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त्रिफला एक अमृत रसायन : कायाकल्प करें व गम्भीर रोग दूर करें

त्रिफला के सेवन से अपने शरीर का कायाकल्प कर जीवन भर स्वस्थ रहा जा सकता है | इस त्रिफला चूर्ण जिसे आयुर्वेद रसायन भी मानता है के सेवेन से  शरीर का कायाकल्प किया जा सकता है | बस जरुरत है तो इसके नियमित सेवन करने की | क्योंकि त्रिफला का 12 वर्षों तक नियमित सेवन हमारे  शरीर का कायाकल्प होता  है |उक्त चूर्ण में हरड,बहेडा व आंवला 1:2:4 की मात्रा होती हैंl

सेवन विधि –

सुबह खाली पेट ताजे पानी के साथ इसका सेवन करें तथा सेवन के बाद एक घंटे तक पानी के अलावा कुछ ना लें | इस नियम का कठोरता से पालन करें |
यह तो हुई साधारण विधि पर आप कायाकल्प के लिए नियमित इसका  प्रयोग  कर रहे है तो इसे विभिन्न ऋतुओं के अनुसार इसके साथ गुड़, सैंधा नमक आदि विभिन्न वस्तुएं मिलाकर निम्नानुसार  ले |
अपनी उम्र जितना रत्ती लेना हैl

 ऋतु मास मिलाये जाने वाली वस्तु का नाम मिलाये जाने वाले द्रव्यों का
अनुमानित अनुपात
ग्रीष्म ऋतु  ज्येष्ठ , आषाढ़

 

गुड़ 1/4  भाग
वर्षा ऋतु

 

सावन और भादो

 

सेंधा नमक 1/8 भाग
शरद ऋतु

 

अशिवनी और कार्तिक

 

देशी खांड के
साथ
1/6 भाग
हेमन्त रितु

 

अगहन और पौष

 

सौंठ का
चूर्ण के साथ
1/6 भाग
शिशिर ऋतू

 

 माघ, फागुन,

 

पिप्पली
चूर्ण के साथ
1/8 भाग
बसंत ऋतू

 

 चेत्र , वैसाख

 

शहद के साथ चाटा जा सके
इतनी मात्रा में

इस तरह इसका सेवन करने से एक वर्ष के भीतर शरीर की सुस्ती दूर होगी , दो वर्ष सेवन से सभी रोगों का नाश होगा , तीसरे वर्ष तक सेवन से नेत्रों की ज्योति बढ़ेगी , चार वर्ष तक सेवन से चेहरे का सोंदर्य निखरेगा , पांच वर्ष तक सेवन के बाद बुद्धि का अभूतपूर्व विकास होगा ,छ: वर्ष सेवन के बाद बल बढेगा , सातवें वर्ष में सफ़ेद बाल काले होने शुरू हो जायेंगे और आठ वर्ष सेवन के बाद शरीर युवाशक्ति सा परिपूर्ण लगेगा |

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वजन घटाने हेतु सूर्य मुद्रा लगाएँ

जो लोग मोटापा और मधुमेह जैसी समस्याओ से ग्रसित है उनके लिए यह योग मुद्रा बेहद ही फायदेमंद है|

विधि:-

  • सूर्य मुद्रा करने के लिए सबसे पहले तो सिद्धासन,पदमासन या सुखासन में बैठ जाएँ ।
  • अब दोनों हाँथ घुटनों पर रख लें और हथेलियाँ उपर की तरफ रहें|
  • अब सबसे पहले अनामिका उंगली को मोड़कर अंगूठे की जड़ में लगा लें एवं उपर से अंगूठे से दबा लें|
  • इस वक्त आपकी बाकी बची हुई तीनों उंगलियों को बिल्कुल सीधी रहने दे|

 

 

लाभ:-

  1. सूर्य मुद्रा को दिन में दो बार 15 मिनट करने से कोलेस्ट्राल घटता है|
  2. शरीर की सूजन दूर करने में भी यह मुद्रा लाभप्रद है|
  3. इसे करने से बलगम, खांसी, पुराना जुकाम, नजला, सांस का रोग, ज्यादा ठंड लगना तथा निमोनिया आदि रोग दूर हो जाते हैंl
  4. इसके नियमित अभ्यास से मानसिक तनाव दूर होता है और भय, शोक खत्म हो जाते है|

5. इसे  नियमित करने से व्यक्ति में अंतर्ज्ञान जाग्रत होता है|

6 .इस मुद्रा के अभ्यास से पाचन प्रणाली ठीक होती है किन्तु यदि आपको एसिडिटी और अम्लपित्त की तकलीफ है तो यह मुद्रा ना करे|

 

सावधानियां:-

  • यदि आपका शरीर बहुत अधिक कमजोर है तो आपकोसूर्य मुद्रा नही करनी चाहिए|
  • सूर्य मुद्रा करने से शरीर में गर्मी बढ़ती है इसलिए गर्मियों में इस मुद्रा करने से पहले एक गिलास पानी पी लेना चाहिए।

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हँस कर रोगों को भगाए

दुनिया में प्रसन्नता नामक औषधि का कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि इसके अनुपात मंे ही शेष दवाइयां काम करती है। हँसी मन की गाँठे खोलती है। प्रसन्नता से मतलब केवल शारीरिक हास्य से नहीं है। भीतरी पवित्रता से उबरने वाला प्रसन्न भाव चाहिए। ऐसे मन की अवस्था मंे न भय होता है न शिकायत और न विरोध।
रोगी को हास्यरस प्रधान कविताएं सुनाकर जो चिकित्सा करने की विधि चली, उसका उद्देश्य भी यही सकारात्मक विचारों के लायक विद्युत् प्रवाह को पैदा करना था।
थकान शरीर में अपच, कब्ज जैसी कुछ बीमारियों को उत्पन्न करके मन के जगत् को घबराहट से भर देती है।। अतः इस बात पर विश्वास पैदा करें कि प्रसन्नता एक देवता है, कल्पवृक्ष है, जो मनोवांछित फल प्रदान करती है। तभी तो जोश बिलिंग्स ने लिखा है कि औषधि मंे कोई आमोद-प्रमोद नहीं है, लेकिन आमोद-प्रमोद में औषधि खूब भरी हुई है।
अब तो वैज्ञानिक ढंग से यह प्रमाणित हो गया है कि मानव शरीर स्वयं ही दर्द निवारक एवं तनाव को कम करने वाले हारमोन्स पैदा करता है। हंसने से इण्डोरफिन नामक हारमोन सक्रिय होता है जो एक प्रभावशाली पेन किलर है।

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लिखने में बाँधाए दूर कर सफल लेखक बने

राईटर्स ब्लाक
एक औसत व्यक्ति अभ्यास के अभाव में सोचता है कि वह लिख नहीं सकता। लिखने के लिए किसी खास कौशल की जरूरत नहीं है। मात्र अभ्यास एवं स्वयं पर विश्वास की जरूरत है। निम्न कारणों से व्यक्ति लेखक नहीं बन पाता है। उन कारणों को राईटर्स ब्लाक कहते है। जिनका विश्लेषण निम्न प्रकार है।ेेेेे
1. टेलेन्ट/प्रतिभा नहीं
कई बार बचपन मंे ठोकरें खाने के कारण या टोका-टोकी के कारण स्वयं को प्रतिभाहीन मान लेते है। ऐसे में हम स्वयं पर भरोसा नहीं करते है। व्यक्तिगत प्रतिभा दब जाती है लेकिन टैलेंट हम में हे ही।
2. रचनात्मकता
मनुष्य मात्र में नया कुछ करने की सहज प्रवृति होती है। लेकिन बचपन के दबाव के कारण व्यक्तित्व कुन्ठित हो जाता है। तब वह नई चीज करने में स्वयं को अक्षम पाता है।writer
3. समय
हम कई बार अपनी प्राथमिकताएँ सही तरह से तय नहीं कर पाते है। ऐसे में हमेशा व्यस्त रहते है। शीथल अवस्था में ही सृजन सम्भव है।
4. भाग्य
कई बार हम अपनी अक्षमताओं को भाग्य का नाम दे देते है। जबकि हम प्रयत्न ही नहीं करते है।
5. लिखने की कला
लिखने के अभ्यास एव थोड़े से प्रयत्न से मार्ग  मिल जाता है l

6.छपेगी नहीं

प्रारम्भ में हमें अपने लेखन पर भरोसा नहीं होता है। वह छपेगा या नहीं, वह छपने योग्य है या नहीं , वह पाठकों को पसन्द आयेगा या नह एवंीं सोचते रहते है इस से मार्ग मिल जाता हैतरह के भय के होने पर लिखना कठिन हो जाता है।

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शौच करने का सही तरीका ताकि बवासीर,लकवा व दांतों के रोग ना हो

विधिपूर्वक शौच करने से दातों के रोग नहीं होते हैl  उषःपान(प्रातः जल सेवन) के बाद कुछ देर घुमने से मलत्याग सरलता से होता हैl

विधि:

भारतीयशैली के टॉयलेट का उपयोग करें l  शौच  हेतु  उकड़ू आसन में बैठेl  पश्चिमी शैली की टॉयलेट के प्रयोग में मलद्वार पूरा नहीं खुलता है नहीं पेट पर दबाव पड़ता हैlशौच करने का सही तरीका

दोनों हाथ ठुड्डी को पकडे रहे व दांत भींच कर रखे l  शौच या पेशाब के समय दांतों के जबड़ों को आपस में दबाकर रखने से दांत मजबूत रहते हैं।

मल छोड़ते वक्त दांतों को और भींचे और श्वास फेकेंl

शौच करते वक्त मुहं बंद रखे l  तत्समय पढ़ना – बोलना उचित नहीं हैl

सहजता से मलत्याग न होने पर कुछ लोग जोर लगाकर शौच करते हैं किंतु ऐसा करना ठीक नहीं हैl

मल आपके स्वास्थ्य को दर्शाता है, बहुत सूखा या पतला, दुर्गन्धयुक्त, चिपचिपा, रक्त या  सफ़ेद झाग युक्त मल रोग को दर्शाता हैl

 

इजरायली शोधकर्ता डॉ. बेरको सिकिरोव ने अपने शोध के निष्कर्ष में पाया कि सिटिंग मेथड कब्जियत का करण बनती है, जिसके कारण व्यक्ति को मल त्यागने के लिए लगभग तीन गुना अधिक जोर लगाना पड़ता है, जिसके कारण चक्कर और हृदयतंत्र की गड़बड़ियों के कारण लोग मर जाते हैं।

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क्षमा प्रार्थी हूँ!

 

मान्यवर,

हमारे अपने कुछ कृत्य बताते है कि मैंने आपके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया।kshama-yachna आपकी उपेक्षा, अनसुनी, मनमाफिक अर्थ निकालने, उपयोग-दुरुपयोग कुछ न कुछ वह किया है जो करने योग्य नहीं था। करके माफी चाहना भी अच्छी बात तो नहीं है, लेकिन दूसरा कोई विकल्प इससे बेहतर नहीं सुझ रहा है। इस भार को कम करने हेतु स्वयं भी माफ करने का भाव रखता हूँ व आपसे यही अपेक्षा है। वैसे भाव का प्रस्फुटन मिलने / चर्चा करने पर उत्तम रहता है। लेकिन मजबूरी है सभी से व्यक्तिगत बात नहीं हो सकती है। अतः पाती को ही भाव समझे।
जयन्ती जैन
मीना जैन
स्वास्थ्य सेतुए ( holistic health forum)उदयपुर

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अन्तर्यात्रा में सहायक ओम साधना

अन्तर्यात्रा में सहायक

स्नायविक शक्ति प्रवाह के प्रति जागने से मन प्रकाशित होता है। प्राण का प्रवाह महसूस होता है जो अन्तर यात्रा में सहायक है। ऊँकार की ध्वनि से उत्पन्न कम्पन हमारे शरीर के स्नायुतन्त्र को संतुलित करते है। इनमें उत्पन्न विकार का शमन करते है।

Pranav Sadhanaओम का बार 2 उच्चारण आन्तरिक सत्संग पैदा करता हैं। शरीर पर पडने वाले प्रभाव देखने की आवश्यकता हैं। इससे शब्द के अर्थ पर ध्यान रहता है जिससे ज्ञानलोक जगता है एवम् आत्मा प्रकाशित होती है। अ, ऊ, म व ओम का उच्चारण अलग-अलग इस तरह करें कि शरीर मे सूक्ष्म कम्पन्न उत्पन्न हो सके । शरीर के प्राकृतिक कम्पन्नों के अनुरूप उच्चारण होने पर ही अनुनाद उत्पन्न होता है । इसलिए इन ध्वनियांे का उच्चारण इस तरह करें कि शरीर में अनुनाद उत्पन्न हो सके । इस तरह के अनुनाद उत्तेजक का कार्य करते हैं एवं अनुनाद के बाद का मौन हमारे होश को बढ़ाता है जो सुक्ष्म तनावों को समाप्त करता है ।
परमाणु सदृश्य मन में उठती तरंग में भी कम्पन्न होता है। ये कम्पन्न चित्त में रहते है। ओंकार से ये कम्पन्न मन में छुपे कम्पन्नों को पुनः जगाते र्है क्यों कि समष्टी में कम्पन्न कभी नष्ट नहीं होते। ऐसे आध्यात्मिक कम्पन्न हमें सहज बनाते है, अपनी याद कराते है। अपना इससे गठजोड भीतर बढता है। चित्त में होने वाले सब कम्पन्न अदृश्य अवश्य हो जाते है, फिर भी परमाणु के कम्पन्न के समान उनकी सूक्ष्म गति अक्षुण्ण बनी रहती है।

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