यदि द्रोण जैसा गुरु उपलब्ध हो तो हम अर्जुन बनना चाहेंगे या एकलव्य?

यदि जीवन में हमें द्रोणाचार्य जैसा गुरु मिले तो हम अर्जुन बनना चाहंेगे या एकलव्य। निश्चित रूप से अधिकांश लोग अर्जुन होना चाहेंगे। वैसे यह निर्णय उचित भी प्रतीत होता है। अतः इस पक्ष का विश्लेषण कर लें।

माना कि अर्जुन धनुर्विद्या सीख रहा है और उसका तीर निशाने से करीब दो इंच चूक जाता है। वह द्रोण के पास जाकर उपाय पूछेगा। गुरु स्थिति देख कर बता देगें कि उसका बाएं पांव पर वजन ज्यादा है, थोड़ा कम कर तीर छोड़ों। वह एक-दो बार में निशाने पर तीर लगा देगा।Eklavya-1

दूसरी तरफ एकलव्य का तीर भी निशाने से दो इंच दूर लगता है। तत्क्षण सहायता के लिए उसके पास गुरु उपलब्ध नहीं है। अर्थात् उसे ‘‘तैयार उत्तर’’नहीं मिलेगा। उसे अपना उत्तर स्वयं खोजना पड़ेगा। इस हेतु वह स्वयं सोचेगा, देखेगा, व चिन्ता में करेगा। बार-बार नए तरीके से तीर चला कर प्रयोग करेगा। उत्तर खोजने के क्रम में हो सकता है उसे रात को नींद न आए व उपाय खोजता रहे। वैसे है दो-तीन दिन में उसे पता लग जाएगा कि उसे बाएं पांव पर जोर अधिक देना है तब वह सफल हो जाए। इस प्रकार वह अपना मार्ग स्वयं खोज लेता है। अर्थात् उसकी निर्भरता दूसरो पर न रहेगी।

अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि विपरीत स्थिति में अपना उत्तर दूसरों की सहायता से खोजने में बुद्धिमत्ता है कि उसे स्वयं खोजना चाहिए। अर्जुन की सहायता प्राप्ति की आदत ने ही कुरुक्षेत्र के मैदान में भी सहायता चाही। वह परिजनों को सामने देख कर युद्धभूमि में घबरा गया। तभी तो कृष्ण ने वहां पर गीता का उपदेश दिया। अर्थात् अर्जुन सदैव मुसीबत में दूसरों की तरफ देखता है जबकि एकलव्य अपना समाधान खुद खोजता है। इससे वह तृप्त व आत्मविश्वास से युक्त रहता है। एकलव्य कोे अपने पर भरोसा अधिक है, वह स्वयं से सन्तुष्ट है क्योंकि दूसरों की तरफ देखने की आदत नहीं है। चुनौतियों का मुकाबला वह अपने तरीके से करता है। जबकि अर्जुन सदैव दूसरों की तरफ ताकता है।

अब मित्रों, पुनः विचार करें कि क्या हमंे मार्गदर्शन चाहने वाला अर्जुन बनना चाहिए या अपनी सहायता आप करने वाला एकलव्य? अब यह तय आपको करना है? द्रोण जैसा कोई गुरु साक्षात् चाहिए या साक्षात् गुरु के बिना भी जीवन को आगे बढ़ाया जा सकता है।

(आभार-एकलव्य एजुकेशन फाउन्डेशन)

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यदि द्रोण जैसा गुरु उपलब्ध हो तो हम अर्जुन बनना चाहेंगे या एकलव्य?&rdquo पर एक विचार;

  1. On PRAKASH gaur

    आप लोग सनातन धर्म की सिर्फ कमियो पे ही ध्यान देते है, जो कि कमी होती नही है। अर्जुन की तुल्ना एकलव्य से कभी की ही नहीं जा सकती, क्युकि अर्जुन का चरित्र आप कभी जां ही नही पायेंगे।जीवन की एक घटना जिसमे अर्जुन का कुछ लेना देना ही नही था उसको अर्जुन की कमजोरी साबित करने के लिये इस्तेमाल कैसे कर सकते है।
    अर्जुन की बाकी जीवन की तपस्या की तरफ आप ध्यान ही नही दे पायेंगे।

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