं सात्त्विक तथ्य को एक मोही व्यक्ति ठीक से गले नहीं उतार सकता। एक सरल एवं सदाचारी व्यक्ति ही आत्मज्ञान को पचा सकता है। कुटिल व्यक्ति सीधी-सच्ची बात को ग्रहण नहीं कर सकता। तीव्र व्यक्ति नैतिकता की बात पढ़ तो सकता है, लेकिन उसे भलीभाँति पचा नहीं सकता। दिन-भर आपके व्यापार-व्यवसाय में लूट-खसोट करने वाला श्रावक ‘रत्नकरण्ड श्रावकाचार को गले नहीं उतार पायेगा। यौन स्वतन्त्रता की समर्थक आधुनिक युवतियाँ भला अंजना के चरित्र को कैसे समझ सकती हैं? अर्थात् स्वाध्याय करने पर भी चरित्र की शुद्धता के बिना आत्मज्ञान रुच नहीं सकता।

आज अधिकांश साधु भी परम्परावादी, स्थितिपालक एवं साम्प्रदायिक दृष्टिकोण रखते हैं। स्वतन्त्र चिन्तन के अभाव में वे नवीन तथ्य ग्रहण नहीं कर सकते। अपरिग्रह के अग्रदूत कहला कर जो गाड़ी-सहित संघ चलाते हों, जो तन्त्र मन्त्र करते हों, वे ‘गोम्मटसार’ को नहीं समझ सकते। जहाँ साधु का अधिकांश समय अपने अनुयांयियों से घिरे रहने में ही व्यतीत होता हो, जो चेले ढूँढ़ने एवं कर्मकाण्डी व्यवस्थाओं में ही दिन-रात डूबे रहते हों; वे ‘समयसार’ की मर्म-महिमा कैसे जान सकते हैं? परिशोधित कषायों में डूबे साधु ‘कषाय पाहुड’ के रहस्य को कैसे पकड़ पायेगे?

जिनागम-का-स्वाध्याय शब्दों का खेल नहीं है, जिसे हर साक्षर व्यक्ति खेल सके। खुली चित्तवुत्ति, विशाल दृष्टिकोण, लीक से हट कर सोचने की क्षमता, निर्णय लेने की शक्ति, एवं तर्क तथा तारतम्यता का विवेक जिसमें है वही शास्त्रों के अंतरंग तथ्यों को समझ सकता है। जिसमें चरित्र की पवित्रता है और व्याकरण एवं साहित्य का ज्ञाता है तथा प्रकृति को खुली किताब की तरह पढ़ सकता है, वही शास्त्र की गहराइयों को समझ सकता है। आचार्य कुन्दकुन्द के शास्त्र को आचार्य कुन्दकुन्द की मनोभूमिका में उत्तर कर ही अच्छी तरह समझा जा सकता है।

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जीवन एक रहस्य हैः इन्द्रियों द्वारा उसे नहीं जान सकते

हमारी ज्ञानेन्द्रियों की एक सीमा होती है। हम अपनी इन्द्रियों से ही संदेश ग्रहण करते है। सभी चीजे इस शरीर द्वारा समझी नही जा सकती हैं। निराकार व सूक्ष्म इन्द्रियगोचर नही हैं। रहस्य को रहस्य रहने देना है।Invisible निराकार को जब महावीर,बुद्व न समझा सके तो उसे कोई नहीं समझा सकता है। आत्मा को, निराकार को समझना कठिन हैं। जो अगोचर है उसे इन्द्रियों द्वारा नहीं समझा जा सकता है। जो ईश्वर न बताना चाहे वह हम क्यों जानना चाहतें हो। हम स्वयं को अनुभव द्वारा ही समझ सकते है। ससिम द्वारा असीम को नहीं समझा जा सकता है। मन तर्क से परे नहीं जा सकता है।
मनोविज्ञान ,तन्त्र, मन्त्र,पराशक्तियाँ,पुनर्जन्म ,ईश्वर का अस्तित्व, आत्मा का अस्तित्व,कर्म सिद्वान्त ,प्रकृति का निमार्ण या रहस्य ,सम्बन्धो में विचित्रता अगर अज्ञात है तो उसे अज्ञात ही रहने दो। इसे समझने-समझाने के क्रम में वैसे भी सारे संगठित धर्म कर्म काण्ड बन कर रह गए है। वे कहने कुछ जाते है व अनुयायी समझते कुछ ओर हैं। सत्य इस प्रक्रिया में लुप्त हो जाता है।

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साहित्य व प्रेरक साहित्य में अन्तर

साहित्य मे बात अप्रत्यक्ष ढंग से कही जाती है । इसमे बात कलात्मक ढंग से लीखी जाती है । सांकेतिक बात होती है । प्रतीक के माध्यम से रचनाकार अपनी बात रखता है । बात तरीके से परोसी जाती है । बिम्ब के बहाने बात होती है, कई बार पीछे के रास्ते से तथ्य रखे जाते है । रचनाकार बड़ी नम्रता दिखाता है । साहित्य हमला तीखा करता है लेकिन धीरे से करता है । साहित्य में शाश्वत व सौंदर्य को ध्यान मेें रखा जाता है । जिसको समझना है वो समझ जाते हैं । बात हौले से कही जाती है । प्रत्यक्ष नहीं होने के कारण विवाद की गुंजाईश नहीं रहती है । पाठक को इसमे स्वयं को डूबना होता है । पाठक अपनी रूची व भूमिकानुसार समझ लेता है ।
प्रेरक साहित्य आक्रामक भाषा में होता है । प्रेरक साहित्य में विद्या, शिल्प व रूप का अभाव होता है । इसमे प्रत्यक्ष बात रखी जाती है । यह कई बार गणितिय भाषा में भी होती है । ‘‘एलकेमिस्ट’’ पाउलो कोएलो की साहित्यक रचना है । हू मुवड माई चीज एक प्रेरक रचना है । इसमेे प्रासंगिकता का भाव प्रबल होता है । क्षणिक सामयिकता शाश्वत मूल्य या बोध को खा जाती है।
आजकल जो प्रत्यक्ष बात सिखाई जाती है, उसमे पाठक का अहं आड़े आता है ।

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देह गगन के सात समंदर : सैन्नी एवं स्नोवा का आत्म खोजी उपन्यास:

देह गगन के सात समंदर वैसे एक कथ्य व शैली के हिसाब से उपन्यास है लेकिन वास्तव में यह एक आधुनिक उपनिषद की तरह है ।यह उपन्यास नहीं बल्कि जीवन शास्त्र है । इसमें स्वयं की खोज एवं स्वयं को पाने का वृतान्त है ।

सैन्नी एवं स्नोवा
सैन्नी एवं स्नोवा

यह एक रहस्यदर्शी, दार्शनिक एवं अन्र्तयात्रा वृतान्त है जो स्वयं की खोज में लगे हुए है । नायक एवं उसकी टोली देह के पार की अन्वेशक है । यह आत्मखोज परक उपन्यास है ।
प्रेम एवं मैत्री, अस्तित्व एवं सौन्दर्य, पुरूष और स्त्री एवं धर्म एवं अध्यात्म पर इसमे गहन चर्चा की हुई है । शब्द के पार जाने की कला इसमे बतायी हुई है । कला एवं कलाकार, कविता एवं साहित्य, मन एवं उसके पार पर बहुत विस्तृत चर्चा है ।

स्त्री व पुरूष सम्बन्धों में गहराई व आत्मीयता बढ़ने से जीवन का रहस्य समझा जा सकता है । पारम्परिक ढर्रे पर जीने से बेहोशी बढ़ती है । स्त्री-पुरूष सम्बन्धों में अपूर्णता जीवन में अपूर्णता का कारण है । स्वयं को जानने की दिशा में यह एक मार्ग है । अपने भीतर के विपरित लिंग से मिलने में बाहर का साथी मात्र सहायक है । असल तो अपनी ही देह के विपरित लिंग से मिलना है। दूसरों के बहाने हम अपने ही ठिकाने तलाश रहे हैं । सजगता व्यक्ति को नये आयाम देती है ।

नर-नारी के स्वाभाविक देहयोग और देहभोग तक से डरते रहेगें, जिसके बिना हम न स्वयं को जान सकते है, न ही दूसरे को । दमन व भय ने नारी को अधुरा बना दिया है । वह समर्पण व प्रेम से वंचित होने से खण्डित है ।
आज देह लोलुपता के विकास की जगह सहभागी चेतना का विकास आवश्यक है।आत्मा स्थिर या तैयार नहीं होती है । यह एक घटना है, संज्ञा नही है । इसे रचना पड़ता है । इसका निर्माण दृष्टा होने पर होता है ।

इसके लेखक मनाली के रहने वाले सैन्नी एक यायावर है जो हिमालय में घुमते हुए अपनी खोज में व्यस्त है। परम्परागत व संगठित धर्मों के विरूद्ध है। सच्चे अध्यात्म के राही है।