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दिवाली की शुभकामनाएं

हम  चाहे लाख दिये और
मोमबत्तीया जलाऐ इनसे
हमारे  जीवन में रोशनी
होने वाली नही।

असली दिवाली तो उस दिन
ही समझना जिस दिन हमारे
भीतर का दिया जले।

उससे पहले तो सब अंधकार
ही है ।

और राम के घर लौटने
से हमारा  क्या लेना देना,
बात तो उस दिन बनेगी
जब हम अपने
भीतर लौटोगे

तभी  होगी असली दिवाली l

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थायराइड की गोली निरन्तर लेने से उसके घातक साइड इफेक्ट

एलोपैथि में थाइरोइड ग्रंथी ठीक  नहीं की जाती है बल्कि इस रोग को  मैनेज किया जाता हैl रोग के साथ जीना सिखाया  जाता हैl स्वयं थायराइड ग्रंथी नियमित तैयार हार्मोन मिलते रहने से निष्क्रिय हो जाती हैl

थायराइड ग्रंथी एक महत्पूर्ण यदि उचित मात्रा में गोली न ले तो थकान,सरदर्द ,चिडचिडाहट ,पसीना आना ,धडकनों में अनियमितता, अनिंद्रा आदि हो सकते  हैl  अथार्त अपने डॉक्टर  से डोस  समय समय पर तय करा लेंl

थायराइड की गोली उचित मात्रा में  नियमित लेने से  भी कैल्शियम की कमी हो जाती है,फलस्वरूप धीरे धीरे हड्डीया कमजोर होने से ओस्टीपोरोसिस हो जाता हैl  इससे बदन में दर्द रहने लगता हैl कैल्शियम की कमी आगे चल कर गुर्दो को भी ख़राब करने लगती हैl  नियमित थाइरोइड की गोली लेते रहने से मूड  खराब होना, सरदर्द ,पसीना आना , धडकनों में अनियमितता, दस्त लगना  व हाथों में कम्पन्न भी हो सकते हैंl  लम्बे समय तक गोली लेने पर ह्रदय, अग्नाशय व जिगर  खराब हो सकते हैl

 

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खोए हुए हम खुद है और खोज रहे है भगवान को,सोए हुए हम खुद है और जगा रहे भगवान को

 हमें  अपना तो कुछ  पता नहीं और परमात्मा का पता करना चाहते है,यही विडम्बना हैl सामने पड़े पत्थर को जानते नहीं और विराट में समाये प्रभु को पाने चले हैl  प्रार्थना की जरूरत हमें है,उससे हमारे भीतर शक्ति जगती हैl परमात्मा को हमारी प्रार्थना की आवश्यकता नहीं है l परमात्मा हमारे भीतर है,किसी मूर्ति में छिपा हुआ नहीं हैl खुद को तराशने की आवश्यकता हैl मूर्ति  पूजा उसमे सहायक हो सकती है यदि पूजा समझ के की जाय l

 

 

 

कर्म कांड में डूबा हुआ व्यक्ति परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकता हैlअपने को स्वीकार कर इस क्षण जीने में ही उपलब्धी हैl वर्तमान में जीना ही परम जीवन को पाना है,परमात्मा को उपलब्ध होना हैl  जीवन अन्यत्र  कहीं नहीं ,जीवन अभी और यही हैl

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अन्तर्यात्रा में सहायक ओम साधना

अन्तर्यात्रा में सहायक

स्नायविक शक्ति प्रवाह के प्रति जागने से मन प्रकाशित होता है। प्राण का प्रवाह महसूस होता है जो अन्तर यात्रा में सहायक है। ऊँकार की ध्वनि से उत्पन्न कम्पन हमारे शरीर के स्नायुतन्त्र को संतुलित करते है। इनमें उत्पन्न विकार का शमन करते है।

Pranav Sadhanaओम का बार 2 उच्चारण आन्तरिक सत्संग पैदा करता हैं। शरीर पर पडने वाले प्रभाव देखने की आवश्यकता हैं। इससे शब्द के अर्थ पर ध्यान रहता है जिससे ज्ञानलोक जगता है एवम् आत्मा प्रकाशित होती है। अ, ऊ, म व ओम का उच्चारण अलग-अलग इस तरह करें कि शरीर मे सूक्ष्म कम्पन्न उत्पन्न हो सके । शरीर के प्राकृतिक कम्पन्नों के अनुरूप उच्चारण होने पर ही अनुनाद उत्पन्न होता है । इसलिए इन ध्वनियांे का उच्चारण इस तरह करें कि शरीर में अनुनाद उत्पन्न हो सके । इस तरह के अनुनाद उत्तेजक का कार्य करते हैं एवं अनुनाद के बाद का मौन हमारे होश को बढ़ाता है जो सुक्ष्म तनावों को समाप्त करता है ।
परमाणु सदृश्य मन में उठती तरंग में भी कम्पन्न होता है। ये कम्पन्न चित्त में रहते है। ओंकार से ये कम्पन्न मन में छुपे कम्पन्नों को पुनः जगाते र्है क्यों कि समष्टी में कम्पन्न कभी नष्ट नहीं होते। ऐसे आध्यात्मिक कम्पन्न हमें सहज बनाते है, अपनी याद कराते है। अपना इससे गठजोड भीतर बढता है। चित्त में होने वाले सब कम्पन्न अदृश्य अवश्य हो जाते है, फिर भी परमाणु के कम्पन्न के समान उनकी सूक्ष्म गति अक्षुण्ण बनी रहती है।

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आदर्श स्वास्थ्य एवं जीवन शैली पर पुनर्विचार की आवश्यकता

आरोग्यम् का उद्वेश्य व्यक्ति को स्वास्थ्य के प्रति जिम्मेदार बनाना है। चिकित्सा कार्य सेवा की जगह कमाने का जरिया बन गया है। दवा कम्पनियो ने इसका दोहन व शोेषण शुरू कर दिया है। ऐलोपेथी दवा के प्रभाव से सबसे अधिक मौेते हो रही है। यद्वपि इस विधा ने कई जाने बचाई भी है। हमारा उद्वेश्य ऐलोपेथी का विरोध करना नहीं है। उसका भी योगदान स्वीकार है। विज्ञापन की बदोलत व शार्टकट की खोज ने अन्य विश्वसनीय वेैकल्पिक चिकित्सा को भुला दिया है। चुकि ये मौते तत्समय नही होती है। दीर्घकाल में हानि पहुचाती है , अतः इनसे सम्बन्ध स्थापित करना कठिन है।
हम स्वस्थ रहने हेतु जन्मे है ।शरीर प्रकृति का दिया हुआ उपहार है । हमें उसे संभालना नहीं आता है । प्रकृति अनुरूप नही जीते हैं तभी बीमार होते हैं । प्रकृति की सहज व्यवस्था मनुष्य को स्वस्थ रखने की है । हमारी जीवन शैली रोगों के लिए जिम्मेदार है । मेरा रोग मेरे कारण है। मेरा स्वास्थ्य मेरी जिम्मेदारी है। दूसरो को इस हेतु दोष नही देता हॅू । बच्चा जन्मता स्वस्थ है व बुढापे में बीमार होकर करता है । इस यात्रा में रोग कहाॅ से आया व कौन लाया ? उसके लिये कौन जिम्मेदार है ? Related posts:

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संसार में झंझट/टकराहट स्वाभाविक है, यहाँ कहीं सुख नहीं है :जो है उसका आनन्द लेना सीखो

हम सभी अधुरे है। मन के अधीन जीते है इसलिए समग्रता में नहीं जी पाते है। हम सभी द्वन्द्व में जीते है। जीवन में साकार को ही आधार मानकर जीते है। तर्क के आधार पर जीते है। विचारों के सहारे जीते है इसलिए पूर्णता को नहीं जान पाते है। इसी कारण अधूरे है। इंसान पूर्ण होते ही भगवान बन जाता है। हम अपूर्ण होने के कारण पूरी तरह सुखी नहीं हो सकते है। हर रिष्ते में अपूर्णता है, षिकायतें है। सभी इच्छाएँ किसी की पूरी नहीं हो सकती है। इसलिए यहाँ कोई पूरी तरह सुखी नहीं हो सकता है। कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं होता, दूसरों के सपनों के अनुरूप पूरी तरह नहीं हो सकता है। यहाँ हमें इन्हीं में मार्ग निकालना पड़ता है। एक दूसरे को सहना पड़ता है। तभी तोे आदर्ष प्रेमी भी षादी के बाद लड़ते देखे जाते है। हम कोई भी पूर्ण नहीं है तो सामने वाले से पूर्णता की आशा क्यों करते हैं? आदर्ष सिर्फ कला जगत में होता है। संसार समझोता है। लोक व्यवहार में यही सब चलता है।
गलती सबसे होती है। गलती इंसान की मजबूरी है एवं यही हमारी सीमा है। भूल हो जाती है। अब सपनों में, चर्चा में वह अपनी गलती स्वीकार कर माफी मांग चुकी है। आपको माफ करना चाहिए। अतीत में बार-बार जाने की जरुरत नहीं है। संसार में जीने हेतु बहुत से जहर पीने पड़ते है। एक जहर यही सही। भौतिक जगत में स्वार्थ ऐसे ही नचाता है। पुत्र की शादी करनी ही है। सर्वश्रेष्ठ बहू होगी तो हमारे पुत्र से ही शादी क्यों रचायेगी। वह भी अपना अधुरापन मिटाने आपके बेटे से ब्याह करती है। अर्थात् वह अपने में पूर्ण नहीं है। उसे जीवन साथी की जरुरत है। किसी पूर्ण को शादी करने की जरुरत नहीं है।
अपनी तरह से श्रेष्ठ व्यवहार करो। यह हमारा सोचा-परखा निर्णय है। अपने पर भरोसा रखों। उन्होंने अच्छे व्यवहार का स्वांग किया होगा। हम असल में बढि़या व्यवहार अपनी तरह से करेंगे, फिर परिणाम जो भी हो। आषंका करके कांटे न बिछाएँ। अपनी नकारात्मकता हानिकारक है।

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आत्मशक्ति/मस्तिष्क की क्षमता: मुनि अजितचन्द्र का महा श तावधान

जैन मुनि अजितचन्द्र सागर जी द्वारा दिनांक 04.03.2012 को मुम्बई में द्विशतावधान का प्रयोग किया गया ।

शतावधान
शतावधान

तीन हजार दर्शकों के साथ-साथ तत्कालिन विधान सभा स्पीकर श्री दिलीप पाटिल, उच्च न्यायालय के न्यायाधिश श्री कमल किशोर तातेड़ एवं न्यूरोलोजिस्ट डाॅ0 सुधीर शाह भी उपस्थित थे । दर्शकों द्वारा 200 प्रश्न व तथ्य रखे गए । जिनमे गणित के सवाल भी थे । मुनिश्री द्वारा सवालों व तथ्यों को पहले क्रमशः बताया फिर उलटा बताया गया । अन्त में लोगों ने प्रश्न क्रम बताया, उन्होने उत्तर दिया । फिर उन्होने उत्तर बताए उन्होने प्रश्न क्रम बताए । इससे हमारी आत्मा की शक्ति सिद्ध होती है ।

मुनि अजितचन्द्र ऊंझा में जन्म लिया एवं 12 वर्ष की उम्र में दिक्षा ग्रहण की । इसके बाद साढ़े छः वर्ष तक मौन रहे । उन्होने बताया कि साधना एवं ध्यान के द्वारा यह उपलब्धि प्राप्त की ।

इससे हमारी मस्तिष्क की अपार क्षमता का ज्ञान हमें होता है । हम उसका कितना प्रयोग कहां कर रहे हंै । चैतन्य-आत्मशक्ति का प्रयोग देख कर प्रेरित होने की आवश्यकता है ।

 

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